शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

सूक्ष्म से साकार तक


सूक्ष्म से साकार तक
आत्मा से परमात्मा तक
मुर्छा से चेतना तक
नई अनुभूतियाँ
कई विसंगतियाँ
सहेजता अंत:करण
कहीं पुष्प की रंगिनियाँ
या कंटकों की है चुभन
कहीं अट्टहास उल्लास है
या अंतस में भरा रुदन
अंतहीन सी राह पर
मंजिल की कोई थाह नहीं
अनवरत चलते रहो
अनवरत जीवन सफ़र
उभर रही संवेदना
लिए हृदय में वेदना
अपेक्षाओं के सिलसिले
शिकवों से भरे दिल मिले
यही काल का चक्र है
कहीं सीधा कहीं वक्र है
प्रेम सीख कर जो चलें
हो जाएँ रस्ते सरल
जीव जन्म का सत्व यही
जीवन का अमरत्व यही|
..........ऋता

सोमवार, 11 नवंबर 2013

कहीं कुछ शाश्वत नहीं


कहीं कुछ शाश्वत नहीं 
कुछ भी तो नहीं 
न अँधेरा न उजाला 
न गीष्म न शरद 
न अमृत न विष का प्याला

शाश्वत हैं सूरज और चंदा
मगर गति शाश्वत नहीं 
दिन होते हर रोज़ 
मगर उजियार शाश्वत नहीं
कभी मेघ घिरे 
कभी धुंध उगे 
कभी ग्रहण की छाया 
हर दिवस सुखद न होता 
यही है प्रभु की माया

निशा आती सांध्य सीढ़ी से 
मगर अंधकार शाश्वत नहीं 
कभी बरसती चांदनी 
कभी अमा का है कहर
कभी तम नैराश्य का 
कभी ग़ज़ल की है बहर

पाप और पुण्य भी 
होते शाश्वत नहीं 
एक के लिए जो शुभ है 
दूसरे के लिए है अशुभ 
बारिश की झमझम बूँदें
कृषक की खुशी बनती
वहीं सावन को देख
रजक को होती कसक

जीवन का आना एक प्रक्रिया है
यह मन में भरता है उजास
जीवन जीना बाध्यता है
उतार चढ़ाव
जीवन सफ़र का सच है
पल में बदल जाते हैं रास्ते
पल में बदल जाते हैं रिश्ते
कई किश्तों में जीते हुए
कहीं सुख पनपते
कहीं दर्द रिसते
पर कुछ भी शाश्वत नहीं

मौत भी शाश्वत नहीं
कहीं बिन बुलाए आती है
कहीं बुलाने पर मुँह छुपाती है
जवानी में मरने की इच्छा
बुढ़ापे में जीने की इच्छा जगाती है
श्मशान ही मंजिल है सबकी
मगर सबको वह नसीब नहीं
सुनामियों में बहने वाले
कब घाट पर जलते हैं ?
कहीं शव पर होती 
अश्रुओं की बारिश
कहीं वह पड़ा है लावारिस
कुछ भी तो शाश्वत नहीं

स्वर्ग से लौट कोई आया नहीं
नरक भी किसी ने बताया नहीं
जैसे होते हैं करम
हम वैसा ही फल पाते हैं
स्वर्ग नरक है इसी जहाँ में
कल्पना में क्यूँ भरमाते हैं
भूत को जी लिया
वर्तमान में डरे हुए
भविष्य को संजो लिया
जितना  जी लिया
वे पल शाश्वत हैं

आज क्या होगा
कोई नहीं जानता
भविष्य तो अनिश्चित है ही
बड़े बड़े भक्तों को हमने
तड़प तड़प कर मरते देखा
जिसने कभी न धूप दिखाया
बिना कष्ट के उठते देखा
जीना है तो जीना है
बाकी विधि के हाथ में है
कभी किसी का ना हो बुरा
सोच की यह निधि साथ में है
पर सोच भी तो शाश्वत नहीं

सरल से विरल में जाती
उम्र के पड़ाव के साथ
कभी प्रेम कभी वेदना गाती
नम्रता के चोले में
कठोरता भी अपनाती
कभी सिद्धांत बनाती
कभी तोड़ आगे बढ़ जाती
कहीं कुछ शाश्वत नहीं 
कुछ भी तो नहीं !!!!!!
.................ऋता

