शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

हिन्दी दिवस पर समर्पित कुछ हाइकु-पुष्प...



हिन्दी दिवस पर समर्पित कुछ हाइकु-पुष्प...

१.

हिंद-संविधा

चौदह सितम्बर

हिन्दी दिवस|

२.

संविधा धारा

तीन सौ तेतालिस

वर्णित हिन्दी|

३.

राष्ट्र की भाषा

लिपि देवनागरी

बोलें तो हिन्दी|

४.

गरिमामयी

लेखन में सरल

सौम्य है हिन्दी|

५.

हिन्दी दीपक

रौशन हिन्दुस्तान

फैला उजास|

६.

सुख का मूल

भारतेन्दु को प्रिय

अपनी हिन्दी|

७.

माँ सी है प्यारी

मातृभाषा हमारी

जग में न्यारी|

८.

स्वदेशी हिन्दी

राष्ट्र का हो विकास

हिन्दी ही लिखें|

९.

रिश्ता प्रगाढ़

हिन्दी में जब बोलें 

सारे ही प्रान्त|

१०.

तुलसीदास

हिन्दी में रामायण

सब को मान्य|

११.

अ से अनार

इ से होती इमली

पढ़े विमली|

१२.

अपनी बोली

हिन्दी होती है खास

दिल के पास|

१३.

कर्ण को प्रिय

मिठास भरी हिन्दी

सहज ग्राह्‌य|

१४.

सुनो संतन

है मधुर गुंजन

हिन्दी भजन|

............ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 8 सितंबर 2013

शिक्षित बन नवगीत रच दो











यूँ फ़लक को चूमने की
और हवा में घूमने की
आरजू है नव उमंग की
कोशिशें हैं नव तरंग की
आगाज तुम नव उदय का
साज तुम मधुर हृदय का
ले चलो ये कश्तियाँ तुम
बनोगे इक दिन हस्तियाँ तुम
राष्ट्रगिरी को तुम उठा लो
बन कान्हा सबको बचा लो
नव सुरों में राग भर दो
शिक्षित बन नवगीत रच दो
तुम धरा के नव श्रृंगार हो
खिले बसंत के पुष्पहार हो
बाल मन है सदा ही निश्छल
चहक रहा है खग सा हर पल
भारत का नव निर्माण करो
जीने का पथ आसान करो
नव अंकुरों को मिले जो पोषण
भारत वतन बन जाएगा रौशन|

................ऋता

बुधवार, 28 अगस्त 2013

भाद्र कृष्णपक्ष अष्टमी, जनमे कृष्णकिशोर...
















'भगिनी का सुत काल है’, सुनकर सिहरा कंस।
शिशु वध करने के लिए, भाई बना नृशंस।।

गर्भवती जकड़ी गई, हा! कैसा था पाप।
वसुदेव संग देवकी, झेल रही संताप।।

चमक रही थी दामिनी, गरजा था घन घोर।
रखवाले बेसुध हुए, नींद पड़ी अति जोर।।

कारा में गूँजा रुदन, खुली लौह जंजीर।
पुत्र आठवाँ देखकर, माता हुई अधीर।।

भाद्र कृष्णपक्ष अष्टमी, जनमे कृष्णकिशोर।
मनहर श्यामल वर्ण में, मुसकाएँ चितचोर।।

मामा से कैसे बचे, शिशु अपना नवजात।
चिंता में वसुदेव की, बीत रही थी रात।।

घटाघुप्प अंधकार में, बारिश का था जोर।
माथ टोकरी धर चले, वृंदावन की ओर।।

हाथ दिखे नहिं हाथ को, छुपी तरेंगन छाँव।
यमुना भी उपला गई, छूने प्रभु का पाँव।।

वृंदावन के गाँव में, इक थे बाबा नंद।
जनमी थी उनकी सुता, पसरा था आनंद।।

कान्हा को ले गोद वसु, गए मित्र के द्वार।
बतलाई सारी कथा, साथ किया मनुहार।।

बिटिया अपनी दो हमें, बोले कर अनुरोध।
सुत के बदले में सुता, शांत करेगा क्रोध।।

शिशु रोया जब भोर में, विहँस पड़ा नृप कंस।
मुट्ठी बाँध उठा लिया, किया अनर्थ विध्वंस।।

