सोमवार, 12 नवंबर 2012

फुलझड़ियों ने पटाखों से कहा...


दिवाली......ताँका कविताएँ!!!



1
निष्कंप थी लौ
दृढ़ विश्वास संग
कुछ यूँ जली
आँधियों की कोशिश
नाकाम कर गई।


2.
सृष्टि-नियम
दिन के संग-संग
रात भी आती
दिए जलाके रखो
लौ को बचाके रखो।


3
फुलझड़ियाँ
पटाखों से यूँ बोलीं-
'करो न बोर
मैं तो राह दिखाती
तू करता है शोर।'
4
धरा-बाला ने
पहनी दीप-माला
इठला गई
मन्द समीर संग
हौले-हौले वो डोली।


5.
खुशी के फूल
हर बाग में खिलें
द्भाव की लौ
हर दिए में जले
देश रौशन रहे।



ऋता शेखर  मधु


शनिवार, 10 नवंबर 2012

अब तैयार हो जाइए पंचदिवसीय पर्व मनाने के लिए - दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ!!


वर्षा ऋतु से उत्पन्न हुई  सीलन और गन्दगी को दूर कर अब हम सब तैयार हैं पाँच दिनों का त्योहार मनाने के लिए|

धनतेरस, दीपावली, चित्रगुप्त पूजा, गोवर्धन पूजा एवं भाईदूज की हार्दिक शुभकामनाएँ|

१) धन त्रयोदशी- 11.11.2012


इसे आयुर्वेद के जनक धन्वन्तरि की याद में मनाया जाता है|समुद्र मंथन में धन्वन्तरि महाराज अमृत कलश लेकर समुद्र से निकले थे
और देवताओं को अमृत पिलाकर उन्हें आयु और आरोग्य प्रदान किया था| इसे धनतेरस भी कहते हैं| ऐसा विश्वास है कि इस दिन सोना, चाँदी या बरतन खरीदने से धन की देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं| अपनी अपनी हैसियत के अनुसार सभी कुछ न कुछ खरीदते हैं|
आज के दिन यम का दीप निकाला जाता है|देर रात जब घर के बच्चे सो जाते हैं तो घर के अन्दर से ही दीया जला कर बाहर ले जाते हैं और उसे मसूर दाल की ढेरी पर रखा जाता है| यम को यह दीप दान करने से पति और पुत्र की अकाल मृत्यु से रक्षा होती है|

२) नरक चतुर्दशी- 12.11.2012


आज के दिन भगवान कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था|
आज के दिन को बजरंगबली हनुमान की जन्मतिथि के रूप में भी मनाया जाता है|
आज के दिन एक खास स्नान का बहुत महत्व है| कहते हैं कि इस स्नान से रूप निखर जाता है| चंदन, कपूर, मंजिष्ठा, गुलाब, नारंगी का छिलका और हल्दी को मिलाकर खास उबटन तैयार किया जाता है| सूर्योदय से पहले इस उबटन को लगाकर स्नान करने से रूप में चार चाँद लग जाते हैं| इसे रूप चौदस भी कहते हैं| इसे छोटी दिवाली के रूप में भी मनाया जाता है|
३) दीपावली- 13.11.2012


