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बुधवार, 24 अगस्त 2022
सार गीता का समझकर मन मदन गोपाल कर
जो मिला वरदान में वह जन्म मालामाल कर|
मान रख ले तू समय का जिन्दगी संभाल कर ||१
ध्यान हो निज काम पर ही यह नियम रख ले सदा |
बात यह अच्छी नहीं तू बेवजह हड़ताल कर ||२
कर कहीं उपहास तो मनु जाँच ले अपना हृदय |
सामने उस ईश के तू क्यों खड़ा भ्रम पाल कर ||३
त्याग के ही भाव में संतोष का धन है छुपा |
सार गीता का समझकर मन मदन-गोपाल कर ||४
बाँध लेता प्राण को जब मोह का संसार यह |
शुद्ध पावन सद्-विचारी उच्च अपना भाल कर ||५
इस जगत में मान ले तू प्रेम है सबसे बड़ा |
हो न ममता साथ तो कब कौन होगा ढाल पर||६
काट कर वन, घर बसाया खग बिना घर के हुए |
पा गया तू क्या मनुज जब हैं न पंछी डाल पर ||७
@ ऋता शेखर ‘मधु’
बुधवार, 10 अगस्त 2022
डेढ़ इंच मुस्कान - क्षणिका संग्रह-समीक्षा
समीक्षक ; ऋता शेखर ‘मधु’
क्षणिकाओं की शान- डेढ़ इंच मुस्कान
मुझे मेरी सद्य प्रकाशित पुस्तक , मृणाल का बदला, के साथ श्वेतांशु प्रकाशन की ओर से उपहारस्वरूप डेढ़ इंच मुस्कान मिली है। अब आप सोच रहे होंगे यह मुस्कान कैसे मिली। मैं बात कर रही हूं श्री राम साहू जी की क्षणिका संग्रह 'डेढ़ इंच मुस्कान' की। आज जबकि मुस्कान भी मिलीमीटर में मिलती है तो डेढ़ इंच तो बहुत बड़ी बात है। पुस्तक का शीर्षक बहुत ही अच्छा है।आवरण पृष्ठ पर मुस्कुराती हुई स्माइली का प्रयोग आकर्षक है|
क्षणिका एक मारक विधा है जो चिंतन की ओर अग्रसर करती है। किसी विशेष क्षण में हुए अनुभव को चंद पंक्तियों में उतार देना क्षणिकाकार की खासियत होती है। क्षणिकाएं लघु कविता नहीं होती। क्षणिका के क्षेत्र में लिख रहे रचनाकारों को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए तब वे लघु कविता एवं क्षणिका के अंतर को समझ सकेंगे।। लेखक श्री राम साहू जी अपनी बात क्षणिका के माध्यम से रखते हुए कहते हैं कि जिंदगी/ हादसों व विडंबनाओं का/ शिकार है…शेष कुशल मंगल है/ बाकी तो आप सभी पाठक /अधिक समझदार हैं… यहीं से लेखनी ने कमाल दिखाना आरम्भ कर दिया है ।।
भूमिका प्रसिद्ध व्यंग्यकार गिरीश पंकज जी ने लिखी है।पंकज जी का कहना है कि लेखन के क्षेत्र में नन्हीं विधाए, जैसे हाइकु, तांका, लघुकथा, क्षणिकाएँ आदि फास्ट फुड की तरह हैं| जिस तरह लोग अधिक देर तक भोजन करना पसंद नहीं करते, उसी तरह समयाभाव के कारण लम्बी रचनाएँ भी पढ़ना पसंद नहीं करते|
नन्हीं रचनाओं का सृजन चुनौतीपूर्ण होता है| बहुत कुछ कहने के लिए चंद शब्द मिलते है| यह लेखक की काबिलियत होती है कि गागर में कितना सागर भर पाए| विषय चयन भी सोच समझकर करना होता है| उस हिसाब से लेखक ने समयानुसार विधा का चयन करके अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया है| सामाजिक सरोकार से लेकर राजनीति, पर्यावरण को विषय बनाते हुए उन्होंने गंभीर सृजन किया है|
कथ्य एवम शिल्प आकर्षित करते हैं।राजनीति और सत्ता को विषय बनाया जाए तो सर्वप्रथम रामराज्य को ही सबसे आदर्श राज्य माना जाता है। किन्तु आदर्श होने के बावजूद आलोचना से कोई भी राज्य अछूता नहीं रह पाता। राज्य को स्वार्थी होने के दृष्टिकोण से मन्त्रणा देने वाले मंथरा सरीखे लोग हैं, तो राजा के हर कृत्य पर अँगुली उठाने वाले धोबी सरीखे भी हैं। जब- जब रामराज्य की चर्चा होगी, ये दोनों स्वयमेव शामिल माने जाएँगे।
* हम /रामराज्य/ स्थापित/ करने में/ सफल हुए हैं /धोबी-मंथरा/ गली-गली/ पल रहे हैं।
चंद शब्दों वाली इस विधा में तुकांत का भी निर्वहन किया जाए तो क्षणिकाओं का स्वरूप अलग ही दिखता है। आदी और अवसरवादी का प्रयोग नितांत खूबसूरत बन पड़ा है। राजनीति पर निशाना साधने वाली यह रचना विपक्ष की भूमिका पर व्यंग्य करता हुआ थोड़ा स्मित भी दे जाता है। जब से सत्ता है तब से महंगाई एक मुद्दा है। चीजों के दाम हर किसी के राज्य में बढ़ते रहे हैं और सत्तापक्ष को निशाना बनाने का हथियार भी बनते रहे हैं। यह विरोध जोरशोर से इसलिए होता है कि विपक्ष का पक्ष मजबूत हो। लोकतंत्र जब भ्रष्टाचार का पर्याय बन जाये तो इस तरह की क्षणिकाएँ जन्म लेती हैं। बेईमानी में ईमानदारी, विरोधाभास का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत कर रहा। विरोधाभास लिए कई क्षणिकाएँ ध्यानाकर्षण करती हैं|
*महंगाई के खिलाफ/उनका/ विरोध अभियान/ युद्धस्तर पर/ जारी है। 'उल्लू' सीधा करने की /पूरी तैयारी है।।
आंदोलन करवाकर तहलका मचाना और स्वयं बच निकलने वाले नेताओं पर मारक सृजन है। बेचारी जनता उन नेताओं के प्रभाव में आकर अपना समय, जोश और समर्पण दाँव पर लगाने के लिए तैयार रहती है| जेल तक चली जाती है और आंदोलन का सृजनकर्ता चैन की वंशी बचाता सुख की नींद सोता है|
