शुक्रवार, 8 जून 2018

मौसम गर्मी का- बाल गीत


बाल-गीत




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मौसम गर्मी का है आया
सूरज छतरी से शरमाया


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गुलमोहर की लाली देखो
उसमें तुम खुशहाली देखो


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तरबूजों की शान निराली
शर्बत बनकर भरती प्याली


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पीले पीले आम सुहाने
ठेलों पर आ गए रिझाने


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हुई गुलाबी लीची रानी
पेटी में भर लाई नानी


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छुट्टी में तुम पढ़ो कहानी
पीकर मीठा नरियल पानी


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बच्चों मन को कर लो ताज़ा
खाओ सॉफ्टी पी लो माज़ा

ऋता शेखर मधु

शनिवार, 26 मई 2018

क्रेडिट कार्ड-लघुकथा

आधुनिक कर्ज
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कुछ देर पहले मोबाइल पर कोई मैसेज देखकर सोमेश का चेहरा उतर गया था। उसके पापा से यह छुपा नहीं रह सका। पूछने पर सोमेश ने बताया कि क्रेडिट कार्ड का बिल है। दस दिन पहले की ही तो बात है जब सोमेश का फोन आया था।

"अम्मा पापा, गृहप्रवेश के लिए 20 मई का दिन रखा है मैंने। वीकेंड में रहने से कोई परेशानी न होगी। अब आपलोग यहां आने की तैयारी करें। मैं फ्लाइट की टिकट भेजता हूँ ।" सोमेश ने चहकते हुए कहा।
"नहीं बेटा, हमलोग ट्रैन से आ जाएंगे। अभी फ्लाइट की टिकट का दाम बहुत बढ़ा मिलेगा।" पिता पाई पाई की बचत का महत्व जानते थे।
"मैं भेजता हूँ न," कहकर सोमेश लैपटॉप खोलकर बैठ गया।
निश्चित दिन माता पिता को नए घर में पाकर सोमेश बहुत खुश हुआ। उसकी पत्नी ने भी आवभगत में कमी न छोड़ी। नए महँगे उपकरणों से घर भरा हुआ था। किचेन में सोमेश की माँ चकित भाव से हर मशीन देखतीं। वाशिंग मशीन, फ्रिज , माइक्रोवेव , गैस चूल्हा, चिमनी, फ़ूड प्रोसेसर तो उच्च क्वालिटी के थे ही, ड्राइंग रूम में सोफे, टीवी सभी शानदार थे। सजावट के सामान भी देखते ही बनते थे।
"सोमेश, सिर्फ दस वर्षों की नौकरी में तुमने एक करोड़ का घर खरीद लिया और जरुरत के सारे सामान भी लिए।एक हम लोग थे, कभी सोच ही नहीं पाए यह सब। सिर्फ बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए सोचते रहे और जुगाड़ करते रहे। आखिर कितनी बचत कर लेते हो।"
"बचत क्यों करें, क्रेडिट कार्ड से लिया"
"तो क्या ये पैसे चुकाने न होंगे"
"चुका देंगे पापा, अब आप बताइए, कुछ कमी लग रही तो वह खरीद लूँ।"
"न बेटा, कोई कमी नहीं। पर कर्ज हमेशा गले में फंदे की तरह लटकता रहता है। आधुनिक भाषा में वो कर्ज ही तो क्रेडिट कार्ड है।"
"क्या पापा आप भी..." कहकर सोमेश मुस्कुरा दिया था।

पापा ने बिल देखा, कुछ सोचा और कहा," चिंता न करो, रिटायरमेंट के जो पैसे मिले हैं उनसे चुका देना।"

"मैं आपके पैसे धीरे धीरे वापस कर दूँगा"

"हम्म, मैं क्रेडिट कार्ड नहीं हूँ बेटा,"

कहकर पापा दूसरे कमरे में चले गए।

-ऋता शेखर मधु

शुक्रवार, 18 मई 2018

माँ 😍

माँ 💕😍💐

भ्रुण में धड़कन भरती माँ
रग रग में है बहती माँ
रौशन कुल का दीपक हो
तन की पीड़ा सहती माँ
बाहों के झूले में रखकर
लोरी सुन्दर गहती माँ
रोटी के हर टुकड़े पर
अनगिन किस्से गढ़ती माँ
पग के नीचे पुष्प मिलें
पथ पर चुप से झरती माँ
सिर के ऊपर छाँव मिले
आँचल उनपर धरती माँ
कुछ माँगो झट ला देती
किस कारण से खटती माँ
डाँट डपट की बोली को
याद कभी ना रखती माँ
बाहर से आती थक कर
खाना में फिर पकती माँ
पानी सबको देती है
खुद प्यासी ही रहती माँ
तुलसी चौरा के दीये में
बाती बनकर जलती माँ

उम्र ढली कमजोर बनी
पानी पानी रटती माँ
हर आहट पर द्वार तके
अपने पूतों में बंटती माँ
रग रग में है दर्द भरा
मौन बनी सब सहती माँ
सबकी खातिर हँसती है
अपनी पीड़ा ढकती माँ
उत्सव में भूखी प्यासी
रसगुल्लों को तकती माँ

प्रेम पगी बोली सुनकर
आशीषों से भरती माँ
-ऋता
सभी पुत्र पुत्रियों को
Happy Mother's Day 🌸🌸😍😊

मंगलवार, 1 मई 2018

प्रेम लिखो पाषाण पर, मन को कर लो नीर।

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प्रेम लिखो पाषाण पर, मन को कर लो नीर।
बह जाएगी पीर सब, देकर दिल को धीर।।1

मन दर्पण जब स्वच्छ हो, दिखते सुन्दर चित्र।
धब्बे कलुषित सोच के, धूमिल करें चरित्र।।2

मन के तरकश में भरे, बोली के लख बाण।
छूटें तो लौटें नहीं, ज्यों शरीर के प्राण।।3

अवसादों की आँधियाँ, दरकाती हैं भीत।
गठरी खोलो प्रीत की, जाए समय न बीत।।4

अमरबेल सा बढ़ गयी, मनु की ओछी बात।
शनै शनै होने लगा,मधुर सोच का पात।।5

उम्र बनी हैं पादुका, पल बन जाता चाल।
तन बचपन को छोड़कर, उजले करता बाल।।6

समय पर अधिकार नहीं, वश में रहती याद।
भूलें उनमें नीम को, आम रखें आबाद।।7

कौन सफल कितना कहो, कैसे हो यह माप।
यश, वैभव या विद्वता, खुद ही जानो आप।।8

तेज भागती जिंदगी, ब्रेकर की है नीड।
उतार चढ़ाव दुःख सुख, कंट्रोल करे स्पीड।।9

मन यायावर बावरा, करे जगत की सैर।
अपनी जूती ढूँढते, सिंड्रेला के पैर ।।10

जो एसी में बैठकर, दिनभर रहते मस्त।
गर्मी के अहसास से, कब होते हैं त्रस्त।।11

गर्मी के अहसास को, शीतल करती छाँव।
तरु को अब मत काट मनु, बिलख रहा है गाँव।12
-ऋता