पाँच दिनों के त्योहार का सबसे महत्वपूर्ण दिन दिवाली का है|
आश्विन शुक्ल पक्ष दशमी के दिन मर्यादापुरुषोत्तम राम ने लंका में लंकापति रावण को युद्ध में पराजित करने के बाद सीता को वापस पाया था| विजयादशमी के बीस दिनों के बाद पुष्पक विमान से राम जी, सीता जी एवं लक्ष्मण जी तथा अन्य अयोध्या वापस लौटने लगे| धरती पर घुप्प अंधकार छाया था क्योंकि उस दिन कार्तिक अमावस्या की रात थी| राम जी को उतरने का सही स्थान पता चले इसके लिए अयोध्यावासियों ने पूरे नगर को ढेर सारे घी के दीपक जलाकर रौशन कर दिया था| इस तरह से उन्होंने वापस लौटने की खुशी भी जाहिर की थी| तभी से ही इस दिन को दीपों की पंक्ति से सजाने की परंपरा शुरू हो गई|
दीपावली के दिन गणेश जी और लक्ष्मी जी की पूजा का भी विधान है| गणेश जी को लड्डू चढ़ाकर उनकी पूजा की जाती है| घरों में घरौंदा बनाने का भी रिवाज़ है| कुलिया में लावा, फ़रही और पचंजा(पाँच तरह के अनाज) डालकर बहनें अपने भाइयों को देती हैं|अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व समाज में उल्लासभाई-चारे व प्रेम का संदेश फैलाता है। लोगों में दीवाली की बहुत उमंग होती है। लोग अपने घरों का कोना-कोना साफ़ करते हैंनये कपड़े पहनते हैं। मिठाइयों के उपहार एक दूसरे को बाँटते हैंएक दूसरे से मिलते हैं। घर-घर में सुन्दर रंगोली बनायी जाती हैदिये जलाए जाते हैं और आतिशबाजी की जाती है।