* उनके/ आंदोलन से/ तहलके मच गए। सब ने जेल की/ राह ली, वे अकेले बच गए।।
सत्ताधारी नेताओं के बदलते व्यवहार को चंद शब्दों में दर्शाना बड़ी कला है| उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ अपने पद और गरिमा को ईमानदारी से निभाने के लिए लेना होता है|किन्तु शपथ ग्रहण के बाद वे कुर्सी बचाने के चक्कर में ईमानदारी कहीं खो जाती है|
विरोधाभास से रची गयी क्षणिका अच्छी बनी है| मनुष्य का नैतिक पतन उसके उत्थान में सहायक है, इससे और कितना अधिक गिरेगा आदमी|
* सचमुच/ आज आदमी/ काफी तरक्की/ कर चुका है। नीचे गिरने की/ हद तक, ऊपर/ उठ चुका है।।
श्रीराम साहू जी ने क्षणिकाओं में बहुत बारीकी से हर उस कथ्य को उभारा है जो आम मनुष्य सोचता है|एक तरफ प्रगति के नाम पर पारिवारिक विखंडन पर रचना है तो दूसरी तरफ कार्य प्रणाली में कागजी घोड़े दौड़ा कर कार्य की संपूर्णता दिखाने की बात कही गई है| जिनके बड़े बड़े बोल होते हैं उनके काम कम होते हैं| हर समस्या पर सिर्फ वार्ता होती है|
*उन्होंने/ प्रगति के/ नए आयाम/ गढ़ लिए हैं/ पहले चारदीवारी में/ रहते थे/ अब केवल दीवार/ खड़ी कर लिए हैं||
* उन्हें/ काम से कम/ बात से अधिक/ वास्ता है| उनकी मान्यता है/ हर समस्या का हल/ केवल वार्ता है ||
क्षणिकाओं में कभी तुकांत का प्रयोग मनभावन है तो कभी अतुकांत में सधी लेखनी चली है| रचनाओं को पढ़ते समय मुस्कान भी सहज रूप से आती है| आपने सत्ता और सत्ताधारियों पर चुटीले तंज किए हैं जो हर आदमी मुस्कुराते हुए स्वीकार कर ले| कथ्य और शिल्प का निर्वहन है और भाव भी भरपूर है|
कहीं- कहीं रचना सपाट बयानी भी लगी , किंतु कथ्य प्रभावशाली होने के कारण प्रभाव छोड़ने में सफल रही|
प्रायः पुस्तक का समर्पण लिखते समय उसी विधा का चयन किया जाता है जिस विधा में पुस्तक बननी है| क्षणिका की पुस्तक का समर्पण पृष्ठ हाइकु में होने के कारण आरम्भ में थोड़े भ्रम की स्थिती बन रही| ऐसा प्रतीत होता है जैसे हाइकु संग्रह हो|
लेखक श्रीराम साहू जी 1984 से लेखन में सक्रिय हैं। उनकी रचनाओं का पत्रिकाओं में प्रकाशन 1987 से जारी है। आप फेसबुक में विभिन्न संस्थाओं द्वारा शताधिक सम्मान प्राप्त कर चुके हैं।
श्रीराम साहू जी की लेखनी सतत क्रियाशील रहे, इसके लिए हार्दिक शुभकामनाएँ।
पुस्तक की साजसज्जा, पन्नों की स्तरीयता एवं छपाई…सभी सुन्दर हैं।
पुस्तक परिचय
पुस्तकः डेढ़ इंच मुस्कान
लेखकः श्रीराम साहू
पृष्ठः ११२
मूल्यः २५०/-
प्रकाशकः श्वेतांशु प्रकाशन, नई दिल्ली
प्रकाशन का मोबाइल नम्बरः 8178326758, 9971193488
दोहा में नटराज
विषय- नटराज
चोल वंश ने कांस्य से, सृजित किया नवरूप।
तांडव मुद्रा में ढले, शिवजी लगे अनूप।।
शिव नर्तक के रूप में, कहलाये नटराज।
बस एक बार प्रेम से, दें उनको आवाज।
3
नृत्य करें नटराज जब, स्पंदित हो आकाश।
महायोगी महेश वह, उनसे है कैलाश।।
4
नटराजन के नृत्य से, कण कण भरे प्रमोद।
जग सारा गतिशील है, डमरू करे विनोद ।।
5
घूम रहे ब्रह्मांड में, नीलकंठ नटराज।
अंतरिक्ष की ओम ध्वनि, खोल रही यह राज।।
6
शर्व: हरो मृडो शिवः, या कह लें नटराज।
एक नाम है तारकः, डमरू जिनका साज़।।
7
शिव वेदांगों शाश्वतः, उनकी कृपा अपार ।
करने जग-कल्याण वह, आते बारम्बार ।।
सोमवार, 13 जून 2022
पाठकीय में कमल कपूर जी की पुस्तक
रंग भरे दिन-रैन- दोहा संग्रह
लेखिका- कमल कपूर
प्रकाशन- अयन प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य- 260/-
पृष्ठ- १०५
पुस्तक लेखन की दुनिया के सहृदय लेखक रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी को समर्पित की गई है| उसके आगे लेखिला का गुरु के प्रति समर्पित दोहै है जो गुरु के प्रति लेखिका का सम्मान प्रदर्शित करता है|
पहले गुरु की वंदना करूं हाथ में जोड़। जिसने चमकाया सदा जीवन का हर मोड़।।
कमल जी ने कुछ दोहे कलम को समर्पित किए हैं। लिखते कथा कहानियां मीठे मोहक गीत। लिखे खत मनुहार के कलम मनाती मित्र।
अनुक्रम में चार विषयों के अंतर्गत उप विषय रखे गए हैं|
लेखिका ने अपनी बात में लिखा है की उनके 480 दोहे पूजा के वे दीप हैं जो उन्होंने कृतज्ञ भाव से देवी प्रकृति की उपासना करते हुए प्रज्वलित किए हैं।
अनुक्रम में चार विषयों के अंतर्गत उप विषय भी रखे गए हैं। प्रथम विषय रंग भरे दिन रैन के अंतर्गत पहला उप विषय रंग भरे दिन रैन ही है।
बरसों से मौसम सभी, देख रहे भर नैन।
रूप बदलते हर घड़ी, रंग भरे दिन- रैन।।
