बुधवार, 24 अक्टूबर 2018

शरद चाँदनी

गीत का प्रयास

मौसम की आवाजाही में
हवा सर्द या हुई गरम

शरद चाँदनी शीतल बगिया
चमक उठे दुधिया कचनार
पुष्पदलों के हिंडोलों पर
झूल रहे नन्हें तुषार
अन्दर बाहर होती साँसें
अहसासों को करें नरम

शांत चित्त स्थिर मन प्याला
श्वेत क्षीर पर अमृत वर्षा
मेवा केसर पिस्ता मिलकर
दुग्ध अन्न का कण कण हर्षा
मुरली की मीठी धुन पर
दौड़ी राधा छोड़ शरम

जित देखें तित कान्हा दिखते
सभी गोपियाँ हुईं मगन
राधे राधे जपते कान्हा
एकाकार हुई प्रेम लगन
महारास की पावन बेला में
सुख की अनुभूति बनी परम

मन के सारे द्वेष मिटाकर
प्रभु में अपना ध्यान लगा
पूर्ण चन्द्र की सुन्दरता में
तन में आभा का ज्ञान सजा
इहलोक की झूठी माया से
स्वयं ही मिट जाएगा भरम

मौसम की आवाजाही में
हवा सर्द या हुई गरम

-ऋता

रविवार, 30 सितंबर 2018

धातु के बरतन - लघुकथा

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धातु के बरतन

सास और बहू का घर अलग अलग शहरों में था।


"मम्मी जी, आपने मलने के लिए सारे बर्तन बाई को दे दिए। बर्तनों पर खरोंच आएगी तो भद्दे दिखेंगे।" बर्तनों का अंबार देखकर सास के घर आई बहु आश्चर्य से बोल पड़ी।

"नहीं बहु, तेज रगड़ से ये और भी चमक उठेंगे, धातु के हैं न।"

"मम्मी जी, हमारे यहाँ तो आधे से अधिक बर्तन मुझे ही साफ करने होते हैं। काँच के शौफ़ियाना बर्तन, नॉन स्टिक तवा कड़ाही, ये सब बाई को नहीं दे सकती। खरोंच लगा देगी या काँच का एक भी गिलास या कटोरी टूट गयी तो डिनर सेट खराब हो जाएगा।"

"तभी तो आजकल के रिश्ते भी नर्म और नाजुक हो गए हैं। क्रोध या अहम की हल्की खरोंच भी उन्हें बदरंग कर सकती है।"

"क्यों, पहले रिश्ते बदरंग नहीं होते थे क्या मम्मी जी।"

"होते थे, पर उन रिश्तों को संभालने के लिए प्यार के साथ कठोरता से भी काम लिया जाता था और उनमें निखार बढ़ता जाता था। धातु के बर्तनों को अपने गिरने या रगड़े जाने की परवाह नहीं होती । "
-ऋता

शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

राशिफल - लघुकथा

राशिफल

सुबह के पाँच बजे से सुनंदा की दिनचर्या शुरू हो जाती। सबसे पहले बच्चों के मनपसन्द नाश्ते और लंच बनाती। उन्हें पैक करती। उधर बच्चे स्कूल के लिए स्वयं तैयार हो जाते। इतना करते हुए छह बज जाते और पतिदेव सुरेश भी तबतक उठकर चाय की फरमाइश कर देते। सास, ससुर और पति के लिए वह एक साथ ही चाय बनाती। इस दौरान उसके कान बालकनी की तरफ लगे रहते जहां गोल गोल मुड़ा ,नन्ही रस्सी में बंधा अखबार 'टप' से गिरता और वह दौड़ लगाकर बालकनी में पहुँच जाती क्योंकि एक बार अखबार पतिदेव के हाथ लगी तो मिलने से रही।
जल्दी जल्दी तीन चार पन्ने पलटती, कुछ पढ़ती और वापस अखबार मेज पर रखकर रसोई में लौट जाती। ऑफिस जाने के समय पति जब बाहर निकलने लगे तो सुनंदा ने धीरे से कहा,"आज वाणी और क्रोध पर नियंत्रण रखना उचित रहेगा। ऐसा आपकी राशि में लिखा है।"
पति के क्रोधी स्वभाव से वह हमेशा सशंकित रहती थी।सुनंदा की ओर कड़ी नजर से देखकर सुरेश चले गए।
"बहु, राशिफल में आज धनप्राप्ति का भी योग है, ये क्यों नहीं बताया सुरेश को" , सास ने अखबार पढ़ते हुए पूछा।
सुनंदा मुस्कुराकर चुप रह गई।
शाम को सुरेश घर आये तो बहुत खुश थे। आते ही माँ को बताया," आज मुझे एक नई प्रोजेक्ट मिली है"
"बेटा, आज के राशिफल में यह भी लिखा था जिसे सुनंदा ने नहीं बताया।"
"माँ, आज ऑफिस जाते ही बॉस किसी बात पर उलझ गया। मैं भी उससे बड़ी बहस करना चाह रहा था तभी सुनंदा की बात याद आ गई और मैन धैर्य से काम लिया।उसके बाद बॉस ने वह प्रोजेक्ट मुझे ही देने का फैसला किया"
"अरे वाह !" कहती हुई सास ने बहु को हल्की मुस्कान के साथ देखा
"धनप्राप्ति से अधिक महत्वपूर्ण व्यवहार पर नियंत्रण है, मान गए तुम्हारी सोच को बहु।"
"जी" कहकर सुनंदा ने मेज पर गरम गरम चाय और पकौड़े रख दिये।
-ऋता

