बुधवार, 9 सितंबर 2015

वो रस्मो रिवाजें निभाने की रातें

बह्र 122-122-122-122
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
काफ़िया- आने
रदीफ़- की रातें
वो रस्मो रिवाजें निभाने की रातें
है चारो तरफ मुस्कुराने की रातें
कहीं छा रही है पपीहे की सरगम
कहीं जाफ़रानी मुहब्बत की रातें
कुबूली गई है किसी की इबादत
सजी मंदिरों में दुआओं की रातें
बहुत रोक कर के रखे थे ये आँसू
सुना जब शहीदों के जाने की रातें
हमारे घरों में झरोखे सुनाते
फलक पे सितारे गिनाने की रातें
जो भरती थी दादी अँचारों से बरतन
वो चुपचाप जाकर चुराने की रातें
वो आती पिता से छुपाने की रातें
बहाने बनाकर बचाने की रातें
सदा टोकते बात बेबात में जो
सुनाने लगे बुदबुदाने की रातें
*ऋता शेखर मधु*

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बृहस्पतिवार (10-09-2015) को "हारे को हरिनाम" (चर्चा अंक-2094) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. कहीं छा रही है पपीहे की सरगम
    कहीं जाफ़रानी मुहब्बत की रातें
    कुबूली गई है किसी की इबादत
    सजी मंदिरों में दुआओं की रातें

    बहुत सुन्दर शव्दों से सजी है आपकी गजल ,उम्दा पंक्तियाँ ..

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