गुरुवार, 21 नवंबर 2013

मेरे हाइकु - 1

1.
स्वर्ग -अप्सरा
गुलमोहर चुन्नी
ओढ़ के आई ।
 2
लाल सितारे
हरी चुनरी पर
लगते प्यारे ।
 3
धरा की गोद
करते अठखेली
स्वर्ग के फूल ।
4
तपी धरती
लाल अँगार बना
गुलमोहर  ।
 5
लावण्य-भरा
अँखियों का सुकून
गुलमोहर ।
 6
सर्पीली पत्ती
नरम मुलायम
अदा दिखाए ।
7
तपिश भूला
ताज़गी से झूमता
देता सन्देश ।
 8
रब ने भेजा
स्वर्ग से गुलदस्ता
भेंटस्वरूप ।
9
गुलमोहर
सजा देता नैनों में
ख्वाब हसीन ।
10.
चुप्पी -दीवार
खड़ी हो गई ऊँची
लाँघी न जाए ।
11.
सनसनाते
बाहर के सन्नाटे
मन में शोर ।
12.
पानी की झड़ी
ताप से घबराया
पेड़ नहाया ।
13.
झूमी डालियाँ
धुल गईं पत्तियाँ
निखरी कली।
14.
मधुमालती
झूम के लहराई
सावन बनी।
15.
नन्ही गौरैया
पत्ते बने छतरी
दुबकी रही।
16.
पीत बैजंती
कन्हैया को रिझाए
रंग जमाए।
17
हरिया गईं
थकी माँदी पत्तियाँ
बजाएँ ताली।

18
दूब पे ओस
तलवों की ठंडक
नैनों की ज्योति।

19.
बिछती गई
दूब की हरियाली
बगिया हँसी।

20.
धैर्य की देवी
पाँव के नीचे दूब
दबती रही।

21.
नर्म हरित
गणपति को भाती
दूब कोमल।

22.
दूर तलक
दूब बनी चुनर
धरती सजी।
23.
जीवन -यात्रा
प्रेम, दया हैं साथी
पथ सुगम।
24.
यात्रा की धूप
जीवन को दे शान्ति
भक्ति की छाँव।
25.
जीवन यात्रा
जीवन कुरुक्षेत्र
कृष्ण, पार्थ मैं।
26.

दीये ये कच्चे

धुन के बड़े पक्के

बच्चों -से सच्चे |

27.

नेह का दीप

घृत हो विश्वास का

अखंड जला|

28.

चाक जो घूमा

सर्जक का सृजन

सुगढ़ दीप |

29.

मिलके रहे

दीप तेल वर्तिका

तभी लौ बने |

30.

चंदा को ढूँढ़े

दीपक की बारात

अमा की रात |

31.

गौरवशाली

दीवाली में भारत

सौरभशाली |


32.


कान्हा से प्रीत

जीवन में संगीत

जीने की राह।

33.

तप- साधना

तप ही आराधना

तप ही प्रेम।

34.

जीवन माया

भक्ति बनती छाया

क्यो भरमाया ?

35.

अधीर मन

प्रभु के चरणों में

पाता है धीर।

36.

फूलों को चुना

काँटे खुद ही मिले

भरा आँचल।

37.

व्यथा के पीछे

तैयार हो रही है

जीवन कथा।

38.

प्रेम की झोली

तपस्या फल भरे

जीवन पूर्ण

39.

विरासत में
शुद्ध पर्यावरण
हमने पाया ।
40.
कारखानों ने
आधुनिक युग में
जाल फैलाया।
41.
सघन धुआँ
लुप्त वन्य-जीवन
रास न आया।
42.
कुछ न सोचा
पॉलिथिन जलाया
विष फैलाया।
43.
किरणें आईं
अल्ट्रावायलेट-सी
बूढ़ी है काया।
44.
हवा का धुआँ
फेफड़ों पर बड़ा
ज़ुल्म है ढाया।
45.
थका पथिक
पाए विश्राम कहाँ?
मिली न छाया।
46.
खाद ने छीना
फल-सब्जी का स्वाद
कोई क्या खाए।
47.
कटी है डाल
पपीहा या कोयल
कोई न गाए।
48.
जल अगाध
पीने योग्य है थोड़ा
करो न जाया।
49.
बाग उदास
जहरीली हवाएँ
उन्हें डराएँ।
50.
आई बहार
कोमल -सी कलियाँ
खिल न पाईं।
51.
कोमल दूब
जमीं है पथरीली
कैसे वो झाँके?
52.
मिट्टी की खुश्बू
जमे सिमेंट तले
सिसक रही।
53.