प्रॉपर्टी - लघुकथा

प्रॉपर्टी

"अभी आ रही हो, इतनी रात गए कहाँ थी तुम?"
"मैं तुम्हारी प्रॉपर्टी नहीं जो तुम मुझपर बन्धन लगाओ"
"प्रॉपर्टी कैसे नहीं, तुम्हारे पिता ने तुम्हे दान दिया है मुझे। तुम्हारे प्रति जिम्मेदारी है मेरी"
"अब भूल जाओ, कोर्ट ने धारा 497 हटाते हुए कहा है कि पत्नी पति की प्रॉपर्टी नहीं"
"हम्म"
"सुनो, कल तुम मेरे साथ चलना। पड़ोस में जो नया आदमी आया है, मुझे अजीब नजरों से घूरता है। तुम्हे मेरा साथ देखेगा तो डरेगा"
"रक्षा तो अपनी प्रॉपर्टी की की जाती है"
-ऋता

गुरुवार, 20 सितंबर 2018

देह का तिलस्म - कहानी


देह का तिलस्म

चारों ओर निशा पसरी हुई थी| निशा के स्याह आँचल पर नन्हें नन्हें सितारे जगमग कर उसकी सुन्दरता बढ़ा रहे थे| एक पूरा चाँद मुस्कुराता हुआ निशा के साँवले मुख को अलौकिक सुन्दरता प्रदान कर रहा था| सृष्टि के निर्माता ब्रम्हा जी धरती पर सागर के किनारे एकांत में बैठे विचारमग्न थे| सिर्फ धरती का कठौर तल, हहराते सागर, चमकता सूर्य, लुभावने सितारे. शातल चाँद के अलावा भी कुछ चाहिए था जो पूरी सृष्टि को मनभावन और चलायमान बना सके| यह सोचते हुए ब्रम्हा जी हाथों में भीगे रेत लेकर सके गोले बनाने लगे| उसे विभिन्न आकार देकर कुछ को धरती पर रहने लायक गढ़ते, कुछ आकार जो समुद्र में रह सकें और कुछ को आसमान में उड़ने लायक बनाया| अब उनकी कल्पना में वे सारे आकार चलने , उड़ने और तैरने लगे| हर गढ़न में अब उन्हें यह ख्याल भी रखना था कि वे शरीर की वृद्धि करें और बाद में खुद जैसे जीवों का निर्माण भी करें ताकि उनकी कृतियों का अस्तित्व बना रहे| अब सवाल यह था कि इन सभी कृतियों में जीवन कैसे भरें| ये तो मात्र देह का निर्माण हुआ था| सोचते सोचते उन्होंने एक प्रकाश पुंज का निर्माण किया| वह पुंज ब्रम्हा जी के सामने आकर पूछने लगा,’प्रभु, मेरे अवतरण का प्रयोजन क्या है’

‘तुम सभी अदृश्य टुकड़ों में विभाजित हो जाओ और अपने पसंद की आकृतियों में समा जाओ| तुम्हारे समाहित होने से ये सभी आकृतियाँ जीवित हो जाएँगी|’’

‘’ लेकिन प्रभु, हम उन आकृतियों में कब तक कैद रहेंगे?’’