 ४) गोवर्धन पूजा- 14.11.2012



दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा का होता है।


गांव और शहरों में पारंपरिक रूप से गाय और उसके गोबर से बने पर्वत की पूजा होती है। भगवान कृष्ण को अन्नकूट का भोग लगता है।
भगवान कृष्ण ने ही गोवर्धन पूजा की शुरुआत की थीजो उस वक्त से आज तक चली आ रही है। इंद्र को इस बात का अहंकार हो गया था कि वो बारिश कराते हैंतब कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर इंद्र को यह एहसास दिलाया कि वो पानी बरसा कर धरती पर कोई कृपा नहीं करतेबल्कि यह तो उनका कर्तव्य हैजो विधाता ने उन्हें सौंपा है।
भगवान कृष्ण ने इसके जरिए ये संदेश दिया था कि अपना कर्तव्य करना चाहिए बिना फल की चिंता किए। इसलिए उन्होंने बारिश के देवता इंद्र को भी ये समझाया।
कृष्ण ने इंद्र को समझाया था कि बारिश समय पर करना तुम्हारा कर्तव्य हैइसके लिए तुम्हें कोई पारिश्रमिक नहीं मिले तो तुम्हें नाराज होने क कोई अधिकार नहीं है। तुम केवल इसलिए पूजे जाने योग्य नहीं हो कि तुम समय पर बारिश करवाते होब्रह्मा ने तुम्हें यह काम सौंपा है और तुम्हें इसे हर हाल में करना है। इंद्र ने अपनी गलती मानी। तभी से गोवर्धन पूजा का प्रचलन चल पड़ा।
गाय बैल को इस दिन स्नान कराकर उन्हें रंग लगाया जाता है व उनके गले में नई रस्सी डाली जाती है। गाय और बैलों को गुड़ और चावल मिलाकर खिलाया जाता है।
५) यम द्वितीया- 15.11.2012
आज के दिन दो प्रकार की पूजा होती है|
चित्रगुप्त पूजा और भाईदूज
चित्रगुप्त पूजा-
भगवान चित्रगुप्त परमपिता ब्रह्मा जी की काया से उत्पन्न हुए हैं और यमराज के सहयोगी हैं।
सृष्टि के निर्माण के उद्देश्य से जब भगवान विष्णु ने अपनी योग माया से सृष्टि की कल्पना की तो उनकी नाभि से एक कमल निकला जिस पर एक पुरूष आसीन था चुंकि इनकी उत्पत्ति ब्रह्माण्ड की रचना और सृष्टि के निर्माण के उद्देश्य से हुआ था अत: ये ब्रह्मा कहलाये। इन्होंने सृष्ट की रचना के क्रम में देव-असुरगंधर्वअप्सरा,स्त्री-पुरूष पशु-पक्षी को जन्म दिया। इसी क्रम में यमराज का भी जन्म हुआ जिन्हें धर्मराज की संज्ञा प्राप्त हुई क्योंकि धर्मानुसार उन्हें जीवों को सजा देने का कार्य प्राप्त हुआ था। धर्मराज ने जब एक योग्य सहयोगी की मांग ब्रह्मा जी से की तो ब्रह्मा जी ध्यानलीन हो गये और एक हजार वर्ष की तपस्या के बाद एक पुरूष उत्पन्न हुआ। इस पुरूष का जन्म ब्रह्मा जी की काया से हुआ था अत: ये कायस्थ कहलाये और इनका नाम चित्रगुप्त पड़ा।
भगवान चित्रगुप्त जी के हाथों में कर्म की किताबकलमदवात और करवालहै। ये कुशल लेखक हैं और इनकी लेखनी से जीवों को उनके कर्मों के अनुसारन्याय मिलती है। कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि को भगवान चित्रगुप्त कीपूजा का विधान है। यमराज और चित्रगुप्त की पूजा एवं उनसे अपने बुरे कर्मोंके लिए क्षमा मांगने से नरक का फल भोगना नहीं पड़ता है।
भाई दूज( गोधन)-
यह एक सामूहिक पूजा है|गाय के गोबर से एक चतुर्भुज बनाया जाता है|इसकी चारो भुजाओं को बीच से खोल दिया जाता है,यह यमपूरी का प्रतीक है| बीच में गोबर से ही यम की आकृति बनाई जाती है| उसके
उपर एक नया ईट रख दिया जाता है|यम की विधिवत पूजा की जाती है|इस पूजा के लिए मुरली की माला, रेंगनी का काँटा, बजरी(कुशी केराव), नारियल,कच्चा रूई एवं मिठाई आवश्यक वस्तुएँ हैं|पूजा के क्रम में बहनें भाई को भला-बुरा कहती हैं, और फिर अपनी जीभ पर रेंगनी का काँटा गड़ाकर प्राशयश्चित करती हैं|कच्चे रूई से माला बनाकर भाई की आयु जोड़ती हैं और यम से भाई की लम्बी उम्र के लिए प्रार्थना करती हैं|फिर समाठ(धान कूटने के लिए प्रयोग किया जाने वाला काठ का बना मूसल) से ईंट पर इतने प्रहार किए जाते हैं कि ईंट और यम चकनाचूर हो जाते हैं| भाईदूज  में हर बहन रोली एवं अक्षत से अपने भाई का तिलक कर उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए आशीष देती हैं। भाई अपनी बहन को कुछ उपहार या दक्षिणा देता है। भाईदूज दिवाली के दो दिन बाद आने वाला ऐसा पर्व हैजो भाई के प्रति बहन के स्नेह को अभिव्यक्त करता है एवं बहनें अपने भाई की खुशहाली के लिए कामना करती हैं। इस त्योहार के पीछे एक किंवदंती यह है कि यम देवता ने अपनी बहन यमी  को इसी दिन दर्शन दिया थाजो बहुत समय से उससे मिलने के लिए व्याकुल थी। अपने घर में भाई यम के आगमन पर यमुना ने प्रफुल्लित मन से उसकी आवभगत की। यम ने प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया कि इस दिन यदि भाई-बहन दोनों एक साथ यमुना नदी में स्नान करेंगे तो उनकी मुक्ति हो जाएगी। इसी कारण इस दिन  नदी में भाई-बहन के एक साथ स्नान करने का बड़ा महत्व है। इसके अलावा यमी ने अपने भाई से यह भी वचन लिया कि जिस प्रकार आज के दिन उसका भाई यम उसके घर आया हैहर भाई अपनी बहन के घर जाए। तभी से भाईदूज मनाने की प्रथा चली आ रही है। जिनकी बहनें दूर रहती हैंवे भाई अपनी बहनों से मिलने भाईदूज पर अवश्य जाते हैं और उनसे टीका कराकर उपहार आदि देते हैं।

ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 7 नवंबर 2012

बुढ़ापा की उम्र क्या है?

चित्र गूगल से साभार
आखिर बुढ़ापा की उम्र क्या है?