शनिवार, 9 नवंबर 2013

कटीली बेड़ियाँ


कई कटीली बेड़ियाँ हैं धर्म की और जात की
जीवन के शतरंज पर शह की और मात की
खिलखिलाते बहार पर निर्दयी तुषारपात की
भोले भाले मेमनों पर शेर के आघात की
इर्ष्या के भाव से जुटे हुए प्रतिघात की
सिसकियों में डूबी बेबस से हालात की
कोख में दम तोड़ती निरीह कन्या जात की
धन और मेधा में हो रहे पक्षपात की
कुर्सियों की होड़ में हो रही मुलाकात की
तेरी मेरी, मेरी तेरी के झगड़ों जैसी बात की

तोड़ना है बेड़ियों को सुकर्मों की तलवार से
खेना है देश की नइया सुविचारों की पतवार से
परवाह कभी करें नहीं पग लहुलुहान जो हो जाएँ
अविचल अडिग चाल से पुष्प राहों पे बो जाएँ |
....................ऋता

बुधवार, 6 नवंबर 2013

प्रतिक्रियाएँ....

http://thalebaithe.blogspot.in/2013/07/sp229.html#comment-form

ठाले बैठे ब्लाग पर मेरे कुछ दोहे प्रकाशित हुए थे जिन्हें ऊपर ले लिंक पर देखा जा सकता है...
वहा़ पर आदरणीय अरुण निगम सर ने मेरे प्रत्एक दोहे के लिए प्रतिक्रियास्वरूप एक दोहा लिखा...उन्हे इस ब्लौग पर साभार सहेज रही हूँ...साथ में सौरभ पाण्डेय सर की प्रतिक्रिया भी प्राप्त हुई थी ...उसे भी साभार दे रही हूँ...




ऋता- सद्गुणियों के संग से, मनुआ बने मयंक
ज्यों नीरज का संग पा, शोभित होते पंक

@कमल मलिन कब है सुना, निर्मल बसता ताल
पंक स्वयम् ही बोलता, यह गुदड़ी का लाल




ऋता- चंदा चंचल चाँदनी, तारे गाएँ गीत
पावस की हर बूँद पर, नर्तन करती प्रीत

@बूँद समुच्चय जब झरे,झर-झर झरता प्यार
बूँद समुच्चय जो फटे, मचता हाहाकार




ऋता- शुभ्र नील आकाश में, नीरद के दो रंग
श्वेत करें अठखेलियाँ, श्याम भिगावे अंग

@श्वेत साँवरे घन घिरे,लेकिन अपना कौन
गरजे वह बरसे नहीं, जो बरसे वह मौन




ऋता- हिल जाना भू-खंड का, नहीं महज संजोग
पर्वत भी कितना सहे, कटन-छँटन का रोग

@पकड़-जकड़ रखते मृदा,जड़ से सारे झाड़
ज्यों-ज्यों वन कटते गये, निर्बलहुये पहाड़




ऋता- महँगाई के राज में, बढ़े इस तरह दाम
लँगड़ा हो या मालदा, रहे नहीं अब आम

@आम खड़ा मन मार कर, दूर पहुँच से दाम
लँगड़ा खीसा हो गया,दौड़े लँगड़ा आम



नवीन भाईजी के सौजन्य से ही ऋता शेखर मधु के बारे में सुना-जाना.
आभार नवीन भाईजी.

मन का आकाश सुभावनाओं के घने मेघों से अच्छादित हुआ संतृप्त हो जाय तो सरस अनुभूतियों की झींसियाँ अनवरत झहरती रहतीं हैं ! रस-विभोर हृदय मनसायन हुआ मद्धिम तरंगों से झंकृत होता रहता है.. अनवरत !
ऐसे में सहजता विस्फारित आँखों मनोरम रंगों को अनायास आकार लेता देखती है. उन्हें छूती है और बूझने का निर्दोष प्रयास करती है. इसी सहजता को वर्तमान ने ऋतु शेखर मधु का नाम दिया है.

