मंगलवार, 15 सितंबर 2015

चल री पवन-कुंडलिया

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40.
राखी के त्यौहार में ,भाई आया द्वार
अँखियों में आई चमक, खुशियाँ मिली अपार
खुशियाँ मिली अपार, सजे अक्षत और रोली
रेशम धागा बाँध, बहन दिल से खुश हो ली
भरती हैं आशीष, हरिक धागे में पाखी
हर सावन में भ्रात, पिरोऊंगीं मैं राखी
39.
मिलकर एक- एक रहें, ग्यारह बने महान
पूर्ण करें हर काम को, लेते जब वे ठान
लेते जब वे ठान, कैद कर लेते धारा
मरु कर जाते पार, रहे थार रहे सहारा
रेशा रेशा सूत, वस्त्र बन जाते सिलकर
होता बल का भान, रहें एक एक मिलकर
38.
किलकारी रौशन रहे, ऐसा बने प्रयास
बालक हो या बालिका, सबको मिले मिठास
सबको मिले मिठास, सृष्टि को दोनों प्यारे
दें कन्या को मान, हर्ष से हक़ दें सारे
पाकर पानी खाद, महक जाती फुलवारी
सम पालन की रीत, रखे रौशन किलकारी
37.
सावन की आई झड़ी, घर में आया तीज
हुलसा मन खिलते सुमन, चहका है दहलीज़
चहका है दहलीज़, हरी कलाइयाँ खनकी
शोभित है परिधान, बिंदिया मुख पर चमकी
होती पूजा आज, पार्वती शिव पावन की
कजरी गाए बूँद, झड़ी आई सावन की
36.
गरिमा संसद की रहे, परिभाषित हो देश
रखना जनसेवक वहाँ, अनुशासित परिवेश
अनुशासित परिवेश, वतन का मान बढ़ाता
हंगामा आक्षेप, हँसी का पात्र बनाता
सुष्मित रहे स्वराज, बढ़े भारत की महिमा
सद्भावी माहौल, रखे संसद की गरिमा
35.
भरता सूरज लालिमा, प्राची में हर भोर
जग जाते इंसान खग, शोर मचाते ढोर
शोर मचाते ढोर ,कृषक खेतों में जाते
बैलों की थामे डोर, उमंगित होकर गाते
धरती का नैराश्य, अरुण उषा संग हरता
पूरब में हर भोर, लालिमा सूरज भरता
34.
चल री पवन उड़ा ध्वज़ा,बढ़ा गगन की शान
केसर- श्वेत- चक्र- हरा, जगा रहे अरमान
जगा रहे अरमान , हिन्द हो जग में न्यारा
मिटे रंक की भूख, धर्म हो सबका प्यारा
भारत माँ की गोद, शुभ्र ज्योत्स्ना तू पल री
कुसुमित हो जा आज, फहर जाने को चल री
**ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 13 सितंबर 2015

कर लो हिन्दी से मुहब्बत दोस्तो

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कर लो हिन्दी से मुहब्बत दोस्तो
है बड़ी उसमें नज़ाकत दोस्तो

रूह तक में वो समाती जा रही
लफ्ज़ में रखती नफ़ासत दोस्तो

देश में अपने फले फूले सदा
हर ज़ुबाँ की है क़राबत दोस्तो

बोल अपनापन भरा कहती सदा
है यहाँ माँ की इबादत दोस्तो

क्यूँ विदेशी मूल की भाषा रहे?
इसलिए करती बग़ावत दोस्तो

विश्व में इज्जत की है हक़दार वो
कर रही अपनी वकालत दोस्तो

लोरियाँ कविता रुबाई या ग़ज़ल
हर जगह है वो सलामत दोस्तो

वो सहज भाषा मिठासों से भरी
मानते हम ये हकीकत दोस्तो

कंठ तालू मूर्ध जिह्वा ओष्ठ में
वर्ण की है बादशाहत दोस्तो

हिन्द हिन्दुस्तान हिन्दी भाव है
क्यूँ वहाँ है फिर सियासत दोस्तो
|
ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

काली कोयल सुर मधुर-कुंडलिया छंद

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33.
काली कोयल सुर मधुर, गुण का करे बखान
सूरत से सीरत भली, देती है संज्ञान
देती है संज्ञान, सदा सद्भावी  रहना
नम्र रहे व्यवहार, वही मानव का गहना
मनहर हो जब पुष्प, पुलक जाता है माली
कानों में रस घोल, कूकती कोयल काली
32.
पलकें ही तो बांधतीं, आँसू की हर बूँद
घनी पीर के मेघ को, आँखों में लें मूँद
आँखों में लें मूँद, दर्द की सीली भाषा
बन जाए हथियार, बदल देती परिभाषा
शब्द सुमन के साथ, भाव के घट जब छलकेँ
खुशियाँ बनतीं बूँद, बाँध ना पातीं पलकें
31.
कठपुतली सी जिंदगी, नाच रही बिन शोर
सधे हाथ से साधती, यह सुख दुख की डोर
यह सुख दुख की डोर, चक्र के जैसे चलती
ज्यों बासंती आस, झरे पत्तों में पलती
स्थिर रहती है चाल, सुदृढ़ होती जब सुतली
स्वाभिमान के साथ, बने रहना कठपुतली
30.
तप की रक्षा के लिए, मुनि माँगे रघुनाथ
दशरथ ने तब काँपकर, जोड़ दिए थे हाथ
जोड़ दिए थे हाथ, चौथपन में सुत पाया
राम न माँगें आप, माँग लें गौ धन माया
''राक्षस करते भंग, यज्ञ प्रक्रिया ऋषि-जप की
राम लखन के साथ, सुरक्षा होगी तप की''