यहाँ पर दोहाकार ने मौसम की आवाजाही और उस के बदलते स्वरूप को अपने अनुभव से जोड़कर लिखा है। यह मौसम कभी खुशियों के भाव भरते हैं और कभी उदास कर जाते हैं। सभी भाव के अपने रंग होते हैं जिसमें जीते हुए मनुष्य अपने दिन और समय को व्यतीत करता जाता है। प्रकृति के सानिध्य में दिन का सबसे उर्जात्मक समय सुबह का समय होता है। जिसने भोर को देखा और आनंद उठाया वही सुबह के खुशनुमा रंग को आत्मसात कर सकता है।
माखन से उजली सुबह ,पाखी दल के गीत।
हँसी खुशी है घूमती, बनके जुड़वा मीत।।
सुबह के लिए माखन का बिंब लेना आकर्षित करता है।
एक और दोहा देखिए…
रजनीगंधा रेन थे,दिन थे शोख़ गुलाब।
दिन में हाथ किताब तो, रातों को थे ख्वाब।।
एक दोहा देखिए जिसमें कवयित्री का हल्का सा चुहल नजर आता है।
जाड़े में रविराज जी, करते नखरे खूब।
बादल से नाराज हो, गए नदी में डूब।।
मौसम में जेठ सबसे गर्म महीना माना जाता है। यह गर्मी जहाँ पशु पक्षी समुदाय को त्रस्त करती है, परेशान करती है वहीं यह गुलमोहर में नई रंगत पैदा करती है।
धूप जेठ की सींचती, गुलमोहर में जान।
सूरज से ले लालिमा, बढ़ती अद्भुत शान।।
जब दिवस का अवसान होता है तो भोर में जितने स्वर्ण रश्मियाँ बिखरी थीं उन्हें समेटने का काम भी शुरू होता है। और यह काम सांझ के जिम्मे आता है।
किरण-गठरिया लाद के, चली केसरी शाम।
पहुँचेगी यह रात तक, अँधियारे के गाम।
अंधियारे के गाँव में क्या होता है इसका दर्शन करते हैं।
नीरवता में गूंजता, मलयानिल संगीत।
चाँद फलक पर आ गया, हुई रात की जीत।।
एक अन्य सुंदर दोहा देखिए…
कुमुद कुमुदिनी से सजे, नदी सरोवर ताल।
लहरों पर तेरा करें, उजले बाल-मराल।।
ऋतुओं में सबसे मनमोहक ऋतु बसंत का होता है। यह बहारों का मौसम है| ये बहार फूलों और तितलियों से आती है| चारो ओर उनका साम्राज्य दिखता है| यह बात दोहा के माधयम से कवयित्री ने इस प्रकार लिखी है|
बासंती ऋतु ने किया, अजब अनोखा काम।
सारा गुलशन लिख दिया, अलि-तितली के नाम।।
चारों ओर बढ़ते प्रदूषण और अरशद हवा की कमी की ओर कवित्री ने बहुत ही सरल और सरस भाव से इशारा किया है। जहां वह मंदाकिनी हो कदंब की छांव। खोजें चलकर आज ही ऐसा कोई गांव।।
ऋतुओं का उल्लेख करते हुए महाकवि निराला के अवतरण दिवस को लेखिका ने मनभावन तरीके से लिखा है।
मधुरिम तिथि थी पंचमी, ऋतु बसंत अभिराम।
जब भारत के पटल ने, लिखा ‘निराला’ नाम।।
लेखक जब कभी कलम उठाता है तो उसकी कोशिश रहती है की वह मानव मन को भी परिभाषित करें और प्रेरणा की पतवार पकड़कर मनुष्य को निराशा के दलदल से पार कराने का प्रयास करें| लेखिका ने भी मानव मन पर और रिश्तो पर अच्छे दोहे सृजित किए हैं| मन को धैर्य बंधाने का प्रयास देखिए…
झड़ गई सारी पत्तियां, पर ना पेड़ उदास|
सांस सांस में पल रहे, नव जीवन की आस।।
कवयित्री ने सबके लिए मंगल कामना करते हुए लिखा है-
दीपक रोज जलाइये, एक सुबह इक शाम|
महारोग से जूझते, सब लोगों के नाम।।
लेखिका ने खिड़की को विषय बनाते हुए लिखा है…
खिड़की के आगे कभी, ना चिनना दीवार।
सिसक रही बाहर खड़ी, ताजा मधुर बयार।।
इस दोहे में मकानों के बीच में दूरी ना होने का जिक्र हुआ है। शहरों में सटे-सटे मकान बनते हैं जिनसे खिड़की का फायदा खत्म हो जाता है। जिस खिड़की को हवा और धूप के लिए बनाया जाता है सामने दीवार उठ जाने से, वह घर वंचित रह जाता है।
कमल जी की लेखनी माँ के लिए बहुत भावपूर्ण चली है और खूब चली है।
माँ की महिमा का करें, कवि कोई गुणगान।
भरनी होगी और भी, उसे कलम में जान।।
सचमुच माँ को शब्दों में बाँध पाना बहुत कठिन है। इसी संदर्भ में दूसरा दोहा भी बहुत सुंदर है।
माँ बनकर ही जानती, बिटिया मां का मोल।
कानों में तब गूँजते, माँ के मीठे बोल।।
जब रिश्तो की बात चले तो भाई बहन का जिक्र ना हो, ऐसा नहीं हो सकता।
डोर कलाई बाँध के, तिलक लगाकर भाल।
भाई का सुख माँगती, बहना हुई निहाल।।
शेष अशेष के अंतर्गत एक दोहा जो आकर्षित कर रहा…
दीवारें कब तक सहे, तस्वीरों का भार|
मन में उन्हें सजाइए, चले गए जो पार।|
अक्सर घर में उनके फोटो रखे जाते हैं जो दुनिया छोड़ कर चले जाते हैं। कवयित्री का कहना है कि दीवारों पर सजाने के बजाय उन्हें मन में स्थान देना चाहिए ताकि वह हर जगह साथ रहे| उनकी तस्वीरें मन के दीवार पर होनी चाहिए , घर की दीवारों पर नहीं।
एक दोहा और है जो सीधे मन तक पहुंच रहा…
राहें तो सीधी सभी, टेढ़े मन के मोड़।
कभी हमें जो तोड़ दें, और कभी दे जोड़।|
कमल जी ने बहुत सार्थक तरीके से या बात समझाई है कि रास्ते हमेशा सीधे ही रहते हैं| यह मनुष्य का मन होता है जो राहों को सरल या कठिन बनाता है|
कवयित्री कमल कपूर जी की लेखनी सतत चलती रहे, इसके लिए दिल से शुभकामनाएँ !!