आज के दिन इस प्रकृतिप्रिया को अग्रज की ओर से जन्मदिन की अनेकानेक शुभकामनाएँ--

शब्द-भाव कोमल मृदुल मधुरस ऋतुपग छंद
विह्वलता अन्वेषमय, आवेशित मकरंद

छंद-रचना पर ढेर सारी बधाइयाँ.
शुभ-शुभ

  1. ठेस-टीस
    धिया, जँवाई ले गये, वह, उन की सौगात
    बेटे, बहुओं के हुये, चुप देखें पित-मात-ऋता
    *********************************
    सास यही कल थी बहू,यही पिता था पूत
    बोये पेड़ बबूल के , चाह रहे शहतूत |
    Reply
  2. उम्मीद
    बूढ़ी आँखें है विकल, कब आएगा लाल
    रात कटे उम्मीद में, अब पूछेगा हाल - ऋता
    *****************************
    मरने भी देती नहीं ,उम्मीदों की डोर
    रातें ढाढस बाँधती , धीर बँधाते भोर |

    सौन्दर्य 
    "गर्भवती मुख-रूप" का, कैसे करूँ बखान
    रविकर जैसा तेज, पर, शीतल चंद्र समान- ऋता
    *******************************
    "गर्भवती मुख-रूप" की, सुंदरतम तस्वीर
    संग-संग खिलते दिखें,मुखपर अरुण सुमीर|
  3. आश्चर्य
    अजब अजूबों से भरा, ब्रह्मा का संसार
    कोमल जिह्वा क्रोध में, उगल पड़े अंगार - ऋता
    ****************************
    लपट नहीं दिखती कभी,और न उठता धूम्र
    सुनने वाला आग में , जलता सारी उम्र |

मंगलवार, 5 नवंबर 2013

दीये ये कच्चे

1

दीये ये कच्चे

धुन के बड़े पक्के

बच्चों -से सच्चे |

2

नेह का दीप

घृत हो विश्वास का

अखंड जला|

3

चाक जो घूमा

सर्जक का सृजन

सुगढ़ दीप |

4

मिलके रहे

दीप तेल वर्तिका

तभी लौ बने |

5

चंदा को ढूँढ़े

दीपक की बारात

अमा की रात |

6

गौरवशाली

दीवाली में भारत

सौरभशाली |

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

इक दीया हाथों में लेकर द्वार द्वार हम घूमे












इक दीया हाथों में लेकर
द्वार द्वार हम घूमे

वह गरीब कि कुटिया थी
जहां नहीं था पेटभर खाना
दिनभर के श्रम से जुटा था
पावभर चावल का निवाला
मिल बाँट कर खा पी कर
तत्क्षण वे संतुष्ट हुए
श्रम बूँद जब पास है उनके
कल की कल देखी जायेगी
स्नेह-दीप से रौशन घर को
दीये की नहीं जरुरत थी

इक दीया हाथों में लेकर
द्वार द्वार हम घूमे

वह ज्ञान का मंदिर था
जहां नहीं था कोई प्रपंच
न तो कोई अपराधी था
न कोई बनता था सरपंच
अंतरात्मा बड़ी सजग थी
नैतिकता का राज था
अमीर गरीब के भेद से दूर
विद्या ही वरदान था
ज्ञान-दीप से जगमग घर को
दीये की नहीं जरुरत थी

इक दीया हाथों में लेकर
द्वार द्वार हम घूमे

वह शहीद कि देहरी थी
जहां हसरतें दबी पड़ी थीं
आँखों में भरकर सन्नाटा
होठों पर सिसकी सुबक रही थी
चिरागे-कुल वतन को देकर
गहन तिमिर में डूबा घर
पर  कहीं कोई शिकवा थी
न कहीं दिखा था उपालम्भ
त्याग-दीप से रौशन घर को
दीये की नहीं जरुरत थी

इक दीया हाथों में लेकर
द्वार द्वार हम घूमे

वह वृध्दों का आश्रम था
जहां बिखरे  थे  टूटे  सपने
पोपल मुंह खांस खांस कर
ढूंढ रहे थे कोई अपने
जिन पांवों को शक्ति दी थी
जाने किन राहों पर मुड़ गये
जिन पंखों को विस्तार दिया
आज़ाद परिंदे बन उड़ गए
उन अशक्त बुझी नजरों को
दीयों की सख्त जरुरत थी

इक दीया हाथों में लेकर
उस द्वार पर हम रख दिए !!!!
.....................................ऋता
दीपावली कि हार्दिक शुभकामनायें !!