मंगलवार, 25 नवंबर 2014

परिवर्तन


अपनी ही तपन
वह झेल न पाता
साँझ ढले 
सागर की गोद में 
धीरे से समाता
नहा धो कर 
नई ताजगी के साथ 
वह चाँद बन निकल आता
चाँदनी का दामन थाम
शुभ्र उज्जवल प्रभास से
जग को 
शीतल मुस्कान दे जाता
हाँ, साँझ ढलते ही 
वह प्रेमी  
प्रेमिका का 
उपमान बन
बच्चों का मामा बन जाता
तब वह रौद्र सूरज 
अपने दिल की मासूमियत 
माँ की लोरी में डाल
कितना भोला कितना प्यारा
कितना निश्छल कितना न्यारा
चन्द्रकिरन बन जाता|
हाँ, हमेशा कोई जल नहीं सकता
प्रचंड रूप में पल नहीं सकता
सूरज को चाँद बनना ही है
यही परिवर्तन है
यही सत्य है
यही शाश्वत है

...ऋता शेखर ‘मधु’

शनिवार, 22 नवंबर 2014

क़ातिल हूँ मैं


क़ातिल हूँ मैं
हाँ, क़त्ल करती हूँ
हर दिन क़त्ल करती हूँ
कुछ मासूम नन्हें ख्वाब का
कभी रुई के फाहे जैसे
सफ़ेद निश्छल स्वप्न का
मिटा देती हूँ
अनुभव के कठोर धरातल
पर उपज आए
आशाओ के इन्द्रधनुष को
हाँ दे देती हूँ विष
छोटी छोटी चाहतो को
चला देती हूँ खंजर
बड़े अरमानों पर
क़ि वजह क्या बताऊँ
कैसे बताऊँ
कि जन्मदाता के हाथों में
पंख कतरने वाली कैँची थी
कि हमकदम ने
हर कदम पर निगाह रखी
कि जिसे जनम दिया
अशक्त अरमानों की दवा
उसके हाथोँ में है
किसे कठघड़े में खड़ा करूँ
या कहाँ आत्मसमर्पण करूँ
ओ वामाओं', तुम भी सोचना
कहीँ तुम भी क़ातिल तो नहीं
सपनों की मज़ारों पर खिलती बहारेँ
हम भी ख़ुशी से उनको निहारें
एक दीप हर रोज़ रखते है जलाकर
घृत न सही डाल देते हैं अश्क
और जलता है दीप अनवरत...
रौशनी की खातिर मिसाल बनकर
*ऋता शेखर 'मधु'*

सोमवार, 10 नवंबर 2014

गुनगुनी सी धूप आई


गुनगुनी सी धूप आई
शरद बैठा खाट लेकर
मूँगफलियों को चटकता
मिर्च नींबू चाट लेकर

फुनगियों से हैं उतरती
हौले झूमती रश्मियाँ
फुदक रहीं डाल डाल पर
चपल चंचला गिलहरियाँ

चौपालों पर सजी बजीं
तरकारियाँ, हाट लेकर
गुनगुनाती हैं गोरियाँ
गेहुँएँ औ' पाट लेकर

छिल गईं फलियाँ मटर की
चढ़ी चुल्हे पर घुघनियाँ
क्यूँ होरियों से चल रहीं
ये पूस की बलजोरियाँ

बंधने लगीं लटाइयाँ
मँझे धागे काट लेकर
समेट रहीं परछाइयाँ
आगमन की बाट लेकर

गुनगुनी सी धूप आई
शरद बैठा खाट लेकर
*ऋता शेखर 'मधु'*
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रविवार, 26 अक्टूबर 2014

सुनो पथिक अनजाने तुम



 


कविताओं में "तुम " शब्द का प्रयोग कविता को व्यापक विस्तार देता है...उसी विषय पर आधारित रचना...