‘’सभी आकृतियों का निश्चित जीवन काल होगा| उसके बाद तुम्हें शरीर से मुक्ति मिल जाएगी| ज्योंहि तुम बाहर निकलोगे, वे आकृतियाँ मृत कहलाएँगी| जब तक तुम देह के अन्दर रहोगे, आत्मा या प्राण कहलाओगे|’’

‘’हे प्रभु! इतना बता दीजिए कि हम देह में समाने के बाद क्या व्यवहार करेंगे|’’

‘’पहले तुम सभी आत्माएँ अपनी देह धारण करो| उस देह के अनुरूप जो आचरण उचित होगा वही करना|’’

सभी आत्माओं ने एक एक आकृति ले ली| अब उस निर्जीव निस्तब्ध स्थान पर हलचल मच गयी|तरह तरह की ध्वनियाँ वातावरण में गुँजायमान हो गईं| कुछ वहीं धरती पर उछल कूद करने लगे, कुछ सागर में उतरकर मजे से तैरने लगीं| कुछ ने पंखों का इस्तेमाल किया और आकाश में उड़ गए| ब्रह्मा जी सब देखकर आनंदित होने लगे| तभी एक देह ने दूसरे पर हमला किया और उसकी देह को क्षत विक्षत कर दिया| उस देह के अन्दर की आत्मा आजाद हो गई| किन्तु वह दुखी भी थी क्योंकि आजाद होने के क्रम में देह ने जो यातना झेली वह असहनीय थी| ब्रह्मा जी ने हमलावर प्राणी को बुलाया और पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया|

‘’प्रभु, मुझे जो आकृति मिली उसे पेट भरने के लिए दूसरे पशु की देह चाहिए थी,’ इसलिए मैंने उस अनुरूप आचरण किया|ब्रह्मा जी चुप रह गए क्योंकि इसमें उस शिकारी देह की कोई गल्ती नहीं थी| उसके निर्माता तो वही थे| उधर आसमान में उड़ने वाली एक देह ने अपने से छोटी देह वाली एक आकृति को गिरा दिया था| सृजन के साथ विध्वंस का सिलसिला होते देख ब्रह्मा जी चिंतामग्न हो गए|

अब वे ऐसी आकृति का निर्माण करना चाहते थे जो आपस में प्यार से रह सकें| इसी क्रम में दो नन्हीं आकृतियाँ गढ़ी गयीं जो बिल्कुल एक समान थीं| उन्हें समान बुद्धि और समान ताकत भर दिए| एक खासियत और दी कि वह अपनी जिह्वा का उपयोग करके तरह तरह की आवाजें निकाल सकते थे| अपनी इस कृति पर ब्रह्मा जी निहाल हो गए| उन्हें पूरा विश्वास था कि इन देहों में जाने वाले प्राण प्यार से रहेंगे| अब उन्होंने सृष्टि को आगे बढ़ाने के ख्याल से उनकी काया में थोढ़ा सुधार किया और दोनों मिलकर सृष्टि को आगे बढ़ा सकें, इसके लिए थोड़े से अंग परिवर्तन कर दिए| अब उन्होंने आत्माओं को आज्ञा दी कि अपनी पसंद की किसी देह में प्रविष्ट हो जाओ| आत्माओं ने प्रभु की आज्ञा का पालन किया और देः में प्रविष्ट हो गए| देह और आत्मा का यह साथ अत्यंत आह्लादकारी साबित हुआ| दोनों एक दूसरे की ओर आकर्षित हुए और प्रेमपूर्वक रमणीय स्थल चुनकर रहने लगे|

अब ब्रह्मा जी निश्चिंत हो गए कि उनका काम पूरा हो गया| आखिरकार उन्होंने देह और आत्मा का सुन्दर समायोजन कर लिया था|

दिन बीत चले समय आने पर दोनों काया ने मिलकर नयी काया का निर्माण किया| जिस काया ने नन्ही काया को खुद में समेटकर रखा था वह उसकी देखरेख में व्यस्त हो गई| स्वयं को उपेक्षित होता देख दूसरी काया नाराजगी जाहिर करने लगी| अब उनके बीच उपालम्भों का आदान प्रदान होने लगा| जब बात असह्य होने लगीतो दोनों अपनी शिकायतें लेकर प्रभु के पास पहुँचे| प्रभु ने उनकी बातें सुनी और कहा,’ तुम दोनों ने मेरी उम्मीद को धराशायी कर दिया| आखिर ये शिकायतें कैसी|’

