रविवार, 21 अप्रैल 2013

तुम चलो तो सही...



मिलेंगी मंजिलें तुम चलो तो सही
मिटेंगे फ़ासले तुम बढ़ो तो सही

असम्भव कुछ नहीं आजमा लो कभी
जुटेंगे हौसले तुम रखो तो सही

खिलेंगे फिर चमन यह न भूलो कभी
उठा के फ़ावड़े तुम बढ़ो तो सही

सवालों में घिरे तो बढ़ोगे नहीं
बुलंदी के कदम तुम रखो तो सही

हमारी ज़िन्दगी और हक़ वे रखें
वजूदों के लिए तुम लड़ो तो सही

ज़रूरतमंद भी राह में हैं खड़े
सहारा बन कभी तुम चलो तो सही

कभी फितरत किसी की बदलती नहीं
न उनके मुँह लगो तुम हँसो तो सही

बनाया है ख़ुदा ने इक जन्नत वहाँ

करम ले के भले तुम चलो तो सही
................ऋता शेखर 'मधु'.......

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

शुक्ल नवमी चैत्र की, जनम लिए श्रीराम|



दोहे...........ऋता शेखर ‘मधु’

दूर-ध्वनि आभास से, दशरथ साधे तीर|
तड़पे श्रवणकुमार जब, रघुपति हुए अधीर||

मात-पिता के पास जब, दशरथ लाए नीर|
आत्मग्लानि के भाव से, रख नहिं पाए धीर||

पाए पुत्र-वियोग से, श्रवण-पिता संताप|
अवधराज को भी मिले, पुत्र-विरह का ताप||

शुक्ल नवमी चैत्र की, जनम लिए श्रीराम|
गूँज उठी किलकारियाँ, हरषा रघुकुल धाम||

स्वागत में लहरा गए, फूले हुए पलाश|
खग के मंगलगान से, मुदित हुआ आकाश||

हुलसी धारा गंग की, सुरभित हैं ऋतुराज|
चहक रही है वाटिका, प्रभु आए हैं आज||

श्यामल छवि श्रीराम की, कुंतल सोहे भाल|
गाकर मीठी लोरियाँ, माता हुईं निहाल||

जनक के दरबार में, बैठे बली महान|
शिव-चाप को तोड़ दिए, सहज भाव से राम||

ब्रह्मा के संसार में, सत्य एक ही नाम|
देते हैं विश्राम जो, कहते उनको राम||

हृदय बसाए प्रेम से, रघुनन्दन के चित्र|
मिलें हमें संसार में, महावीर सम मित्र||

.....ऋता शेखर ‘मधु’................

मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

जली पतीली का दर्द



जली पतीली का दर्द

ये महिलाएँ भी न
पता नहीं
क्या समझती हैं खुद को,
कभी भी धैर्यपूर्वक
चुल्हे के पास खड़े होकर
दूध नहीं उबालतीं
उन्हें बड़ा नाज है
अपनी याददाश्त पर
पतीले में दूध डाला
उसे गैस पर चढ़ाया
पर वहाँ खड़े होकर
कौन बोर होने का सरदर्द ले
या तो तेज आँच पर ही
दूध को छोड़कर
गायब हो जाती हैं
यह सोचकर
बन्द कर दूँगी न
इधर दूध बेचारा भी क्या करे
उसे आदत है
उबलकर बाहर निकल जाने की
और नतीजा बड़ा सुहाना
हँस-हँस कर गाइए
हम उस घर के वासी हैं
जहाँ दूध की नदिया बहती हैJ

दूसरा विकल्प
गैस की आँच धीमी करो
फिर निकल जाओ गप्पें मारने
अब दूध बेचारा
उबलता रहा
उबलता रहा
आधा हुआ
उसका भी आधा हुआ
उफ! मालकिन अब भी गायब
पतीली ने सारा दूध पी लिया
अब क्या करे
उसने जले दूध की गंध
फ़िजाओं में घोल दिया
फिर रो-रो कर गाने लगी
मैं बैरन ऐसी जली

