शनिवार, 11 जनवरी 2025

पाँच लघुकथाएँ - ऋता शेखर

1. असर कहाँ तक

"मीना अब बड़ी हो गई है। उच्च शिक्षा लेने के बाद नौकरी भी करने लगी है। कोई ढंग का लड़का मिल जाये तो उसके हाथ पीले कर दें !" चाय पीते हुए सरला ने पति से कहा।

     "हाँ, बेटी के पिता को दिल पर पत्थर तो रखना ही होता है। बेटी को खूब पढ़ाया-लिखाया और वह अब नौकरी भी करने लगी है। फिर भी, उसे विदा तो करना ही है।"

     "किसे विदा करना है पापा?" मीना जाने कब कमरे में आ गई थी।

     "तुम्हें विदा करना है, और किसे। उसी पर बातें हो रही है।" माँ  ने बेटी से कहा।

     "पर मुझे तो यहीं रहना है। मैं अपना घर-द्वार, सखी-सहेलियों को छोड़कर दूसरे घर क्यों जाऊँगी माँ। मेरी नौकरी है तो आर्थिक रूप से आपको किसी पर बोझ नहीं बनने दूँगी।"

      "यही समाज का नियम है। विवाह तो करना ही होता हैं।" माँ ने उसे समझाते हुए कहा।

      "मैं यह नियम मानने से इनकार करती हूँ। विवाह कर मैं किसी को मानसिक प्रताड़ना नहीं दे सकती। कोई भी विरोध अपने घर से आरम्भ होना चाहिए।" मीना के स्वर में दृढ़ता झलक रही थी।

      "कैसी प्रताड़ना देने की बात कर रही हो मीना?"

      "वही, जो आज तक आप पापा को देती आई हो।"

      "मैंने क्या किया है?" बेटी के इस आरोप से सरला घबरा गई।

      "आप हमेशा पापा पर अहसान जताती रही हो, कि विवाह कर, अपने सबों को छोड़कर आप यहाँ आईं। पापा उस समय खुद को अपराधी समझने लगते हैं। आपको भी तो पता था कि यह समाज का नियम है। घरवालों को नहीं छोड़ना था तो अपने ही घर रहना चाहिए था। माना कि पहले के समय आर्थिक मजबूरी रहती थी। लड़की विरोध नहीं कर सकती थी। अब तो ऐसी बात नहीं है।"

      "ये तू क्या बोले जा रही है मीना?"

      "सही तो कह रही हूँ माँ, विवाह एक सामाजिक बंधन है। विवाह के बाद घर छोड़ने के त्याग को बार-बार कहकर किसी को अपराध बोध से ग्रसित रखना भला क्यों? मुझे कोई जबरदस्ती तो अपने घर नहीं ले जा सकता। विरोध मेरा ही है कि मुझे कहीं नहीं जाना।"

      मामूली नोक-झौंक का बेटी पर इतना गहरा असर देख सरला स्तब्ध रह गई। पिता ने पुत्री को निहारा और पीठ पर स्नेह का हाथ रख दिया।


2. सुपर मॉम

"भैया, मम्मी को पहले भी जब थकान लगी थी, तो उस वक्त आपने दिखाया क्यों नहीं?"

     "मम्मी तो सुपर मॉम हैं। सब कुछ सम्भाल लेती हैं। कभी उन्हें थकते नहीं देखा। काम करते हुए थोड़ी बहुत थकान तो हो ही जाती है, इसमें कौन-सी बड़ी बात है। लेकिन तुझे कैसे पता कि मॉम को थकान लग रही थी।" भैया ने सफाई देते हुए कहा।

     "मैं परसों भी आई थी। अपने लिए कभी कुछ न कहने वाली मॉम ने हताश स्वर में कहा था--"बहुत थकान लग रही है। चलते हुए लगता है कि अभी गिर पड़ूँगी।" 

      "मैंने कहा था कि डॉक्टर के यहाँ चलते हैं। उन्होंने कहा--"नहीं, डॉक्टर की जरूरत नहीं, वैसे ही ठीक हो जाउँगी। पहले भी कई दफा ऐसा हुआ है, फिर अपने आप ठीक भी हो गई थी।"

      बहन ने एक कागज़ थमाते हुए भाई से कहा--"मैंने उसी दिन उनका ब्लड टेस्ट करवाया था। भैया, ये आपकी सुपर मॉम की ब्लड रिपोर्ट आई है।"

      "ओह ! विटामिन 'डी' और हीमोग्लोबिन, दोनों इतना कम।" रिपोर्ट भैया के हाथों में फड़फड़ा रही थी।

       "तुम दोनों बेकार ही परेशान हो रहे हो। मैं तुम दोनों के लिए कुछ बनाकर लाती हूँ।" माँ ने बात टालने के लिए कहा।

       "आप सुपर मॉम हो। मेटल मॉम नहीं।" कहते हुए भैया ने माँ को कुर्सी पर बैठा दिया और खुद रसोई में चले गए।

       "माँ, यह आपकी भी भूल थी कि खुद को न थकने वाली मशीन समझा। अब दवाएँ समय पर लेते रहें और स्वयं को स्वस्थ रखें। पढ़े लिखे होने का यह फायदा दिखना चाहिए।" बेटी और बेटा एक साथ चिर्रा पड़े। 

       बच्चों की झिड़की सुन, माँ को अपनी माँ की याद हो आई। शरीर में हड्डियों का घनत्व कम होने के कारण ऑस्टियोपोरोसिस का शिकार होकर वह दस वर्षों तक बिस्तर से उठ ही नहीं पाई थी। काश उस समय यही बात मैंने भी, अपनी माँ को कही होती?


3. छाया दान

एक-एक कर सारे गमले ठेले पर चढ़ाए जा रहे थे। आदित्य बाबू हर गमले की पत्तियों पर हाथ फिराते, फिर जाने देते। बड़े नावनुमा गमले में बरगद का बोनसाई था। जिसमें तीस वर्षों से उनकी पत्नी वट सावित्री पूजा करती आई थी। एक बार पानी की टँकी बेकार हो गयी तो उसमें मिट्टी भरकर आम का वृक्ष लगाया गया था, ताकि सत्यनारायण की पूजा में आम के पल्लव मिल सकें। वैसे ही दान के लिए आँवले का पेड़ और शिव पूजन के लिए बेल का पेड़ भी लगा हुआ था। तीन तल्ला घर में ऊपरी छत पर पूरा एक बगीचा सुशोभित था।

      अब गुलाब के गमले ठेले पर जाने लगे। सफेद, लाल, गुलाबी, काले, पीले गुलाब; सबका अपना-अपना महत्व और सबकी अपनी-अपनी सुंदरता थी।

      इसी तरह बोगनविलिया, जिनिया, लिली, चमेली, बेली, कनेर, अपराजिता, अड़हुल, मीठा नीम के पौधे भी घर से निकलने लगे। हर पौधे के साथ आदित्य बाबू की आँखों मे नमी बढ़ती ही जा रही थी।

       तभी, पड़ोसी अरुण बाबू ने उनका हाथ थाम लिया और बोले--"पूरा बगीचा किधर भेज रहे भाई। क्यों हटा रहे हो यह सब?"

      आदित्य बाबू बोले--"रिटायरमेंट के बाद, यह शहर छोड़कर जा रहा हूँ भाई। अब बच्चे जिस शहर में रहेंगे, वहीं हम भी रहेंगे। पेड-पौधों को सूखने के लिए नहीं छोड़ सकता।" आवाज में दर्द साफ झलक रहा था।

      "तो इन्हें पड़ोसियों में बाँट देते भाई।"

      "बात तो सही है अरुण बाबू, लेकिन किसी पर अवांछित बोझ नहीं डाल सकता। इसे नर्सरी वालों के हवाले कर रहा हूँ। वही इसकी कीमत समझेंगे। कोई वहाँ से पैसे देकर खरीदेगा तो वह भी कीमत जानेगा।"

      "कितने पैसे दे रहा है नर्सरी वाला?"

      "दान में दी जा रही वस्तु की कीमत नहीं ली जाती।"

       तभी, पास खड़ी अरुण बाबू की माँ बोल पड़ीं--"यह छाया दान है बेटा, पर्यावरण रक्षा के लिए इस दान का बहुत पुण्य मिलेगा तुम्हें ! इन्हें हम अपने घर ले जाते हैं। इनके सहारे तुम्हारा स्नेह भी हमें याद आता रहेगा।"

       आदित्य बाबू ने झुककर माता जी के पाँव छू लिए।


4.परछाई

जीवन के उतार-चढ़ाव समझने की कोशिश में वह थोड़ा परेशान रहने लगा था। एक दिन, प्रोफ़ेसर ने उससे कहा--"वह सूरज उगने के साथ ही उठे और सूरज की ओर मुँह करके बैठ जाए। उसके बाद उसकी जो परछाई बनेगी, वह दिन के पहर बीतने के साथ-साथ कैसे-कैसे बदलती है, उसे लिखता जाए और मुझे दिखाया करे।"

      आज उसने यही करने का फैसला किया। सूरज उगा, वह भी उठा और एक खुली जगह पर आसन जमा लिया। सुबह, दोपहर, शाम और रात की परछाई का सर्वेक्षण था। निर्देशानुसार मुँह हमेशा पूरब की ओर ही रखना था। रात को वह प्रोफेसर के घर पहुँचा। प्रोफेसर ने उसे सर्वेक्षण पढ़ने को कहा। उसने पढ़ना शुरू किया--"सुबह में, लम्बी सी परछाई मेरे पीछे थी। दोपहर को वह मेरे आस-पास सिमट आई थी। शाम को परछाई फिर से लम्बी हुई। लेकिन शाम के समय वह मेरे आगे की तरफ थी। रात में तो बिल्कुल ही गायब हो गई थी। हाँ, एक बार दिन में परछाई धूमिल भी हुई थी। यह तब हुआ, जब आसमान में बादल आये थे।"

      प्रोफेसर ने उससे कहा--"तो समझ लो कि सूर्य जीवन है और परछाई है, यह जमाना। मनुष्य जब जन्म लेता है तो अपनी ऊर्जा, अपनी सफलता से पूरे जमाने को अपने पीछे चला सकता है। सफलता की ऊँचाई पर सारा जमाना उसके इर्द-गिर्द सिमटा रहता है। जीवन की संध्या में उसे जमाने के पीछे चलना होता है, और फिर मिट जाना होता है। मनुष्य मात्र एक बिम्ब है, जो सफलता की परछाइयाँ बनाता हुआ, एक दिन मिट जाता है। बादलों के कारण परछाई धूमिल हो सकती है, पर कुछ देर के लिए ही।"

      उसने अपनी उम्र देखी। और परछाइयों को अपने इर्द-गिर्द समेटने के लिए निकल पड़ा।


5. बेटी बड़ी हो गई

"आज हमारी बिटिया अट्ठारह साल की हो गई। अब तुम अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकोगी। मैं मतदाता सूची में तुम्हारा नाम दर्ज करवा देता हूँ।" पुत्री के अट्ठारहवें जन्मदिवस पर पिता ने बिटिया को बधाई देते हुए कहा।

     "लेकिन पापा, मैं तो चार वर्ष पहले ही बड़ी हो गई थी।"

     "अच्छा ! ये आपको किसने बताया?"

      "चार वर्ष पहले ही दादी ने कहा था कि अब मै बड़ी हो गई हूँ, और मुझे लड़कों से दूर रहना है।"

      मातृ-विहीन बिटिया को उसके पिता शारीरिक रूप से बड़े हो जाने और बौद्धिक रूप से उम्र का फर्क, चाहकर भी समझा नहीं सके थे।

*****

ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 8 दिसंबर 2024

मध्य में क्या

 जिंदगी की स्लेट पर

जन्म या मृत्यु लिखना

आरम्भ और अंत है।

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य वृहद उपन्यास है।


जन्म तो संयोग है

मृत्यु एक वियोग है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य मिलन का पर्याय है।


जन्म एक भोर है

मृत्यु निशा की ओर है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य चिलचिलाती धूप है।


जन्म उन्नयन है

मृत्यु अवनयन है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य उतार चढ़ाव है।


जन्म जो मुखड़ा है

मृत्यु भी तो टेक है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य अंतरे का विस्तार है।


जन्म गंगोत्री है

मृत्यु सागर समागम है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य ऊँची नीची धारा है।


जन्म जब बीज है

मृत्यु विशाल ठूंठ है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य फूल और काँटें हैं।


जन्म मतला है

अंत मकता है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य ग़जल है।


जन्म है अनुक्रम

मृत्यु है मतिभ्रम

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य  कथा है।


जन्म  प्रस्फुटन हो

मृत्यु भी विघटन है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य बसंत और पतझड़ है।


जन्म आशा है

मृत्यु में निराशा है

क्या इतना ही जीवन है?