‘प्रभु, आपने एक काया में ममता भरी और वह नम्रता सीख गयी| दूसरे में ताकत थी, वह अहंकारी हो गया,’ममतामयी काया कह उठी|

‘प्रभु, अब यह सवाल जवाब करने लगी है| उसने बुद्धि का उपयोग शुरू कर दिया है| मैं उसे तर्क से नहीं बल्कि ताकत से ही हरा सकता हूँ,’ये अहंकारी देह की आवाज थी|

‘क्या तुम दोनों आत्माएँ प्रेमपूर्वक नहीं रह सकतीं,’ प्रभु अपनी ही बनायी रचना के सामने विनीत भाव से बोले|

‘रह सकते हैं, जब हम इस देहरूपी बंधन से आजाद हो जाएँगे| जब तक हम दोनों के पास काया, वाणी और बुद्धि रहेगी, तर्क वितर्क चलते रहेंगे| इन सबके बावजूद भी हम एक दूसरे का ख्याल रखेंगे| यह देह का तिलस्म है प्रभु जी| अब आप भी इसमें कुछ नहीं कर सकते,’यह कहकर दोनों आत्माएँ ब्रह्मा को उनके ही तिलस्म में हैरान करके

एक दूसरे का हाथ पकड़कर मुस्कुराती हुई ओझल हो गईं|

-ऋता शेखर ‘मधु’

मानव तभी तक जीवित है जब तक उसके शरीर में आत्मा का वास है...वरना मृत है| आत्माओं का व्यवहार देह पाने के बाद बदल क्यों जाता है...चिंतन से उपजी एक कहानी आपको भी अवश्य पसंद आएगी|अपनी राय देंगे तो लेखन में सुधार जारी रहेगा, धन्यवाद मित्रों|

मंगलवार, 18 सितंबर 2018

पसंदगी की रेंज

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‘हलो, मिस्टर वर्मा, मैने शादी डॉट कॉम पर आपके पुत्र के बारे में पढ़ा| आपको मैं अपनी बेटी की आई डी भेजती हूँ| आप देख लें और पसन्द आए तो हमलोग रिश्ते के बारे में सोच सकते हैं,’ ऊधर से मधुर आवाज में एक महिला बोल रही थीं|

‘जी, बताइए, मैं अपनी ओर से देख ही लेता हूँ क्योंकि अभी ऑनलाइन हूँ| आप चाहें तो कुछ देर लाइन पर बनी रह सकती हैं,’ वर्मा जी ने कहा और साथ ही दिए गए आई डी पर क्लिक भी किया| वहाँ एक प्यारी सी लड़की मोहक मुसक्न से सजी दिख रही थी| पूरी प्रोफ़ाइल देखने के बाद वर्मा जी ने कहा’’, मैडम,लड़की मुझे तो पसन्द आ रही| अब आप अपनी बिटिया का मोबाइल नम्बर दीजिए|’’

‘क्या !,’उधर से अचंभित स्वर उभरा|

‘देखिए मैडम, वह जमाना गया जब माता पिता शादियाँ तय करते थे और बाद में बच्चों की राय ली जाती थी| बच्चे भी ज्यादा विरोध नहीं करते थे| अब बच्चे चुनाव करते हैं, बाद में माता पिता की राय ली जाती है| आप बिटिया का नम्बर दें, मैं अपने पुत्र आशु को दे दूँगा| अपनी सुविधा से दोनों बात कर लेंगे| यदि दोनों ने एक दूसरे के विचारों को पसन्द किया तो फिर हमलोग आगे की बात कर लेंगे| दोनों ही बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में उच्च पदों पर हैं| उनकी पसन्द ही सर्वोपरि है,’ थोड़े से आहत स्वर में मिस्टर वर्मा बोल रहे थे|

इसके पहले भी दो जगहों पर बात आगे बढ़ी थी| एक जगह लड़की ने छोड़ा क्योंकि उसे घर में किसी भी बड़े बुज़ुर्ग को रखना स्वीकार्य नहीं था| एक जगह लड़के ने छोड़ा क्योंकि लड़की ने अँग्रेजी स्कूल से शिक्षा प्राप्त नहीं की थी| मिस्टर वर्मा के अनुसार ये दोनों ही बातें कोई मायने नहीं रखती थीं|