कोयला भई न राख’…J

.ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

जिमें केशरी भात अरु, बोलें मीठे बोल


फागुन मास गुजर गया, आसमान है साफ|
धूप सुनहरी है सजी, अन्दर गए लिहाफ़|1|

सुरमई सहज सांध्य से, रातें बनीं उदार|
झिलमिल झिलमिल कर रहे, नव तारों के हार|2|

होली गई फाग गया, चैत बना अनुराग|
नव वर्ष अब आ गया, जाग मुसाफिर जाग|3|

आज खास श्रीखंड अरु, पूरणपोली, नीम|
करें निरोगी पत्तियाँ, ऐसा कहें हकीम|4|

बैठो मिल-जुल दो घड़ी, तुम अपनों के पास|
पल भर दुख-सुख बाँट लो, मन में घुलें मिठास|5|

चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा, मिले जगत को प्राण|
नवसंवत्सर आज है, हरषित हुए कृषाण|6|

जिमें केशरी भात अरु, बोलें मीठे बोल|
गुड़ी पड़वा कहे हमें, मिलें सदा दिल खोल|7|

गुड़ी पड़वा महाराष्ट्र में, बिहार में नवरात्र|

नवसंवत्सर शुभ रहें, शुभ हों मंगल-पात्र|8|

ऋता शेखर 'मधु'


शनिवार, 30 मार्च 2013

मेरी खिचड़ी तेरी खिचड़ी


एक साधु बाबा किसी गाँव में पहुँचे| गाँववाले बड़े खुश हुए| सभी उनके दर्शन के लिए बेताब हुए जाते थे| साधु बाबा ने कहा कि वे कल सुबह आएँगे और सबके घरों की बनी खिचड़ी खाएँगे| गाँववाले उत्साहित हो गए| सबने बहुत मन से खिचड़ी पकाई| गाँव में सभी जाति और सम्प्रदाय के लोग रहते थे| दूसरे दिन साधु बाबा गाँव में पधारे| सभी चाहते थे कि वे उनकी खिचड़ी खाएँ| साधु बाबा सबके मन की बात समझ रहे थे| उन्होंने कहा, सबकी खिचड़ी मिला दी जाए तब वे खाएँगे| सभी संप्रदाय के लोग अपनी खिचड़ी को स्वादिष्ट मान रहे थे| पर बाबा जी की आज्ञा थी सो खिचड़ी मिला दी गई| सबके चेहरे से मायूसी झलक रही थी| इसे देख साधु बाबा ने कहा कि उस इकट्ठी खिचड़ी से सब अपनी अपनी खिचड़ी अलग कर लें| अब भला सबकी खिचड़ी अलग कैसे हो सकती थी| सबने कहा कि हम सब मिलकर इसे खाएँगे| अपनी खिचड़ी को सबसे स्वादिष्ट साबित करने का विचार सबके मन से निकल चुका था इसलिए सभी तनावमुक्त थे| सबने मिलजुल कर खिचड़ी खाई और साधु बाबा जो संदेश देना चाहते थे उसमें सफल रहे|
एकता और भाइचारा में जो खुशी है वह सबकी समझ में आ चुका था|

....ऋता शेखर मधु

मंगलवार, 26 मार्च 2013

होली मुबारक....



फागुन के अवसान में, जली होलिका रात
चैत ने खुशी से दिया, होली की सौगात
होली की सौगात, बरसात है रंगों की
जगी हृदय में प्रीत, उल्लासों-उमंगों की
मिल-जुल कर सब आज, फूल खुशियों के लें चुन
वैर-भाव को भूल, मनाएँ चैती-फागुन|


..........................ऋता शेखर मधु

रविवार, 10 मार्च 2013

महाशिवरात्रि...





