शुक्रवार, 25 अक्तूबर 2013

192..कसीदाकारी












आज दर्द का इक टुकड़ा 
फ़लक में उड़ा दिया हमने
चंद ख्वाबों से हँसकर
पीछा छुड़ा हमने
चाँद से चुराकर एक किरन
जीवन की चादर पर
कसीदाकारी की है
बड़े जतन से
समेटकर शबनम
यादों की रुनझुन पायल पर
मीनाकारी की है
होठों पर सजाकर
मुसकान की कलियाँ
खुश्बुओं को ओढ़ने की
अदाकारी की है
ऐ जिन्दगी,
तुम भी तो हम इंसानों के संग
तरह तरह की बाजीगरी दिखाती हो
तुम्हारी प्रतिद्वंदि बन कर
तुमसे टक्कर लेने को
फिर क्यूँ न हम भी कारीगरी कर जाएँ|

.........................ऋता

9 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन सब 'उल्टा-पुल्टा' चल रहा है - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  2. दर्द के टुकड़े यूं ही उड़ा देने से दिल हल्का हो जाता है ...
    भावपूर्ण रचना ...

    उत्तर देंहटाएं

आपकी टिप्पणियाँ उत्साहवर्धन करती है...कृपया इससे वंचित न करें...आभार !!!