सुनो पथिक अनजाने तुम
लगते बड़े सुहाने तुम

कविताओं में आते हो
अपनी बात सुनाने तुम

जब भी आँखें नम होतीं
आ जाते थपकाने तुम

कभी ममता या ईश हो
दुआओं के बहाने तुम

शामिल होते मेघों में 
शीतलता बरसाने तुम

मन एकाकी जब होता
आते हो मुसकाने तुम

तुम ही तो सबल स्वप्न हो
होते नहीं पुराने तुम

*ऋता शेखर 'मधु'*

रविवार, 14 सितंबर 2014

काव्य का है प्यार हिन्दी


हिन्द का श्रृंगार हिन्दी
भाव का है सार हिन्दी

देव की नगरी से आई
ज्ञान का भंडार हिन्दी

लोकगीतों में बसी यह
है मधुर संसार हिन्दी

डाल पातें झूमती सी
गा रहीं मल्हार हिन्दी

छंद गजलों में महकती
काव्य का है प्यार हिन्दी

भाषणों संभाषणों में
मंच का आभार हिन्दी

बोलने की चाहते हैं
क्यों लगे फिर भार हिन्दी

बाँध देती एक सुर में
प्रांत को हर बार हिन्दी

गा रही सरगम बनी यह
है सफल उद्गार हिन्दी

शिल्प को जब गढ़ रही हो
तब लगे कुम्हार हिन्दी

साथ में उर्दू मिले तो
नज़्म का है हार हिन्दी

यह विदेशों में रमी है
सच बड़ी फ़नकार हिन्दी

मान्यता प्रतियोगिता में
कर रही उपकार हिन्दी

जा बसी हर गंध में यह
राज्य का उपहार हिन्दी
मूल संस्कृत में जमा के
है विटप विस्तार हिन्दी