सुता उड़ी आकाश में, बोली कर अट्टहास।
भगिनी सुत कहिं और है, तुझे नहीं आभास।।'

होनी तो होकर रही, कोई सका न रोक।
कान्हा बन प्रभु आ गए, बिखर गया आलोक।।

-ऋता शेखर 'मधु'

जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ............


यह रचना अनुभूति पर प्रकाशित है...

http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/nandlal/2013/ritashekhar_madhu.htm

रविवार, 25 अगस्त 2013

राधे को कान्हा तूने काहे सताया...



जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ...प्रस्तुत है लोकगीत विधा पर आधारित मुरली मनोहर से शिकायत करता एक गीत...

काहे सताया बोलो काहे सताया राधे को कान्हा तूने काहे सताया
मार कंकरी उसकी फोड़ी गगरिया पनघट की डगर पर उसको रुलाया काहे रुलाया बोलो काहे रुलाया राधे को कान्हा तूने काहे सताया
वृषभानु की छोरी लाज से भरी थी बेर बेर बंसी की धुन से बुलाया काहे बुलाया बोलो काहे बुलाया राधे को कान्हा तूने काहे सताया
प्रीत में तेरी वही तो बंधी थी उसे छोड़ सखियों संग रास रचाया काहे रचाया बोलो काहे रचाया राधे को कान्हा तूने काहे सताया
होरी के रंग में डूब गई बाला उल्टे ही तूने मुँह को फुलाया काहे फुलाया बोलो काहे फुलाया राधे को कान्हा तूने काहे सताया
दौड़ पड़े झट से मथुरा की पुकार पर वृंदावन की गलियों को दिल से भुलाया काहे भुलाया बोलो काहे भुलाया राधे को कान्हा तूने काहे सताया
तेरे ही नाम की माला जपी वह तो उद्धव के बदले तुम ही समझाते काहे नहीं आए बोलो काहे नहीं आए राधे को कान्हा तुम काहे सताये
मथुरा के नृप बन गद्दी पर बैठे छलिया बड़े, रुक्मिणी को ब्याह लाए लड़कपन में भोली को काहे लुभाया राधे को कान्हा तूने काहे बिसराया
काहे बिसराया बोलो काहे बिसराया राधे को कान्हा तूने काहे सताया .....................ऋता शेखर ‘मधु’

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

मोती मोती नेह भरा है...


न स्वार्थ का है लेप
न इच्छाओं का अवलंबन
है चट्टान सा मजबूत
भाई-बहन का बंधन

मोती मोती नेह भरा है 
डोरी डोरी मंत्र
बहन की रेशम राखी में
पिरोया आशीष अनंत

सर्वरोगोपशमनं सर्वाशुभविनाशनम्|
सकृतकृतेनाब्दमेकं येन रक्षाकृतो भवेत्||

रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ!!!!!!!!
................ऋता

बुधवार, 14 अगस्त 2013

ओ सरहद पर रहने वालो...

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ




हिंद देश के रखवालो तुम

किस खास तत्व से बनते हो 
ओ सरहद पर रहने वालो

सिकुड़े शीत आए तूफ़ान
या धरा बने जब गर्म तवा
डट कर रहते हर मौसम में
हिंद देश के रखवालो तुम

किस खास तत्व से बनते हो 
ओ सरहद पर रहने वालो

माँ का आँचल पितृ का साया
याद हमेशा आता होगा
राखी में भी तड़पे होगे
हिंद देश के रखवालो तुम

किस खास तत्व से बनते हो 
ओ सरहद पर रहने वालो

बिटिया की बोली सुनने को
आँखें नम भी होती होंगी
परिणीता का व्याकुल मुखड़ा
तुमको खूब रुलाता होगा
हिंद देश के रखवालो तुम