नहीं...मध्य खुशी या अवसाद है।


-ऋता शेखर

शुक्रवार, 20 सितंबर 2024

डमरू घनाक्षरी


डमरू घनाक्षरी - शृंगार रस

वर्णिक छंद- 8, 8, 8, 8 की एक पंक्ति

हर अठकल अमात्रिक - त्रिकल त्रिकल द्विकल से

चार समतुकांत पंक्तियाँ


अनत जगत यह, सरल सहज वह,

करत नयन नत, मदन भजन रत।1

कमल नयन लख, चरण शरण रख,

असत गरल हत, नमन करत शत।2

तपन सहन कर, हवन भवन धर,

धरम करम गत, फलत रमन तत।3

बरस सघन घन, हरष रतन मन।

बढ़त फसल सत, मगन सदन बत। 4

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द्वितीय छंद


चमक दमक कर, कनक कलश  भर,

चलत अचल हल, जनमत सिय थल।1

चहक चहक खग, नटत अयन मग,

चहल पहल ढल, मगन भवन तल।2

जनक नगर घर, लखन दरस कर,

हरष हँसत जल, नवल कँवल दल।3

सकल चयन कर, वरण रमण वर,

सरल सहज पल, झरत सरस फल।4

- ऋता शेखर

गुरुवार, 29 फ़रवरी 2024

महिला दिवस विशेष १- भारतीय सिनेमा के निर्माण में महिलाओं की भूमिकाएँ

 भारतीय सिनेमा के निर्माण में महिलाओं की पार्श्व भूमिकाएँ – ऋता शेखर ‘मधु’

सिनेमा को सबसे लोकप्रिय कला माध्यम के रूप में देखा जाता है।

एक वक्त था जब भारतीय सिनेमा में महिलाओं को फिल्मों में काम करना या फिर पर्दे पर

महिलाओं का दिखना अच्छा नहीं समझा जाता था लेकिन आज महिलाएं न सिर्फ फिल्मों में किरदार

निभा रही हैं बल्कि फिल्मों में निर्माता, निर्देशक, पटकथा लेखन, गीतकार, संगीतकार का भी काम

कर रही हैं।

इस आलेख में सिनेमा के निर्माण में पर्दे के पीछे से सहयोग देने वाली महिलाओं की चर्चा करेंगे|

१.निर्माता,निर्देशक,पटकथा लेखन २.गीतकार एवं ३.संगीतकार

१. निर्माता, निर्देशक एवं पटकथा लेखक के रूप में महिला

१.फातिमा बेगम

फातिमा बेगम का जन्म 1892 में एक मुस्लिम परिवार में हुआ था।

फातिमा बेगम पहली महिला फ़िल्म निर्देशक बनीं जिन्होंने रूढ़िवादी विचारों को तोड़कर इस दुनिया में

कदम रखा था और सिनेमा जगत को नया आयाम देने का काम किया। फातिमा बेगम न सिर्फ

भारत की पहली फिल्म निर्देशक हैं बल्कि अपने दौर की प्रसिद्ध अभिनेत्री भी रही हैं। उन्होंने पटकथा

लेखक के तौर पर भी काम किया है।

1926 में पहली बार फातिमा ने ‘बुलबुल-ए-परिस्तान’ नामक फिल्म का निर्देशन किया था और सिनेमा

में निर्देशन करने वाली पहली महिला बनने का भी खिताब जीता। 1926 में इस फ़िल्म का निर्देशन

करने के बाद फातिमा को काफी कुछ झेलना पड़ा। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और 1928 में

फिल्म रांझा, 1929 में फिल्म शकुंतला का निर्देशन किया।

२.जोया अख्तर

जोया अख्तर एक भारतीय फिल्म निर्देशक-लेखक हैं। जोया अख्तर बहुत ही कम समय में अपनी

कड़ी मेहनत से बॉलीवुड के सफल निर्देशकों में शुमार हो चुकीं हैं।

जोया का जन्म 14 अक्टूबर 1972 को मुंबई में जावेद अख्तर के घर में हुआ था। जावेद अख्तर

बॉलीवुड के मशहूर लेखक,कवि हैं। इनकी माँ का नाम हनी ईरानी है, जोकि एक बॉलीवुड अभिनेत्री

है।

जोया की पहली निर्देशित फिल्म ‘लक बाय चांस’ थी, जिसे दर्शकों और आलोचकों नें काफी सराहा था।

फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छी कमाई की| ज़ोया को पहचान फिल्म ‘जिंदगी ना मिलेगी दुबारा’

से मिली। ज़ोया को इस फिल्म के लिए फिल्म फेयर के बेस्ट डायरेक्टर अवार्ड से भी सम्मानित

किया गया।

उनकी प्रसिद्ध फ़िल्में हैं- दिल धड़कने दो, ज़िंदगी मिलेगी ना दुबारा, लक बाय चांस, बॉम्बे टॉकीज,

तलाश।

३. रीमा कागती

रीमा कागती भारतीय फिल्म निर्देशक और स्क्रीनराइटर हैं। रीमा ने हिंदी सिनेमा में बतौर निर्देशक

फिल्म ‘हनीमून ट्रेवल्स प्राइवेट लिमिटेड’ से डेब्यू किया था।


रीमा कागती का जन्म गुवाहटी, असम में हुआ था। उन्होंने मुंबई स्थित सोफिया कॉलेज से इंग्लिश

लिट्रेचेर में स्नातक की डिग्री हासिल की है। साथ ही उन्होंने सोफिया कॉलेज से ही सोशल

कम्युनिकेशन में परा-स्नातक की डिग्री ली है।

रीमा कागती ने अपने करियर की शुरुआत बतौर सहायक निर्देशक की| इस दौरान उन्होंने हिंदी

सिनेमा के कई दिग्गज निर्देशकों के साथ काम किया, जिसमे फरहान अखतर(दिल चाहता है), आशुतोष

गोविरकर (लगान)हनी इरानी (अरमान), मीरा नायर (वैनिटी फेयर) शामिल हैं।

रीमा ने हिंदी सिनेमा में बतौर फिल्म निर्देशक अपने करियर की शुरुआत वर्ष 2006 में फिल्म

‘हनीमून ट्रेवल्स प्राइवेट लिमिटेड’ से की। इसके बाद रीमा ने फिल्म ‘तलाश’ निर्देशित की| फिल्म

बॉक्स-ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई थी। वर्ष 2016 में रीमा ने फिल्म ‘गोल्ड’ पर काम करना शुरू

किया। जोया अख्तर और रीमा कागती ने मशहूर कॉमिक बुक पर आधारित नई फिल्म 'द आर्चीज' को

भारतीय दर्शकों के हिसाब से बनाया है और पर्यावरण को भी इसमें शामिल किया है। इस फिल्म के

अलावा रीमा कागती ने जोया अख्तर के साथ मिलकर फिल्म रोड ट्रिप पर आधरित फिल्म ;जी ले

जरा; लिखी है।

४. मेघना गुलजार

आज के समय की एक और उल्लेखनीय नाम मेघना गुलजार का है जो फिल्म निर्माता, निर्देशक एवं

पटकथा लेखक हैं| मेघना गुलजार का जन्म 13 दिसम्बर 1973 को मुंबई में हुआ था। वह हिंदी सिनेमा

के मशहूर संगीतकार-गीतकार गुलजार और अभिनेत्री राखी गुलजार की बेटी हैं। उन्होंने हिंदी फिल्म

इंडस्ट्री में अपने करियर की शुरुआत 1999 में 'हू तू तू'  नाम की फिल्म से की थी। उन्होंने फिल्म के

लिए पटकथा लिखी। इसके बाद कई फिल्मों का निर्देशन किया| 2015 में ;तलवार; और 2018 में

;राज़ी; जैसी फिल्मों से सफलता मिली। ;राज़ी; ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार जीता

और मेघना को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार मिला। मेघना गुलज़ार अपनी फिल्मों के विषय चयन

और भावनात्मक पहलू के लिए जानी जाती हैं। उनकी 2002 की फिल्म ;फिलहाल; में सरोगेसी के बारे

में बात की गई थी जो उस समय काफी साहसिक विकल्प था। फिल्म ;तलवार; से आरुषि तलवार

हत्याकांड को संबोधित किया। ;छपाक; नामक फिल्म पर काम किया जो एसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी

अग्रवाल के जीवन पर आधारित एक जीवनी फिल्म है।

पांच साल के लम्बे अंतराल के बाद उन्होंने फिल्म ‘जस्ट मैरिड’ और ‘दस कहानियाँ’ निर्देशित की। दोनों ही फिल्मों ने बॉक्स-ऑफिस पर ठीक-ठाक व्यापार किया था।

५. गौरी शिंदे

गौरी शिंदे आज के समय की एक और प्रमुख फिल्म निर्माता हैं, जो 'जीवन का हिस्सा' फिल्में बनाने

के लिए जानी जाती हैं, जो दर्शकों के दिल में एक संदेश, आंखों में आंसू और चेहरे पर मुस्कान छोड़

जाती हैं। उन्होंने 2012 में दिल छू लेने वाली फिल्म 'इंग्लिश विंग्लिश' से अपनी शुरुआत की, जिसने

व्यावहारिक रूप से सभी पुरस्कार जीते। यह एक महिला द्वारा अपनी असुरक्षाओं पर काबू पाने और

अपनी एक पहचान बनाने के बारे में थी जिसे उसने अपनी माँ को समर्पित किया था। शिंदे की यह

फिल्म आलोचकों दर्शकों सबको बेहद पसंद आई, साथ ही यह फिल्म टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में भी

दिखाई गयी। शिंदे को उनकी इस फिल्म के लिए झोली भर अवार्ड्स भी मिले। उन्हें इस फिल्म के

लिए फिल्मफेयर बेस्ट डेब्यू आवर्ड से भी सम्मानित किया गया| इसके बाद उन्होंने एक और अद्भुत

फिल्म ;डियर जिंदगी; बनाई| इस फिल्म ने करियर-उन्मुख, शहरी महिलाओं द्वारा सामना किए जाने

वाले मुद्दों को संबोधित किया। गौरी शिंदे ने नारीवाद और शहरीवाद के साथ मानसिक स्वास्थ्य और

भावनात्मक मुद्दों को संभाला और एक शानदार फिल्म बनाई जिसे व्यावसायिक और समीक्षकों

द्वारा खूब सराहा गया।

उनकी शार्ट फिल्म ‘ओह मैन’ (2001) को बर्लिन फिल्म फेस्टिवल के दौरान स्क्रीनिंग के लिए चुनी

गयी थी।

६. मीरा नायर

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने वाली मीरा भारतीय समाज में गहरे तक पैठी हुई खोखली

मान्यताओं पर फिल्म बनाने के लिए जानी जाती हैं. उनकी फिल्में द नेमसेक, मॉनसून वेडिंग और

सलाम बॉम्बे आज भी एक जरूरी फिल्म के तौर पर देखी जाती हैं. उनकी ये फिल्में 'बाफ्टा' और

'गोल्डन ग्लोब' जैसे प्रतिष्ठित अवॉर्ड्स के लिए भी नामित हो चुकी हैं.