सदा दमके
सिन्दूर सुहाग का
चन्द्र-दीप सा 
54.
रहे सदा ही
जीवन सुवासित
पारिजात-सा ।
55.
सिन्दूरी आभा
सोहे मुख-मण्डल
नव- दुल्हन 
56.
घर-आँगन
स्नेह-प्यार के दीप
जगमगाएँ 
57.
शुभ्र धवल
शरद्- पूर्णिमा का ये
निकला चाँद ।
58.
दूध-चाँदनी
श्वेत कमल पर
थिरक उठी ।
59.
चन्दा को देखे
निर्निमेष चकोर
हो गई भोर। ३।
60.
शरद-पूनो
रुपहली किरणें
झिलमिलाईं ।
61.
पूनो की रात
मधुरिम सी आस
बनी है खास ।
62.
चाँद ने छेड़ी
मधुमय रागिनी
हँसी चाँदनी ।
63.
चाँद को देख
सागर भी मचला
मिलने चला।
64.
चाँदनी फैली
लहरों की वीणा से
संगीत फूटा  ।
65.
चाँदनी रात
ले के हाथों में हाथ
करें क्या बात ।
66.
शरद पूर्णिमा
सोलह कला-युक्त
खिला है चन्द्र ।
67.
अमृत -वर्षा
चाँदनी की किरणें
धरा पर करें।
68.
मनभावन
शरद की पूनम
कृष्ण का रास ।
69.
नभ से बही
सागर में समाई
शुभ्र चाँदनी ।
70.
निकला चाँद
उजला उत्तरीय
नभ में फैला ।
.....ऋता


शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

सूक्ष्म से साकार तक


सूक्ष्म से साकार तक
आत्मा से परमात्मा तक
मुर्छा से चेतना तक
नई अनुभूतियाँ
कई विसंगतियाँ
सहेजता अंत:करण
कहीं पुष्प की रंगिनियाँ
या कंटकों की है चुभन
कहीं अट्टहास उल्लास है
या अंतस में भरा रुदन
अंतहीन सी राह पर
मंजिल की कोई थाह नहीं
अनवरत चलते रहो
अनवरत जीवन सफ़र
उभर रही संवेदना
लिए हृदय में वेदना
अपेक्षाओं के सिलसिले
शिकवों से भरे दिल मिले
यही काल का चक्र है
कहीं सीधा कहीं वक्र है
प्रेम सीख कर जो चलें
हो जाएँ रस्ते सरल
जीव जन्म का सत्व यही
जीवन का अमरत्व यही|
..........ऋता

सोमवार, 11 नवंबर 2013

कहीं कुछ शाश्वत नहीं


कहीं कुछ शाश्वत नहीं 
कुछ भी तो नहीं 
न अँधेरा न उजाला 
न गीष्म न शरद 
न अमृत न विष का प्याला

शाश्वत हैं सूरज और चंदा
मगर गति शाश्वत नहीं 
दिन होते हर रोज़ 
मगर उजियार शाश्वत नहीं
कभी मेघ घिरे 
कभी धुंध उगे 
कभी ग्रहण की छाया 
हर दिवस सुखद न होता 
यही है प्रभु की माया

निशा आती सांध्य सीढ़ी से 
मगर अंधकार शाश्वत नहीं 
कभी बरसती चांदनी 
कभी अमा का है कहर
कभी तम नैराश्य का 
कभी ग़ज़ल की है बहर

पाप और पुण्य भी 
होते शाश्वत नहीं 
एक के लिए जो शुभ है 
दूसरे के लिए है अशुभ 
बारिश की झमझम बूँदें
कृषक की खुशी बनती
वहीं सावन को देख
रजक को होती कसक