किस खास तत्व से बनते हो 
ओ सरहद पर रहने वालो

गगन में फहरा के तिरंगा 
दिव्य पुरुष बन जाते हो तुम
केसरिया में लगे सजीले
हिंद देश के रखवालो तुम

किस खास तत्व से बनते हो 
ओ सरहद पर रहने वालो

कभी न डरना ओ मतवालो
दुआ हमारी साथ तुम्हारे
विजय पताका लेकर आना
हिंद देश के रखवालो तुम

तुम अमर तत्व से बनते हो 
ओ सरहद पर रहने वालो
...........ऋता

शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

जोशीला हर प्रान्त हिन्द का...(आल्हा छंद)



जोशीला हर प्रान्त हिन्द का...(आल्हा छंद)

हूँक भरो तुम वीर बंकुरो , भरो धनुष में तुम टंकार
मातृभूमि पर आँच न आए,करो दुश्मनों का संहार

भारत देश जान से प्यारा, भारतवासी की यह शान
जाग उठो अब वीर सपूतो, आजादी की रख लो आन

ऋषियों के यह तपोभूमि है, और वीरों की करमभूमि
गाँधी गौतम भगत संग हे, नमन तुझे ओ भारतभूमि

घर के भीतर जो विरोध हो, संकट में होते हम एक
मुट्ठी -सा बल बनी एकता, दिखती हैं अँगुलियाँ अनेक

पूरब हो या फिर पश्चिम हो, केरल हो या फिर कश्मीर
जोशीला हर प्रान्त हिन्द का, संस्कारों में खूब अमीर
.................ऋता

बुधवार, 10 जुलाई 2013

कुछ चतुष्पदी रचनाएँ...

ईश्वर के वरदान से मिले मनुज का रूप
बल विवेक अरु बुद्धि से सहते छाया- धूप
उर जब निश्छल हो सदा प्रभु आते हैं पास
कुछ तो इस संसार में कर जाएँ हम खा

हर मौन सिर्फ़ मौन नहीं होता
तूफ़ान के पहले की शांति तो नहीं
चीत्कार भरा हो अंतर्मन में जब
खामोशियों की यह भ्रांति तो नहीं.

दिखता जब नूर वह चेहरे का पानी है
झुकती हुई पलकों में लाज का पानी है
तीन चौथाइ धरा पर पानी का है राज
शुद्धता मिले नहीं वह आज का पानी है

जो बीत गई वो बात गई
क्या सच में ऐसा  होता है
गुजरे लम्हों की चादर पर
इतिहास पसरकर सोता है|

विगत की भूलों से सीखकर
जो स्वप्न के मोती बोता है
वह इंसां अपने जीवन में
खुद पर ही कभी न रोता है|

छमछम नाच रही हैं बूँदें
पावस छेड़े मधुर तराना
मिलन-विरह की यही कहानी
लगे सुहाना या वीराना |

..........ऋता

मंगलवार, 2 जुलाई 2013

मेरी माँ....



मेरी माँ...

अभी तो उसके ही तन का हिस्सा हूँ मैं
ख्वाबों में मुझसे मिल रही है मेरी माँ
पा न जाऊँ कहीं अमावस का अंधकार
जतन से रुपहली चादर सिल रही है मेरी माँ
जहाँ भी लूँ श्वास, सुवास ही मिले सदा
पिटारे में गुलाबौं को गिन रही है मेरी माँ
शीतल समीर संग हिंडोले पर झुला सके
मधुर सरस लोरियाँ गुन रही है मेरी माँ
पाँव तले रहे हरदम मखमली गलीचा
नर्म दूब पर शबनम चुन रही है मेरी माँ
फैली रहे उजास सूरज की हमारे पास
उषा के लाल धागे बुन रही है मेरी माँ
मन मंदिर में पावनता बनी रहे सदा
कपोतो से शांति मंत्र सुन रही है मेरी माँ
न मैंने कुछ कहा, न उसने कुछ कहा
बस हमारी धड़कनें सुन रही है मेरी माँ
मेरे आने की घड़ियाँ गिन रही है मेरी माँ!!!!
..................ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 21 जून 2013