७. कोंकणा सेन शर्मा

पहले से ही एक शानदार अभिनेत्री और अपनी पसंद से कुछ न कुछ कहने वाली अदाकारा के रूप में

जानी जाने वाली कोंकणा सेन शर्मा ने निर्देशक की भूमिका भी निभा ली है। उन्होंने 2006 में एक

बंगाली फिल्म से निर्देशन की शुरुआत की और 2017 में हिंदी फिल्म ;ए डेथ इन द गुंज; बनाई। इस

फिल्म को कई अंतर्राष्ट्रीय समारोहों में प्रदर्शित किया गया और सर्वश्रेष्ठ फिल्म के साथ-साथ

सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के रूप में कई पुरस्कार जीते।

आगे भी कई नाम हैं जिनमें दीपा मेहता, जद्दन बाई, किरण राव, सई परांजपे, अरुणा राजे, शोभना

समर्थ, माधुरी दीक्षित, दुर्गा खोटे, कल्पना लाजमी, श्रीदेवी, नंदिता दास, दुर्गा खोटे, ज्योति देशपांडे

आदि प्रमुख हैं|

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2] महिला गीतकार


बॉलीवुड की टॉप 10 महिला गीतकारों में 1. कौसर मुनीर 2. अनविता दत्त 3. रानी मल्लिक 4. माया

गोविन्द 5. प्रिया सरिया 6. रश्मी सिंह 7. गरिमा वहल 8. अभिरुचि चाँद 9. सीमा सैनी 10. प्रभा

ठाकुर हैं|

इनके अतिरिक्त अमृता प्रीतम, इंदु जैन, हेमा सरदेसाई, इला अरुण, हार्ड कौर, स्नेहा खानवलकर, पद्मा

सचदेव, श्रुति पाठक को भी बॉलीवुड की गीतकार महिलाओं में गिना जा सकता है। इन सबके के बीच

माया गोविंद का नाम उल्लेखनीय है|

माया गोविंद

बतौर गीतकार माया गोविंद का करियर 1972 में शुरू हुआ । उन्होंने फिल्म ‘आरोप’ के गाने लिखे।

इस फिल्म से उनका गाना ‘नैनों में दर्पण है’ बहुत चर्चित हुआ। यहां से माया का फिल्मों में गाने

लिखने का काम शुरू हुआ। उन्होंने अपने करियर में 350 फिल्मों के लिए 750 से ज़्यादा गाने लिखे।

इसमें ‘आंखों में बसे हो तुम’, ‘मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी’ फिल्म का टाइटल ट्रैक, हम तुम्हारे हैं सनम

फिल्म का ‘गले में लाल टाई’, शीशा फिल्म का ‘यार को मैंने मुझे यार ने’ जैसे गाने शामिल हैं। जब

समय के साथ संगीत बदलने लगा तब भी माया ने पॉपुलर सिंगर फाल्गुनी के गाने ‘मैंने पायल है

छनकाई’ के बोल लिखे, जो कि बहुत बड़ा हिट गाना साबित हुआ। आरोप फ़िल्म का गीत, नैनों में

दर्पण है, को लोगों ने बहुत पसंद किया|

दूरदर्शन पर प्रसारित हुए धारावाहिक ‘महाभारत’ के लिए उन्होंने काफी गीत, दोहे और छंद लिखे।

इसके अलावा ‘विष्णु पुराण’, ‘किस्मत’, ‘द्रौपदी’, ‘आप बीती’ आदि उनके चर्चित धारावाहिक रहे।

सैटेलाइट चैनलों के दौर में भी माया गोविंद के लिखे शीर्षक गीतों की खूब धूम रही।

3] महिला संगीतकार

१. इशरत सुल्ताना

इशरत सुल्ताना का नाम बिब्बो के नाम से प्रसिद्द है। वह भारतीय फिल्म इतिहास में महिला

संगीतकारों की पहली खेप में थीं । उन्होंने भारत की स्वतंन्त्रता से पहले 1934 में फिल्म ;अदल ए

जहांगीर; फिल्म में संगीत दिया था, जोकि बॉलीवुड की प्रसिद्द अभिनेत्री नरगिस की माताजी

जद्दनबाई के भी संगीत देने के एक साल पहले की बात है। इशरत सुल्ताना ने इसके अलावा ;कागज

की लड़की; जोकि 1937 में आई थी। उसके गानों को भी संगीतबद्ध किया था।

२.जद्दनबाई

भारतीय फिल्मों में जद्दनबाई का नाम बहुत ऊँचा है। वह भारत के सिनेमा जगत तकनीकी रूप से

पहली संगीतकार थीं। उन्होंने 1935 में 'तलाशे हक' में संगीत दिया था। उन्होंने संगीत की शिक्षा

कोलकाता के श्रीमंत गणपत राव से ली थी। इसके बाद उन्होंने 1936 में आई फिल्म 'मैडम फैशन' में

न सिर्फ काम किया बल्कि उन्होंने फिल्म के लिए संगीत देने के साथ साथ उसका निर्देशन भी किया।

३. सरस्वती देवी

पारसी परिवार में जन्मी और उन दिनों बॉम्बे टॉकीज़ के कुछ संगीतकारों के साथ काम कर रहीं

सरस्वती बाई ने सबसे पहले अछूत कन्या के लिए ‘ मैं बन की चिड़िया ...’ गाना कम्पोज़ किया था।

४. उषा खन्ना

उषा खन्ना भारतीय फिल्म इंडस्टी की ऐसी महिला संगीकार हैं, जिनके काम को लोग कभी नहीं भूल

सकते। उनके लोकप्रिय गानों में ;छोड़ो कल की बातें;,शायद मेरी शादी का ख्याल;ज़िंदगी प्यार का

गीत है; और ;आप तो ऐसे न थे’ जैसे हिट शामिल हैं। उन्होंने 1940 में पहली बार फिल्म;दिल दे के

देखों; में संगीत दिया था, जिसमें आशा पारेख ने काम किया था और यह उनकी डेब्यू फिल्म थी और

इस फिल्म के कारण वह सुपरहिट हो गयी थी। उन्होंने करीब 40 वर्षों तक सक्रिय तौर पर गाने

बनाये। उषा खन्ना ने हवस, दिल देके देखों, साजन की सहेली और आप तो ऐसे न थे जैसी फिल्मों में

बेहतरीन संगीत दिया।

५. लता मंगेश्कर बनाम आनंद घन

लता जी ने सिर्फ गाने ही नहीं गाये बल्कि फिल्मों में और ख़ासकर मराठी फिल्मों में संगीत

दिया। उन्होंने संगीतकार के रूप में अपना असली नाम न देकर आनंद घन के नाम का

इस्तेमाल किया। लता मगेशकर ने पहली बार सन 1955 में मराठी फिल्म 'राम-राम पाऊंण'

में संगीत दिया था। जिसके बाद उन्होंने 1963 में 'मराठा टिटुका मेळावा', 1963 में 'मोत्यांची

मंजुला', 1965 में 'साधी माणसे' 1969 में उन्होंने 'ताम्बाडी माती' जैसी फिल्मों में भी संगीत

दिया है। उन्हें 1965 में आई फिल्म 'साधी माणसे' के लिए महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें बेस्ट

म्यूजिक डायरेक्टर का सम्मान दिया था। उनका संगीतबद्ध किया एक गाना ‘ऐरणीच्या देवा

तुला...’ बहुत लोकप्रिय भी हुआ है।

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रविवार, 5 फ़रवरी 2023

जब हम सीख लेते हैं

 निभ जाते हैं रिश्ते

जब हम सीख लेते हैं

दोषों को नजरअंदाज़ करना


जी लेते हैं तमाम उम्र

जब हम सीख लेते हैं

बेवज़ह ही मरना


मिलती है सफलता

जब हम सीख लेते हैं

समय पर काम करना


पा लेते हैं निदान

जब हम सीख लेते है

समस्याओं को पकड़ना


मिल जाते हैं रास्ते

जब हम सीख लेते हैं

निडरता से पग धरना


कुसुमित होती है बगिया

जब हम सीख लेते हैं

काँटों संग निखरना


निखर जाता है लेखन

जब हम सीख लेते हैं

भाव सुन्दर भरना


खिल जाते हैं चेहरे

जब हम सीख लेते हैं

मुसकानों से सँवरना


पास आती हैं खुशियाँ

जब हम सीख लेते हैं

प्रकृति के संग गुजरना


जिंदगी हो जाती खूबसूरत

जब हम सीख लेते हैं

प्रीत-डोर में ठहरना


जीत लेते हैं जमाना

जब हम सीख जाते हैं

हरसिंगार सा झरना

-- ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 24 जनवरी 2023

बेटियाँ वरदान हैं

अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस













संसार के सुन्दर सृजन में, बेटियाँ वरदान हैं।

माता पिता की लाडली अब बन रही अभिमान हैं।।

बेटी पढ़े आगे बढ़े यह कह रही सरकार है।

उसकी खुशी सबसे जरूरी जो बनी आधार है||1


बगिया सुवासित देखकर के, गुनगुनाती बेटियाँ|

नभ में पतंगों को उड़ाकर, मुस्कुराती बेटियाँ||

अम्बर सितारे टिमटिमाए, जगमगाई बेटियाँ|

कलकल नदी की धार बनकर, खिलखिलाई बेटियाँ||2


जब बूँद बनकर बारिशों में, नाचता सावन कभी|

रुनझुन हुई है पायलों की, हँस दिए आँगन सभी||

शृंगार बालों का हुआ है, झूलती है चोटियाँ|

चकले थिरक जाते खुशी से, बेलती जब बेटियाँ||3


लगती कमलदल सी सुकोमल, धैर्य में है झील सी|

जगमगाती दीप बनकर, रोशनी कंदील सी||

प्राची हँसी पूरब दिशा में भोर की लाली बनी|

धरती सुहानी बेटियों सी खेत की बाली बनी||4


वह चाहते हैं बेटियों को, सरस्वती बसती जहाँ |

जो पूजते हैं बेटियों को, लक्ष्मी रहती वहाँ||

कुछ पर्व भारत में बने जो, बेटियों से हैं खिले|

होंगी नहीं जब बेटियाँ तब, राखियाँ कैसे मिले||5


कुछ शील्ड भारत को मिले हैं, बेटियों के काम पर।

वह हों बछेन्द्री पाल या फिर, कल्पना के नाम पर।।

वैमानिकी तकनीक हो या, हो पहाड़ी चोटियाँ।

बढ़ती गईं आगे हमेशा, हिन्द की ये बेटियाँ।।6


भारत बहादुर बेटियों से, पा रहा गौरव कई।

वह पाँच महिला हैं खिलाड़ी, जो भरें सौरभ कई।।

झूलन क्रिकेटी टीम में रह, जब बनी कप्तान थीं।

तब गेंदबाजी में रमी वह, देश में वरदान थीं।।7


जमुना मुक्केबाज ने तो, रच दिया इतिहास है।

चौवन किलो की वर्ग श्रेणी, वह उन्हीं से खास है।।

तसनीम सोलह वर्ष में ही, रैंक नम्बर वन बनी।

गुजरात की महिला खिलाड़ी, बैडमिंटन बन तनी।।8


जब खेल लंबी कूद अंजू, चैंपियन बनती रहीं|

अनगिन पदक वह नाम अपने, देश के करती रहीं||

आसाम में जनमी हिमा ने,रेस को करियर बनाया|

वह गोल्ड मेडल पाँच जीती, देश का गौरव बढ़ाया|९


माता पिता का साथ पाकर खिल उठी हैं बेटियाँ।

चाहे पढ़ाई नौकरी हो, चल पड़ी हैं बेटियाँ।।

जूडो कराटे भी सिखाएँ, आत्मविश्वासी बनाएँ।

अपनी सुरक्षा कर सकें वे, आत्मबल साहस बढायें।।10


सौन्दर्य का प्रतिमान बनकर वह बनी अभिकल्पना|

माधुर्य का अभिदान पाकर, सृष्टि की अनुरूपना||

जिसने सजाए भाव सारे, क्यों वही अनजान है?

दो-दो घरों से मान पाना, क्यों महाअभियान है??11


जो पूजते नौ देवियाँ पर, बेटियाँ भाती नहीं|

समझे पराया धन हमेशा, वंश की थाती नहीं||

बहुएँ सभी को चाहिए पर, बेटियाँ लाते नहीं|

जब हों मुखौटे इस तरह के, मान वे पाते नहीं||12

--- ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

फिल्म पर दोहे












लाइट ऐक्शन कैमरा, तीन शब्द है फ़िल्म।

संप्रेषण संवाद का, बहुत बड़ा है इल्म।।1


सुन्दर सज्जा नृत्य की, आकर्षक तस्वीर|

देशभक्ति या प्रेम की, सुन्दर सी तहरीर||2


तेरह सन उन्नीस में,प्रथम फिल्म थी मूक|

मिली साल इकतीस में, मौन रील को कूक||3


राजा हरिश्चंद्र रहा, मूक फ़िल्म के पास|

आलम आरा स्वर सहित, रचे फ़िल्म इतिहास||4


सोलह नौवें माह का, फ़िल्म दिवस श्रीमान|

सस्ती मिलती है टिकट, यही मान पहचान||5


फ़िल्म जगत के नाम कुछ, भारत में हैं ज्ञात।

टॉलीवुड तेलुगु-तमिल,बॉलीवुड विख्यात।।6


मिले सिनेमा में हमें, चलते फिरते दृश्य।

कुछ हैं बालक के लिए,रहते कुछ अस्पृश्य।।7


फाल्के जी के नाम पर, बने हैं पुरस्कार।

अभिनय निर्देशन बने, उत्कृष्ट फिल्मकार।।8


पार्श्व गायकी के लिए, लता रहीं उत्कृष्ट।

पुरुष वर्ग में थे रफी, रहे जो अति विशिष्ट।।9


शोमैन जो कहे गए, वह थे राज कपूर।

सुन्दर मधुबाला हुईं, दुनिया में मशहूर।।10


कवि प्रदीप ने रच दिया, देशभक्ति का सार।

मन वीणा के तार पर, मधुरिम है झंकार।।11


फिल्में मन पर डालती, अपना बहुत प्रभाव।

उनमें कुछ सन्देश हों, संग रहे कुछ चाव।।12

रविवार, 25 दिसंबर 2022

यात्रा

यात्रा-

यात्रा के हैं अनगिन रूप
कभी छाँव मिले कभी धूप
प्रथम यात्रा परलोक से
इहलोक की
नौ महीने की विकट यात्रा
बन्द कूप में सिमटी हुई यात्रा
जग से जुड़ता जब नाता
भोर से सायं तक
पृथ्वी की यात्रा
गंगोत्री से खाड़ी तक
गंगा की यात्रा
बचपन से बुढ़ापा तक
देह की यात्रा
कभी पैदल यात्रा
कभी पटरी पर चलती
रेल की यात्रा
नभ में बादलों के बीच
यान की यात्रा
सागर में
डूबती उतराती यात्रा
कभी दैनिक यात्रा
या फिर साप्ताहिक
मासिक या वार्षिक
समय की पाबंदी पर
बस यात्रा ही यात्रा
क्योंकि करनी है
मुख से पेट तक
भोजन को यात्रा
हर यात्रा में करनी होती तैयारी
बस चूक हो जाती है
अंतिम यात्रा की तैयारी में
जाने कितना कुछ
छोड़ जाते हैं ऐसा
जिसे स्वयं ठिकाने लगाना था
पर अपनी देह को ठिकाने
कोई न लगा सकता
हर आत्मनिर्भर होकर भी
बेबस है
परावलम्बन होना ही है
फिर घमंड किस बात का
इस यात्रा का टिकट तो है
बस तिथि का नहीं पता।
कैसे किस विधि जाना है
रीति का पता नहीं
– ऋता शेखर मधु