जीवन का आना एक प्रक्रिया है
यह मन में भरता है उजास
जीवन जीना बाध्यता है
उतार चढ़ाव
जीवन सफ़र का सच है
पल में बदल जाते हैं रास्ते
पल में बदल जाते हैं रिश्ते
कई किश्तों में जीते हुए
कहीं सुख पनपते
कहीं दर्द रिसते
पर कुछ भी शाश्वत नहीं

मौत भी शाश्वत नहीं
कहीं बिन बुलाए आती है
कहीं बुलाने पर मुँह छुपाती है
जवानी में मरने की इच्छा
बुढ़ापे में जीने की इच्छा जगाती है
श्मशान ही मंजिल है सबकी
मगर सबको वह नसीब नहीं
सुनामियों में बहने वाले
कब घाट पर जलते हैं ?
कहीं शव पर होती 
अश्रुओं की बारिश
कहीं वह पड़ा है लावारिस
कुछ भी तो शाश्वत नहीं

स्वर्ग से लौट कोई आया नहीं
नरक भी किसी ने बताया नहीं
जैसे होते हैं करम
हम वैसा ही फल पाते हैं
स्वर्ग नरक है इसी जहाँ में
कल्पना में क्यूँ भरमाते हैं
भूत को जी लिया
वर्तमान में डरे हुए
भविष्य को संजो लिया
जितना  जी लिया
वे पल शाश्वत हैं

आज क्या होगा
कोई नहीं जानता
भविष्य तो अनिश्चित है ही
बड़े बड़े भक्तों को हमने
तड़प तड़प कर मरते देखा
जिसने कभी न धूप दिखाया
बिना कष्ट के उठते देखा
जीना है तो जीना है
बाकी विधि के हाथ में है
कभी किसी का ना हो बुरा
सोच की यह निधि साथ में है
पर सोच भी तो शाश्वत नहीं

सरल से विरल में जाती
उम्र के पड़ाव के साथ
कभी प्रेम कभी वेदना गाती
नम्रता के चोले में
कठोरता भी अपनाती
कभी सिद्धांत बनाती
कभी तोड़ आगे बढ़ जाती
कहीं कुछ शाश्वत नहीं 
कुछ भी तो नहीं !!!!!!
.................ऋता

शनिवार, 9 नवंबर 2013

कटीली बेड़ियाँ


कई कटीली बेड़ियाँ हैं धर्म की और जात की
जीवन के शतरंज पर शह की और मात की
खिलखिलाते बहार पर निर्दयी तुषारपात की
भोले भाले मेमनों पर शेर के आघात की
इर्ष्या के भाव से जुटे हुए प्रतिघात की
सिसकियों में डूबी बेबस से हालात की
कोख में दम तोड़ती निरीह कन्या जात की
धन और मेधा में हो रहे पक्षपात की
कुर्सियों की होड़ में हो रही मुलाकात की
तेरी मेरी, मेरी तेरी के झगड़ों जैसी बात की

तोड़ना है बेड़ियों को सुकर्मों की तलवार से
खेना है देश की नइया सुविचारों की पतवार से
परवाह कभी करें नहीं पग लहुलुहान जो हो जाएँ
अविचल अडिग चाल से पुष्प राहों पे बो जाएँ |
....................ऋता

बुधवार, 6 नवंबर 2013

प्रतिक्रियाएँ....

http://thalebaithe.blogspot.in/2013/07/sp229.html#comment-form

ठाले बैठे ब्लाग पर मेरे कुछ दोहे प्रकाशित हुए थे जिन्हें ऊपर ले लिंक पर देखा जा सकता है...
वहा़ पर आदरणीय अरुण निगम सर ने मेरे प्रत्एक दोहे के लिए प्रतिक्रियास्वरूप एक दोहा लिखा...उन्हे इस ब्लौग पर साभार सहेज रही हूँ...साथ में सौरभ पाण्डेय सर की प्रतिक्रिया भी प्राप्त हुई थी ...उसे भी साभार दे रही हूँ...