बारिश का मौसम सुहाना है


बारिश का मौसम सुहाना है
पावस ने छेड़ा तराना है

काँधे सजते झूलते काँवर
भजनों में शिव-गुण को गाना है

सुंदर पत्ते बेल के लाओ
शिवशंकर जी पर चढ़ाना है

सावन में चुनरी हरी लहरी
हाथों में लाली रचाना है

बच्चे पन्ने फाड़ते झटपट
धारा में किश्ती चलाना है

चूड़ी धानी सी खरीदे वे
परिणीता को जो लुभाना है

पानी है तालों तडागों में
मेढक को हलचल मचाना है

मंथर मंथर चल रही गंगा
तट पे शायद कारखाना है

पनपीं बेलें जात मज़हब की
सद्भावों के बीज पाना है


..........ऋता

सोमवार, 17 जून 2013

18 जून सायं 8 बजे फ़ेसबुक पर हिन्दी हाइगा पुस्तक का लोकार्पण आ० रामेश्वर काम्बोज 'हिमा़शु' जी द्वारा-

माँ शारदे की अनुकम्पा से मेरी हाइगा की पुस्तक छप कर आ चुकी है जिसमें हिन्दी-हाइगा ब्लौग पर शामिल ३६ रचनाकारों के हाइगा सम्मिलित हैं| पुस्तक का लोकार्पण उत्कृष्ट हाइकुकार आ० रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' जी के कर कमलों द्वारा फ़ेसबुक पर किया जाएगा| दिन- १८ जून, समय-सायं ८ बजे.| अत: इस विशेष मौके पर नेट पर आपकी उपस्थिति प्रार्थनीय है...सादर आभार !!
याद रखें-18 June--8.00Pm 
लोकार्पण स्थल-




गुरुवार, 13 जून 2013

ऐ समंदर...


पूनो की रात आती जब
समंदर क्युँ मचल जाता है
राज़े-दिल बयाँ करने को
वह भी तो उछल जाता है
खामोश चाँद ने कुछ कहा
फिर से वह बहल जाता है
कभी बहाने से सैर के
लहरों पे निकल जाता है
सुनने प्रेमी दिल की व्यथा
कूलों पर टहल आता है
करुण कहानी मुहब्बत की
सुनकर वह पिघल जाता है
समेट अश्कों की धार को
खारापन निगल जाता है

ऐ समंदर, तेरी गहराइयाँ
बेचैन बहुत करती हमें
मन मनुज का भी तो
तुझसे कम गहरा नहीं
लहरें बहुत उठतीं वहाँ भी
शांत धीर तुझसा ही वह
तेरी तरह ही तो वहाँ भी
बाँध का पहरा नहीं

पर सुनामियाँ भी कब भला
किसके रोके से रुकी हैं ???
..........ऋता..

मंगलवार, 11 जून 2013

कोमल हाथ चुभ गए थे काँच


ताँका........विश्व बाल श्रम दिवस पर-१२ जून

बालक रोया
बस्ता चाहिए उसे
है मजबूर
दिल किया पत्थर
बनाया मजदूर|१|

कोमल हाथ
चुभ गए थे काँच
बहना रोई
भइया आँसू पोंछे
दोनो कचरे बिनें|२|

दिल के धनी
राजा औ' रंक बच्चे
देख लो फ़र्क
एक खरीदे जूता
पोलिश करे दूजा|३|

गार्गी की बार्बी
कमली ललचाई
माँ ने पुकारा
बिटिया, इधर आ
बर्तन मांज जरा|४|

कठोर दिल
कैसी माता है वह
काम की भूखी
बेटी को देती मैगी
कम्मो को रोटी सूखी|५|

........ऋता शेखर 'मधु'

गुरुवार, 6 जून 2013

तुम हो बहादुर ओ सिपाही, याद उसकी ले चलो



यह हरिगीतिका समर्पित है उन वीर जवानों और उनकी परिणीताओं को जो देश की रक्षा के लिए विरह वेदना में तपते हैं...