मंगलवार, 7 जून 2022
छंद विजात में परमपिता
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मात्रा विधान - १२२२ १२२२ , १४ मात्रिक सम छंद
चरण-४, चरणारंभ-१ लघु
चरणान्त-२२२(तीन गुरु)
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सभी में जो समाया है |
जहाँ कण -कण लुभाया है|
जहाँ विश्वास मिलते हैं |
लगाकर आस का चंदन|
नदी की धार में बहते |
मिले उनका सहारा जब |
धरा की हर फसल कहती |
तभी पावस बरसते हैं |
दिवस भर सूर्य चलता है|
इशारों पर हिलीं पातें|
अमन को ध्यान में धरती |
दिलों में हों मुहब्बत भी |
रहें सब साथ मिलजुल कर |
पवन जब चले बहारों में|
– ऋता शेखर ‘मधु’
पाठकीय में ऋता शेखर 'मधु' की पुस्तक
'ऋता शेखर मधु' जी साहित्य जगत का एक जाना पहचाना नाम है। उनकी कलम लघुकथा से लेकर हाइकु, हाइगा, कविता, ग़ज़ल, आलेख एवम् छंदों पर भी खूब चलती है। सबसे अच्छी बात है कि आप विधा के प्रति बहुत गंभीर एवं समर्पित है। हाल ही में आपकी नवीनतम कृति 'धूप के गुलमोहर' प्रकाशित हुई है। आपने यह संग्रह लघुकथा विधा को समर्पित किया है। कवर पृष्ठ बहुत ही शानदार है, पेपर भी उम्दा क्वालिटी का है। जिसके लिए 'श्वेतांशु प्रकाशन'
बधाई
के पात्र हैं।
संग्रह में सबसे अच्छी बात यह है कि अनुक्रमांक में सभी लघुकथाओं को विषयों के आधार पर वर्गीकृत किया है। 41 लघुकथाएं सामाजिक सरोकार से जुड़ी हुई हैं तो 45 लघुकथाएं रिश्तों के आधार पर बुनी गईं हैं। 4 लघुकथाएं कारोना काल पर और 43 अन्य विविध लघुकथाएं हैं।
संग्रह का शीर्षक 'धूप के गुलमोहर' अपने आप में गहन अर्थ समेटे हुए है। आखिर यह नाम ही क्यों? 'मन की बात' में लेखिका बताती हैं:
"जिंदगी की कड़ी धूप में चलते हुए मिल जाए गुलमोहर का घना साया...
समझ लो थके कदमों को मिल गया कोमल रूई का फाहा।"
गज़ब बात कही लेखिका ने:
"जिसने सही धूप, उसने पा लिया गुलमोहर सा रूप।"
जिसने आदत ही बना ली हो चुनौतियों को टक्कर देने की, उसे गुलमोहर की लालिमा पाने से कौन रोक सकता है भला। इसे कहते हैं कविता का हो जाना।
लेखिका ने पुस्तक की शुरुआत 'मेरी बात' से की है जिसमें रचना प्रक्रिया के बारे में भी बताया है कि जीवन जीते हुए, आसपास के लोगों से मिलते हुए कई पल ऐसे आतें हैं जो मन मस्तिष्क पर अपनी जगह बना लेते हैं। यही विशेष पल चिंतन के लिए मजबूर करते हैं। इन्हें हूबहू पेश नहीं किया जा सकता इसलिए उपयुक्त शब्दों का चयन कर रचना में ढालना पड़ता है। उन्होंने लघुकथा विधा को अपने शब्दों में परिभाषित किया है जो एक अनूठी पहल है।
इस संग्रह की भूमिका लघुकथाकारा 'आदरणीया प्रेरणा गुप्ता' जी द्वारा लिखी गई है जिसमें उन्होंने लघुकथाओं की समीक्षा भी की है। भूमिका पढ़ते ही पाठकों का मन अपने आप लघुकथाओं को पढ़ने के लिए लालायित हो उठेगा।
आइए अब बात करते है लघुकथाओं पर:
सामाजिक सरोकार से जुड़ी पहली ही लघुकथा 'माँ' ने दिल जीत लिया। जिसमें लेखिका का पैनी दृष्टिकोण नज़र आया और आगे की लघुकथाएं पढ़ने को मन आतुर हो उठा।
'मासूम अपराध' एक बेहद मार्मिक लघुकथा है जिसमें एक गरीब बच्चे की व्यथा को बखूबी बयां किया गया है।
'नया दरवाज़ा' संवादात्मक शैली में लिखी रचना है। जिसमें संदेश दिया गया है कि औरत होने का मतलब यह नहीं कि वह कमज़ोर है।
'नैतिकता' : उन लोगों पर अच्छा कटाक्ष किया है जो कहते कुछ और है और करते कुछ और है।
'अपनी- अपनी उम्मीदें' यह लघुकथा बहुत ही सार्थक लगी क्योंकि अक्सर लोग जो खुद कामचोर होतें हैं वही मेहनतकश लोगों पर छींटाकशी करते नजर आतें हैं।
'बेतार संदेश' जिंदगी आगे बढ़ने का नाम है। ज़माने के साथ तो चलना ही पड़ेगा। इस लघुकथा में लेखिका ने यही संदेश देने की कोशिश की है कि कभी-कभी जो हम सोच भी नहीं पाते वह हो जाता है।
'भूख का पलड़ा' एक बेहद मार्मिक लघुकथा है। भूख पर किसी का ज़ोर नहीं चलता। राजा हो या रंक, पेट की आग बुझानी ही पड़ती है। खाना किन हाथों से मिल रहा है यह भूखा पेट नहीं सोचता।
'गठबंधन' एक बढ़िया व्यंग्य रचना है क्योंकि कुर्सी के लिए तो लोग गधे को भी बाप बना लेते हैं।
'आदर्श घर' लिंगभेद की जड़ें अभी भी जीवित है। कौन कहता है कि बेटा बेटी में फर्क मिट गया है। अक्सर उभरती पीड़ा भीतर ही भीतर दबे घाव को पुनः हरा कर देती है।
'रिटायर्ड' इस कथा के माध्यम से यह बताया गया है कि जब इंसान के पास कुर्सी होती है तब सभी उसे पूछते हैं, उसका मान सम्मान भी करते हैं, कुर्सी से हटते ही वह इंसान सबके लिए बेगाना हो जाता है। चंद शब्दों में ही कथ्य को बड़ी खूबसूरती के साथ उभारा है।
'चिपको' बहुत बढ़िया लघुकथा है, चिपको आंदोलन का वह समय आंँखों के सामने सजीव हो उठा जिसे भले ही सब ने ना देखा हो मगर वह पीड़ा महसूस जरूर की है। शानदार शब्दों में इस रचना को पिरोया है लेखिका ने जिसके लिए वह
बधाई
की पात्र है।