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018

उत्तरदायित्व

उत्तरदायित्व का ज्ञान
"अंजना, जरा पानी देना।"
"अंजना, चादर ठीक से ओढ़ा दो बेटा।"
"अंजना, मन भारी लग रहा, कुछ देर मेरे पास बैठो।"
"माँ, पानी भी दिया, चादर भी दिया। पास बैठने का समय नहीं, आपके बेटे आएंगे, वही बैठेंगे।"
बहु की बात सुनकर प्रमिला जी की आंखें छलक गईं।

प्रमिला जी ने बेटे की शादी तब की थी जब उनकी सास जीवित थीं। तीन देवर और दो ननदों वाला भरा पूरा संयुक्त परिवार था। सबसे बड़ी बहू प्रमिला जी ने खुद को गृहस्थी में पूरी तरह से लगा दिया। सास के ताने सुनते सुनते आदी भी हो गईं थीं। बेटे की शादी हुई तो वे नहीं चाहती थीं कि उनकी बहु इस झमेले में पड़े। इसलिए कभी उसे अपने पास नहीं रखा। ईश्वर की निष्ठुरता से उस दिन बुरी तरह से टूट गईं जब उन्हें लिवर कैंसर निकल गया। बड़ी बेटी और दामाद ने उनकी भरपूर सेवा की। बाद में बेटा किसी तरह से तबादला करवाकर माँ के पास आ गया। अब वे बेटी के घर से अपने घर आ गई थीं।आये हुए सिर्फ पाँच दिन ही बीते थे।
अब बेटी रोज़ आकर माँ को देख जाती। कुछ चीज़ें न भी पसन्द आती तो चुप रहकर कर देती। उस दिन भी वह आई। माँ की छलकी आँखें उससे छुप न सकीं। कीमोथेरेपी ने माँ को बहुत कमजोर बना दिया था।
"भाभी, माँ अब कम दिनों की ही मेहमान है। थोड़ा वक्त उनके साथ बिता लिया कीजिये।" सहज भाव से बेटी ने कह दिया।
"तो मैं क्या करूँ, यहां आकर फंस गई हूँ।" भाभी की बात से वह आहत हो गयी।
"छह महीने लगे आपको आने में भाभी। "
"अब तुम मुझे मेरा उत्तरदायित्व बताओगी"
"नहीं, मैंने सोचा था कि बेटा बहु के आ जाने से अच्छा रहेगा। खैर, माँ को ले जा रही हूँ वापस। आप आराम करें।"
दरवाजे पर बेटे ने भी कोरों पर छलक आई बूंदों को चुपचाप से पोंछकर माँ के पास चला गया।
"भाई, आपकी कोई गलती नहीं। गलती तो माँ से हुई जो प्रेमवश आपको परिवार के जंजाल से दूर रखी। भाभी इसे अपना अधिकार समझ बैठीं और उत्तरदायित्व भूल गईं।"
-ऋता शेखर मधु

शनिवार, 14 अप्रैल 2018

उधम की परिणति

उधम की परिणति
शाम हो चली थी| हल्के अँधेरे अपने पाँव धीरे धीरे पसार रहे थे| मैं ऑफिस से लौट कर अपार्टमेंट की ओर बढ़ रहा था| पार्क में खेलता हुआ मेरा छह वर्षीय बेटा मुझे देखते ही मेरे पास आ गया| हम आगे बढ़ते जा रहे थे तभी रोने की आवाज़ आई| कौन रो रहा, यह देखने के लिए हम इमली के पेड़ वाले पार्क की ओर बढ़े| वहाँ बहुत बड़ा लोहे का पिंजरा था जिसके अन्दर तीन बड़े और दो नन्हें बन्दर कैद थे| वे ही बन्दर रो रहे थे और बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे| मुझे याद आया कि अपार्टमेंट की ओर से सुबह ही नोटिस आ चुका था कि अपने छोटे बच्चों को इमली पार्क में न जाने दें|
“पापा, इन बन्दरों को पिंजरे में क्यों बंद किया है|”

“ये सबको तंग करते थे बेटा| तुमने देखा था न कि गृह प्रवेश के दिन ये खिड़की से घुसकर पूजा के सारे केले उठाकर ले गए थे|”

“दादी ने कहा था कि हनुमान जी स्वयं आकर प्रसाद ग्रहण किये| तो ये तो भगवान हैं न |” बालमन बन्दरों को कैद में देखकर छटपटा रहा था| ”ये बन्दर शाम को यहाँ घूमते थे तो कितना अच्छा लगता था|”

“पर अब यहाँ हम मनुष्य रहेंगे तो वे कैसे रह सकते हैं,” मैंने बेटे की गाल थपथपाते हुए कहा|

“हम मनुष्य बहुत गंदे हैं पापा| उनके रहने के पेड़ काटकर अपना घर बना लिया| उनसे उनका घर छीन लिया| वे अपना घर खोजने आते हैं,” बेटे की बात मुझे भी आहत कर रही थी|

“उधम मचाएँगे तो यही होगा”, बात टालने के इरादे से मैंने कह दिया|

“दादी कहती हैं कि बच्चे भगवान का रूप होते हैं| मैं भी तो उधम मचाता हूँ तो क्या मुझे भी...”उसने अपना मुँह मेरे कंधे में छुपा लिया|

हर दिन सोने से पहले बिस्तर पर उधम मचाने वाला मेरा मासूम बेटा उस दिन चुपचाप सो गया और मैं शांत बिस्तर पर जाग रहा था|

