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सोमवार, 10 सितंबर 2018

अनकहा हो दर्द तब लावा पिघलता है


रजनी छंद गीतिका

इस जगत में जो सभी से प्रेम करता है
वह तपिश में चाँदनी बनकर उतरता है

ईश से जो भी मिले स्वीकार कर लेना
आसरा के साथ ही विश्वास रहता है

कोंपलें उगती वहीं झरते जहाँ पत्ते
रात के ही गर्भ से सूरज निकलता है

हो समर्पण भाव हरसिंगार के जैसा
देखना कैसे वहाँ पर प्यार पलता है

शांत हो, एकाग्र हो, कहते यहाँ सारे
अनकहा हो दर्द तब लावा पिघलता है

मन बसे हैं भाव दोनों राम या रावण
राम को जो जीतता पल पल निखरता है

-ऋता शेखर मधु