'नेग'- प्रेम और सद्भावना भरा व्यवहार पत्थर दिल इंसान को भी बदलने पर मजबूर कर देता है।
'ठनी लड़ाई' चुलबुली सी मगर बेहद रोचक कथा है। आंँखों के सामने चलचित्र सी चलती, बिंबों का बेहद खूबसूरती से प्रयोग किया गया है।
रिश्तों की लघुकथाएं:
'अंतर्देशीय' आज के समय में रिश्तों में आती दूरियों का एहसास करवाती लघुकथा है।
'पुनर्गठित' इस लघुकथा में मांँ ने बेटी का साथ देकर सही किया ताकि जो उसके साथ घटा, वह बेटी के साथ ना घटे। आज की नारी कमज़ोर नहीं है। सार्थक दिशा की ओर अग्रसर करती लघुकथा के लिए साधुवाद है लेखिका को।
'समस्या' परिवार में आपसी प्रेम का उदाहरण देती मन को छू लेने वाली रचना है।
'सागर की आत्महत्या' एक बेहद गंभीर विषय उठाया है लेखिका ने अपनी इस लघुकथा के माध्यम से। अक्सर पूरे घर की जिम्मेदारियां निभाते पिता के मन की बात को कोई समझ नहीं पाता, उन्हें भी जरूरत है समझने की।
'आप अच्छे हो' प्रतियोगिता के युग में माता-पिता बच्चों को मशीन बना रहे हैं। उन्हें एक दूसरे से आगे बढ़ते देखना चाहते हैं। इसी बीच अगर वह ऐसा ना कर पाएं तो जीवन की एहलीला खत्म करने की ओर अग्रसर हो जाते हैं। इसलिए बेहतर है उन्हें सही समय पर संभाल लिया जाए। आज के युग के लिए संदेश देती एक सार्थक कथा।
विविध लघुकथाओं में:
'तुसी ग्रेट हो' एक बेहद हल्की फुल्की खूबसूरत रचना है।
'कॉपी पेस्ट' इस रचना को पढ़ने के बाद तो बस मन में एक ही पंक्ति बार-बार आ रही है "नानक दुखिया सब संसार।"
'एहसासों की दीपावली' रिश्तो का अहसास करवाती बेहद मार्मिक रचना है। समय बहुत तेजी से बीत रहा है और सब अपने आप में व्यस्त हैं, अकेलेपन से निपटने के लिए अपने मन को खुद ही समझाना पड़ता है।
'शपथ' इंटरनेट के इस दौर में हम रिश्तों को तरजीह देना भूल गए हैं और आभासी दुनिया में कहीं खो गये है।
अन्य और भी लघुकथाएं हैं जिन पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है किंतु आगे मैं पाठकों के लिए छोड़ती हूँ।
मुझे उम्मीद ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आपके विचार पाठकों के मन मस्तिष्क में उतरकर उनके जीवन को सही दिशा की ओर दृष्टिगोचर कर देंगे। लेखिका को इस खूबसूरत संग्रह के लिए हार्दिक
बधाई
एवं शुभकामनाएंँ प्रेषित करती हूँ। उनकी कलम यूंँ ही नित नये आयाम स्थापित करती रहे।
सीमा वर्मा
लुधियाना (पंजाब)
रविवार, 5 जून 2022
पाठकीय में गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी की पुस्तक
पाठकः ऋता शेखर 'मधु'
पुस्तकः कुछ ठहर ले और मेरी ज़िन्दगी- गीत संग्रह
लेखिकाः गिरिजा कुलश्रेष्ठ
“काँटों को मैं अपना लूँ, या मृदु कलियों को प्यार करूँ
ये दोनों जीवन के पहलू किसको मैं स्वीकार करूँ|
जीवन में चलने वाले उथल- पुथल की यह अभिव्यक्ति प्रभावशाली है|
कुल ६९ गीतों को १११ पृष्ठों में संजोया गया है| पुस्तक का शीर्षक , उनकी प्रथम कविता है| जीवन में आए झंझावातों से थकी ज़िन्दगी को सांत्वना देकर, बहला फुसलाकर कुछ दिन और रुकने का आग्रह करती लेखिका की सकारात्मक लेखनी मन भाई| काँटो की चुभन से अधिक पुष्प का खिलना भाया|
तुम उगे तो
जग हुआ लयमान
तुम भले दिनमान
आह भरने सिसकने की
है मुझे फुरसत कहाँ
बोझ इतना बाँटने को
कौन आता है यहाँ
वोटों की भीख माँगी, कितने करार करके
भूले जो जीतकर वो, आवाम क्या करे
अब उसके अपने दिन हैं
अपनी ही राते हैं|
अपने तर्क विरोध बहस
अपनी ही बातें हैं|
माँ की उँगली छोड़
पाँव खुद खड़ा हो रहा है
बेटा बड़ा हो रहा है|
आग तेरे पास भी है
आग मेरे पास भी है
करना क्या उपयोग आग का
बात यही है खास|
गिरिजा दी, आपकी लेखनी सतत चलती रहे और साहित्य जगत समृद्ध होता रहे, इन्हीं शुभेच्छाओं के साथ पाठकों से भी विनम्र निवेदन है कि वे इस संग्रह को अवश्य पढ़ें|
रचनाकारः गिरिजा कुलश्रेष्ठ
प्रकाशकः ज्योतिपर्व प्रकाशन, ९९ ज्ञानखंड-३, इंदिरापुरम, गाजियाबाद, फोन-९८११७२११४७
प्रथम संस्करणः २०१४
मूल्यः १९९/-
समीक्षा- ऋता शेखर 'मधु'
शुक्रवार, 3 जून 2022
पाठकीय में ऋता शेखर ' मधु' की पुस्तक
पाठकः राजीव तनेजा जी
पुस्तकः धूप के गुलमोहर-लघुकथा संग्रह
लेखिकाः ऋता शेखर 'मधु'
इस संकलन की लघुकथाओं में कहीं नयी पीढ़ी, पुरानी पीढ़ी को नयी तकनीक से रूबरू कराती नज़र आती है तो कहीं भूख से तड़पता कोई बालक चोरी करता हुआ दिखाई देता है। तो कोई बाल श्रम के लिए ज़िम्मेदार ना होते हुए भी ज़िम्मेदार मान लिया जाता दिखाई देता है। इसी संकलन की किसी अन्य रचना में जहाँ एक तरफ़ किसी शहीद की नवविवाहिता विधवा सेना में शामिल होने की इच्छा जताती हुई नज़र आती है तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य लघुकथा में कोई अपने दिखाए नैतिकता के पथ पर खुद चलने के बजाय उसके ठीक उलट करता दिखाई देता हैं।