अपनी उम्र को लेकर महिलाएँ ज्यादा सजग रहती हैं इसमें दो मत नहीं...किन्तु वह उम्र क्या है जहाँ से शुरुआत हो जाती है उन्हें वृद्धा कहने की:)
देखते हैं कुछ उदाहरण...
* सबसे पहले बात करते हैं ब्युटीशियन्स की---उनका कहना है कि २०-२५ साल की उम्र से त्वचा अपनी रौनक खोने लगती है,इसलिए खास देखभाल की जरूरत पड़ती...मतलब आप वृद्धा हो चलीं:)
* गाइनोकोलौजिस्ट का कहना है---३० वर्ष की उम्र के बाद संतानोत्पत्ति घातक होती है...मतलब वृद्धा:)
* ४० साल के बाद महिलाओं में कैल्सियम और आयरन की कमी होने लगती है, इसके अलावा इस उम्र के बाद रेग्युलर चेकअप जरूरी हो जाता है...बुढ़ापे की राह पर:)
* अपने बच्चों की हर डिमान्ड पर चकरी की तरह नाचने वाली माँ जब प्रथम बार यह कहती है"रुको थोड़ी देर, उठती हूँ", झट से बच्चे डिक्लेयर कर देते हैं--माँ तो बूढ़ी हो गई:)
* एक महिला तब चौंक पड़ती है जब बालों में पहली सफेदी दिखती है--वह मन को तैयार करने लगती है कि उसकी उम्र हो गई:)
* एक ८५ वर्ष की वृद्धा अपनी ६० वर्ष की बहू या बेटी को वृद्धा नहीं मानती और उससे उसी सेवा की अपेक्षा करती है जो वह ३० की उम्र में किया करती थी...है न अच्छी बात:)
* सरकार ने रिटायरमेन्ट की उम्र अपनी-अपनी जौब और प्रांत के अनुसार ५८--६०--६२ रखी है...मतलब उसके बाद गीता का पाठ करो:)
....तो आखिर बुढ़ापा की उम्र क्या है?
अपने जीवन के ६०--६५ बसंत देख चुकीं ब्लौगर दीदियाों के लिए मेरे मन मे बहुत सम्मान है क्योंकि वे कम्प्यूटर का बखूबी इस्तेमाल करके  हमें रास्ता दिखाती हैं...उन्हें मेरा नमन|
तो अब मान ही लीजिए...बुढ़ापा की कोई निश्चित उम्र नहीं|

ऋता शेखर 'मधु'

शनिवार, 3 नवंबर 2012

सफलता का वृत




प्रकाश वृत

भोर की आहट पा
दृग कपाट खुलते ही
दिख जाती है
झरोखे की झिर्री से झाँकती
रवि की प्यारी सी किरण
असंख्य धूल-कणों को समेटे
झिलमिल करती रहती वह किरण
नन्हें बालकों की चेष्टा
प्रकाश को मुट्ठी में कैद करने की
देख, दीप्त हो हँसती वह किरण

रवि की चमकीली किरण
धरा पर छोटा सा प्यारा सा
प्रकाश वृत बनाती
किरण पथ का अवरोध
मैं हाथों को बनाती
धरा का छोटा सा वृत
बिना मिटाए मिट जाता
बिना उठाए ही वह वृत
हाथों पर जाता

दृग कपाट की भाँति
मन के द्वार तुम खोलो
दिख जाएगी
भक्ति के झरोखे से झाँकती
आशा की सघन किरण
खुद में समेटे
निराशा के असंख्य धूल-कण

यूं ही छोड़ दो धूलकणों को
मत कैद करो मुट्ठी में
तुम्हे दिखेगा
वृत सफलता का
किरण-पथ का अवरोध करो
प्रयास के हाथों से,
बिना उठाए सफलता वृत
जाएगा तुम्हारे हाथों में |
ऋता शेखर ‘मधु’

