शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

वाणी और कलम


वाणी और कलम


वाणी मुखर है
पर खामोश है
कलम बोलती नहीं
पर वाचाल है
कई कई बातें ऐसी
कह नहीं पाते
कलम भावों की स्याही से
बयान करती है
दर्द बह जाते हैं आँखों से
वाणी कह नहीं पाती
उन बूँदों को समाकर
कलम दरिया बहाती है
विरोध मन में हो
स्वर फूट नहीं पाते
उस तपिश को सहकर
कलम अगन रेखा बनाती है
आँधियाँ आ जाएँ
वाणी टिक नहीं पाती
थरथराती लौ को
कलम स्थिर बनाती है
भावों का अतिरेक हो
हिचकियाँ आ जाती हैं
कलम ग्लास बन जाती
पानी पिलाती है
एकांत होता है मरणासन्न
कलम औषधि बन जाती
जीवन- संचार करती है
सपनों के पंख होते हैं
वाणी पकड़ नहीं पाती
उन पंखो को लेकर
कलम नर्तन कराती है
मुहब्बत व्यक्त न हो पाए
कलम की रस-फुहारें
धड़कन बढ़ाती हैं
वाणी एक कम्पन है
हवा में तिरोहित हो जाती
कलम उस स्पंदन को
शाश्वत साकार बनाती है|

ऋता शेखर मधु

10 टिप्‍पणियां:

  1. वाणी एक कम्पन है
    हवा में तिरोहित हो जाती
    कलम उस स्पंदन को
    शाश्वत साकार बनाती है|

    अच्छी पंक्तियाँ,..खूबशूरत रचना,....

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  2. जो भाव होठों के जरिये लरज नहीं पाते!
    वो कलम के जरिये पन्नों पे उतर जातें !!
    बहुत सुन्दर रचना !
    आभार !

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  3. कलम वाचाल है ... कितनी सही बात कही है ..सुंदर प्रस्तुति .

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  4. कलम भी कई बार रुक जाती है ... पर रुक कर भी मरहम लगाती है

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  5. वाणी मुखर है
    पर खामोश है
    कलम बोलती नहीं
    पर वाचाल है
    बहुत खूब ।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर रचना !
    आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  7. गहन अभिव्यक्ति..... सरल शब्दों में गहरी बात

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  8. वाह!!!!!बहुत अच्छी अभिव्यक्ति,सराहनीय प्रस्तुति,..

    MY NEW POST ...सम्बोधन...

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  9. आपकी बेमिशाल प्रस्तुति
    पर शब्द नहीं मिल रहे मुझे
    कुछ भी कहने के लिए.

    आभार..आभार..बस आभार आपका.

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  10. वाणी और कलम का सार्थक सामजस्य स्थापित किया है ... दोनों का महत्त्व है ...

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