सोमवार, 5 सितंबर 2022

लघुकथा- भविष्यतकाल

 

भविष्यतकाल


'वाह ममा, आज तो आपने कमाल की पेंटिंग बनाई है,' अपनी चित्रकार माँ की प्रशंसा करते हुए तुलिका बोल पड़ी|
'अच्छा बेटा, इसमे कमाल की बात क्या लगी तुम्हें यह भी तो बताओ,' 

ममा ने बिटिया की आँखों में देखते हुए पूछा|
'देखिए ममा, ये जो प्यारी सी लड़की बनाई है न आपने, वह तो मैं ही हूँ| उसके सामने इतनी सारी सीढ़ियाँ जो हैं वे हमारे सपने हैं जो हम दोनों को मिलकर तय करने हैं, ठीक कहा न ममा' तुलिका ने मुस्कुराते हुए कहा|
'बिल्कुल ठीक कहा बेटे, अब इन सीढ़ियों की अंतिम पायदान को देख पा रही हो क्या'ममा ने पूछा|
'नहीं ममा, क्या है वहाँ?'
'वहाँ पर तुम्हारे सपनों का राजकुमार है जो तभी नजर आएगा जब तुम पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हो जाओगी' ममा ने हल्के अ़दाज़ में कह दिया|
' ममा, जब मैं घोड़े पर चली जाऊँगी तब भी तुम ये सीढ़ियाँ मत हटाना,' एकाएक थोड़े उदास स्वर में तुलिका कह उठी|
'ऐसा क्यों कह रही बेटा,' ममा भी थोड़ी मायूस हो गई|
' यदि मैं खुद गिर गई, या उस राजकुमार ने धक्का देकर गिरा दिया तो मैं इन्हीं सीढ़ियों से वापस लौट सकूँगी, इन्हें हटाओगी तो नहीं न ममा', तुलिका सुबक उठी|
'नहीं बेटा, नहीं हटाऊँगी,' ममा ने तुलिका को गले लगाते हुए कहा|
ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 24 अगस्त 2022

सार गीता का समझकर मन मदन गोपाल कर

2122 2122 2122 212

जो मिला वरदान में वह जन्म मालामाल कर|
मान रख ले तू समय का जिन्दगी संभाल कर ||१

ध्यान हो निज काम पर ही यह नियम रख ले सदा |
बात यह अच्छी नहीं तू बेवजह हड़ताल कर ||२

कर कहीं उपहास तो मनु जाँच ले अपना हृदय |
सामने उस ईश के तू क्यों खड़ा भ्रम पाल कर ||३

त्याग के ही भाव में संतोष का धन है छुपा |
सार गीता का समझकर मन मदन-गोपाल कर ||४

बाँध लेता प्राण को जब मोह का संसार यह |
शुद्ध पावन सद्-विचारी उच्च अपना भाल कर ||५

इस जगत में मान ले तू प्रेम है सबसे बड़ा |
हो न ममता साथ तो कब कौन होगा ढाल पर||६

काट कर वन, घर बसाया खग बिना घर के हुए |
पा गया तू क्या मनुज जब हैं न पंछी डाल पर ||७

@ ऋता शेखर ‘मधु’

बुधवार, 10 अगस्त 2022

डेढ़ इंच मुस्कान - क्षणिका संग्रह-समीक्षा

 



डेढ़ इंच मुस्कान- क्षणिका संग्रह
क्षणिकाकारः श्रीराम साहू

समीक्षक ; ऋता शेखर ‘मधु’

क्षणिकाओं की शान- डेढ़ इंच मुस्कान

मुझे मेरी सद्य प्रकाशित पुस्तक , मृणाल का बदला, के साथ श्वेतांशु प्रकाशन की ओर से उपहारस्वरूप डेढ़ इंच मुस्कान मिली है। अब आप सोच रहे होंगे यह मुस्कान कैसे मिली। मैं बात कर रही हूं श्री राम साहू जी की क्षणिका संग्रह 'डेढ़ इंच मुस्कान' की। आज जबकि मुस्कान भी मिलीमीटर में मिलती है तो डेढ़ इंच तो बहुत बड़ी बात है। पुस्तक का शीर्षक बहुत ही अच्छा है।आवरण पृष्ठ पर मुस्कुराती हुई स्माइली का प्रयोग आकर्षक है|

क्षणिका एक मारक विधा है जो चिंतन की ओर अग्रसर करती है। किसी विशेष क्षण में हुए अनुभव को चंद पंक्तियों में उतार देना क्षणिकाकार की खासियत होती है। क्षणिकाएं लघु कविता नहीं होती। क्षणिका के क्षेत्र में लिख रहे रचनाकारों को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए तब वे लघु कविता एवं क्षणिका के अंतर को समझ सकेंगे।। लेखक श्री राम साहू जी अपनी बात क्षणिका के माध्यम से रखते हुए कहते हैं कि जिंदगी/ हादसों व विडंबनाओं का/ शिकार है…शेष कुशल मंगल है/ बाकी तो आप सभी पाठक /अधिक समझदार हैं… यहीं से लेखनी ने कमाल दिखाना आरम्भ कर दिया है ।।

भूमिका प्रसिद्ध व्यंग्यकार गिरीश पंकज जी ने लिखी है।पंकज जी का कहना है कि लेखन के क्षेत्र में नन्हीं विधाए, जैसे हाइकु, तांका, लघुकथा, क्षणिकाएँ आदि फास्ट फुड की तरह हैं| जिस तरह लोग अधिक देर तक भोजन करना पसंद नहीं करते, उसी तरह समयाभाव के कारण लम्बी रचनाएँ भी पढ़ना पसंद नहीं करते|

नन्हीं रचनाओं का सृजन चुनौतीपूर्ण होता है| बहुत कुछ कहने के लिए चंद शब्द मिलते है| यह लेखक की काबिलियत होती है कि गागर में कितना सागर भर पाए| विषय चयन भी सोच समझकर करना होता है| उस हिसाब से लेखक ने समयानुसार विधा का चयन करके अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया है| सामाजिक सरोकार से लेकर राजनीति, पर्यावरण को विषय बनाते हुए उन्होंने गंभीर सृजन किया है|

कथ्य एवम शिल्प आकर्षित करते हैं।राजनीति और सत्ता को विषय बनाया जाए तो सर्वप्रथम रामराज्य को ही सबसे आदर्श राज्य माना जाता है। किन्तु आदर्श होने के बावजूद आलोचना से कोई भी राज्य अछूता नहीं रह पाता। राज्य को स्वार्थी होने के दृष्टिकोण से मन्त्रणा देने वाले मंथरा सरीखे लोग हैं, तो राजा के हर कृत्य पर अँगुली उठाने वाले धोबी सरीखे भी हैं। जब- जब रामराज्य की चर्चा होगी, ये दोनों स्वयमेव शामिल माने जाएँगे।

* हम /रामराज्य/ स्थापित/ करने में/ सफल हुए हैं /धोबी-मंथरा/ गली-गली/ पल रहे हैं।

चंद शब्दों वाली इस विधा में तुकांत का भी निर्वहन किया जाए तो क्षणिकाओं का स्वरूप अलग ही दिखता है। आदी और अवसरवादी का प्रयोग नितांत खूबसूरत बन पड़ा है। राजनीति पर निशाना साधने वाली यह रचना विपक्ष की भूमिका पर व्यंग्य करता हुआ थोड़ा स्मित भी दे जाता है। जब से सत्ता है तब से महंगाई एक मुद्दा है। चीजों के दाम हर किसी के राज्य में बढ़ते रहे हैं और सत्तापक्ष को निशाना बनाने का हथियार भी बनते रहे हैं। यह विरोध जोरशोर से इसलिए होता है कि विपक्ष का पक्ष मजबूत हो। लोकतंत्र जब भ्रष्टाचार का पर्याय बन जाये तो इस तरह की क्षणिकाएँ जन्म लेती हैं। बेईमानी में ईमानदारी, विरोधाभास का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत कर रहा। विरोधाभास लिए कई क्षणिकाएँ ध्यानाकर्षण करती हैं|

*महंगाई के खिलाफ/उनका/ विरोध अभियान/ युद्धस्तर पर/ जारी है। 'उल्लू' सीधा करने की /पूरी तैयारी है।।

आंदोलन करवाकर तहलका मचाना और स्वयं बच निकलने वाले नेताओं पर मारक सृजन है। बेचारी जनता उन नेताओं के प्रभाव में आकर अपना समय, जोश और समर्पण दाँव पर लगाने के लिए तैयार रहती है| जेल तक चली जाती है और आंदोलन का सृजनकर्ता चैन की वंशी बचाता सुख की नींद सोता है|

* उनके/ आंदोलन से/ तहलके मच गए। सब ने जेल की/ राह ली, वे अकेले बच गए।।

सत्ताधारी नेताओं के बदलते व्यवहार को चंद शब्दों में दर्शाना बड़ी कला है| उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ अपने पद और गरिमा को ईमानदारी से निभाने के लिए लेना होता है|किन्तु शपथ ग्रहण के बाद वे कुर्सी बचाने के चक्कर में ईमानदारी कहीं खो जाती है|

विरोधाभास से रची गयी क्षणिका अच्छी बनी है| मनुष्य का नैतिक पतन उसके उत्थान में सहायक है, इससे और कितना अधिक गिरेगा आदमी|

* सचमुच/ आज आदमी/ काफी तरक्की/ कर चुका है। नीचे गिरने की/ हद तक, ऊपर/ उठ चुका है।।

श्रीराम साहू जी ने क्षणिकाओं में बहुत बारीकी से हर उस कथ्य को उभारा है जो आम मनुष्य सोचता है|एक तरफ प्रगति के नाम पर पारिवारिक विखंडन पर रचना है तो दूसरी तरफ कार्य प्रणाली में कागजी घोड़े दौड़ा कर कार्य की संपूर्णता दिखाने की बात कही गई है| जिनके बड़े बड़े बोल होते हैं उनके काम कम होते हैं| हर समस्या पर सिर्फ वार्ता होती है|

*उन्होंने/ प्रगति के/ नए आयाम/ गढ़ लिए हैं/ पहले चारदीवारी में/ रहते थे/ अब केवल दीवार/ खड़ी कर लिए हैं||

* उन्हें/ काम से कम/ बात से अधिक/ वास्ता है| उनकी मान्यता है/ हर समस्या का हल/ केवल वार्ता है ||

क्षणिकाओं में कभी तुकांत का प्रयोग मनभावन है तो कभी अतुकांत में सधी लेखनी चली है| रचनाओं को पढ़ते समय मुस्कान भी सहज रूप से आती है| आपने सत्ता और सत्ताधारियों पर चुटीले तंज किए हैं जो हर आदमी मुस्कुराते हुए स्वीकार कर ले| कथ्य और शिल्प का निर्वहन है और भाव भी भरपूर है|

कहीं- कहीं रचना सपाट बयानी भी लगी , किंतु कथ्य प्रभावशाली होने के कारण प्रभाव छोड़ने में सफल रही|

प्रायः पुस्तक का समर्पण लिखते समय उसी विधा का चयन किया जाता है जिस विधा में पुस्तक बननी है| क्षणिका की पुस्तक का समर्पण पृष्ठ हाइकु में होने के कारण आरम्भ में थोड़े भ्रम की स्थिती बन रही| ऐसा प्रतीत होता है जैसे हाइकु संग्रह हो|