-ऋता शेखर ‘मधु’
14/04/18
मौलिक, अप्रकाशित

बुधवार, 11 अप्रैल 2018

मी टू-लघुकथा

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मी टू

‘रमोला, ये तुम्हें क्या सूझी है| तुम्हारा हँसता खेलता परिवार बर्बाद हो जाएगा| परिणाम पर भी विचार किया है क्या?’’
‘जी दीदी, सब सोच कर ही फैसला लिया है| अब बात बाहर आनी ही चाहिए|”
‘किन्तु, रमेन्द्र जी ये सह नहीं पाएँगे| समाज में सशक्त लेखक के रूप में उनकी इज्जत है| पहले उनसे बात कर लो|’’
‘वो नारी सशक्तिकरण के घोर समर्थक हैं| कुछ न कहेंगे|’’
‘वे पुरुष भी हैं, यह सोच लेना| पर वह था कौन रमोला?’’ दीदी का भयभीत स्वर गूँज उठा|
‘वह तो ‘मी टू’ कैंपेन से जुड़कर ही बताऊँगी दीदी,’’ कहती हुई रमोला बाहर निकल गई|

थोड़ी देर बाद ब्रेकिंग न्यूज था, ‘प्रसिद्ध लेखक रमेन्द्र जी की पत्नी रमोला ''मी टू” कैंपेन से जुड़ी हैं| जब वे बारह वर्ष की थीं तो बड़ी बहन ने डिलीवरी के वक्त बुलाया था ताकि घर के कामों में मदद मिल सके| जब बहन अपनी ननद के साथ अस्पताल में थीं तो घर में बहन की ननद के पति ने उनके अकेलेपन का फायदा उठाया| बहन का घर न टूटे इस वजह से वे चुप थीं| किन्तु इस कैंपेन ने उन्हें अपनी बात कहने की हिम्मत दी है|’’
खबर सुनते ही रमेंन्द्र जी स्तब्ध रह गए| रात में बच्चों ने पिता को बाहर सोफे पर सोये देखा|
तभी दीदी का फोन आया,’’मेरी ननद सूटकेस के साथ मेरे घर आ गई हैं रमोला, शायद हमेशा के लिए| पर तू तो खुश है न’’
रमोला फोन रखते हुए सोच रही थी, कौन का अपराध ज्यादा बड़ा है...चुप रहने का या बोल देने का|
-ऋता शेखर ‘मधु’

सेलिब्रीटीज द्वारा मी टू कैंपेन के तहत किए जा रहे खुलासों के आधार पर रचित कथा

शनिवार, 7 अप्रैल 2018

संवैधानिक अधिकार-सदुपयोग या दुरुपयोग

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संवैधानिक अधिकार-सदुपयोग या दुरुपयोग

अधिकार, एक ऐसा शब्द जो सुख, सुविधा और सहुलियत के दरवाजे खोलता है| कहते हैं जब मनुष्य अपना कर्तव्य करता है तो अधिकार खुद ब खुद मिल जाते हैं| समाज में रहने के लिए कर्तव्य और अधिकार, दोनों आवश्यक हैं|

अब सवाल यह उठता है कि कानूनी रूप से अधिकार लेने की नौबत कब आती है| तभी न जब सामने वाला उसे वह सहुलियत देने में अनदेखी करे या आनाकानी करे| कई मामलों में अधिकार को कानूनी रूप देना आवश्यक हो जाता है|
किन्तु जब किसी को मिला हुआ अधिकार उसे अहंकारी बना दे, निरंकुश बना दे तो कानून पर पुनर्विचार की आवश्यकता आ जाती है|

*हम यहाँ पर शुरु करते हैं उस अधिकार की बात से जब वैवाहिक विच्छेद को कानूनन स्वीकृत किया गया| 1955 में हिन्दु मैरिज एक्ट के तहत हिन्दु रीति रिवाज से हुए विवाह को मान्यता प्राप्त थी| बाद में उसे कानून के हाथों में सौंपा गया जब किसी परिस्थिति में पति-पत्नी का साथ रहना सम्भव नहीं हो पाए तो विवाह विच्छेद ही एकमात्र विकल्प बचता है| यह परिस्थिति में पत्नी को क्या क्या सुविधाएँ मिलनी चाहिए, इसपर कई संशोधन हुए| धीरे धीरे यह कानून जहाँ एक ओर स्त्रियों को सहुलियत देने लगा वहीं कुछ इसका दुरुपयोग भी करने लगे| झूठे आरोप गढ़े जाने लगे| घरों को टूटने की संख्या बढ़ने लगी| संपत्ति के लिए या बदला लेने के लिए इन अधिकारों का दुरुपयोग किया जाने लगा|

*दहेज प्रतिबंध अधिनियम 1961 में बनाया गया| इसका उद्देश्य नवविवाहिता को दहेज उत्पीड़न से बचाना था| धीरे धीरे इन अधिकारों का दुरुपयोग आरम्भ होने लगा| तब संशोधन की आवश्यकता पड़ी|27 जुलाई 2017 में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आया|अब दहेज उत्पीड़न मामले में केस दर्ज होते ही गिरफ्तारी नहीं की जाएगी।

कोर्ट ने नाराज पत्नियों द्वारा अपने पति के खिलाफ दहेज-रोकथाम कानून का दुरुपयोग किए जाने पर चिंता जाहिर करते हुए निर्देश दिए कि इस मामले में आरोप की पुष्टि हो जाने तक कोई गिरफ्तारी ना की जाए। कोर्ट ने माना कि कई पत्नियां आईपीसी की धारा 498ए का दुरुपयोग करते हुए पति के माता-पिता, नाबालिग बच्चों, भाई-बहन और दादा-दादी समेत रिश्तेदारों पर भी आपराधिक केस कर देती हैं। जस्टिस एके गोयल और यूयू ललित की बेंच ने कहा कि अब समय आ गया है जब बेगुनाहों के मनवाधिकार का हनन करने वाले इस तरह के मामलों की जांच की जाए।

कोर्ट द्वारा जारी की गई गाइडलाइंस के मुताबिक, हर जिले में एक परिवार कल्याण समिति गठित की जाएगी और सेक्शन 498A के तहत की गई शिकायत को पहले समिति के समक्ष भेजा जाएगा। यह समिति आरोपों की पुष्टि के संबंध में एक रिपोर्ट भेजेगी, जिसके बाद ही गिरफ्तारी की जा सकेगी। बेंच ने यह भी कहा कि आरोपों की पुष्टि से पहले NRI आरोपियों का पासपोर्ट भी जब्त नहीं किया जाए और ना ही रेड कॉर्नर नोटिस जारी हो।

*हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 में संशोधन से पहले, परिवार के केवल पुरुष सदस्य ही प्रतिपक्षी थे, लेकिन बाद में बेटियों को भी एक हिस्सा पाने का हकदार बना दिया गया। अब सोचने वाली बात यह है कि इस संशोधन की आवश्यकता ही क्यों पड़ी| इसलिए न कि यदि बेटी किसी विशेष परिस्थिति में माता पिता की संपत्ति का कुछ हिस्सा चाहे तो भाई इसके लिए कदापि तैयार न होंगे| साधारणतंः विवाहित खुशहाल बेटियाँ संपत्ति पर अपन दावा नहीं ठोकतीं किंतु बेटी का किसी कारणवश पति से संबंध विच्छेद हो जाए तो वह कहाँ जाए| या फिर कोई बेटी अविवाहित रह जाए तो उसे भी माता पिता के घर में रहने का उतना ही अधिकार है जितना बेटे को| किसी भी घर की बिक्री के लिए बेटियों की सहमति भी आवश्यक है| इससे बेटों की मनमानी पर रोक लगी|

*एक एनजीओ कॉमन कॉज ने 2005 मेंसुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा था कि संविधान के आर्टिकल 21 के तहत जिस तरह नागरिकों को जीने का अधिकार दिया गया है, उसी तरह उन्हें मरने का भी अधिकार है। इस पर केंद्र सरकार ने कहा कि इच्छा मृत्यु की वसीयत (लिविंग विल) लिखने की अनुमति नहीं दी जा सकती, लेकिन मेडिकल बोर्ड के निर्देश पर मरणासन्न का सपॉर्ट सिस्टम हटाया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने 8 मार्च 2018 को ऐतिहासिक फैसले में मरणासन्न व्यक्ति द्वारा इच्छा मृत्यु के लिए लिखी गई वसीयत (लिविंग विल) को गाइडलाइन्स के साथ कानूनी मान्यता दे दी है। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि मरणासन्न व्यक्ति को यह अधिकार होगा कि कब वह आखिरी सांस ले। कोर्ट ने कहा कि लोगों को सम्मान से मरने का पूरा हक है। लिविंग विल' एक लिखित दस्तावेज होता है जिसमें कोई मरीज पहले से यह निर्देश देता है कि मरणासन्न स्थिति में पहुंचने या रजामंदी नहीं दे पाने की स्थिति में पहुंचने पर उसे किस तरह का इलाज दिया जाए। 'पैसिव यूथेनेशिया' (इच्छा मृत्यु) वह स्थिति है जब किसी मरणासन्न व्यक्ति की मौत की तरफ बढ़ाने की मंशा से उसे इलाज देना बंद कर दिया जाता है।

अब देखना यह है कि इस फेसले का  सदुपयोग ही हो|

*अब बात करते हैं अनुसूचित जाति/जनजाति के आरक्षण की| भारत के संविधान निर्माता बाबा साहब भीमराव रामजी आंबेडकर ने स्वतंत्र भारत में अनुसूचित जाति/जनजाति के उत्थान के लिए सभी सरकारी लाभ के लिए उनका प्रतिशत निश्चित किया था| यह सर्वप्रथम दस वर्षों के लिए लागू की गई| बाद में इसकी अवधि बढ़ाकर चालीस वर्ष की गई| आरक्षण तो मिला पर दलित समाज को उनकी जाति का नाम लेकर व्यंग्य और कटाक्ष करने वाले भी कम न थे| इसे मद्देनजर रखते हुए अगस्त 1989 में नियम बनाया गया कि कोई सवर्ण जाति यदि ऐसे शब्द इस्तेमाल करते हैं जिनसे उनकी भावनाएँ आहत होती हैं और उनकी शिकायत थाने में दर्ज की जाती है तो तुरंत उस तथाकथित व्यक्ति को गिरफ्तार करना होगा| उस दलित को मुआवजा भी दिया जाएगा|

कानून दलित समाज के भले के लिए था किन्तु धीरे धीरे यह धमकी का रूप लेने लगा| इसी कानून का हवाला देकर झूठे आरोप भी लगाए जाने लगे| जितने केस दर्ज़ हुए उनमें करीब सत्तर प्रतिशत केस झूठे साबित होने लगे| नौबत यहाँ तक पहुँच गई कि सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश को अनुसूचित जाति के उनके जुनियर जजों ने फँसा दिया| इन सबके मद्देनजर कानून में सुधार की आवश्यकता पड़ी| मार्च 2018 में इस नियम में बदलाव किया गया है और शिकायत पर तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगाई गई है||
-ऋता शेखर 'मधु'

गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

ग्रीष्म गुलमोहर हुई

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ग्रीष्म
ग्रीष्म गुलमोहर हुई है
मोगरे खिलने लगे
नभ अमलतासी हुआ जब
भाव गहराने लगे|

अब नवल हैं आम्रपल्लव
बौर भी अमिया बना
वीरता भी है पलाशी
शस्त्र दीवाने लगे|

तारबूजे ने दिखाया
रंग अब अपना यहाँ
दोपहर में जेठ की
स्वेदकण बहने लगे|

नीम भी करने लगे हैं
ताप से अठखेलियाँ
जी गईं उनकी शिराएँ
पात हरसाने लगे|

शौक से चढ़ने लगी हैं
मृत्तिकाएँ चाक पर
नीर घट के साथ रहकर
सौंधपन लाने लगे|

भोर की ठंडी हवाओं
ने दिया संदेश है
झूम लो क्षण भर यहा़ँ
हम फिर कहाँ अपने लगे|

-ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 1 अप्रैल 2018

धुंध

4
धुंध
नींद खुली
नव रश्मियाँ
भोर का सौंदर्य
कलरव
प्रकृति का माधुर्य
खिड़कियाँ
आज भी खोलीं
बाहर झांकते हुए
स्पष्ट नहीं था कुछ
धुंध छायी थी।
उज्ज्वल रास्तों के लिए
करना होगा वक्त का इंतेज़ार
धूप गहराएगी
तभी दिखेंगे
दूब और फूल
कि सब कुछ
हमारे वश में नहीं होता
करना ही होता है
समय का इंतेज़ार
मन में छाए धुंध को
छंट जाने का।
-ऋता
5
समानता
*
समान चेहरा फिर भी अलग
समान दिनचर्या होते अलग
समान समस्याएं निदान अलग
समान सोच अभिव्यक्ति अलग
समान जीवन क्रम उम्र अलग
सूर्य वही दिवस विस्तार अलग
चाँद वही रूप अलग