“लड़की किसी के साथ नहीं रहना चाहती तो न रहे| समय के साथ और जरूरतों के अनुसार स्वयं सब ठीक हो जाता है| हर बात को गणित की तराजू पर तौलने से क्या डंडी सीथी मिलेगी ? नहीं न, पहले की शादियों में सामंजस्य बिठा ही लिया जाता था|”

“लेकिन पापा, हम सामंजस्य क्यों बिठाएँ| जब विचार ही नहीं मिलेंगे तो साथ कैसे रहेंगे,”वर्मा जी किसी भी दलील से पुत्र को नहीं समझा पाए|

‘आशु, जिस लड़की ने अँग्रेजी स्कूल से शिक्षा नहीं पाकर भी अपनी मेहनत के बल पर इतनी अच्छी नौकरी पाई है उसे तुम कमतर कैसे आँक सकते हो,’ उस दिन भी पिता पुत्र में वैचारिक मतभेद हो गया था| बाद में पिता ने ही चुप्पी का सहारा लिया|

मन में घुमड़ते हुए विचारों के समंदर में डूबे मिस्टर वर्मा यह भूल गए कि वह फ़ोन पर हैं|

“जी, मैं नम्बर दे देती हूँ,” यह सुनकर उनकी तन्द्रा टूटी|

उन्होंने नम्बर नोट किया और व्हाट्स एप पर आशु को भेज दिया| तुरन्त उभरी दो नीली रेखाओं ने संदेश पढ़ लिये जाने की चुगली कर दी| पहले इस तरह के संदेश पर आशु बिना विलम्ब के फ़ोन करता था किन्तु इस बार इन्तेज़ार के बाद भी उसने फ़ोन नहीं किया|

‘ अच्छा ही है, स्वयं बात कर लेगा तो बताएगा’, यह सोचकर वर्मा जी अपने काम में व्यस्त हो गए|

हर दिन बातें होतीं आशु से, पर उस लड़की के बारे में न पिता ने पूछा और न ही पुत्र ने बताया| एक दिन आशु ने कहा,”पापा, मैं एक महीने से लगातार उस लड़की से बात कर रहा हूँ| लगभग सभी विषयों पर हमारे विचार मिलते हैं| मुझे लगता है कि अब हमें आमने-सामने एक दूसरे से मिल लेना चाहिए| आप उसकी माँ को कहिए कि वह भी आ जाएँ और आप भी चलिए|”

सीधे सपाट शब्दों में कही गई बात वर्मा जी को अच्छी लगी| बेकार की संवेदनाओं में बहकर तो हमारी पीढ़ी बात करती थी| घर में ग़लत को कभी ग़लत कहने की हिम्मत नहीं होती थी|

दिन , समय, स्थान निश्चित किया गया| नियत समय पर सभी पहुँच गए| लड़की जैसी फ़ोटो में थी वैसी ही दिख रही थी| कुछ देर तक बातें हुई , उसके बाद आशु और वह लड़की थोड़ा अलग हट कर बातें करने लगे| वर्मा जी और लड़की की माँ ने तबतक विवाह की सारी रूपरेखा तय ली| घर में मण्डप सजेगा, शहनाइयाँ बजेंगी, इसकी प्रसन्नाता दोनों अभिभावकों को आह्लादित कर रही थी|

थोड़ी देर बाद दोनों वापस आ गए| दोनों के चेहरे पर तनाव की रेखाएँ साफ दिख रही थीं| वर्मा जी का दिल धड़क उठा| लक्षण ठीक नहीं लग रहे थे|

“पापा, अभी हम किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सकते| मैं अपना देश नहीं छोड़ सकता| यदि हमारे देश में कुछ कमी है तो हम सभी मिलकर सुधार सकते हैं| देश को हम सभी की जरूरत है| ये क्या बात हुई कि पढ़े लिखे हैं अपने भारत में और सपनों का घर सजाएँ विदेश की धरती पर| यह मुझसे नहीं होगा|”

लड़की सिर झुकाए सुन रही थी| उसने कुछ नहीं कहा| माँ भी कुछ कह पाने में असमर्थ थीं|

इस बार मिस्टर वर्मा ने पुत्र की पीठ को सराहना के भाव से थपथपा दिया| आज पुत्र को वह गर्व भरी दृष्टि से देख रहे थे| पूर्व के मतभेद की दीवार गिर चुकी थी|