दिल में बसा के प्रेम तेरा, हर घड़ी वह रह तके|
लाली अरुण या अस्त की हो, नैन उसके नहिं थके||

जब देश की सीमा पुकारे, दूर हो सरहद कहीं|
इतना समझ लो प्यार उसका, राह का बाधक नहीं||

तुम हो बहादुर, ओ सिपाही, याद उसकी ले चलो|
संबल वही है जिंदगी का, साथ में फूलो फलो||

आशा, कवच बन कर रहेगी, बात यह बांधो गिरह|
तुम लौट आना एक दिन तब, भूल जाएगी विरह|

फिर मांग में भर के सितारे, वह सजी तेरे लिए|
अर्पण करेगी प्रीत अपना, आँख में भर के दिए||

ले लो दुआएँ इस जहाँ की, भूल जाओ पीर को|
आबाद हो संसार तेरा, अंक भर लो हीर को||
....................ऋता शेखर 'मधु'


रविवार, 2 जून 2013

मत संहार करो वृक्षों का


५ जून विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाता है...

मत संहार करो वृक्षों का

श्मशानी निस्तब्धता छाई है
उभरी दर्द भरी चहचहाहट
नन्हें-नन्हें परिंदों की,
शायद उजड़ गया था उनका बसेरा
मनुष्य ने पेड़ जो काट दिए थे|

गुजर रही थी लम्बे रास्ते से
गूँजी एक सिसकी
नज़रें दौड़ाईं इधर उधर
थके हारे पथिक की कराहट थी,
शायद छिन गया था
विशाल वृक्ष की छाया
मनुष्य ने पेड़ जो काट दिए थे|

जा रही थी पगडंडी से
किनारे की फ़ैली ज़मीं पे
पाँव रखा ज्योंहि
दरकने की आवाज़ आई
ये धरती की फटी दरारें थीं
चरमरा कर फटी धरती
दरारें भरे कैसे
आकाश ने बरसना छोड़ दिया था
आकाश बरसे भी कैसे
मनुष्य ने पेड़ जो काट दिए थे|

अचानक गूँज उठी
ढेर सारी सिसकियाँ
गर्मी से व्याकुल सजीव
छटपटा रहे थे,
इधर उधर भाग कर
शीतलता तलाश रहे थे
शीतलता मिलती भी कैसे
पृथ्वी का उष्मीकरण हो रहा था
मनुष्य ने पेड़ जो काट दिए थे|

कुलबुलाहट फैली थी
सांस न ले पाने की अकबकाहट
कहीं से प्राणवायु तो मिले
जीवन का संचार हो
प्राणवायु मिले तो कैसे
विषैले गैसों को आत्मसात् कर
आक्सीजन देने वाली हरी पत्तियाँ न थीं
मनुष्य ने पेड़ जो काट दिए थे|

देख विशाल वृक्षों की
कटी निर्जीव कतार
ब्रह्मा कर उठे अट्टहास
रे मनुष्य! मैंने तुझे बनाया
तेरी सुरक्षा के लिए पेड़ बनाये
पेड़ों का करके विनाश
क्यों कर रहा है
सृष्टि का महाविनाश!
पापी है तू, अभी भी संभल जा|

अगली पीढ़ी मांगेगी जवाब
पितामहों!
आपने मकान छोड़ा
संपत्ति छोड़ी
बैंक बैलेंस छोड़ा
क्यों नहीं छोड़ा आपने
शुद्ध हवाएँ, निर्मल नदी
वृक्ष की छाया, हरी धरती
पंछियों का बसेरा, शीतल बयार
क्यों छीन लिया जीवन का मूल आधार?
क्यों  किया  आपने  वृक्षों  का  संहार??
 .....................ऋता शेखर मधु