लेखक श्रीराम साहू जी 1984 से लेखन में सक्रिय हैं। उनकी रचनाओं का पत्रिकाओं में प्रकाशन 1987 से जारी है। आप फेसबुक में विभिन्न संस्थाओं द्वारा शताधिक सम्मान प्राप्त कर चुके हैं।

श्रीराम साहू जी की लेखनी सतत क्रियाशील रहे, इसके लिए हार्दिक शुभकामनाएँ।

पुस्तक की साजसज्जा, पन्नों की स्तरीयता एवं छपाई…सभी सुन्दर हैं।

पुस्तक परिचय

पुस्तकः डेढ़ इंच मुस्कान

लेखकः श्रीराम साहू

पृष्ठः ११२

मूल्यः २५०/-

प्रकाशकः श्वेतांशु प्रकाशन, नई दिल्ली

प्रकाशन का मोबाइल नम्बरः 8178326758, 9971193488

दोहा में नटराज


विषय- नटराज
============
शिव  ब्रह्मांडीय नर्तक के रूप में
चित्र गूगल से साभार



















1

चोल वंश ने कांस्य से, सृजित किया नवरूप।
तांडव मुद्रा में ढले, शिवजी लगे अनूप।।

2

शिव नर्तक के रूप में, कहलाये नटराज।
बस एक बार प्रेम से, दें उनको आवाज।

3

नृत्य करें नटराज जब, स्पंदित हो आकाश।
महायोगी महेश वह, उनसे है कैलाश।।

4

नटराजन के नृत्य से, कण कण भरे प्रमोद।
जग सारा गतिशील है, डमरू करे विनोद ।।

5

घूम रहे ब्रह्मांड में, नीलकंठ नटराज।
अंतरिक्ष की ओम ध्वनि, खोल रही यह राज।।

6

शर्व: हरो मृडो शिवः, या कह लें नटराज।
एक नाम है तारकः, डमरू जिनका साज़।।

7

शिव वेदांगों शाश्वतः, उनकी कृपा अपार ।
करने जग-कल्याण वह, आते बारम्बार ।।

8

चार भुजाओं से सजे, कदम उठे ज्यों ताल |
हर मुद्रा को सीखकर, नर्तक हैं मालामाल||

9

प्रीत भरा संसार हो, सद्भावी हो ठाँव |
बौनारूपी द्वेष पर, थिरके शिव के पाँव ||

10

एक हाथ में दिख रहा, डमरू जैसा साज| 
दूजे से जग को अभय, देते हैं नटराज ||

11

अनल घेर में हैं घिरे, लेकर ऊर्जा स्रोत |
आभामंडित शिव धरे,नृत्य पक्ष प्रद्योत||( नृत्य की एक मुद्रा)

@ऋता शेखर 'मधु'

सोमवार, 13 जून 2022

पाठकीय में कमल कपूर जी की पुस्तक

पाठकीय प्रतिक्रिया-ऋता शेखर ‘मधु’

रंग भरे दिन-रैन- दोहा संग्रह
लेखिका- कमल कपूर
प्रकाशन- अयन प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य- 260/-
पृष्ठ- १०५













छंद विधान के अनुसार लेखन का अपना सौन्दर्य होता है| मात्र ४८ मात्राओं में कोई धारदार बात कह देना दोहा छंद की विशेषता है| इसी ध्र को महसूस करते हुए हम यह पुस्तक पढ़ेगे|

पुस्तक लेखन की दुनिया के सहृदय लेखक रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी को समर्पित की गई है| उसके आगे लेखिला का गुरु के प्रति समर्पित दोहै है जो गुरु के प्रति लेखिका का सम्मान प्रदर्शित करता है|

पहले गुरु की वंदना करूं हाथ में जोड़। जिसने चमकाया सदा जीवन का हर मोड़।।

कमल जी ने कुछ दोहे कलम को समर्पित किए हैं। लिखते कथा कहानियां मीठे मोहक गीत। लिखे खत मनुहार के कलम मनाती मित्र।

अनुक्रम में चार विषयों के अंतर्गत उप विषय रखे गए हैं|

लेखिका ने अपनी बात में लिखा है की उनके 480 दोहे पूजा के वे दीप हैं जो उन्होंने कृतज्ञ भाव से देवी प्रकृति की उपासना करते हुए प्रज्वलित किए हैं।

अनुक्रम में चार विषयों के अंतर्गत उप विषय भी रखे गए हैं। प्रथम विषय रंग भरे दिन रैन के अंतर्गत पहला उप विषय रंग भरे दिन रैन ही है।

बरसों से मौसम सभी, देख रहे भर नैन।
रूप बदलते हर घड़ी, रंग भरे दिन- रैन।।

यहाँ पर दोहाकार ने मौसम की आवाजाही और उस के बदलते स्वरूप को अपने अनुभव से जोड़कर लिखा है। यह मौसम कभी खुशियों के भाव भरते हैं और कभी उदास कर जाते हैं। सभी भाव के अपने रंग होते हैं जिसमें जीते हुए मनुष्य अपने दिन और समय को व्यतीत करता जाता है। प्रकृति के सानिध्य में दिन का सबसे उर्जात्मक समय सुबह का समय होता है। जिसने भोर को देखा और आनंद उठाया वही सुबह के खुशनुमा रंग को आत्मसात कर सकता है।

माखन से उजली सुबह ,पाखी दल के गीत।
हँसी खुशी है घूमती, बनके जुड़वा मीत।।

सुबह के लिए माखन का बिंब लेना आकर्षित करता है।

एक और दोहा देखिए…

रजनीगंधा रेन थे,दिन थे शोख़ गुलाब।
दिन में हाथ किताब तो, रातों को थे ख्वाब।।

एक दोहा देखिए जिसमें कवयित्री का हल्का सा चुहल नजर आता है।

जाड़े में रविराज जी, करते नखरे खूब।
बादल से नाराज हो, गए नदी में डूब।।

मौसम में जेठ सबसे गर्म महीना माना जाता है। यह गर्मी जहाँ पशु पक्षी समुदाय को त्रस्त करती है, परेशान करती है वहीं यह गुलमोहर में नई रंगत पैदा करती है।

धूप जेठ की सींचती, गुलमोहर में जान।
सूरज से ले लालिमा, बढ़ती अद्भुत शान।।

जब दिवस का अवसान होता है तो भोर में जितने स्वर्ण रश्मियाँ बिखरी थीं उन्हें समेटने का काम भी शुरू होता है। और यह काम सांझ के जिम्मे आता है।

किरण-गठरिया लाद के, चली केसरी शाम।
पहुँचेगी यह रात तक, अँधियारे के गाम।

अंधियारे के गाँव में क्या होता है इसका दर्शन करते हैं।

नीरवता में गूंजता, मलयानिल संगीत।
चाँद फलक पर आ गया, हुई रात की जीत।।

एक अन्य सुंदर दोहा देखिए…

कुमुद कुमुदिनी से सजे, नदी सरोवर ताल।
लहरों पर तेरा करें, उजले बाल-मराल।।

ऋतुओं में सबसे मनमोहक ऋतु बसंत का होता है। यह बहारों का मौसम है| ये बहार फूलों और तितलियों से आती है| चारो ओर उनका साम्राज्य दिखता है| यह बात दोहा के माधयम से कवयित्री ने इस प्रकार लिखी है|

बासंती ऋतु ने किया, अजब अनोखा काम।
सारा गुलशन लिख दिया, अलि-तितली के नाम।।

चारों ओर बढ़ते प्रदूषण और अरशद हवा की कमी की ओर कवित्री ने बहुत ही सरल और सरस भाव से इशारा किया है। जहां वह मंदाकिनी हो कदंब की छांव। खोजें चलकर आज ही ऐसा कोई गांव।।

ऋतुओं का उल्लेख करते हुए महाकवि निराला के अवतरण दिवस को लेखिका ने मनभावन तरीके से लिखा है।

मधुरिम तिथि थी पंचमी, ऋतु बसंत अभिराम।
जब भारत के पटल ने, लिखा ‘निराला’ नाम।।

लेखक जब कभी कलम उठाता है तो उसकी कोशिश रहती है की वह मानव मन को भी परिभाषित करें और प्रेरणा की पतवार पकड़कर मनुष्य को निराशा के दलदल से पार कराने का प्रयास करें| लेखिका ने भी मानव मन पर और रिश्तो पर अच्छे दोहे सृजित किए हैं| मन को धैर्य बंधाने का प्रयास देखिए…

झड़ गई सारी पत्तियां, पर ना पेड़ उदास|
सांस सांस में पल रहे, नव जीवन की आस।।

कवयित्री ने सबके लिए मंगल कामना करते हुए लिखा है-

दीपक रोज जलाइये, एक सुबह इक शाम|
महारोग से जूझते, सब लोगों के नाम।।

लेखिका ने खिड़की को विषय बनाते हुए लिखा है…

खिड़की के आगे कभी, ना चिनना दीवार।
सिसक रही बाहर खड़ी, ताजा मधुर बयार।।

इस दोहे में मकानों के बीच में दूरी ना होने का जिक्र हुआ है। शहरों में सटे-सटे मकान बनते हैं जिनसे खिड़की का फायदा खत्म हो जाता है। जिस खिड़की को हवा और धूप के लिए बनाया जाता है सामने दीवार उठ जाने से, वह घर वंचित रह जाता है।

कमल जी की लेखनी माँ के लिए बहुत भावपूर्ण चली है और खूब चली है।

माँ की महिमा का करें, कवि कोई गुणगान।
भरनी होगी और भी, उसे कलम में जान।।

सचमुच माँ को शब्दों में बाँध पाना बहुत कठिन है। इसी संदर्भ में दूसरा दोहा भी बहुत सुंदर है।

माँ बनकर ही जानती, बिटिया मां का मोल।
कानों में तब गूँजते, माँ के मीठे बोल।।

जब रिश्तो की बात चले तो भाई बहन का जिक्र ना हो, ऐसा नहीं हो सकता।

डोर कलाई बाँध के, तिलक लगाकर भाल।
भाई का सुख माँगती, बहना हुई निहाल।।

शेष अशेष के अंतर्गत एक दोहा जो आकर्षित कर रहा…

दीवारें कब तक सहे, तस्वीरों का भार|
मन में उन्हें सजाइए, चले गए जो पार।|

अक्सर घर में उनके फोटो रखे जाते हैं जो दुनिया छोड़ कर चले जाते हैं। कवयित्री का कहना है कि दीवारों पर सजाने के बजाय उन्हें मन में स्थान देना चाहिए ताकि वह हर जगह साथ रहे| उनकी तस्वीरें मन के दीवार पर होनी चाहिए , घर की दीवारों पर नहीं।

एक दोहा और है जो सीधे मन तक पहुंच रहा…

राहें तो सीधी सभी, टेढ़े मन के मोड़।
कभी हमें जो तोड़ दें, और कभी दे जोड़।|

कमल जी ने बहुत सार्थक तरीके से या बात समझाई है कि रास्ते हमेशा सीधे ही रहते हैं| यह मनुष्य का मन होता है जो राहों को सरल या कठिन बनाता है|

कवयित्री कमल कपूर जी की लेखनी सतत चलती रहे, इसके लिए दिल से शुभकामनाएँ !!