इसी संकलन की किसी रचना में जहाँ बहुत से अध्यापक काम से जी चुराते दिखाई देते हैं तो वहीं कोई बेवजह ही काम का बोझ अपने सिर ले..उसमें पिसता दिखाई देता है। कहीं किसी रचना में भूख के पलड़े पर नौकर- मालिक का भेद मिटता दिखाई देता है। तो कहीं किसी अन्य रचना में राजनीति की बिसात पर कथनी और करनी में अंतर होता साफ़ दिखाई देता है।
इसी संकलन में कहीं किसी रचना में बरसों बाद मिली सहेलियाँ आपस में एक दूसरे से सुख-दुख बाँटती दिखाई देती हैं। तो कहीं किसी रचना में किसी के किए अच्छे कर्म बाद में फलीभूत होते दिखाई देते हैं। इसी संकलन की एक अन्य रचना में आदर्श घर कहलाने वाले घर में भी कहीं ना कहीं थोड़ा बहुत भेदभाव तो होता दिखाई दे ही जाता है। इसी संकलन की किसी अन्य रचना मरण कहीं कोई नौकरी जाने के डर से काम का नाजायज़ दबाव सहता दिखाई देता है।
इसी संकलन की एक रचना जहाँ एक तरफ़ 'कुर्सी को या फिर चढ़ते सूरज को सलाम' कहावत को सार्थक करती नज़र आती है जिसमें सेवानिवृत्त होने से पहले जिस प्राचार्य का सब आदर करते नज़र आते थे..वही सब उनके रिटायर होने के बाद उनसे कन्नी काटते नज़र आते हैं। तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य रचना कोई स्वार्थी बेटा अपने पिता को बरगला उसका सब कुछ ऐंठने क़ा पर्यास करता दिखाई देता है।
इसी संकलन की एक अन्य रचना में कोई 'चित भी मेरी..पट भी मेरी' की तर्ज़ पर अपनी ही कही बात से फिरता दिखाई देता है। तो कहीं किसी रचना में महँगे अस्पताल में, मर चुके व्यक्ति का भी पैसे के लालच में डॉक्टर इलाज करते दिखाई देते है। एक अन्य रचना में रिश्वत के पैसे से ऐश करने वाले परिवार के सदस्य भी पकड़े गए व्यक्ति की बुराई करते नज़र आते हैं कि उसकी वजह से उनकी इज़्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी।
इसी संकलन की एक अन्य रचना में जहाँ हार जाने के बाद भी कोई अपनी जिजीविषा के बल पर फिर से आगे बढ़ने प्रयास करता दिखाई देता है। तो वहीं कहीं किसी अन्य रचना में ढिठाई के बल पर कोई किसी की मेहनत का श्रेय खुद लेता नज़र आता है।
इसी संकलन की एक अन्य रचना इस बात की तस्दीक करती नज़र आती है कि मतलबी लोगों की इस दुनिया में सांझी चीज़ की कोई कद्र नहीं करता।
इसी तरह के बहुत से विषयों को अपने में समेटती इस संकलन की रचनाएँ अपनी सहज..सरल भाषा की वजह से पहली नज़र में प्रभावित तो करती हैं मगर कुछ रचनाएँ मुझे अपने अंत में बेवजह खिंचती हुई सी दिखाई दीं। मेरे हिसाब से लघुकथाओं का अंत इस प्रकार होना चाहिए कि वह पाठकों को चौंकने अथवा कुछ सोचने पर मजबूर कर दे। इस कसौटी पर भी इस संकलन की रचनाएँ अभी और परिश्रम माँगती दिखाई दी।
आमतौर पर आजकल बहुत से लेखक स्त्रीलिंग एवं पुल्लिंग में तथा एक वचन और बहुवचन के भेद को सही से समझ नहीं पाते। ऐसी ही कुछ ग़लतियाँ इस किताब में भी दिखाई दीं। जिन्हें दूर किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त प्रूफरीडिंग एवं वर्तनी के स्तर पर भी कुछ त्रुटियाँ नज़र आयी। उदाहरण के तौर पर
इसी संकलन की 'दर्द' नामक लघुकथा अपनी कही हुई बात को ही काटती हुई दिखी कि इसमें पेज नंबर 22 पर एक संवाद लिखा हुआ दिखाई दिया कि..
"कल मैंने एक सिनेमा देखा 'हाउसफुल-3' जिसमें लंगड़ा, गूंगा और अँधा बन कर सभी पात्रों ने दर्शकों का खूब मनोरंजन किया।"
यहाँ यह बात ग़ौरतलब है कि 'खूब मनोरंजन किया' अर्थात खूब मज़ा आया जबकि इसी लघुकथा के अंत की तरफ़ बढ़ते हुए वह अपने मित्र से चैट के दौरान कहती है कि..
"मैंने फेसबुक पर यह तो नहीं लिखा कि यह सिनेमा देख कर मुझे मज़ा आया।"
यहाँ वह कह कर वह अपनी ही बात को विरोधाभासी ढंग से काटती नज़र आती है कि उसे मज़ा नहीं आया।
इसी तरह पेज नम्बर 27 पर लिखी कहानी 'विकल्प' बिना किसी सार्थक मकसद के लिखी हुई प्रतीत हुई। जिसमें अध्यापिका अपनी एक छात्रा के घर इसलिए जाती है कि वह उसे कम उम्र में शादी करने के बजाय पढ़ने के लिए राज़ी कर सके मगर उसके पिता की दलीलें सुन कर वह चुपचाप वापिस चली जाती है।
इसी तरह पेज नंबर 78 की एक लघुकथा 'हो जाएगा ना' में माँ की घर से हवाई अड्डे के लिए जल्दी घर से निकलने की चेतावनी और समझाइश के बावजूद भी बेटा देरी से घर से निकलता है और कई मुश्किलों से दो चार होता हुआ अंततः ट्रैफिक जाम में फँसने की वजह से काफ़ी देर से हवाई अड्डे पर पहुँचता है। जिसकी वजह से उसे फ्लाइट में चढ़ने नहीं दिया जाता।
सीख देती इस रचना की अंतिम पंक्ति में लिखा दिखाई दिया कि..
'माँ खुश थी कि उसने समय की कीमत पहचान ली थी।'
मेरे ख्याल से बेटे की फ्लाइट छूट जाने पर कोई भी माँ खुश नहीं होगी। अगर इस पंक्ति को इस तरह लिखा जाता तो मेरे ख्याल से ज़्यादा सही रहता कि..
'माँ को उसकी फ्लाइट छूट जाने का दुख तो था लेकिन साथ ही साथ वह इस वजह से खुश भी थी कि इससे उसके बेटे को समय की कीमत तो कम से कम पता चल ही जाएगी।'
इसी तरह आगे बढ़ने पर एक जगह लिखा दिखाई दिया कि..