रविवार, 28 अक्टूबर 2012

चाँदनी फलक पे थिरक उठी




शरद की पूनम है आज
चन्द्र-आभा को हो रहा नाज
ओ कायनात, मुस्कुरा भी दो
दूर हुआ है धरा का दाज(अंधकार)
शबनमी मोतियाँ गिरने लगीं
गुलाबी ठंढ का है आगाज
चाँद ने चुपके से छेड़ा
मध्यम सुर में मधुर साज
चाँदनी फलक पे थिरक उठी
सबने जाना दिल का राज
अधरों पे स्मित सजा के लाया
सनम जो अब तक था नाराज
दुधिया उजालों की चमक में
सितारे भी बने आतिशबाज
झिंगुरों को यह क्या हुआ
वे भी बन रहे चुहलबाज
रौशनी चाँद की ज्योंही पड़ी
ताज का बदल गया अंदाज
किरणों की बारिश समेट
खीर-अमृत ने दी आवाज
जीवन में मिठास बनी रहे
खुश रहें सबके मिजाज|

ऋता शेखर 'मधु'

Enjoy Sharad Purnima…

गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

ठनी लड़ाई




ठनी लड़ाई

आज मेरी गणपति की सवारी के साथ ठन गई| गणपति के सामने लड्डुओं से भरा थाल रखा था| उन लड्डुओं पर भक्त होने के नाते मैं अपना अधिकार समझ रही थी और वह मूषक अपना...आखिर गणेश का प्रिय जो था| मेहनत की कमाई से लाए लड्डुओं को लुचकने के लिए वह तैयार बैठा था| चूहों की तरह कान खडे करके गोल-गोल आँखें मटकाता दूर से ही वह सतर्क था कि मैं कब अपनी आँखें बन्द करके ध्यान में डूबूँ और वह लड्डुओं पर हाथ साफ करे| मैं भी कब दोनों आँखें बन्द करने वाली थी| एक आँख बन्द करके गणेश जी को खुश किया और दूसरी आँख खुली रखकर चूहे पर नजर रखी| किन्तु ये भी कोई पूजा हुई भला...देवता से ज्यादा ध्यान चूहे पर!
पल भर के लिए सीन बदल गया| थाल में लड्डुओं की जगह मेहनत की कमाई दिख रही थी और चूहे में वह भ्रष्टाचारी जो एरियर का बिल बनाने के लिए पैसों पर नजर जमाए बैठा था| फिर तो मैंने भी ठान लिया...उस चूहे को एक भी लड्डू नहीं लेने दूँगी|


ऋता शेखर मधु

सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

ये हवाएँ...




पर्वतों और समुद्रों को लांघती
कितने ही धूल-कणों को समेटती
सागर की नमी सँभालती
ये पुरवा और पछुआ हवाएँ
कुछ कहने आती हैं
झंझोड़ देती हैं खिड़की दरवाजे
इन्हें बन्द करने में
कुछ थपेड़े चेहरे पर पड़ते हैं
फिर भी बन्द कर देते हैं खिड़कियाँ
किन्तु उन साँय सांय करती
हवाओं की आवाज
क्या चैन से बैठने देती है
थक कर शांत क्लांत हवा
या तो चुप हो जाती है
या दिशा बदल देती है
यह है हवा की बात
अब देखते हैं उन्हें
जिन्होंने दरवाजे बन्द किए
सन्नाटे को पाकर
झाँकती हुई आँखें
क्या आँधियों के अवशेष
धूल की परत फ़र्श पर नहीं देखती
नमी के छींटे से
खिड़कियों के परदे
क्या भीगे नहीं होते
अनकहा दर्द झलक ही जाता है|
परिवार में
किसी एक के जीवन में आई सुनांमी
सबको अस्त-व्यस्त कर देती है
यह अलग बात है
किसी से ममता मिलती है
किसी से सहानुभूति
कटाक्ष से भी बचना मुश्किल है
इसलिए प्रभु से जब भी माँगो
सबकी खुशियाँ माँगो
सब खुश रहेंगे
तभी हम भी खुश रहेंगे
सिर्फ अपना सुख कुछ नहीं होता
सबकी खुशी में ही
अपनी भी खुशी होती है|

ऋता शेखर मधु

विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ!!