29.
नीले अम्बर के तले, बसते हैं इंसान
मज़हब माटी के लिए, बन जाते हैवान
बन जाते हैवान, खेलते खूनी होली
दिल में रखकर स्वार्थ,बोलते नकली बोली
वे संवेदनहीन, गिनें मौतों के टीले
मौन हुए मासूम, लाल में डूबे नीले
--ऋता शेखर "मधु"

बुधवार, 9 सितंबर 2015

वो रस्मो रिवाजें निभाने की रातें

बह्र 122-122-122-122
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
काफ़िया- आने
रदीफ़- की रातें
वो रस्मो रिवाजें निभाने की रातें
है चारो तरफ मुस्कुराने की रातें
कहीं छा रही है पपीहे की सरगम
कहीं जाफ़रानी मुहब्बत की रातें
कुबूली गई है किसी की इबादत
सजी मंदिरों में दुआओं की रातें
बहुत रोक कर के रखे थे ये आँसू
सुना जब शहीदों के जाने की रातें
हमारे घरों में झरोखे सुनाते
फलक पे सितारे गिनाने की रातें
जो भरती थी दादी अँचारों से बरतन
वो चुपचाप जाकर चुराने की रातें
वो आती पिता से छुपाने की रातें
बहाने बनाकर बचाने की रातें
सदा टोकते बात बेबात में जो
सुनाने लगे बुदबुदाने की रातें
*ऋता शेखर मधु*

सोमवार, 7 सितंबर 2015

बिना जाने किसी को भी कहानी क्यों बनाते हैं

बह्र 1222-1222-1222-1222
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
काफ़िया- आते

रदीफ़- हैं

बिना जाने किसी को भी कहानी क्यों बनाते हैं
इधर कहते उधर कहते खुदा को भूल जाते हैं

किसी अनजान राहों पर मिले रहमत खुदाई की
बहारों में वही अक्सर शिकायत भी सुनाते हैं

न तो ईमान रखते हैं न ही इंसान बन पाते
लगा कर आग दुनिया में जमाने को डराते हैं

हवा में बात कर कर के शरीफ़ों को खिजा देते
निशाने पर अगर आते शराफ़त भी भुलाते हैं

जरा सी बात पर देखो तुनक भी तो दिखा देते
कला उनकी निराली है सुलह भी तो कराते हैं


*ऋता*

शनिवार, 15 अगस्त 2015

बूँदें...

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सावन का बूँदों से अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है| प्रस्तुत है .......

बूँदें...
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आसमान की नई कहानी
धरती पर ले आतीं बूँदें
तपी ग्रीष्म में भाप बनीं वो
फिर बादल बन जाती बूँदें
श्वेत श्याम भूरे लहंगे
इधर उधर इतराती बूँदें
सखी सहेली बनकर रहतीं
आपस में बतियाती बूँदें
नई नई टोली जब जुटती
अपना बोझ बढाती बूँदें
थक जातीं जब बोझिल होकर
नभ में टिक ना पातीं बूँदें
ताल तलैया पोखर भरतीं
कागज़ नाव तिराती बूँदें
रिमझिम रिमझिम बारिश करके
बच्चों संग नहाती बूँदें
सुन मल्हार राग आ जातीं
कजरी गीत सुनाती बूँदें
झूले पेंगें हरियाली में
गोरी के मन भाती बूँदें
तृषित धरा की सोंधी खुशबू
गिरकर खूब उड़ाती बूँदें
विकल व्यथित वीरान हृदय में
आँसू बन बस जाती बूँदें
गंगा की पावन लहरों में
गोद भराई पाती बूँदें
लहरों पर इठलाती गातीं
सागर में मिल जाती बूँदें
ऊपर उठतीं नीचे गिरतीं
सिंधु में जा समाती बूँदेंं
स्वाति को सीप का साथ मिले
मोती बन रम जाती बूँदें
आती बूँदें जाती बूँदें
जीवन को कह जाती बूँदें
या तो लहरों में खो जाती
या मोती बन जाती बूँदे
*ऋता शेखर 'मधु'*

गुरुवार, 13 अगस्त 2015

ग़ज़ल

एक ग़ज़ल...
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मुकाबिल आंधियों के दीप जलना भी जरूरी था
मुसीबत लाख आये ख्वाब पलना भी जरूरी था

अदब के साथ राहों पर चले थे हम सदा साथी
वही देने लगे बाधा बदलना भी जरूरी था
लगी ठोकर जमाने से कदम भी लड़खड़ाए थे
हँसी में हौसलों को तब मचलना भी जरूरी था
समंदर में लहर उठना रवानी का तकाज़ा है
गुहर लेकर बिना डूबे निकलना भी जरूरी था
सुगंधों से भरी देखो गुलाबों की कली न्यारी
बिखरने को हवाओं में टहलना भी जरूरी था
...ऋता