समानता में अलगाव
फिर क्यों हम चाहते
सामने वाले का निदान
वही हो
जैसा हमने किया
वह वैसे ही जीये
जैसे हमने जीया
समझो कभी उनके मन को
जिंदगी और मौत समान
जीने की कला अलग अलग
मरने के रास्ते अलग अलग।
-ऋता

शुक्रवार, 30 मार्च 2018

कोमल पत्ते

2
जिजीविषा
मन की धरती
जब होने लगे पठार
संवेदनाएँ तोड़ने लगें दम
उत्साह डूबने लगे
निराशा के समंदर में
आसपास के सूखे पत्ते
मन में शोर करने लगें
मधुर वाणी भी
कानों को बेधने लगें
तब जाना उस पठार पर
जहाँ दरारों से झाँकती है
दो नन्हीं कोमल पत्तियाँ
तब लगता है
कहीं तो दबी है जड़
उसके अहसासों की
नमी को सहेजे हुए।
-ऋता
3
मौज
उम्मीदों की खूँटी पर
ना उम्मीदों के वस्त्र टांगकर
मौज करना चाहती हूँ
मैं हर सोच से परे जाना चाहती हूँ।
रुई के फाहों जैसे उड़ते
नादान स्वप्न की तितली
धूप में खड़े गुलमोहर पर
बैठती फिर उड़ जाती
एक मुट्ठी छाँव की तलाश में
आकाश को
बादलों से ढक देना चाहती हूँ।
हाँ, मैं मौज से जीना चाहती हूँ।
कलकल नदियाँ
शोर नहीं करतीं
बहती जाती निश्चित रिदम में
मन मे बहती नदियों को
बांध कर रिदम देना चाहती हूँ।
बस, मौज से जीना चाहती हूँ।
जिंदगी नाम है
संघर्ष त्याग और प्रेम का
यह पाठ लिखा किसने
किसके लिए लिखा
अब बदल देती हूँ परिभाषा
तुम सब कुछ रख लो
अपनी मौज मुझे दे दो।
सही समझे
मैं भी मौज से जीना चाहती हूँ।
मौसम के अपने जलवे
अपने राग होते हैं
जो इन्हें हू ब हू जी ले
बड़े भाग्य होते हैं
मैं हवा बन जाना चाहती हूँ
फूलों से खुशबू लेकर
कायनात में बिखरना चाहती हूँ।
हाँजी हाँ,
मैँ मौज से जीना चाहती हूँ।
-ऋता

बुधवार, 28 मार्च 2018

हैप्पी जर्नी

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हैप्पी जर्नी
--------------
जब भी कोई जाता है
सुदूर यात्रा पर
गाड़ी रेलगाड़ी
या हवाई जहाज से
दही खिलाकर बोलते
हैप्पी जर्नी

यह एक दुआ है
जो कवच बनने की
रखती है ताकत
एक विश्वास है
हादसों से परे
सुरक्षा का
यह संदेश है
उस परमपिता को
कि वापस भेजना होगा
परिजनों को सहेजना होगा।

जब उतर जाती है
पटरी से रेल
या लैंडिंग में
बिगड़ जाता है संतुलन
तब महसूस होता है
ईश्वर के अस्तित्व का
कुछ को मिलता जीवनदान
कुछ निकल जाते
अंतिम सफर को
और
हम कह नहीं पाते
हैप्पी जर्नी|

जिन्हें मिल जाता
जीवनदान
उनकी आस्था
पक्की हो जाती
तकदीर पर।

आखिर आदमी के पास
यदि कोई है चमत्कार
तो वह है शुभकामनाओं का।
दिल से मिले
दिल से हो स्वीकार
परमात्मा सोचेंगे
हर हादसे के पहले
सौ बार
सौ सौ बार !
-ऋता

मंगलवार, 27 मार्च 2018

गाँव की पगडंडी

गाँव की पगडंडी
खड़ी बोली/देशज बोली
हिंदी/मागधी
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बिहान* होते ही
खुश हो जाती
मेरे गाँव की पगडंडी

बैलों की जोड़ी देखकर
खेत की मोड़ी देखकर
हरियर दुब्बी* से खेलकर
खुश हो जाती
मेरे गाँव की पगडंडी

ननका ननकी* खेले डेंगा पानी*
घुप्पी* में पिलाएँ* गोली*
पिट्टो* खेल में ढेर* दौड़ाते
सुनकर प्यारी मगही* बोली
खुश हो जाती
मेरे गांव की पगडंडी

किसानों की मेहरारू* लातीं
अँचरा* में सत्तू और रोटी
उठती सोंधी सोंधी खुशबू
पायल की रुनझुन रुनझुन से
खुश हो जाती
मेरे गांव की पगडंडी

दलान* में दादी सुड़कती*
लोटा भरकर चाय
दादा जी खंखार* के रखते
घर के भीतर पाँव
लजाती नई बहुरिया*
खुश हो जाती
मेरे गांव की पगडंडी

पीपर* के फेरे लगते
अमा सोम जब होता
बड़* के पेड़ होते निहाल
बरसाइत* पूजा में
बेटी नथिया* पहनी गोर* रंगी
खुश हो जाती
मेरे गाँव की पगडंडी

इन्जोर*होते ही तुलसी पूजा
रोज साँझ को दिया बाती
गोबर से नीपल* अँगना
खन खन बाजे माइ के कंगना
देख पवित्तर* घर को
खुश हो जाती
मेरे गाँव की पगडंडी

रात में लड़कन* गिनें तरेंगन*
रट्टा मारें गिनती पहाड़े*
जीमें* थरिया *में
बेर बेर* मइया को पुकारे
घर की रौनक से
खुश हो जाती
मेरे गांव की पगडंडी
-ऋता


अर्थ-------
बिहान-सुबह
हरियर दुब्बी-हरी दूब
ननका ननकी-बेटा बेटी
डेंगा पानी-ेएक खेल का नाम
घुप्पी*(छेद) में पिलाएँ*(डालें गोली*(कंचे)
पिट्टो-सतोलिया
ढेर-बहुत
मेहरारू-औरत
अँचरा-आँचल
दलान-बैठका
सुड़कती-चुस्की लेकर पीना
खँखार-खाँसकर
बहुरिया-बहु
पीपर-पीपल
बड़-बरगद
बरसाइत पूजा-वट सावित्री पूजा
नथिया-नथ
गोर-पैर
इंजोर-उजाला
नीपल-लीपा हुआ
पवित्तर-पवित्र
लड़कन-बच्चे
तरेंगन-तारा
पहाड़े-टेबल अंग्रेजी में
जीमें-खायें
थरिया-थाली
बेर बेर-बार बार