मंगलवार, 7 जून 2022

छंद विजात में परमपिता

छंद - विजात
************
मात्रा विधान - १२२२ १२२२ , १४ मात्रिक सम छंद
चरण-४, चरणारंभ-१ लघु
चरणान्त-२२२(तीन गुरु)
****************











जिसे संसार ने जाना | 
जिसे संसार ने माना ||
सभी में जो समाया है | 
न नश्वर है न काया है ||१


उसी से आस मिलती है | 
उसी से श्वास खिलती है ||
जहाँ कण -कण लुभाया है| 
समझ लो ईश आया है||२

जहाँ विश्वास मिलते हैं |
वहाँ पर फूल खिलते हैं ||
लगाकर आस का चंदन| 
करें हम ईश का वंदन ||३

नदी की धार में बहते | 
किनारे दूर ही रहते ||
मिले उनका सहारा जब | 
जहां में कौन हारा कब ||४

धरा की हर फसल कहती | 
कृपा उनकी बनी रहती ||
तभी पावस बरसते हैं | 
तभी तो पेट भरते हैं ||५

दिवस भर सूर्य चलता है| 
निशा में चाँद ढलता है ||
इशारों पर हिलीं पातें| 
कहें सब ईश की बातें ||६

अमन को ध्यान में धरती | 
खुदा से कामना करती ||
दिलों में हों मुहब्बत भी | 
रक़ीबों पर मुरव्वत भी ||७

रहें सब साथ मिलजुल कर | 
चमन में गुल हँसें खुलकर ||
पवन जब चले बहारों में| 
नयन रीझे नजारों में ||८

– ऋता शेखर ‘मधु’

पाठकीय में ऋता शेखर 'मधु' की पुस्तक

पाठकः सीमा वर्मा जी
पुस्तक- धूप के गुलमोहर-लघुकथा संग्रह
लेखिका- ऋता शेखर 'मधु'

लेखकीय प्रतिक्रिया
'ऋता शेखर मधु' जी साहित्य जगत का एक जाना पहचाना नाम है। उनकी कलम लघुकथा से लेकर हाइकु, हाइगा, कविता, ग़ज़ल, आलेख एवम् छंदों पर भी खूब चलती है। सबसे अच्छी बात है कि आप विधा के प्रति बहुत गंभीर एवं समर्पित है। हाल ही में आपकी नवीनतम कृति 'धूप के गुलमोहर' प्रकाशित हुई है। आपने यह संग्रह लघुकथा विधा को समर्पित किया है। कवर पृष्ठ बहुत ही शानदार है, पेपर भी उम्दा क्वालिटी का है। जिसके लिए 'श्वेतांशु प्रकाशन'
बधाई
के पात्र हैं।
संग्रह में सबसे अच्छी बात यह है कि अनुक्रमांक में सभी लघुकथाओं को विषयों के आधार पर वर्गीकृत किया है। 41 लघुकथाएं सामाजिक सरोकार से जुड़ी हुई हैं तो 45 लघुकथाएं रिश्तों के आधार पर बुनी गईं हैं। 4 लघुकथाएं कारोना काल पर और 43 अन्य विविध लघुकथाएं हैं।
संग्रह का शीर्षक 'धूप के गुलमोहर' अपने आप में गहन अर्थ समेटे हुए है। आखिर यह नाम ही क्यों? 'मन की बात' में लेखिका बताती हैं:
"जिंदगी की कड़ी धूप में चलते हुए मिल जाए गुलमोहर का घना साया...
समझ लो थके कदमों को मिल गया कोमल रूई का फाहा।"
गज़ब बात कही लेखिका ने:
"जिसने सही धूप, उसने पा लिया गुलमोहर सा रूप।"
जिसने आदत ही बना ली हो चुनौतियों को टक्कर देने की, उसे गुलमोहर की लालिमा पाने से कौन रोक सकता है भला। इसे कहते हैं कविता का हो जाना।
लेखिका ने पुस्तक की शुरुआत 'मेरी बात' से की है जिसमें रचना प्रक्रिया के बारे में भी बताया है कि जीवन जीते हुए, आसपास के लोगों से मिलते हुए कई पल ऐसे आतें हैं जो मन मस्तिष्क पर अपनी जगह बना लेते हैं। यही विशेष पल चिंतन के लिए मजबूर करते हैं। इन्हें हूबहू पेश नहीं किया जा सकता इसलिए उपयुक्त शब्दों का चयन कर रचना में ढालना पड़ता है। उन्होंने लघुकथा विधा को अपने शब्दों में परिभाषित किया है जो एक अनूठी पहल है।
इस संग्रह की भूमिका लघुकथाकारा 'आदरणीया प्रेरणा गुप्ता' जी द्वारा लिखी गई है जिसमें उन्होंने लघुकथाओं की समीक्षा भी की है। भूमिका पढ़ते ही पाठकों का मन अपने आप लघुकथाओं को पढ़ने के लिए लालायित हो उठेगा।
आइए अब बात करते है लघुकथाओं पर:
सामाजिक सरोकार से जुड़ी पहली ही लघुकथा 'माँ' ने दिल जीत लिया। जिसमें लेखिका का पैनी दृष्टिकोण नज़र आया और आगे की लघुकथाएं पढ़ने को मन आतुर हो उठा।
'मासूम अपराध' एक बेहद मार्मिक लघुकथा है जिसमें एक गरीब बच्चे की व्यथा को बखूबी बयां किया गया है।
'नया दरवाज़ा' संवादात्मक शैली में लिखी रचना है। जिसमें संदेश दिया गया है कि औरत होने का मतलब यह नहीं कि वह कमज़ोर है।
'नैतिकता' : उन लोगों पर अच्छा कटाक्ष किया है जो कहते कुछ और है और करते कुछ और है।
'अपनी- अपनी उम्मीदें' यह लघुकथा बहुत ही सार्थक लगी क्योंकि अक्सर लोग जो खुद कामचोर होतें हैं वही मेहनतकश लोगों पर छींटाकशी करते नजर आतें हैं।
'बेतार संदेश' जिंदगी आगे बढ़ने का नाम है। ज़माने के साथ तो चलना ही पड़ेगा। इस लघुकथा में लेखिका ने यही संदेश देने की कोशिश की है कि कभी-कभी जो हम सोच भी नहीं पाते वह हो जाता है।
'भूख का पलड़ा' एक बेहद मार्मिक लघुकथा है। भूख पर किसी का ज़ोर नहीं चलता। राजा हो या रंक, पेट की आग बुझानी ही पड़ती है। खाना किन हाथों से मिल रहा है यह भूखा पेट नहीं सोचता।
'गठबंधन' एक बढ़िया व्यंग्य रचना है क्योंकि कुर्सी के लिए तो लोग गधे को भी बाप बना लेते हैं।
'आदर्श घर' लिंगभेद की जड़ें अभी भी जीवित है। कौन कहता है कि बेटा बेटी में फर्क मिट गया है। अक्सर उभरती पीड़ा भीतर ही भीतर दबे घाव को पुनः हरा कर देती है।
'रिटायर्ड' इस कथा के माध्यम से यह बताया गया है कि जब इंसान के पास कुर्सी होती है तब सभी उसे पूछते हैं, उसका मान सम्मान भी करते हैं, कुर्सी से हटते ही वह इंसान सबके लिए बेगाना हो जाता है। चंद शब्दों में ही कथ्य को बड़ी खूबसूरती के साथ उभारा है।
'चिपको' बहुत बढ़िया लघुकथा है, चिपको आंदोलन का वह समय आंँखों के सामने सजीव हो उठा जिसे भले ही सब ने ना देखा हो मगर वह पीड़ा महसूस जरूर की है। शानदार शब्दों में इस रचना को पिरोया है लेखिका ने जिसके लिए वह
बधाई
की पात्र है।
'नेग'- प्रेम और सद्भावना भरा व्यवहार पत्थर दिल इंसान को भी बदलने पर मजबूर कर देता है।
'ठनी लड़ाई' चुलबुली सी मगर बेहद रोचक कथा है। आंँखों के सामने चलचित्र सी चलती, बिंबों का बेहद खूबसूरती से प्रयोग किया गया है।
रिश्तों की लघुकथाएं:
'अंतर्देशीय' आज के समय में रिश्तों में आती दूरियों का एहसास करवाती लघुकथा है।
'पुनर्गठित' इस लघुकथा में मांँ ने बेटी का साथ देकर सही किया ताकि जो उसके साथ घटा, वह बेटी के साथ ना घटे। आज की नारी कमज़ोर नहीं है। सार्थक दिशा की ओर अग्रसर करती लघुकथा के लिए साधुवाद है लेखिका को।
'समस्या' परिवार में आपसी प्रेम का उदाहरण देती मन को छू लेने वाली रचना है।
'सागर की आत्महत्या' एक बेहद गंभीर विषय उठाया है लेखिका ने अपनी इस लघुकथा के माध्यम से। अक्सर पूरे घर की जिम्मेदारियां निभाते पिता के मन की बात को कोई समझ नहीं पाता, उन्हें भी जरूरत है समझने की।
'आप अच्छे हो' प्रतियोगिता के युग में माता-पिता बच्चों को मशीन बना रहे हैं। उन्हें एक दूसरे से आगे बढ़ते देखना चाहते हैं। इसी बीच अगर वह ऐसा ना कर पाएं तो जीवन की एहलीला खत्म करने की ओर अग्रसर हो जाते हैं। इसलिए बेहतर है उन्हें सही समय पर संभाल लिया जाए। आज के युग के लिए संदेश देती एक सार्थक कथा।
विविध लघुकथाओं में:
'तुसी ग्रेट हो' एक बेहद हल्की फुल्की खूबसूरत रचना है।
'कॉपी पेस्ट' इस रचना को पढ़ने के बाद तो बस मन में एक ही पंक्ति बार-बार आ रही है "नानक दुखिया सब संसार।"
'एहसासों की दीपावली' रिश्तो का अहसास करवाती बेहद मार्मिक रचना है। समय बहुत तेजी से बीत रहा है और सब अपने आप में व्यस्त हैं, अकेलेपन से निपटने के लिए अपने मन को खुद ही समझाना पड़ता है।
'शपथ' इंटरनेट के इस दौर में हम रिश्तों को तरजीह देना भूल गए हैं और आभासी दुनिया में कहीं खो गये है।
अन्य और भी लघुकथाएं हैं जिन पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है किंतु आगे मैं पाठकों के लिए छोड़ती हूँ।
मुझे उम्मीद ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आपके विचार पाठकों के मन मस्तिष्क में उतरकर उनके जीवन को सही दिशा की ओर दृष्टिगोचर कर देंगे। लेखिका को इस खूबसूरत संग्रह के लिए हार्दिक
बधाई
एवं शुभकामनाएंँ प्रेषित करती हूँ। उनकी कलम यूंँ ही नित नये आयाम स्थापित करती रहे।
सीमा वर्मा
लुधियाना (पंजाब)
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बहुत बहुत आभार आदरणीया सीमा वर्मा जी

रविवार, 5 जून 2022

पाठकीय में गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी की पुस्तक

 पाठकः ऋता शेखर 'मधु'

पुस्तकः  कुछ ठहर ले और मेरी ज़िन्दगी- गीत संग्रह

लेखिकाः गिरिजा कुलश्रेष्ठ


जीवन के अनेक रंग समेटता गीत संग्रह

“कुछ ठहर ले और मेरी ज़िन्दगी” गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी की यह पुस्तक मुझे उन्ही के कर कमलों द्वारा ३ जून २०१७ में मिली थी| यह गीत संग्रह है जिसे पढकर मैं अचंभित होती रही| गिरिजा दी की लेखन शैली, प्रस्तुति, शब्द- चुनाव, भाषा सौन्दर्य बिल्कुल साहित्य अनुरूप लगता है| 

गीतकार ने अपनी बात में लिखा है,
“काँटों को मैं अपना लूँ, या मृदु कलियों को प्यार करूँ
ये दोनों जीवन के पहलू किसको मैं स्वीकार करूँ|
जीवन में चलने वाले उथल- पुथल की यह अभिव्यक्ति प्रभावशाली है|
कुल ६९ गीतों को १११ पृष्ठों में संजोया गया है| पुस्तक का शीर्षक , उनकी प्रथम कविता है| जीवन में आए झंझावातों से थकी ज़िन्दगी को सांत्वना देकर, बहला फुसलाकर कुछ दिन और रुकने का आग्रह करती लेखिका की सकारात्मक लेखनी मन भाई| काँटो की चुभन से अधिक पुष्प का खिलना भाया|

पुस्तक का प्रकाशन वर्ष २०१४ है| गीत समेटे गये हैं १९७५ से| एक गीत १९८७ का है जिसका शीर्षक है ‘सूर्य गीत’| दिनकर का आगमन होता है तो जग अपनी गति पकड़ता है|
तुम उगे तो
जग हुआ लयमान
तुम भले दिनमान

कवयित्री का गीत “गीत बनकर गूँज” मार्मिक है| यहाँ दर्द का आह्वान किया है | जीवन की व्यस्तता दिखाई गयी है|
आह भरने सिसकने की
है मुझे फुरसत कहाँ
बोझ इतना बाँटने को
कौन आता है यहाँ

गजलनुमा गीत ‘क्या करें' में बहुत बेबसी है| एक बंद देखिए|
वोटों की भीख माँगी, कितने करार करके
भूले जो जीतकर वो, आवाम क्या करे

बच्चे जब बड़े होने लगते हैं तो क्या क्या बदलाव आता है इसका रोचक वर्णन है|
अब उसके अपने दिन हैं
अपनी ही राते हैं|
अपने तर्क विरोध बहस
अपनी ही बातें हैं|
माँ की उँगली छोड़
पाँव खुद खड़ा हो रहा है
बेटा बड़ा हो रहा है|

अपने गीत ‘आग’ में गिरिजा जी ने किसी वस्तु के सदुपयोग या दुरुपयोग पर सार्थक प्रकाश डाला है|
आग तेरे पास भी है
आग मेरे पास भी है
करना क्या उपयोग आग का
बात यही है खास|

गिरिजा जी के सभी गीतों को पढ़ते हुए जीवन की पीड़ाओं से गुजरना, जीवन की नकारात्मकताओं के बीच सकारात्मक बने रहने की सार्थकता, और किसी के द्वारा छले जाने की स्वीकारोक्ति होने पर भी विश्वास न कर पाने की व्यथा अंदर तक झकझोरती है|
गिरिजा दी, आपकी लेखनी सतत चलती रहे और साहित्य जगत समृद्ध होता रहे, इन्हीं शुभेच्छाओं के साथ पाठकों से भी विनम्र निवेदन है कि वे इस संग्रह को अवश्य पढ़ें|