पावन पर्व
हर हर महादेव
गूँजी दिशाएँ
आओ, चलो हम भी
कर दें अभिषेक|

विष को पिया
कंठ में धार लिया
हम भी सीखें
हर बुराई सहें
आत्मसात न करें|

तेरा ही नाम
जिसने भजा सदा
वह क्यूँ डरे
भव सागर का तू
जो खेवनहार है|

ऋता शेखर 'मधु'

गुरुवार, 7 मार्च 2013

नारी शक्ति...

महिला दिवस के उपलक्ष में हम सभी महिला मित्र एक स्थान पर इकट्ठे हुए हैं...ये सभी या तो मेरे ब्लॉग पर मेरे साथ हैं या फ़ेसबुक पर...
अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ...




सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

नव कोंपल से सजता, लगता तरु का हर डाल मनोहर है



मेरे तीन दुर्मिल सवैया छंद...
१.
अनुशासित प्रांत महान बने, यह बात सदा सच ही रहती
सदभाव बसे जिस देश सदा, दुनिया बस भारत ही कहती
जँह प्रीत नदी बन के बहती अरु वेद ऋचा नभ में उड़ती
वह पावन भूमि तपोवन सी, दिल से दिल की कड़ियाँ जुड़ती
२.
नव कोंपल से सजता, लगता तरु का हर डाल मनोहर है
खग-गान हवा तब गूँज उठे, लगता यह गायन सोहर है
जब धान पके, हर खेत सजे, चमकी सरसों पुखराज बनी
परिधान धरा कुछ यूँ पहनी, सुषमा उसकी अधिराज बनी
३.
फगुनाहट में ऋतुराज चले, धरती कुसुमी बन डोल रही
कलियाँ खिलतीं, तितली उड़ती, अलिगूँज सखी-मन खोल रही
हर बौर सजी अमिया महकी, बगिया कुहु कोयल बोल रही
मनभावन मौसम, मंद हवा, कचनार कली रस घोल रही

---ऋता शेखर मधु

बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

मेरी अब तक प्रकाशित पुस्तकें

मेरी अब तक प्रकाशित पुस्तकें...सभी सम्पादक महोदय/महोदया की 

हार्दिक आभारी हूँ जिन्होंने मेरी रचनाओं को प्रकाशन के योग्य 

समझा...सभी पब्लिशर्स को हार्दिक धन्यवाद !!

सभी सह-रचनाकारों को हार्दिक बधाई !!...ऋता शेखर 'मधु'

उत्साहवर्धन के लिए सभी पाठकगणों का हार्दिक आभार !!















प्रिंट प्रकाशन-
1.भाव कलश(२९ रचनाकारों के ताँका कविता)सम्पादक-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु',डॉ भावना कुँअर
2.शब्दों के अरण्य में(६० कवियों का कविता-संग्रह)- सम्पादन-रश्मिप्रभा
3.खामोश खामोशी और हम( कविता-संग्रह) सम्पादन- रश्मिप्रभा
4.संरचना (वर्ष २०११ के १०० लघुकथाकारों की लघुकथाओं का संग्रह)सम्पादक-डा कमल चोपड़ा
5.माला के मोती-दिलबाग विर्क जी के हाइकु-संग्रह में मेरी समीक्षात्मक भूमिका)
6.उदंती मासिक पत्रिका के मई अंक में मेरी कविता
7.युग चेतना(अमरीकी त्रैमासिक पत्रिका-अक्टूबर) में लघुकथा
8.यादों के पाखी(४८ रचनाकारों का साझा हाइकु-संग्रह)सम्पादक-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'/डॉ भावना कुँअर/डॉ हरदीप कौर संधु
9.पगडंडियाँ(२८ कवियों की कविता-संग्रह)सम्पादक-अंजु चौधरी,रंजू भाटिया,मुकेश कु० सिन्हा
10.लघुकथाएँ-जीवन-मूल्यों की--सम्पादक-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु',सुकेश साहनी