गुरुवार, 15 मार्च 2018

करना अगर है कुछ तुझे तो इन्क़िलाब कर

करना अगर है कुछ तुझे तो इन्क़िलाब कर
छोड़े जो छाप, उम्र को ऐसी किताब कर

कीमत बहुत है वक़्त की जेहन में तू बिठा
बेकार बात में न समय को ख़राब कर

ये ज़िंदगी तेरी है तेरी ही रहे सदा
शिद्दत से तू निग़ाह को अपनी रुआब कर

शब भर रहेगा चाँद सितारे भी जाएँगे
लम्हे बिताए जो यहाँ उनका हिसाब कर

मुस्कान से सजा रहे मुखड़ा तेरा सदा
कुछ देर के लिए तू ग़मों से हिजाब कर

-ऋता शेखर 'मधु'

सोमवार, 12 मार्च 2018

नाज करो कि तुम नारी हो

नाज करो कि तुम नारी हो
नाज करो कि सब पर भारी हो
नाज करो कि तुमसे संसार है
नाज करो कि धुरी के साथ हाशिया भी हो
इतनी संपूर्णता किसे मिलती है


तुम बया हो जो खूबसूरत नीड़ बुनती है
गर आंधियों में बिखर भी गए
तो सम्बल और धैर्य चुनती हो
दुआ तुम्हारी प्रभु भी स्वीकारते
इतनी संपूर्णता किसे मिलती है

तलवों के नीचे की जमीन
शुष्क रूखी कठोर हो
या फिर मखमली शीतल दूब हो
नमी के साथ उर्वर रखती अहसास
इतनी संपूर्णता किसे मिलती है

पहाड़ जैसी अडिग हो
गलत को गलत कहने के लिए
नदी जैसी निर्मल हो
निश्छलता से बहने के लिए
इतनी संपूर्णता किसे मिलती है

एक कर में नवजीवन रखती
दूजा कर सेवा को समर्पित
तीजे कर में ई गैजेट्स संभालती
चौथा कर कलम को अर्पित
इतनी संपूर्णता किसे मिलती है

मधुर स्वरों की मालकिन तुम
हर क्षेत्र तुम्हीं से सज्जित है
आखिर क्यों फिर आधी दुनिया
तुम्हारे जन्म से लज्जित है
इतनी अपूर्णता भी किसे मिलती है

नाज करो कि नारी हो
-ऋता

शनिवार, 10 मार्च 2018

नारी

महिला दिवस विशेष रचना-दोहे
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नारी से ही रीत है, नारी से है प्रीत।
नारी से है सर्जना, नारी सुन्दर गीत।।


एक वृत्त के केंद्र में, नारी का संसार।
प्रेम त्याग के भाव से , देती है आकार।।

रिश्तों को सम्भालती, बन माला की डोर।
नारी से है अर्चना , तुलसी भावविभोर ।।

बस थोड़े सम्मान से, बन जाती है फूल।
कोमल मन की भावना, सह लेती हर शूल।।

मातृ रूप में है दुआ, बहन रूप में प्रीत।
पुत्री रूप अहसास का, पत्नी रूप है मीत।।

नर विस्तारित कीजिये, अपने मन का कूप।
वर्णित है हर वेद में, सरस्वती का स्वरूप।।

नदी पहाड़ धरा गगन, सभी जगह है राज।
खुल कर के अपनाइए , नारी की परवाज़।।

-ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 6 मार्च 2018

वक्त का बदलाव

वक्त का बदलाव
"जहाँ देखो सिर्फ बेटियों के लिए ही स्लोगन बन रहे।
मेरी बेटी मेरा अभिमान।
बेटी पढ़ाओ बेटी बढाओ।
बेटियों से संसार है....हुंह"
ननद रानी की बातें सुनकर सुहासिनी मुस्कुरा रही थी।
"तो इसमें दिक्कत क्या है जीजी। बेटियों को तो बढ़ावा मिलना ही चाहिए।"
"पर इस तरह के नारे बनाने की क्या जरूरत है। क्या बेटे वाले अपने बेटों पर अभिमान नहीं करते।" अब सुहासिनी दो बेटों वाली नन्दरानी का दर्द समझ रही थी।
"और बेटा या बेटी पैदा करना अपने हाथ में है क्या" जीजी अब भी बोले जा रही थीं।
"यही बात सदियों से कही जा रही। पर कहने वाले बदल गए। है न जीजी" सुहासिनी को वो दिन याद आ गया जब दूसरी बिटिया के जन्म पर बुरा सा मुँह बनाकर जीजी ने कहा था,"फिर से बेटी" ।
जीजी को भी शायद वही बात याद आयी थी इसलिए नजरें बचते हुए वहाँ से दूसरे कमरे में चली गईं।
-ऋता शेखर "मधु"

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

शापित फल्गु-लघुकथा


शापित फल्गु

"माँ, यहाँ तो रेत ही रेत है, फिर इसे नदी क्यों कहते हैं।" रेत पर बैठी मैनेजमेंट पढ़ रही प्रज्ञा पूछ रही थी।

"बेटे, यहाँ गड्ढा करोगी तो पानी निकल आएगा। कहते हैं इस फल्गु नदी को सीता माता ने श्राप दिया था । नदी ने सीता माता के सच की गवाही न देकर गुप्त रखा इसलिए नदी का जल भी गुप्त हो गया।"

"अच्छा! पर कौन सा सच माँ ," प्रज्ञा ने विस्मय से देखते हुए पूछा।

" जब श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वनवास पर थे तभी राजा दशरथ की मृत्यु हो गयी थी। हिन्दू रिवाजों के अनुसार वे तीनों गयाधाम में राजा दशरथ की आत्मा की मोक्षप्राप्ति के लिए तर्पण करने गए। समय निकला जा रहा था किन्तु राम और लक्ष्मण सामान लेकर लौटे नहीं थे। तब दशरथ की आत्मा ने सीता से तर्पण की माँग की। सीता ने श्वसुर के लिए बालू का पिंड बनाकर दान दिया और नदी को गवाह बनाया। राम के आने पर सीता ने सारी बात बताई किन्तु राम को विश्वास नहीं हुआ। सीता ने नदी से सच बताने को कहा पर वह चुप रह गयी। तब दशरथ की आत्मा ने आकर सच बताया। राम को विश्वास हो गया। किन्तु नदी के व्यवहार पर सीता ने क्रोधित होकर श्राप दिया।"

"बहुओं के नसीब में हमेशा अविश्वास ही क्यों रहता है माँ ? भाभी दिनभर आपकी और पापा की कितनी सेवा करती हैं। फिर भी हर शाम उनको भैया के संशय भरे सवालों का जवाब देना पड़ता है। जब एक मृत आत्मा बहु के तर्पण को स्वीकार कर उसका साथ दे सकती है तो जीवित आत्माएं क्यों चुप रह रह जाती हैं माँ ? अब मैं भाभी की आत्मा को दुःखी नहीं होने दूँगी। मुझे सच की गवाही देनी होगी माँ। मैं फल्गु नहीं बनूँगी।"

-ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ !!



