सूक्ष्म से साकार तक
आत्मा से परमात्मा तक
मुर्छा से चेतना तक
नई अनुभूतियाँ
कई विसंगतियाँ
सहेजता अंत:करण
कहीं पुष्प की रंगिनियाँ
या कंटकों की है चुभन
कहीं अट्टहास उल्लास है
या अंतस में भरा रुदन
अंतहीन सी राह पर
मंजिल की कोई थाह नहीं
अनवरत चलते रहो
अनवरत जीवन सफ़र
उभर रही संवेदना
लिए हृदय में वेदना
अपेक्षाओं के सिलसिले
शिकवों से भरे दिल मिले
यही काल का चक्र है
कहीं सीधा कहीं वक्र है
प्रेम सीख कर जो चलें
हो जाएँ रस्ते सरल
जीव जन्म का सत्व यही
जीवन का अमरत्व यही|
..........ऋता