औपचारिक अभिवादन के बाद सभी जाने के लिये दरवाजे की ओर बढ़े| आशु जल्दी ही वहाँ से निकल जाना चाहता था| उसका मन अपने आप से ही क्षुब्ध था| बातें करने के दौरान उसने कल्पना भी नहीं की थी कि विदेश में बस जाने का प्रस्ताव भी रखा जा सकता है वरना वह पहले ही नकार देता| उसका गणितीय समीकरण गलत साबित हो गया था पर पिता की थपथपाहट से कुछ शांति अनुभव कर रहा था|

“आशु, मैं तो बस तुम्हारी परीक्षा ले रही थी| मैं भी अपने देश से उतना ही प्यार करती हूँ जितना तुम|”

अचानक आई इस आवाज पर आशु ने पलट कर देखा| लड़की मुस्कुराती हुई खड़ी थी| इधर समधी समधन एक दूसरे को बधाइयाँ दे रहे थे|

-ऋता शेखर “मधु”

गुरुवार, 13 सितंबर 2018

हे अशोक


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हे अशोक !

वापस आकर
हे अशोक! तुम
शोकहरण
कहला जाओ

लूटपाट से सनी नगरिया
लगती मैली सबकी चदरिया
नैतिकता का उच्चार करो
सद्भावों का संचार करो

प्रीत नीर से
हे अशोक! तुम
जन जन को
नहला जाओ

जितने मुँह उतनी ही बातें
सहमा दिन चीखती रातें
मेघ हिचक जाते आने में
सूखी धरती वीराने में

हेमपुष्प से
हे अशोक! तुम
हर मन को
बहला जाओ

नकली मेहँदी नकली भोजन
पल में पाट रहे अब योजन
झूठ के धागे काते तकली
आँसू भी हो जाते नकली

हरित पात से
हे अशोक! तुम
कण कण को
सहला जाओ

भूमिजा को मिली थी छाया
रावण उसके पास न आया
फिर उपवन का निर्माण करो
हर बाला का सम्मान करो

वापस आकर
हे अशोक! तुम
शोकहरण
कहला जाओ
-ऋता शेखर ‘मधु’
यह रचना अनुभूति के अशोक विशेषांक पर प्रकाशित है...
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मंगलवार, 11 सितंबर 2018

पुत्रीरत्न

नवरात्र की पूजा पर बैठी नंदिनी ने मोबाइल बजते ही तत्परता से उठाया और बोल पड़ी,
" हलो, पापा, क्या हुआ है?"
"बेटा,बहुत बहुत बधाई ! तू बुआ बन गयी, काजल की रस्म के लिए यहाँ आने की तैयारी कर।"
" अरे वाह ! आपको भी दादा बनने की बहुत बधाई पापा। भाभी कैसी है और वो दोनों छुटकू किस रूप में अवतरित हुए हैं, ये भी बताइये।"
"एक पुत्ररत्न और एक लक्ष्मी, सोमेश की फ़ैमिली पूरी हो गई। बहुत प्यारा परिवार बन गया नन्दिनी," पापा ने नन्दिनी को जुड़वाँ जन्म लिए बच्चों के बारे में बताया।
" अरे वाह ! पर मैं आपसे नाराज हूँ पापा। आपने नवजात शिशुओं का परिचय ठीक से नहीं दिया|"
"अच्छा, तो यह बता दो क्या ग़लत कहा|"
"पुत्र को गणेश नहीं कहा पर बिटिया को लक्ष्मी कहकर अभी से ही देवी बना दिया आपने। पापा, नवरात्रि के पाठ से यह समझ पा रही हूँ कि स्त्री जीवन स्वयं एक चुनौती है जिसे वह साधारण मानवी के रूप में ही स्वीकार करता है। पढ़ाई, कमाई और सृष्टि निर्माण की शक्ति के समय उसे देवियों के रूप में जाना जा सकता है, पर अभी से क्यो?"
शायद पापा को भी यह बात तर्कसंगत लगी थी तभी  पूछे,"तो क्या कहकर परिचय देता"
"पुत्रीरत्न कहना था," कहकर नन्दिनी खिलखिला उठी।
"समझ गया, तू आरती कर देवियों की और फ़ोन जरा दामाद जी को दे।"
नन्दिनी ने स्पीकर ऑन किया तब पति को फोन दिया।
"सोमेश के जुड़वाँ बच्चों के जन्मोत्सव में आप और नन्दिनी आमन्त्रित हैं, अवश्य आइयेगा" पापा ने कहा।
"जी अवश्य, पर शिशुओं के परिचय तो दीजिये पापा जी।"
"एक पुत्ररत्न और एक पुत्रीरत्न",
यह सुनते ही नन्दिनी का चेहरा खिल गया और वह घंटी बजाकर गाने लगी, "जय अम्बे गौरी.....
-ऋता शेखर 'मधु'