करती समर्पित काव्य उनको, देश हित में जो डटे|
वे वेदना सहते विरह की, संगिनी से हैं कटे ||


दिल में बसा के प्रेम तेरा, हर घड़ी वह राह तके|
लाली अरुण या अस्त की हो, नैन उसके नहिं थके||

जब देश की सीमा पुकारे, दूर हो सरहद कहीं|
इतना समझ लो प्यार उसका, राह का बाधक नहीं||

तुम हो बहादुर, ओ सिपाही, याद उसकी ले चलो|
संबल वही है जिंदगी का, साथ में फूलो फलो||

आशा, कवच बन कर रहेगी, बात यह बांधो गिरह|
तुम लौट आना एक दिन तब, भूल जाएगी विरह|

फिर मांग में भर के सितारे, वह सजी तेरे लिए|
अर्पण करेगी प्रीत अपना, आँख में भर के दिए||

ले लो दुआएँ इस जहाँ की, भूल जाओ पीर को|
आबाद हो संसार तेरा, अंक भर लो हीर को||

जब जब तिरंगा आसमाँ में, शान की गाथा लिखे|
हम सब नमन करते रहेंगे, वीर, तुम मन में दिखे ||
....................ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

आत्मबोध जागृत रहे, कर में हो संघर्ष--दोहे

जब छाए मन व्योम पर, पीर घटा घनघोर|
समझो लेखन बढ़ चला, इंद्रधनुष की ओर||

दिशा हवा की मोड़ते, हिम से भरे पहाड़।
हिम्मत की तलवार से, कटते बाधा बाड़।।

खुशी शोक की रागिनी, खूब दिखाते प्रीत।
जीवन के सुर ताल पर, गाये जा तू गीत।।

शब्द शब्द के मोल हैं, शब्द शब्द के बोल।
मधुरिम बात विचार से, शब्द हुए अनमोल||

नफऱत कभी न कीजिये, ना कीजे अभिमान।
घुन समान खोखल करे, मन के सारे ज्ञान।।

हरे भरे मन खेत पर, उगे ज्ञान का धान।
छल के खरपतवार से, कुंठित होता मान।।

जग के माया मोह में, आते खाली हाथ।
सखा बना लो पुण्य को, वही चलेंगे साथ।।

आत्मबोध जागृत रहे, कर में हो संघर्ष|
आत्मशक्ति लिखती रही, जीवन का उत्कर्ष||

भाई है इक छोर पर, बहना दूजी ओर|
ये मीलों की दूरियाँ, पाटें रेशम डोर||

लिखने को तो सब लिखें, रचते हैं कुछ चंद।
छोड़े गहरी छाप जो, वही है प्रेमचंद।।

ज्ञानी ध्यानी नम्र हो, फिर भी करना शोध।
छीने आधी बुद्धि को, तेरा अपना क्रोध ।।

बात बात पर दे रहे, फूलों की सौगंध।
बगिया मुरझाने लगी, खोकर अपनी गंध।

बहु रंगों को धारता, कृष्ण मयूरी पंख।
श्याम दरस की आस से , विकल बजावे शंख।।

अफ़रातफ़री से कहाँ,होते अच्छे काम।
सही समय पर ही लगे,मीठे मीठे आम||
--ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 14 जनवरी 2018

बिसात जीवन की














देखो बंधु बाँधवों,
जिंदगी ने बिछायी है
बिसात शतरंज की
बिखरायी है उसने
मोहरें भाव-पुंज की
श्वेत-श्याम खानों के संग
दिख जाते सुख-दुःख के रंग
प्यादे बनते सोच हमारी
सीधी राह पर चलते हुए
सरल मना को किश्ती प्यारी
तीव्र चतुर दलबदलू ही
करते हैं घोड़ों की सवारी
व्यंग्य वाण में माहिर की
तिरछी चाल विशप कटारी
समयानुकूल वजीर बने जो
चाणक्य नीति के वो पिटारी
सबकी चालें सहता हुआ
बादशाह है हृदय बेचारा
नाप रहा उल्फ़त से पग
कैसे  विजय मिले दोबारा
विषयासक्त अनुरागी को
यह टकराव बना रहेगा
कुछ भी कर लो जेहनवालों
अज्ञानी से ठना रहेगा
पूर्वाग्रह के पिंजरे में बैठे
अजनबी  क्षितिज पर दिखते
हल्की सी भी ठेस लगे तो
यातना के नज़्म लिखते
ऐ जिंदगी,
छलिया बन तूने
हम सबको है नाच नचाया
बाँध के धागे भाव पगे
तूने सबसे रास रचाया
पर समझ लेना यह बात
मात हमें न दे पाएगी
मनु के अंतर्मन की शक्ति
तेरा हर घात सह जाएगी|
चालें चाहे हों जितनी शतरंजी
बस एक निवेदन करती हूँ
उनकी खुशियाँ खोने न देना
जिन रिश्तों पर मरती हूँ|
-ऋता शेखर ‘मधु’

शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

स्वप्नलोक


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स्वप्नलोक....


