बुधवार, 11 अप्रैल 2018

मी टू-लघुकथा

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मी टू

‘रमोला, ये तुम्हें क्या सूझी है| तुम्हारा हँसता खेलता परिवार बर्बाद हो जाएगा| परिणाम पर भी विचार किया है क्या?’’
‘जी दीदी, सब सोच कर ही फैसला लिया है| अब बात बाहर आनी ही चाहिए|”
‘किन्तु, रमेन्द्र जी ये सह नहीं पाएँगे| समाज में सशक्त लेखक के रूप में उनकी इज्जत है| पहले उनसे बात कर लो|’’
‘वो नारी सशक्तिकरण के घोर समर्थक हैं| कुछ न कहेंगे|’’
‘वे पुरुष भी हैं, यह सोच लेना| पर वह था कौन रमोला?’’ दीदी का भयभीत स्वर गूँज उठा|
‘वह तो ‘मी टू’ कैंपेन से जुड़कर ही बताऊँगी दीदी,’’ कहती हुई रमोला बाहर निकल गई|

थोड़ी देर बाद ब्रेकिंग न्यूज था, ‘प्रसिद्ध लेखक रमेन्द्र जी की पत्नी रमोला ''मी टू” कैंपेन से जुड़ी हैं| जब वे बारह वर्ष की थीं तो बड़ी बहन ने डिलीवरी के वक्त बुलाया था ताकि घर के कामों में मदद मिल सके| जब बहन अपनी ननद के साथ अस्पताल में थीं तो घर में बहन की ननद के पति ने उनके अकेलेपन का फायदा उठाया| बहन का घर न टूटे इस वजह से वे चुप थीं| किन्तु इस कैंपेन ने उन्हें अपनी बात कहने की हिम्मत दी है|’’
खबर सुनते ही रमेंन्द्र जी स्तब्ध रह गए| रात में बच्चों ने पिता को बाहर सोफे पर सोये देखा|
तभी दीदी का फोन आया,’’मेरी ननद सूटकेस के साथ मेरे घर आ गई हैं रमोला, शायद हमेशा के लिए| पर तू तो खुश है न’’
रमोला फोन रखते हुए सोच रही थी, कौन का अपराध ज्यादा बड़ा है...चुप रहने का या बोल देने का|
-ऋता शेखर ‘मधु’

सेलिब्रीटीज द्वारा मी टू कैंपेन के तहत किए जा रहे खुलासों के आधार पर रचित कथा

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (13-04-2017) को बैशाखी- "नाच रहा इंसान" (चर्चा अंक-2939) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    बैशाखी की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. गलती तो चुप रहने की ही थी लेकिन बोल देने के तरीके पे भी निर्भर करता है.... यानी ननद को जो जो बात रमोला से पता चलनी चाहिए थी वो मीडिया से पता चली... यहीं शायद चूक हुई.... अच्छी लघु कथा... हम जो भी करते हैं उसके कुछ न कुछ परिणाम हमे भुगतने पड़ते हैं...यही दर्शा रही है ये....

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  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन स्वार्थमय सोच : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  4. सच समय पे बोला जाना चाहिए ....

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