'नाच गाना से हॉल थिरक रहा था।'
यहाँ इस वाक्य से लेखिका का तात्पर्य है कि क्रिसमस की पार्टी के दौरान हॉल में मौजूद लोग नाच..गा और थिरक रहे थे। जबकि वाक्य से अंदेशा हो रहा है कि लोगों के बजाय हॉल ही थिरक रहा था जो कि संभव नहीं है। अगर इस वाक्य को सही भी मान लिया जाए तो भी यहाँ 'नाच गाना से हॉल थिरक रहा था' की जगह 'नाच गाने से हॉल थिरक रहा था' आएगा।
यूँ तो यह लघुकथा संकलन मुझे लेखिका की तरफ़ से उपहार स्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि बढ़िया कागज़ पर छपे इस 188 पृष्ठीय लघुकथा संकलन को छापा है श् वेतांश प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है 340/- रुपए जो कि कंटैंट को देखते हुए मुझे ज़्यादा लगा। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को बहुत बहुत शुभकामनाएं।
बुधवार, 1 जून 2022
पाठकीय में ऋता शेखर 'मधु' की पुस्तक
पाठक ः नमिता सचान जी
पुस्तकः धूप के गुलमोहर- लघुकथा संग्रह
लेखिकाः ऋता शेखर 'मधु'
किताबें:समय और समाज के यथार्थ से साक्षात्कार कराती लघुकथाएं
--- नमिता सचान सुंदर
धूप के गुलमोहर
( लघुकथा- संग्रह): ऋता शेखर’मधु’
प्रकाशक: श्वेतांशु प्रकाशन- नई दिल्ली
पृष्ठ: 188, मूल्य: रू 340/-
अपने
नाम को सार्थक करता ऋता शेखर का लघुकथा संकलन, ‘धूप के गुलमोहर’ कहीं धूप में
गुलमोहर हो जाने की प्रेरणा देता है तो कहीं जेठ की आग उगलती दोपहरिया में रस-रंग
की धार सा अंतस को गहरे तक सिंचित करता है। हाँ, कुछ ऐसा ही है ऋता जी की कथाओं में विषय- वस्तु का विस्तृत आयाम।
पाँच
श्रेणियों में सलीके से वर्गीकृत की गयीं 138 लघुकथाओं से सुसज्जित यह संकलन हमें
वैचारिक एवं भावानात्मक दोनों ही स्तर पर प्रभावित करता है और समृद्ध भी।
सामाजिक
सरोकार की श्रेणी वाली कथाएं हमें मात्र मानवीय सरोकारों की ओर अंगुली पकड़ कर ही नहीं
ले चलती हैं वरन् हमारी सोच में कुछ डिग्री का फर्क लाने की भी क्षमता रखती हैं।
ऋता जी
की एक- दो कथाएं हमने किन्हीं अंतरजालीय समूहों में पहले भी पढ़ी हैं किंतु लघुकथा
के उनके रचना संसार से फुरसत से मुलाकात करने का यह मेरा पहला मौका था और उस संसार
में पहला कदम रखते ही मैं आश्वस्त हो उठी थी कि मेरी यह पाठकीय मुलाकात सुखद होने
वाली है। भला गुलमोहर के रस- रंग से भी कोई अछूता रह पाया है क्या?
‘नैतिकता’, कम शब्दों में
प्रभावशाली ढंग से बात कहने के कारण अपना असर छोड़ती है। दोहरी मानसिकता वाले आचरण
पर चोट करती कथा का कसाव उसका मुख्य आकर्षण हैं।
‘रिटायर्ड’--- नौकरी की सेवा
अवधि समाप्त होने पर व्यक्ति के भीतर उपजे खालीपन, अनुपयोगी होने के एहसास को
दर्शाती कथा है। इस कथा में लेखिका का कहन मुझे बहुत प्रभावित कर गया। न लेखिका ने
कहीं उस खालीपन का जिक्र किया, न पात्र विशेष ने व्यक्त किया, कथा के अन्य पात्रों
का व्यवहार भी पात्र विशेष के प्रति अत्यंत सौहार्द पूर्ण रहा फिर भी कथा समाप्त
कर मन भीग गया। पात्र- विशेष की मनःस्थिति हमारी संवेदनाओं तक सहजता से पहुंच गई।
अनकहे ही सब कुछ कह देने का कौशल ही इस कथा को विशेष बना जाता है।
लघुकथा—‘युग परिवर्तन’ और ‘बेतार संदेश’ हमारी युवा पीढी की
संवेदनशीलता को केंद्र में रख कर रची गई कथाएं हैं। इस संवेदनशीलता को दर्शाने के
लिए लेखिका ने जिस प्रकार नए प्रतीकों का चयन किया है, वह उनकी विस्तृत और गहन सोच
का परिचायक हैं।
इसी प्रकार सामाजिक
सरोकार की श्रेणी में कुल मिला कर 41 कथाएं हैं जो अपने-अपने ढंग से पाठक मन पर
अपनी छाप छोड़ती हैं।
‘शापित फल्गु’ कई कारणों से एक बहुत ही खास कथा है। फल्गु नदी और सीता मैया के पौराणिक संदर्भ का लेखिका ने बहुत अच्छा उपयोग किया है। यह संदर्भ बहुत प्रचलित नहीं है अतः इसका उल्लेख कर इसे सामने लाने के लिए ऋता जी बधाई की पात्र हैं। ननद-भाभी के रिश्ते को नारी की पारस्परिक समझ से जोड़ना, एक- दूसरे के अधिकारों के लिए साथ- खड़े होने की कटिबद्धता की ओर इंगित करना लेखिका की विकसित सोच के परिचायक हैं। इस कथा की सबसे बड़ी विशेषता है एक पौराणिक संदर्भ को सामाजिक विचारधारा से लघुकथा के चोले में कुछ इस तरह फिट कर देना कि कहीं भी न असहजता लगे, न ढीलापन नजर आए।
‘संक्राति की सौगात’, ‘मनमर्जी’ आदि कथाएं सास-ससुर और बहु के रिश्ते में एक नया मोड़ ले कर सामने
आती हैं और मन को कुछ ऐसी ठंडक पहुंचाती है जैसे जेठ की तपती धरती पर पहली बारिश
की फुहार।खास कर ‘मनमर्जी’ की शैली तो होंठों पर मुस्कुराहट ले ही आती है।
‘बीज का अंकुर’, ‘सागर की आत्महत्या’, ‘पिता की कोख’, ‘ठोस रिश्ता’ आदि कुछ ऐसी कथाएं हैं जो अपने- अपने विशिष्ट अंदाज में हमसे यह कहती
हैं कि हर पारिवारिक रिश्ता दूसरे रिश्तों को मजबूती देता है यदि हम समझदारी से
काम लें।
मानवेतर लघुकथाओं की
श्रेणी में पाँच कथाएं हैं। पाँचों में अलग- अलग और कुछ तो बड़े अनूठे प्रतीक चुने