विष्णु ऊँ ब्रम्हा विराजें
ईश का दरबार हिन्दी

लेखनी में जा बसी है
बन रही रसधार हिन्दी

भर रही है बाजुओं में
वीर का हुंकार हिन्दी

राह, माना है कँटीली
चल पड़ी साभार हिन्दी

शादियाँ त्योहार में भी
गूँजती सौ बार हिन्दी

अंग्रेजी जब से घुसी है
कर रही तकरार हिन्दी

जीत हासिल हम करेंगे
है विजय आसार हिन्दी

प्रेमियों की पात है ये
है मधुर इज़हार हिन्दी

शान से बोलें इसे तो
देश का उपहार हिन्दी

पीर इसकी भी सुनो तुम
माँगती अधिकार हिन्दी

अब विमानों में सजी है 
वक्त की रफ़्तार हिन्दी
*ऋता शेखर ‘मधु’*

गुरुवार, 4 सितंबर 2014

स्त्री एक-विशेषण अनेक

स्त्री एक-विशेषण अनेक

स्त्रियों का जावन हमेशा से दूसरों का मोहताज रहा है| स्त्री सबसे सहज और सरल विवाह के पहले बेटी और बहन के रूप में रह पाती है| किन्तु बचपन से ही यहाँ भी उसे मानसिक रूप से तैयार किया जाता है कि पिता का घर उसका घर नहीं| लड़की फिर भी विवाह के पहले घर पर अधिकार जताती रहती है| उसकी बातों को मान्यता दी जाती है| कमोबेश यह स्थिति सुखद ही होती है|
सबको एक जैसा जीवन या एक जैसी परिस्थिति नहीं मिलती| सब कुछ अनुकूल रहा तो विवाह योग्य होने पर लड़की विवाहबंधन में बँध जाती है| वह एक पल जिस वक्त वह सुहागप्रतीक सिन्दूर या मंगलसूत्र धारण करती है, उसके जीवन में बहुत सारे विशेषण जुटने की पृष्ठभूमि तैयार कर देता है| हमने हर परिस्थिति की महिलाओं के लिए समाज में विभिन्न विचार देखे| सारे विवाहप्रतीक धारण की हुई ‘सुहागन’ स्त्री के लिए सम्मानपूर्ण सम्बोधन और विचार होते हैं| किन्तु इस सम्मानपूर्ण स्थिति के लिए जिम्मेदार लड़की के पति या सास ससुर ही होते हैं| एक अच्छा घर हर स्वभाव की लड़की को अच्छे से रखकर समाज में  सम्मान दिलाता है| यदि थोड़े भी टेढ़े मेढ़े विचार वाले लोग मिल गए तो एक से एक सुशील लड़की भी समाज की नजरों में बुरी साबित कर दी जाती है| तो लड़की का अच्छा या बुरा कहा जाना उसके ससुरालवालों पर निर्भर करता है , न कि उसके अपने व्यक्तित्व पर| लड़किया ज्यादातर सुशील और मिलजुल कर रहने वाली ही होती हैं|
एक बदचलन और आवारा पति,या किसी अन्य कारण से पति- पत्नी अलग हो गए हों तो ‘परित्यक्ता’ की उपाधि से विभूषित लड़की कितनी भी काबिल क्यों न हो,अवहेलना- सहानुभूति का पात्र बन जाती है| वह कितना भी अच्छा व्यवहार करे, समाज में वह सम्मान नहीं पा पाती जिसकी वह हकदार है| जमाना बदल चुका है पर घर के अन्दर की तथाकथित सुहागन रिश्ते उसे यह एहसास दिलाते रहते हैं कि वह एक छोड़ी गई स्त्री है|
स्त्री के लिए एक विशेषण ‘तलाकशुदा’ है| इन स्त्रियों के लिए समाज की नजर बदल जाती है| हर पग पर उन्हें शक की दृष्टि से देखा जाता है| घर की पति के साथ रहने वाली महिलाए अन्य पुरुषों के साथ कितने भी हँसी मजाक कर लें , उन्हें कोई कुछ नहीं कहता, तलाकशुदा ने दो बातें कर लीं तो समाज की भवें तन जाती हैं| तलाकशुदा महिलाओं को लोग तेजतर्रार की श्रेणी में रखते हैं| मैंने एक लेखिका के विचार पढ़े थे-'मैं विधवा कहलाना पसन्द करूँगी मगर तलाकशुदा नहीं|'
तलाकशुदा या परित्यक्ता वाली स्थिति मनुष्यजन्य परिस्थितियाँ हैं | एक परिस्थिति ईश्वरजनित होते है और वह है ‘विधवा’ हो जाना| विधवाओं को किसी भी मंगलकार्य से दूर रखा जाना सर्वविदित है| इस तरह की महिलाएँ परिवार में किसी शुभ कार्य में जाने से कतराने लगती हैं|
यही सारी परिस्थितियाँ पुरुषों के सामने भी होती हैं मगर उन्हें कोई कुछ नहीं कहता| तन से नाजुक, मन से सरल स्त्रियों के लिए इतने भारी भारी विशेषणों के बोझ उनके जीवन को दुरूह बना दते है| अब पहले जैसी बात नहीं लगती ,मगर पूरी तरह से जमाना बदल गया है यह कहना भी मुश्किल है|

एक विशेषण है ‘बाँझ’, मगर बाँझपन का मूल कारण क्या है यह कोई नहीं जानना चाहता| इन स्त्रियों को भी परिवार में जन्मोत्सव या बच्चे से सम्बन्धित शुभ कार्यों से दूर रखा जाता है| 
इस प्रकार बेकसूर होते हुए भी सामाजिक अवहेलना की शिकार इन स्त्रियों के प्रति रवैया बदलना आवश्यक है ताकि वे हीन भाव से बाहर आ सकें| पल भर में कौन किस श्रेणी में आ जाएगा यह कोई नहीं जानता ...फिर अनावश्यक टीकाटिप्पणी क्यों ? स्त्री तो बस स्त्री है, ममता है, दुआ है, शुभकामना है, और कुछ भी नहीं|