पुस्तक का नामः कुछ ठहर ले और मेरी ज़िन्दगी ( गीत संग्रह)
रचनाकारः गिरिजा कुलश्रेष्ठ
प्रकाशकः ज्योतिपर्व प्रकाशन, ९९ ज्ञानखंड-३, इंदिरापुरम, गाजियाबाद, फोन-९८११७२११४७
प्रथम संस्करणः २०१४
मूल्यः १९९/-
समीक्षा- ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 3 जून 2022

पाठकीय में ऋता शेखर ' मधु' की पुस्तक

 पाठकः राजीव तनेजा जी

पुस्तकः धूप के गुलमोहर-लघुकथा संग्रह

लेखिकाः ऋता शेखर 'मधु'

आमतौर पर अपने भावों को अभिव्यक्त करने के लिए सब एक दूसरे से बोल बतिया कर अपने मनोभावों को प्रकट करते हैं। मगर जब अपने मन की बात को अभिव्यक्त करने और उन्हें अधिक से अधिक लोगों तक संप्रेषित करने का मंतव्य हम जैसे किसी लेखक अथवा कवि का होता है तो वह उन्हें दस्तावेजी सबूत के तौर पर लिखने के लिए गद्य या फिर पद्य शैली को अपनाता है। जिसे साहित्य कहा जाता है। आज साहित्य की अन्य विधाओं से इतर बात साहित्य की ही एक लोकप्रिय विधा 'लघुकथा' की।
लघुकथा..तात्कालिक प्रतिक्रिया के चलते किसी क्षण-विशेष में उपजे भाव, घटना अथवा विचार जिसमें कि आपके मन मस्तिष्क को झंझोड़ने की काबिलियत हो..माद्दा हो...की नपे तुले शब्दों में की गयी प्रभावी अभिव्यक्ति है। मोटे तौर पर अगर लघुकथा की बात करें तो लघुकथा से हमारा तात्पर्य एक ऐसी कहानी से होता है जिसमें सीमित मात्रा में चरित्र हों और जिसे एक बैठक में आराम से पढ़ा जा सके।


दोस्तों..आज मैं लघुकथाओं के ऐसे संकलन की बात करने जा रहा हूँ जिसे 'धूप के गुलमोहर' नाम से लिखा है ऋता शेखर 'मधु' ने। इस संकलन की लघुकथाओं के लिए लेखिका ने अपने आस पड़ोस के माहौल से ही अपने किरदार एवं विषयों को चुना है। जिसे देखते हुए लेखिका की पारखी नज़र और शब्दों पर उनकी गहरी पकड़ का कायल हुए बिना रहा नहीं जाता।
इस संकलन की लघुकथाओं में कहीं नयी पीढ़ी, पुरानी पीढ़ी को नयी तकनीक से रूबरू कराती नज़र आती है तो कहीं भूख से तड़पता कोई बालक चोरी करता हुआ दिखाई देता है। तो कोई बाल श्रम के लिए ज़िम्मेदार ना होते हुए भी ज़िम्मेदार मान लिया जाता दिखाई देता है। इसी संकलन की किसी अन्य रचना में जहाँ एक तरफ़ किसी शहीद की नवविवाहिता विधवा सेना में शामिल होने की इच्छा जताती हुई नज़र आती है तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य लघुकथा में कोई अपने दिखाए नैतिकता के पथ पर खुद चलने के बजाय उसके ठीक उलट करता दिखाई देता हैं।
इसी संकलन की किसी रचना में जहाँ बहुत से अध्यापक काम से जी चुराते दिखाई देते हैं तो वहीं कोई बेवजह ही काम का बोझ अपने सिर ले..उसमें पिसता दिखाई देता है। कहीं किसी रचना में भूख के पलड़े पर नौकर- मालिक का भेद मिटता दिखाई देता है। तो कहीं किसी अन्य रचना में राजनीति की बिसात पर कथनी और करनी में अंतर होता साफ़ दिखाई देता है।

 

इसी संकलन में कहीं किसी रचना में बरसों बाद मिली सहेलियाँ आपस में एक दूसरे से सुख-दुख बाँटती दिखाई देती हैं। तो कहीं किसी रचना में किसी के किए अच्छे कर्म बाद में फलीभूत होते दिखाई देते हैं। इसी संकलन की एक अन्य रचना में आदर्श घर कहलाने वाले घर में भी कहीं ना कहीं थोड़ा बहुत भेदभाव तो होता दिखाई दे ही जाता है। इसी संकलन की किसी अन्य रचना मरण कहीं कोई नौकरी जाने के डर से काम का नाजायज़ दबाव सहता दिखाई देता है।
इसी संकलन की एक रचना जहाँ एक तरफ़ 'कुर्सी को या फिर चढ़ते सूरज को सलाम' कहावत को सार्थक करती नज़र आती है जिसमें सेवानिवृत्त होने से पहले जिस प्राचार्य का सब आदर करते नज़र आते थे..वही सब उनके रिटायर होने के बाद उनसे कन्नी काटते नज़र आते हैं। तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य रचना कोई स्वार्थी बेटा अपने पिता को बरगला उसका सब कुछ ऐंठने क़ा पर्यास करता दिखाई देता है।
इसी संकलन की एक अन्य रचना में कोई 'चित भी मेरी..पट भी मेरी' की तर्ज़ पर अपनी ही कही बात से फिरता दिखाई देता है। तो कहीं किसी रचना में महँगे अस्पताल में, मर चुके व्यक्ति का भी पैसे के लालच में डॉक्टर इलाज करते दिखाई देते है। एक अन्य रचना में रिश्वत के पैसे से ऐश करने वाले परिवार के सदस्य भी पकड़े गए व्यक्ति की बुराई करते नज़र आते हैं कि उसकी वजह से उनकी इज़्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी।
इसी संकलन की एक अन्य रचना में जहाँ हार जाने के बाद भी कोई अपनी जिजीविषा के बल पर फिर से आगे बढ़ने प्रयास करता दिखाई देता है। तो वहीं कहीं किसी अन्य रचना में ढिठाई के बल पर कोई किसी की मेहनत का श्रेय खुद लेता नज़र आता है।
इसी संकलन की एक अन्य रचना इस बात की तस्दीक करती नज़र आती है कि मतलबी लोगों की इस दुनिया में सांझी चीज़ की कोई कद्र नहीं करता।
इसी तरह के बहुत से विषयों को अपने में समेटती इस संकलन की रचनाएँ अपनी सहज..सरल भाषा की वजह से पहली नज़र में प्रभावित तो करती हैं मगर कुछ रचनाएँ मुझे अपने अंत में बेवजह खिंचती हुई सी दिखाई दीं। मेरे हिसाब से लघुकथाओं का अंत इस प्रकार होना चाहिए कि वह पाठकों को चौंकने अथवा कुछ सोचने पर मजबूर कर दे। इस कसौटी पर भी इस संकलन की रचनाएँ अभी और परिश्रम माँगती दिखाई दी।
आमतौर पर आजकल बहुत से लेखक स्त्रीलिंग एवं पुल्लिंग में तथा एक वचन और बहुवचन के भेद को सही से समझ नहीं पाते। ऐसी ही कुछ ग़लतियाँ इस किताब में भी दिखाई दीं। जिन्हें दूर किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त प्रूफरीडिंग एवं वर्तनी के स्तर पर भी कुछ त्रुटियाँ नज़र आयी। उदाहरण के तौर पर
इसी संकलन की 'दर्द' नामक लघुकथा अपनी कही हुई बात को ही काटती हुई दिखी कि इसमें पेज नंबर 22 पर एक संवाद लिखा हुआ दिखाई दिया कि..
"कल मैंने एक सिनेमा देखा 'हाउसफुल-3' जिसमें लंगड़ा, गूंगा और अँधा बन कर सभी पात्रों ने दर्शकों का खूब मनोरंजन किया।"
यहाँ यह बात ग़ौरतलब है कि 'खूब मनोरंजन किया' अर्थात खूब मज़ा आया जबकि इसी लघुकथा के अंत की तरफ़ बढ़ते हुए वह अपने मित्र से चैट के दौरान कहती है कि..
"मैंने फेसबुक पर यह तो नहीं लिखा कि यह सिनेमा देख कर मुझे मज़ा आया।"
यहाँ वह कह कर वह अपनी ही बात को विरोधाभासी ढंग से काटती नज़र आती है कि उसे मज़ा नहीं आया।
इसी तरह पेज नम्बर 27 पर लिखी कहानी 'विकल्प' बिना किसी सार्थक मकसद के लिखी हुई प्रतीत हुई। जिसमें अध्यापिका अपनी एक छात्रा के घर इसलिए जाती है कि वह उसे कम उम्र में शादी करने के बजाय पढ़ने के लिए राज़ी कर सके मगर उसके पिता की दलीलें सुन कर वह चुपचाप वापिस चली जाती है।
इसी तरह पेज नंबर 78 की एक लघुकथा 'हो जाएगा ना' में माँ की घर से हवाई अड्डे के लिए जल्दी घर से निकलने की चेतावनी और समझाइश के बावजूद भी बेटा देरी से घर से निकलता है और कई मुश्किलों से दो चार होता हुआ अंततः ट्रैफिक जाम में फँसने की वजह से काफ़ी देर से हवाई अड्डे पर पहुँचता है। जिसकी वजह से उसे फ्लाइट में चढ़ने नहीं दिया जाता।
सीख देती इस रचना की अंतिम पंक्ति में लिखा दिखाई दिया कि..
'माँ खुश थी कि उसने समय की कीमत पहचान ली थी।'
मेरे ख्याल से बेटे की फ्लाइट छूट जाने पर कोई भी माँ खुश नहीं होगी। अगर इस पंक्ति को इस तरह लिखा जाता तो मेरे ख्याल से ज़्यादा सही रहता कि..
'माँ को उसकी फ्लाइट छूट जाने का दुख तो था लेकिन साथ ही साथ वह इस वजह से खुश भी थी कि इससे उसके बेटे को समय की कीमत तो कम से कम पता चल ही जाएगी।'
इसी तरह आगे बढ़ने पर एक जगह लिखा दिखाई दिया कि..
'नाच गाना से हॉल थिरक रहा था।'
यहाँ इस वाक्य से लेखिका का तात्पर्य है कि क्रिसमस की पार्टी के दौरान हॉल में मौजूद लोग नाच..गा और थिरक रहे थे। जबकि वाक्य से अंदेशा हो रहा है कि लोगों के बजाय हॉल ही थिरक रहा था जो कि संभव नहीं है। अगर इस वाक्य को सही भी मान लिया जाए तो भी यहाँ 'नाच गाना से हॉल थिरक रहा था' की जगह 'नाच गाने से हॉल थिरक रहा था' आएगा।
यूँ तो यह लघुकथा संकलन मुझे लेखिका की तरफ़ से उपहार स्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि बढ़िया कागज़ पर छपे इस 188 पृष्ठीय लघुकथा संकलन को छापा है श् वेतांश प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है 340/- रुपए जो कि कंटैंट को देखते हुए मुझे ज़्यादा लगा। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को बहुत बहुत शुभकामनाएं।
-- राजीव तनेजा
समीक्षक एवं व्यंग्यकार

बुधवार, 1 जून 2022

पाठकीय में ऋता शेखर 'मधु' की पुस्तक

 पाठक ः नमिता सचान जी

पुस्तकः धूप के गुलमोहर- लघुकथा संग्रह

लेखिकाः ऋता शेखर 'मधु'











किताबें:समय और समाज के यथार्थ से साक्षात्कार कराती लघुकथाएं


--- नमिता सचान सुंदर

धूप के गुलमोहर

( लघुकथा- संग्रह): ऋता शेखर’मधु’

प्रकाशक: श्वेतांशु प्रकाशन- नई दिल्ली

पृष्ठ: 188, मूल्य: रू 340/-

अपने नाम को सार्थक करता ऋता शेखर का लघुकथा संकलन, धूप के गुलमोहर कहीं धूप में गुलमोहर हो जाने की प्रेरणा देता है तो कहीं जेठ की आग उगलती दोपहरिया में रस-रंग की धार सा अंतस को गहरे तक सिंचित करता है। हाँ, कुछ ऐसा ही है ऋता जी की कथाओं में विषय- वस्तु का विस्तृत आयाम।

पाँच श्रेणियों में सलीके से वर्गीकृत की गयीं 138 लघुकथाओं से सुसज्जित यह संकलन हमें वैचारिक एवं भावानात्मक दोनों ही स्तर पर प्रभावित करता है और समृद्ध भी।

सामाजिक सरोकार की श्रेणी वाली कथाएं हमें मात्र मानवीय सरोकारों की ओर अंगुली पकड़ कर ही नहीं ले चलती हैं वरन् हमारी सोच में कुछ डिग्री का फर्क लाने की भी क्षमता रखती हैं।

ममता के बेपनाह विस्तार में भी संबंधों के दायरे हमारी सोच में झुकाव, वरीयता स्वाभाविक रूप से ले ही आते हैं। हम अनजाने ही इसे अपने भीतर पोसते हैं और कब यह हमारी प्रतिक्रियायों में स्वतः ही व्यक्त हो जाता है हमें स्वयं भी पता नहीं चलता। यह बात संकलन की प्रथम कथा, माँ में लेखिका ने कुछ इस अंदाज में कही है कि कथा समाप्त करते ही मेरे भीतर का पाठक चमत्कृत हो मुस्कुराया।

ऋता जी की एक- दो कथाएं हमने किन्हीं अंतरजालीय समूहों में पहले भी पढ़ी हैं किंतु लघुकथा के उनके रचना संसार से फुरसत से मुलाकात करने का यह मेरा पहला मौका था और उस संसार में पहला कदम रखते ही मैं आश्वस्त हो उठी थी कि मेरी यह पाठकीय मुलाकात सुखद होने वाली है। भला गुलमोहर के रस- रंग से भी कोई अछूता रह पाया है क्या?