ऋता- सद्गुणियों के संग से, मनुआ बने मयंक
ज्यों नीरज का संग पा, शोभित होते पंक

@कमल मलिन कब है सुना, निर्मल बसता ताल
पंक स्वयम् ही बोलता, यह गुदड़ी का लाल




ऋता- चंदा चंचल चाँदनी, तारे गाएँ गीत
पावस की हर बूँद पर, नर्तन करती प्रीत

@बूँद समुच्चय जब झरे,झर-झर झरता प्यार
बूँद समुच्चय जो फटे, मचता हाहाकार




ऋता- शुभ्र नील आकाश में, नीरद के दो रंग
श्वेत करें अठखेलियाँ, श्याम भिगावे अंग

@श्वेत साँवरे घन घिरे,लेकिन अपना कौन
गरजे वह बरसे नहीं, जो बरसे वह मौन




ऋता- हिल जाना भू-खंड का, नहीं महज संजोग
पर्वत भी कितना सहे, कटन-छँटन का रोग

@पकड़-जकड़ रखते मृदा,जड़ से सारे झाड़
ज्यों-ज्यों वन कटते गये, निर्बलहुये पहाड़




ऋता- महँगाई के राज में, बढ़े इस तरह दाम
लँगड़ा हो या मालदा, रहे नहीं अब आम

@आम खड़ा मन मार कर, दूर पहुँच से दाम
लँगड़ा खीसा हो गया,दौड़े लँगड़ा आम



नवीन भाईजी के सौजन्य से ही ऋता शेखर मधु के बारे में सुना-जाना.
आभार नवीन भाईजी.

मन का आकाश सुभावनाओं के घने मेघों से अच्छादित हुआ संतृप्त हो जाय तो सरस अनुभूतियों की झींसियाँ अनवरत झहरती रहतीं हैं ! रस-विभोर हृदय मनसायन हुआ मद्धिम तरंगों से झंकृत होता रहता है.. अनवरत !
ऐसे में सहजता विस्फारित आँखों मनोरम रंगों को अनायास आकार लेता देखती है. उन्हें छूती है और बूझने का निर्दोष प्रयास करती है. इसी सहजता को वर्तमान ने ऋतु शेखर मधु का नाम दिया है.

आज के दिन इस प्रकृतिप्रिया को अग्रज की ओर से जन्मदिन की अनेकानेक शुभकामनाएँ--

शब्द-भाव कोमल मृदुल मधुरस ऋतुपग छंद
विह्वलता अन्वेषमय, आवेशित मकरंद

छंद-रचना पर ढेर सारी बधाइयाँ.
शुभ-शुभ

  1. ठेस-टीस
    धिया, जँवाई ले गये, वह, उन की सौगात
    बेटे, बहुओं के हुये, चुप देखें पित-मात-ऋता
    *********************************
    सास यही कल थी बहू,यही पिता था पूत
    बोये पेड़ बबूल के , चाह रहे शहतूत |
    Reply
  2. उम्मीद
    बूढ़ी आँखें है विकल, कब आएगा लाल
    रात कटे उम्मीद में, अब पूछेगा हाल - ऋता
    *****************************
    मरने भी देती नहीं ,उम्मीदों की डोर
    रातें ढाढस बाँधती , धीर बँधाते भोर |

    सौन्दर्य 
    "गर्भवती मुख-रूप" का, कैसे करूँ बखान
    रविकर जैसा तेज, पर, शीतल चंद्र समान- ऋता
    *******************************
    "गर्भवती मुख-रूप" की, सुंदरतम तस्वीर
    संग-संग खिलते दिखें,मुखपर अरुण सुमीर|
  3. आश्चर्य
    अजब अजूबों से भरा, ब्रह्मा का संसार
    कोमल जिह्वा क्रोध में, उगल पड़े अंगार - ऋता
    ****************************
    लपट नहीं दिखती कभी,और न उठता धूम्र
    सुनने वाला आग में , जलता सारी उम्र |

मंगलवार, 5 नवंबर 2013

दीये ये कच्चे

1

दीये ये कच्चे

धुन के बड़े पक्के

बच्चों -से सच्चे |

2

नेह का दीप

घृत हो विश्वास का

अखंड जला|

3

चाक जो घूमा

सर्जक का सृजन

सुगढ़ दीप |

4

मिलके रहे

दीप तेल वर्तिका

तभी लौ बने |

5

चंदा को ढूँढ़े

दीपक की बारात

अमा की रात |

6

गौरवशाली

दीवाली में भारत

सौरभशाली |