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रविवार, 1 मार्च 2020

देसी आम - लघुकथा

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देसी आम

"आज मन बहुत उदास है प्रिया| अपना देश छोड़ तो आए, पर लग रहा कि कितना कुछ पीछे छूट गया, " प्रियम ने कोरों पर छलक आए आँसुओं को छुपाने का असफल प्रयास करते हुए कहा|


"देखो भाई, इतने दुखी मत हो| जीवन हमें गति का पाठ पढ़ाती है| गतिशिलता में कुछ पाते हैं और कुछ खोते भी हैं| जब तुम अपने पूरे परिवार के साथ आए हो, पापा मम्मी भी साथ हैं तो फिर क्या छूट गया,"प्रिया ने भाई को सहज करने का प्रयास करते हुए कहा|

"सिर्फ अपना परिवार ही सब कुछ नहीं होता प्रिया| हम अपनी उस मिट्टी को छोड़ कर आए है जिसने हमारा पालन पोषण किया| उन साथियों को छोड़ आए हैं जो हमारी खुशी में खुश होते थे और जरूरत पड़ने पर हमारे आसपास होते थे| हम उस देश को छोड़ आए हैं जिसने हमें बेहतर जीवनयापन की डिग्रियाँ दीं|"

"भाई, हम अब भी जुड़े हैं|"

"वह कैसे|"

"बस देखते जाओ हमारा कमाल", कहती हुई प्रिया चली गई|

थोडी देर बाद फेसबुक पर एक नया समूह अवतरित हुआ|

" 'धरती विदेश की- भाषा स्वदेश की', मित्रों , यह एक साहित्यिक समूह है| यहाँ आप हिन्दी में अपने विचार प्रकट कर सकते हैं| विधा आपके पसंद की, जुड़ाव हमारे दिलों का|' "

देखते ही देखते सैकड़ों लोग जुड़ गये|

"कैसा लग रहा भाई"

"प्रिया! मेरी साहित्यकार बहन, ऐसा लग रहा जैसे हम हिन्दी की कश्ती पर सवार वापस अपनी माटी का तिलक लगा रहे|"

उस दिना डाइनिंग टेबल पर बैठा प्रियम देसी अंदाज में आम खा रहा था...अँगुलियों और होंठों के किनारों पर आम का रस लपेटे हुए|


ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

तुस्सी ग्रेट हो

तुस्सी ग्रेट हो

सिख सम्प्रदाय की वह लड़की दीपा अब हिन्दु धर्म के घर की प्यारी बहु थी| उसे जब पता चला था कि नानी सास के पुण्यतिथि में जाना है तो अपने हिसाब से उसने हल्के रंग के कपड़े रख लिए थे| नानी सास का स्वर्गवास पहले ही हो चुका था और उसने उन्हें देखा नहीं था|
तरह तरह के पकवान बन रहे थे| वह सब कुछ समझने की कोशिश कर रही थी|
उसने हवन के लिए सासू माँ को तैयार देखकर पूछा,''मम्मी जी, पुणयतिथि में तो सफेद या हल्के कपड़े पहनने चाहिए न| आपने तो रंगीन सजीली साड़ी पहनी है|''
''बेटा, नानी को हल्के रंग पसंद नहीं थे| इसलिए उनकी पसंद का पहना|''
दूसरे कमरे में मासी ने भी रंगीन कपड़े पहने थे| दीपा ने वही बात मासी से भी कही|
''बेटा, आज नानी की पसंद के हिसाब से खाना बनेगा और हम उनकी पसंद के अनुसार कपड़े भी पहनेंगे| वे हमेशा से चाहती थीं कि उनकी बेटी-बहु सजधज कर रहे|''
तभी मामी जी भी वहाँ पर आ गईं| उनकी तो सजधज ही निराली थी|
जब मामी अकेली पड़ी तो दीपा ने फिर से अपनी बाद दोहरा दी|
''दीपा, नानी ने हमेशा हमलोगों को सजाकर रखा| आज हम उदास कपडों में उनके लिए हवन करेंगे तो शायद वे स्वीकार न करें|''
अब दीपा के मस्तिष्क में घूमने लगा,''सासू माँ और मासी तो नानी की बेटियाँ हैं इसलिए एक सी बात दोनों ने कही| जब मामी ने भी वही कहा तो इसका अर्थ है कि नानी ने कभी बेटी-बहु में अन्तर नहीं समझा|''
अब वह भी रंगीन कपड़े पहन हवन के लिए बैठी|
प्रथम स्वाहा में उसने मन ही मन नानी सास से संवाद करते हुए कहा,''नानी, तुस्सी ग्रेट हो|''
उसे लगा, हवन कुंड से होकर गुजरती हवा ने उसके बाल हौले से सहला दिए हों|
-ऋता शेखर 'मधु'