इसी श्रेणी के अंतर्गत दो और लघुकथाओं का जिक्र करना चाहूंगी – डील और नेग। मैंने इन दोनों कथाओं का जिक्र एक साथ क्यों किया? ‘डील हमारे बदलते सामाजिक परिवेश की कथा है। नेग में समय के साथ आया परिवर्तन तो परिलक्षित है ही, किंतु साथ ही है पुरानी रूढ़िवादी मानसिकता भी। गरज यह कि दोनों में यथार्थ समाहित है पर मुझे जो भाया, वह है लेखिका का समस्याओं के समाधान की ओर इशारा करने का तरीका। हर स्थिति में पत्थर तोड़ कर ही धारा के प्रवाह के लिए रास्ता बनाना आवश्यक नहीं होता वरन् कभी- कभी बहुत सुखद लगती है चंचल धारा की पत्थरों को गुदगुदाती, छेड़ती खिलखिलाहट। इन दोनों कथाओं का चुस्त-दुरुस्त चुहल भरा अंत ही कथाओं को रोचक बना जाता है। किंतु रोचकता का यह अर्थ नहीं है कि समस्या की गंभीरता को कहीं भी हल्का किया गया है। कथन और कहन का संतुलन बखूबी बनाए रखा है लेखिका ने।

नैतिकता, कम शब्दों में प्रभावशाली ढंग से बात कहने के कारण अपना असर छोड़ती है। दोहरी मानसिकता वाले आचरण पर चोट करती कथा का कसाव उसका मुख्य आकर्षण हैं।

जहाँ काम आवे सुई कहा करे तरवारि, यह सुना तो हम सबने हैं, जानते भी हम सब हैं पर इसे जीवन में चरितार्थ कर पाने में अक्सर चूक जाते हैं।इसकी अहमियत को दर्शाती है कथा, प्रैक्टिकल नॉलेज। प्रैक्टिकल नॉलेज की कथा-वस्तु थोड़ा हट के है और यही ताजापन इस कथा की विशेषता भी है।सटीक, सार्थक शब्दों के जरिए बड़ी स्वाभाविकता से मर्म की बात पाठक तक पहुंचा दी है लेखिका ने।

रिटायर्ड--- नौकरी की सेवा अवधि समाप्त होने पर व्यक्ति के भीतर उपजे खालीपन, अनुपयोगी होने के एहसास को दर्शाती कथा है। इस कथा में लेखिका का कहन मुझे बहुत प्रभावित कर गया। न लेखिका ने कहीं उस खालीपन का जिक्र किया, न पात्र विशेष ने व्यक्त किया, कथा के अन्य पात्रों का व्यवहार भी पात्र विशेष के प्रति अत्यंत सौहार्द पूर्ण रहा फिर भी कथा समाप्त कर मन भीग गया। पात्र- विशेष की मनःस्थिति हमारी संवेदनाओं तक सहजता से पहुंच गई। अनकहे ही सब कुछ कह देने का कौशल ही इस कथा को विशेष बना जाता है।सामाजिक सरोकारों वाली श्रेणी में लेखिका ने कुछ ऐसे सरोकारों की ओर भी हमारा ध्यान आकर्षित किया है, जिन पर हम बात करने से बचना चाहते हैं, जिन्हें हम हमेशा कालीन के नीचे खिसका देते हैं।ऐसी ही एक कथा है कासे कहूं

लघुकथा—युग परिवर्तन और बेतार संदेश हमारी युवा पीढी की संवेदनशीलता को केंद्र में रख कर रची गई कथाएं हैं। इस संवेदनशीलता को दर्शाने के लिए लेखिका ने जिस प्रकार नए प्रतीकों का चयन किया है, वह उनकी विस्तृत और गहन सोच का परिचायक हैं।

घर के भीतर बेटे और बेटी में भेद करने को ले कर तमाम कथाएं लिखी जाती रही हैं और आज भी लिखी जा रही हैं। हमारे समाज में इस परम्परावादी सोच को ले कर जागरूकता बढ़ी है और स्थितियों में बहुत परिवर्तन भी हुआ है, यह हमें स्वीकार करना ही पड़ेगा किंतु अब भी कहीं न कहीं विभाजन की वह रेखा बरकरार है, इस सत्य को भी नकारा नहीं जा सकता।दो सिरों पर खड़े इन दोनों विचार बिंदुओं को ऋता जीने बड़े कौशल से अपनी लघुकथा आदर्श घर में चंद पंक्तियों में ही समेटा है।परिवर्तित परिस्थियाँ और पारम्परिक सोच दोनों एक ही कथा का हिस्सा होते हुए भी अपनी-अपनी अलग अपस्थित दर्ज करती हैं और बेटी का तिलस्म टूटने  जैसा दर्द भी हमें भीतर तक छील जाता है।

इसी प्रकार सामाजिक सरोकार की श्रेणी में कुल मिला कर 41 कथाएं हैं जो अपने-अपने ढंग से पाठक मन पर अपनी छाप छोड़ती हैं।

दूसरी श्रेणी रिश्तों की लघुकथाएं की है, जिसके अंतर्गत 45 कथाएं हैं।माता-पिता- बच्चे, भाई-बहन, सास-ससुर- बहू, देवरानी-जिठानी, बहन- बुआ, सखियां, गरज यह कि हर रिश्तों के ताने-बाने को बुना है, ऋचा जी ने इन कथाओं में। जैसा कि हम सब जानते हैं कि हर रिश्ता बहु आयामी होता है। इन कथाओं से गुजरते हुए मुझे रिश्तों के इन विविध आयामों की धूप- छाँव को भरपूर जीने का मौका मिला।कथा काठ की हांडी में लेखिका ने हांडी के माध्यम से जितने नपे-तुले ढंग से जिठानी से बात कहलवाई है, वह वाकई अत्यंत प्रशंसनीय है।संप्रेषण किसी भी रचना की आत्मा होती है और लघुकथा में शब्द सीमा की अनिवार्यता के कारण भावों, विचारों का संप्रेषण तो रस्सी पर चलती नटी सा संतलुन का कौशल मांगता है। इस संकलन की कई कथाओं में लेखिका का यह कौशल उभर कर सामने आया है।
शापित फल्गु कई कारणों से एक बहुत ही खास कथा है। फल्गु नदी और सीता मैया के पौराणिक संदर्भ का लेखिका ने बहुत अच्छा उपयोग किया है। यह संदर्भ बहुत प्रचलित नहीं है अतः इसका उल्लेख कर इसे सामने लाने के लिए ऋता जी बधाई की पात्र हैं। ननद-भाभी के रिश्ते को नारी की पारस्परिक समझ से जोड़ना, एक- दूसरे के अधिकारों के लिए साथ- खड़े होने की कटिबद्धता की ओर इंगित करना लेखिका की विकसित सोच के परिचायक हैं। इस कथा की सबसे बड़ी विशेषता है एक पौराणिक संदर्भ को सामाजिक विचारधारा से लघुकथा के चोले में कुछ इस तरह फिट कर देना कि कहीं भी न असहजता लगे, न ढीलापन नजर आए।

संक्राति की सौगात, मनमर्जी आदि कथाएं सास-ससुर और बहु के रिश्ते में एक नया मोड़ ले कर सामने आती हैं और मन को कुछ ऐसी ठंडक पहुंचाती है जैसे जेठ की तपती धरती पर पहली बारिश की फुहार।खास कर मनमर्जी की शैली तो होंठों पर मुस्कुराहट ले ही आती है।

बीज का अंकुर, सागर की आत्महत्या, पिता की कोख, ठोस रिश्ता आदि कुछ ऐसी कथाएं हैं जो अपने- अपने विशिष्ट अंदाज में हमसे यह कहती हैं कि हर पारिवारिक रिश्ता दूसरे रिश्तों को मजबूती देता है यदि हम समझदारी से काम लें।

कहते हैं लघुकथा में एक संदेश, एक उद्देश्य का निहित होना उसकी शक्ति का परिचायक होता है। इस श्रेणी की लघुकथाओं में पारिवारिक संबंधों में समस्यायें और उनके निराकरण का संदेश निहित है। कहीं बेधक और मारक तरीके से, कहीं शांत भाव से, कहीं थोड़ी चुहल के साथ पर बात इस ढंग से कही गई है कि मर्म तक पहुंच जाती है, सीधे।

मानवेतर लघुकथाओं की श्रेणी में पाँच कथाएं हैं। पाँचों में अलग- अलग और कुछ तो बड़े अनूठे प्रतीक चुने हैं लेखिका ने और सब में अपना अलग संदेश हैं।प्यासी आत्मा, दोधारी तलवार सी हमारे सिर पर लटकती है तो व्यवस्था का नकाब, हमें आइना दिखाती है।

अगली श्रेणी में है चार लघुकथाएं जिन्हें ऋता जी ने कोरोनाकाल की लघुकथाओं के अंतर्गत रखा है। इन लघुकथाओं की पृष्ठभूमि भले ही कोरोनाकाल है किंतु उनकी कथावस्तु सर्वकालिक है, फिर वह दाग अच्छे हैं की सास-बहु का परस्पर सांमजस्य हो या भीड़-निर्माता की प्रिया की संवेदनशीलता।

पांचवी और आखिरी श्रेणी है विविध कथाओं की। इस श्रेणी में 43 लघुकथाएं हैं और जब श्रेणी का नाम करण ही विविध हो तो कथानक में विविधता होनी तो स्वाभाविक ही है। एक तरफ मरियम’, समझौताआदि कथाएं अपनी संवेदनशीलता से भीतर तक उतर जाती हैं तो वहीं दूसरी तरफ प्रतिकार जैसी कथा पीड़ा और अट्टहास दोनों को एक साथ ही उपजा जाती है।हर कथा का अपना विशिष्ट कथ्य है और विशिष्ट ही कहन भी।

कुल मिला कर धूप के गुलमोहर से हो कर गुजरना संवेदनाओं, भावों, सरोकारों की एक ऐसी यात्रा है जिसमें एक तरफ यथार्थ हमारी बांह थामे चलता है तो दूसरी ओर हालातों को बदलने की संभावनायें भी हमारा साथ नहीं छोड़ती।और मेरे नजदीक यही सृजन का धर्म है। जो निभा पाए उसके लिए लघुकथा अभिव्यक्ति का एक अत्यंत सशक्त माध्यम है। लघुकथा विधा के प्रति ऋता जी की गंभीरता और उसके निर्वाह के प्रति उनकी सजगता का परिचय तो इस संकलन के प्रारम्भ में उनके द्वारा लिखी गई मेरी बात से ही मिल जाता है। 

जिक्र मेरी बात का निकल आया है तो इस संकलन की भूमिका पर बात करने से मैं स्वयं को नहीं रोक पाऊंगी। धूप के गुलमोहर की भूमिका लिखी है प्रेरणा गुप्ता जी ने। लघुकथा के क्षेत्र में प्रेरणा जी एक जाना- माना हस्ताक्षर हैं और जो ईमानदारी इस विधा के प्रति उनकी स्वयं की लघुकथाओं में परिलक्षित होती है, उसी ईमानदारी का निर्वाह उन्होंने इस संकलन की भूमिका लेखन में किया है। 

मेरे भीतर का पाठक मन और मस्तिष्क दोनों ही स्तर पर खुश है कि धूप के गुलमोहर का रसास्वादन करने का सुअवसर प्राप्त हुआ। ऋता शेखर जी को हार्दिक शुभकामनाएं। अबाध गति से चले आपकी लेखन यात्रा।
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इतनी सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए दिल से आभार नमिता जी|