बचपन का वह स्वप्नलोक अब विस्मृत होता जाता है
जलपरियाँ जादुई समंदर सन्नाटे में खोता जाता है

सीप वहाँ थे रंग बिरंगे मीन का नटखट खेल था
सजा सजीला राज भवन जहाँ तिलस्म का मेल था

सजा सजीला एक कुँवर बेमिसाल इक राजकुमारी
प्रीत कँवल खिलते चुपके से छाती दोनो पर खुमारी

हस्तक दे दे हँसते थे वो इक दूजे की करें प्रतिष्ठा
प्रेम भरी आँखों में, दिखती रहती सच्ची निष्ठा

दूर कहीं से देखा करता सींगों वाला दैत्य भयानक
अशांति का दूत बड़ा वह बन जाता था खलनायक

एक दिवस ऐसा भी आया विपत्ति बन वह मँडराया
शहजादा बनकर आया और परी कुमारी को भरमाया

पल भर बीते तभी वहाँ पर राजकुमार की आई सवारी
विस्मित रह गई भोली परियाँ, थी अवाक वह राजकुमारी
*
ओह, जुदा होकर कैसे जीएँगे, नींद में वह धीरे से बोली
कौन जुदा होता है मुनिया, पूछी रही सखियों की टोली

झट उठ बैठी बिस्तर पर, अपनी बोझिल पलकें खोली
रब ऐसे सपने न देना जिसमें कोई, किसी की तोड़े डोली

इस प्रलाप से जन्म ले रही थी, कहीं पर एक कहानी
जब पुरातन वह हो जाएगी, इसे कहेगी बनकर नानी

ऋता शेखर ‘मधु’

बुधवार, 10 जनवरी 2018

संक्रांति की सौगात

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संक्रांति की सौगात
मकर संक्रांति के दिन सुषमा ने नहा धोकर तिलवा और गुड़ चढ़ाकर विष्णु पूजन किया| सास, ससुर, देवर, ननद पति,जेठ, जेठानी सबको प्रसाद दे आई| यह सब करते हुए वह अनमयस्क सी लग रही थी| सास की अनुभवी आँखों ने समझ लिया था उसकी उदासी का कारण| कल जबसे बड़ी बहु के मैके से मकर संक्राति की सौगात आई थी तब से सुषमा के चेहरे पर एक उदासी तिर गई थी| अभी चार महीने पहले ही उसकी माँ का स्वर्गवास हुआ था| पहले सुषमा के घर से भी मकर संक्रांति के उपहार आते थे| उसके शादीशुदा भाई को बहनों से कोई खास लगाव नहीं था इसलिए किसी सौगात की उम्मीद भी न थी|

‘सुषमा, खाना के बाद हमलोग छत पर पतंग उड़ाने जाएँगे| तुम भी तैयार हो जाना उस समय, पतंग खूब ऊँचे तक उड़ा लेती हो तुम’, सास की आवाज़ आई|

‘मगर माँजी, मेरी तबियत ठीक नहीं लग रही| शायद तैयार न हो पाऊँ’, सुषमा ने धीमे से कहा|

‘मन ठीक हो जाए तो आ जाना,’ कहकर सासू माँ अपने कमरे में चली गईं और जाते जाते सुषमा के पति को भी आने को कहा|

दोपहर कीं नींद सुषमा की आँखों को बोझिल बना रही थी| तभी डोरबेल बजी| कुछ पल सुषमा ने इन्तेज़ार किया कि कोई खोलेगा किन्तु शायद सब सो गए थे| सुषमा ने दरवाजा खोला| दरवाजे पर कोई पार्सल लेकर आया था| सुषमा ने देखा कि पैकेट पर उसका ही नाम था| उसे आश्चर्य हुआ तो जल्दी से उसने भेजने वाले का नाम देखा|

‘महेश वर्मा’ खुशी से लगभग चीख पड़ी सुषमा| पार्सल रिसीव किया और पैकेट खोलने लगी| तब तक सास और पति वहाँ आ गए थे|

‘ये क्या है, किसने भेजा’ लगभग एक साथ सास और पति पूछ बैठे|

‘भइया ने संक्रांति गिफ़्ट भेजा है’ चहकती हुई वह बोली,मैं पतंग उड़ाने छत पर अवश्य जाऊँगी|’’

सास और पति एक दूसरे की ओर देखकर मुस्कुरा दिए|


आधे घंटे बाद सब लोग तैयार हो चुके थे| तभी फिर से डोरबेल बजी|

“कौन होगा”, ये सोचती हुई सुषमा देवाजे पर गई| दरवाजा खोलते ही उसकी आँखें विस्फरित रह गईं|

‘भइया-भाभी, आप दोनो” अविश्वास से उसने कहा|

“और नहीं तो क्या, संक्रांति की सौगात ननद रानी को देना था न” कहते हुए भाभी ने सुषमा के हाथों में पैकेट पकड़ाया|

‘तो अभी जो पार्सल आया वो किसने भेजा’ सोचती हुई सुषमा भाई भाभी के साथ कमरे की ओर बढ़ी|

वहाँ सास और पति अर्थपूर्ण ढ़ग से मुस्कुरा रहे थे|

‘अच्छा, तो ये माँ-बेटे की मिलीभगत थी ’ सोचती हुई वह भी मुस्कुरा दी|

--ऋता शेखर ‘मधु’

बुधवार, 3 जनवरी 2018

नए साल पर....


यह नवगीत प्रतिष्ठित ई-पत्रिका "अनुभूति" के नववर्ष विशेषांक पर प्रकाशित है...यहाँ क्लिक करें |

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नए साल पर....
फिर से रमिया चलो गाँव में

लेकर अपनी टोली
छोड़ चलो अब महानगर की
चिकनी चुपड़ी बोली

नए साल पर हम लीपेंगे
चौखट गोबर वाली
अँगना में खटिया के ऊपर
छाँव तरेंगन वाली
श्रीचरणों की छाप लगाकर
काढ़ेंगे रंगोली

फिर से रमिया चलो गाँव में
लेकर अपनी टोली
बरगद की दाढ़ी पर चढ़कर
फिर झूला झूलेंगे
पनघट पर जब घट भर लेंगे
हर झगड़ा भूलेंगे
बीच दोपहर में खेलेंगे
गिल्ली डंडा गोली

फिर से रमिया चलो गाँव में
लेकर अपनी टोली

दिन भर मोबाइल को लेकर
कोई नहीं हिलता है
हर सुविधा के बीच कहें सब
समय नहीं मिलता हैं
धींगामस्ती को जी चाहे
सखियों संग ठिठोली

फिर से रमिया चलो गाँव में
लेकर अपनी टोली

अब गाँव में सभी वर्जना
हम मिलकर तोड़ेंगे
शिक्षा की नव ज्योत जलाकर
हर नारी को जोड़ेंगे
सुता जन्म पर हम डालेंगे
सबके माथे रोली

फिर से रमिया चलो गाँव में
लेकर अपनी टोली
_ऋता शेखर ‘मधु’