हैं लेखिका ने और सब में अपना अलग संदेश हैं।‘प्यासी आत्मा’, दोधारी तलवार सी
हमारे सिर पर लटकती है तो ‘व्यवस्था का नकाब’, हमें आइना दिखाती है।
अगली श्रेणी में है
चार लघुकथाएं जिन्हें ऋता जी ने कोरोनाकाल की लघुकथाओं के अंतर्गत रखा है। इन
लघुकथाओं की पृष्ठभूमि भले ही कोरोनाकाल है किंतु उनकी कथावस्तु सर्वकालिक है, फिर
वह ‘दाग अच्छे हैं’ की सास-बहु का परस्पर सांमजस्य हो या ‘भीड़-निर्माता’ की प्रिया की
संवेदनशीलता।
कुल मिला कर ‘धूप के गुलमोहर’ से हो कर गुजरना संवेदनाओं, भावों, सरोकारों की एक ऐसी यात्रा है जिसमें एक तरफ यथार्थ हमारी बांह थामे चलता है तो दूसरी ओर हालातों को बदलने की संभावनायें भी हमारा साथ नहीं छोड़ती।और मेरे नजदीक यही सृजन का धर्म है। जो निभा पाए उसके लिए लघुकथा अभिव्यक्ति का एक अत्यंत सशक्त माध्यम है। लघुकथा विधा के प्रति ऋता जी की गंभीरता और उसके निर्वाह के प्रति उनकी सजगता का परिचय तो इस संकलन के प्रारम्भ में उनके द्वारा लिखी गई ‘मेरी बात’ से ही मिल जाता है।
पाठकीय में लता प्रासर जी की पुस्तक
पाठकः ऋता शेखर 'मधु'
पुस्तकः ये कैसा वनवास
लेखिकाः लता प्रासर
सरस् रसधार का काव्य संग्रह ' कैसा ये वनवास'
लेखिका: कुमारी लता प्रासरमन की बात में कवयित्री ने लिखा है ‘मेरे भीतर बसा है मेरा गाँव| जब हम मुक्ति के लिए छटपटाते हैं वह क्षण किसी वनवास से कम नहीं होता| नैसर्गिक और कृत्रिम कई बेड़ियों से बंधे होने के कारण हम उससे निकलना चाहते हैं| किसी एक व्यक्ति को भी लगे कि मेरा वनवास सफल रहा तो मैं मुक्ति मार्ग पर हूं|’’लता जी, मैं यह कहना चाहूँगी कि आपके अंतर्मन से कविताएं प्रस्फुटित होकर अपनी सुगंध चारों ओर फैला रही हैं। पुस्तक का कवर खूबसूरत है और सफेद पुष्प अपनी पूरी आभा के साथ शोभायमान है|
जिस दिन बच्चा-बच्चा बोलेगा
मैं मगध हूँ मैं मगध हूँ
फिर कोई घनानंद आनंद के मग में
शिक्षा और शिक्षक को
तिरस्कृत करने की हिम्मत नहीं करेगा
मगध की धरती पर प्रेम पसरा है… बहुत सुंदर बात कही लता जी ने| उन्होंने इस प्रेम के लिए कुछ बिंब लिए हैं| यह प्रेम किस तरह पसरेगा… वह सेमल, पलाश, गुलमोहर और हरसिंगार की तरह प्रेम का संचार करेगा।
जी करता है
उड़ जाऊं मैं
नील गगन में
किंतु कैसे किंतु कैसे
बड़ी बेड़ियां गांव में
हथकड़ियां हैं हाथों में
और बना है जीवन मेरा अदृश्य धागों से।
गाँव से आए काका के संवाद सुन
सूनी बगिया की फरियाद सुन
उड़ते परिंदे का नाम सुन
माँ क्यों बिसूरती है।
देख मैंने तेरे लिए मंदिर नहीं बनाए
मैंने तेरे लिए स्कूल नहीं बनाई
क्योंकि मैं कमजोर थी।
तू ने ठीक कहा लक्ष्मी
पुरुष से सम्मान नहीं चाहिए
क्योंकि पुरुष प्रधान समाज का डर
मातृत्व को भयभीत कर रखा है
मानवी मैं तुम्हारी हिम्मत की सराहना करती हूं।
जनाब समधी हो गए हैं
प्यार के नए बीज बो गए हैं
पहले देखा देखी फिर छेका छेकी
जमाना आधुनिक है इसलिए
व्हाट्सएप का नंबर दे दिया
अब तो शब्दों में प्यार बढ़ने लगा
जनाब समधी हो गए हैं
प्यार के नए बीज बो गए हैं।
बहुत खूब लता जी! यह पूरी कविता पढ़ने लायक है किंतु पाठकों को तो पुस्तक में ही पढ़ना पड़ेगा।
बिंदास है यह जिंदगी उदास है यह जिंदगी
दूर होकर भी कितने पास है यह जिंदगी
आज है जिसकी उसी से निराश है यह जिंदगी
खास है बहुत चाहतों की प्यास है यह जिंदगी।
जिन शब्दों का कर आलिंगन
जीत लिया तूने मेरा मन
ए शब्द गले लगा ले मुझको
फिर लिख भेजू पाती मैं उनको।
लता जी की लेखनी सतत चलती रहे इन्हीं शुभकामनाओं के साथ…
पुस्तक में पन्नो की क्वालिटी अच्छी है।
मुद्रक हैं: पाकीजा ऑफसेट,
शाहगंज ,पटना 8 00006
सोमवार, 30 मई 2022
पाठकीय में रमेश सोनी जी की पुस्तक
पाठकः ऋता शेखर ‘मधु'
प्रकृति के साथ स्नेहिल संबंधों को कहता हाइकु संग्रह; गुरतुर मया-
रचनाकार-रमेश कुमार सोनी
प्रकाशक - श्वेतांशु प्रकाशन, नई दिल्ली-११००१८
मूल्य- २५०/-
यह पुस्तक मुझे श्वेतांशु प्रकाशन की ओर से मेरी पुस्तकों के साथ उपहार स्वरूप भेजी गई है। इसके लिए मैं प्रकाशन का आभार प्रकट करती हूँ।
मुखपृष्ठ राज्य की लोक परम्परा के अनुसार रखी गयी। छत्तीसगढ़ी गीतों में जिन वाद्ययंत्रों का प्रयोग होता है वह पीली रंगत लिए अपनी छटा बिखेर रहा। पुस्तक पूज्य माता-पिता को समर्पित की गई है।
सर्वप्रथम पुस्तक के नाम पर आती हूँ। गुरतुर मया का अर्थ है- मीठे संबंध| मिठास भरा नामकरण पुस्तक में अपने आप ही एक मिठास पैदा कर रहा| भूमिका में एक महाविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ चंद्रशेखर सिंह जी ने कहा है कि यह संग्रह छत्तीसगढ़ी भाषा मे हाइकु की प्रथम पुस्तक है|इस पुस्तक में छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक चिन्ह-लोककला, सभ्यता संस्कृति और जनजीवन से संबंधित सुन्दर हाइकु संकलित हैं|
जुन्ना तरिया / कूद गेहे बेंगवा/ पानी छपाक |
आगे भी आपकी पुस्तकें आती रहें, अशेष शुभकामनाओं के साथ,
ऋता शेखर ‘मधु’




