बुधवार, 30 मार्च 2016

आता है याद हमको गुजरा हुआ जमाना

221 2122 221 2122
गजल....

हर राह पर गुलों की कालीन तुम बिछाना
आए हजार बाधा धीरज से लाँघ जाना

ये आसमाँ सजाता सूरज औ' चाँद तारे
तुम रौशनी में इनकी अपने कदम बढ़ाना

जब जिंदगी में दुख सुख का सिलसिला मिले तो
इतनी विशालता हो, थक कर न बैठ जाना

रहतीं झुकी निगाहें माँ बाप के अदब में
आता है याद हमको गुजरा हुआ जमाना

झुकती हुई कमर में लाचारगी बहुत है
तुम प्रेम से सदा ही उनको गले लगाना

नाजुक बड़े ये रिश्तों के हैं महीन धागे
रखना बड़ी नफ़ासत जब भी इन्हें निभाना

*ऋता शखर 'मधु'*

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 31 मार्च 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. जब जिंदगी में दुख सुख का सिलसिला मिले तो
    इतनी विशालता हो, थक कर न बैठ जाना

    वाह क्या बात कही, बेहतरीन

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  3. ये आसमाँ सजाता सूरज औ' चाँद तारे
    तुम रौशनी में इनकी अपने कदम बढ़ाना
    बेहद सुन्दर एवं भावपूर्ण ग़ज़ल दी :) शुभ संध्या jsk

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (01-04-2016) को "भारत माता की जय बोलो" (चर्चा अंक-2299) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    मूर्ख दिवस की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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