सोमवार, 10 सितंबर 2018

अनकहा हो दर्द तब लावा पिघलता है


रजनी छंद गीतिका

इस जगत में जो सभी से प्रेम करता है
वह तपिश में चाँदनी बनकर उतरता है

ईश से जो भी मिले स्वीकार कर लेना
आसरा के साथ ही विश्वास रहता है

कोंपलें उगती वहीं झरते जहाँ पत्ते
रात के ही गर्भ से सूरज निकलता है

हो समर्पण भाव हरसिंगार के जैसा
देखना कैसे वहाँ पर प्यार पलता है

शांत हो, एकाग्र हो, कहते यहाँ सारे
अनकहा हो दर्द तब लावा पिघलता है

मन बसे हैं भाव दोनों राम या रावण
राम को जो जीतता पल पल निखरता है

-ऋता शेखर मधु

शनिवार, 1 सितंबर 2018

थेथर - लघुकथा

थेथर
सामने नाट्य प्रदर्शन के लिए मंच सजा है| परदा खुलता है|
प्रथम दृश्यः
एक शिक्षक वर्ग में बैठे हैं| उनके सामने कुछ बच्चे बैठे हैं|
‘बच्चों, आज हमलोग कुछ प्रतियोगिताएँ करवाएँगे, आशा है आप सभी अच्छा प्रदर्शन करोगे|’
‘जी सर, हम सभी उस प्रतियोगिता में भाग लेना चाहते हैं,’ दसवीं –ग्यारहवीं के बच्चे उत्साहपूर्वक बोले|
‘ठीक है बच्चों,हम आपको मिट्टी देंगे| आप सभी को एक एक मूर्ति बनानी है| जिसकी मूर्ति सबसे अच्छी होगी उसे इनाम दिया जाएगा|’
सभी बच्चे उत्साहपूर्वक अपने अपने स्थान पर खड़े हो गए| मूर्ति बनाने के लिए सबके पास सूखी मिट्टी से भरी बाल्टियाँ रख दी गईं|
शिक्षक का किरदार निभा रहे बच्चे ने कहा,’ अब आपलोग मूर्तियाँ बनाना शुरू करों|’
सभी बच्चे एक दूसरे को देखने लगे| अपने सामने मिट्टी का ढेर लगाकर उन्होंने पूछा,’ सर मूर्ति कैसे बनाएँ?’
‘क्यों, क्या दिक्कत है’ हल्की मुस्कान के साथ टीचर जी बोले|
‘हमे पानी नहीं दिया गया है, फिर कैसे बनेंगी मूर्तियाँ सूखी मिट्टी से,’ लगभग सभी एक स्वर में बोल पड़े|
तब तक तेज रौशनी वाला बल्ब मंच पर जला| कुछ देर में ही मंच का तापमान काफी बढ़ गया| बच्चे गर्मी से परेशान हो गए|
‘सर, बल्ब ऑफ़ करवाइये, पसीना हो रहा,’ बच्चों की तेज आवाज़ आई|
तभी एक बच्चा, दिनकर चिल्लाया,’ रुकिए सर, बस दो मिनट’
उसने एक रुमाल निकाला| चेहरा और हाथों को पोंछा| रुमाल तरबतर हो गया| फिर उसने पसीने की बूँदों को थोड़ी सी मिट्टी पर निचोड़ दिया| अब उस भीगी मिट्टी से उसने एक डंडी बनाई और उसपर नन्हीं नन्हीं बालियाँ लटका दीं|
मंच का बल्ब बन्द कर दिया गया था किन्तु वातावरण अभी भी गर्म था| मिट्टी की संरचना सूख गई| दिनकर ने पीले रंग से उसे रंग दिया|
पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा| तभी सूत्रधार के रूप में एक कलाकार का पदार्पण हुआ|
‘ मित्रों, हमारी धरती अब सिर्फ सूखी मिट्टी बन चुकी है| बिना बारिश के वह अनाज कैसे पैदा करे यह विचारणीय है| बारिश का पानी रोकने का कोई उपाय नहीं क्योंकि हम सभी धड़ाधड़ जंगल और पेड़ काटते चले जा रहे हैं| जैसे दिनकर ने अपने पसीने से गेहूँ की बालियाँ बनाईं वैसे ही हमारे श्रमिक भी कार्य करते हैं| किंतु सूरज के बढ़ते तापमान ने सब कुछ निगल लिया है| हमारा संदेश आप दर्शकों तक पहुँच पाए, इसी में इस मंचन की सार्थकता है|” दर्शकों ने तालियाँ बजाकर मंचन का स्वागत किया|

