सोमवार, 3 दिसंबर 2012

हम कहाँ जा रहे रहे हैं


गूगल से साभार

हम कहाँ जा रहे हैं...इस विषय पर सोचा जाए तो कई क्षेत्र हमारी आँखों के सामने झिलमिलाने लगते हैं जहाँ पर यह विचारणीय हो जाता है कि आखिर हम कहाँ जा रहे हैं|यह बात सही है कि पिछले तीस वर्षों में समाज की सोच में जो बदलाव आया है उसे फ़िफ्टी प्लस और माइनस के लोगों ने बहुत गहराई से महसूस किया है| बात यदि परम्परा और संस्कारों की ली जाए तो हमारी कई परम्पराओं को आज की पीढ़ी अँगूठा दिखाती हुई अपनी दुनिया में मस्त हैं| इसमें मैं युवा पीढ़ी को दोष नहीं देती क्योंकि इस तरह से रहने पर शायद हमारी सामाजिक व्यवस्था ने ही उन्हें मजबूर किया है| घर से बाहर रहकर नौकरी करना उनकी मजबूरी बन चुकी है| घर से दूर अकेले पड़ चुके बच्चे बहुत ज्यादा ही आत्मनिर्भर बन चुके हैं| हमारे समय में इस उम्र में हमें अपनी जिम्मादारियों का एहसास तक नहीं था क्योंकि संयुक्त परिवार में रहते हुए कभी आवश्यकता ही महसूस नहीं हुई| आजकल के बच्चों पर दबाव ज्यादा है...बाहर रहते हुए कभी भूखे रहने की भी नौबत आती है तो वे बताते नहीं क्योंकि घरवाले दुखी हो जाएँगे|
दूसरों पर निर्भर होना उन्हें पसन्द नहीं| कोई उनको टोके यह भी पसन्द नहीं|
आजकल की लड़कियाँ भी आत्मनिर्भर हैं...यह बात समाज के विकास में सहायक है साथ ही साथ घातक भी है| वे किसी की बातों को बरदाश्त करने के लिए तैयार नहीं इसलिए अहं के टकराव की स्थिति बन रही है और पारिवारिक बिखराव ज्यादा दिख रहे हैं|
सबसे उहापोह की स्थिति हमारी उम्र(पचास के लगभग) के लोग झेल रहे हैं| एक तरफ हमारे पैरेन्ट्स हैं जो हमारी सोच के साथ समझौता करने के लिए तैयार नहीं| समाज बहुत आगे बढ़ चुका है और उनके अनुभव हर फ़ील्ड में काम नहीं आते| एक तरफ़ हमारे बच्चे हैं जो हमसे समझौता करने के लिए तैयार नहीं| हमारी सोच की धज्जियाँ उड़ा देते हैं वे| आमने सामने बैठकर एक दूसरे के मनोभावों को चेहरे पर पढ़ते हुए हमारी गप्पबाजियों का आनन्द ही कुछ और था| आजकल फ़ेसबुक या किसी भी सोशल नेवर्किंग साइट पर चौबीसों घंटे रहना ही  दिनचर्या बन चुकी है|
ऐसे में हम भी नेट पर न रहें तो कितने पिछड़े नजर आएँगेः) एक ओर हम पिट्टो और गिल्ली डंडा जैसे खेल नहीं भूले हैं और आज विडियो गेम खेलकर बच्चों को टक्कर भी दे रहे हैं| हमने कोयलों पर भी हाथ काले किए हैं और आज माइक्रोवेव भी इस्तेमाल कर रहे हैं| बचपन में रिक्शे की सवारी करने वाले भली-भाँति गाड़ियाँ भी ड्राइव कर रहे हैं| हाट-बाजार से झोलों में सब्जी लाने वाले हम मॉल से बिना मोल-भाव किए और बिना चुने भिंडी भी खरीद रहे हैं|
अब बात कर लेते हैं ब्लॉगिंग की...बहुत सारी बातें जो हम घरों में नहीं कह पाते वह ब्लॉग पर लिख देते हैं| रेगुलर ब्लॉगिंग होती रहे इसके लिए हमारी बेचैनी बनी रहती है...कुल मिलाकर ब्लॉग पर ही जान अटकी रहती है| मैं तो स्कूल से आते ही नेट खोलती हूँ और इसके लिए सबकी नाराजगी भी झेल लेती हूँJ| कुल मिला कर हम कम्प्यूटर की दुनिया में प्रवेश करते जा रहे हैं| किसी तरह की जानकारी के लिए नानी-दादी की जरुरत नहीं...गूगल महाराज हैं नः)

ऋता शेखर मधु

9 टिप्‍पणियां:

  1. दल दल में नित धँस रहे, किन्तु नहीं एहसास |
    अगल बगल बदलाव हो, हों सुविधा के दास |
    हों सुविधा के दास, रास आता कंप्यूटर |
    घर में लगती क्लास, लगे घर घर में ट्यूटर |
    ऊँगली आँखे तेज, किन्तु हो काया से छल |
    मैदानों में भेज, कुर्सियां तो है दलदल ||

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  2. सच है.....बस ये गूगल प्यार नहीं करता न हमसे ..नानी दादी की तरह.
    :-)

    सस्नेह
    अनु

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  3. शुक्रिया कि आपने हमारे दर्द को समझा। सच में आज 50 प्लस के लोग ज्यादे ही परेशान हैं। जब तक बच्चे थे पिताजी पढ़ाते थे अब पिताजी हुए तो बच्चे पढ़ाते हैं!:)

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  4. हम कम्प्यूटर की नई दुनिया में प्रवेश करते जा रहे हैं|

    recent post: बात न करो,

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  5. इसे वक्त की साजिश कह लीजिए या फिर इंसानी फ़ितरत...

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  6. सबसे उहापोह की स्थिति हमारी उम्र(पचास के लगभग) के लोग झेल रहे हैं| एक तरफ हमारे पैरेन्ट्स हैं जो हमारी सोच के साथ समझौता करने के लिए तैयार नहीं| समाज बहुत आगे बढ़ चुका है और उनके अनुभव हर फ़ील्ड में काम नहीं आते| एक तरफ़ हमारे बच्चे हैं जो हमसे समझौता करने के लिए तैयार नहीं| हमारी सोच की धज्जियाँ उड़ा देते हैं वे|

    बिलकुल सही बात .... इस उम्र वालों को ही अपने में बदलाव लाना पड़ रहा है ... नेट न होता तो वक़्त कैसे कटता ? :)

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  7. बात तो आपने सही कही है मगर सामन्जस्य भी हमे ही बिठाना पडेगा क्योंकिबच्चों की उम्र ऐसी है जिसमे वो कुछ समझ नही सकते और पेरेंटस की उम्र भी ऐसी ही है जिसमे वो खुद फिर बचपन मे जा रहे हैं ………तो बस मुस्कुराते हुए जो सामने जैसा आये स्वीकारते रहिये जीना आसान हो जायेगा

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  8. ये युग परिवर्तन का दौर लगता है ... बदलाव तेज़ी से हो रहा है सभी में ...
    कुछ बदलाव जल्दी ला रहे अहिं ओर वो सुखी हैं ...

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  9. किसी तरह की जानकारी के लिए नानी-दादी की जरुरत नहीं...गूगल महाराज हैं नः)
    बिल्‍कुल सच कहा आपने

    बेहतरीन प्रस्‍तुति

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