द्वितीय दृश्यः
मंच पर दर्शकों की भीड़ नजर आई| उनके बीच से एक आवाज आई,
’ कितने भी मंचन कर लो, इंसानों की प्रजाति थेथर हो चुकी है|’ साथ ही सम्मिलित हँसी की आवाज से नाट्य कलाकारों के चेहरों पर उदासी के भाव तिर गए|
-ऋता शेखर ‘मधु’

बुधवार, 15 अगस्त 2018

बाबला- कहानी

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बाबला       
(कहानी पर आपकी राय बहुमूल्य है...इस विधा पर काम करना ठीक है या नहीं? कमियाँ/खूबियाँ बताएँ, धन्यवाद )

बेला की खुशियाँ थामे नहीं थम रही थी| चारो ओर से बधाइयों का ताँता लगा था| मम्मी पापा की इकलौती लाडली का मैट्रिक बोर्ड का परिणाम आ चुका था| अपने स्कूल में तो बेला ने टॉप किया ही था साथ ही जिले में भी दूसरे स्थान पर आई थी| बेला थोडी गम्भीर प्रकृति की थी पर इतनी भी नहीं कि खुशियाँ मनाने के समय नाच गा न सके| पिता की राजकुमारी बिटिया ने उनका नाम रौशन किया था| सबसे कहते फिर रहे थे,”कौन कहता है कि बेटियों से पिता का सर गर्व से ऊँचा नहीं होता| आज तो मैं सातवें आसमान पर हूँ|”

बेला के पिता उस जमाने के थे जब घर की बहुओं का नौकरी करना अच्छा नहीं माना जाता था| किन्तु वह औरतों की आजादी के समर्थक थे| उन्होंने अपनी इंटर पास पत्नी को स्नातक की डिग्री दिलवाई और शिक्षण प्रशिक्षण कोर्स करवाया| उसके बाद नौकरी के लिए राजी हुए और बेला की माँ विद्यालय में शिक्षिका बन गयी|

तब तक बेला का जन्म हो चुका था| बेला के कोख में आने से लेकर जन्म तक और उसके लालन पालन में बेला की माँ को पति और संयुक्त परिवार का भरपूर सहयोग मिला| विचारों के अग्रणी पिता ने दूसरी संतान को लाना उचित नहीं समझा| पिता की लाडली पढने में काफी होशियार थी| विद्यालय के हर कार्यकलाप में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती और पुरस्कार जीतती| विद्यालय में सबकी चहेती बन गई थी वह|

समय पंख लगाकर तेजी से उड़ चला था| बिटिया की पढाई के लिए हर संभव सहयोग के लिए तत्पर रहते| बेला के रिजल्ट ने साबित कर दिया था कि इस तरह के परिणाम के पीछे घर का वातावरण भी बहुत सहयोगी होता है|

घर में आयोजित हल्के फुल्के समारोह में कुछ रिश्तेदार और पड़ोसी शामिल थे|

‘हलो बेला, बहत बहुत मुबारक हो| और मिस्टर वर्मा, आपको भी बहुत बधाई हो| बिटिया के रिजल्ट से हम सभी बहुत गर्व का अनुभव कर रहे हैं|’ पड़ोस में नए आए अंकल को बेला नहीं पहचानती थी| वह ‘धन्यवाद’ कहकर आगे बढ़ गई|कुछ देर बाद वह अंकल फिर नेहा के सामने थे,’ देखो बेटा, यह है मेरा बेटा बाबला|’

‘अच्छा! हाय”, कहकर बेला ने नमस्ते की मुद्रा में हाथ जोड़ा| उसके बाद बेला ने महसूस किया कि वह जिधर भी जा रही है , उस बाबला की नजरें निरंतर उसका पीछा कर रही हैं| कुछ देर उसने अनदेखी की| बाद में वह असहज महसूस करने लगी| उस वक्त वह यह बात किसी से कह भी नहीं सकती थी| पार्टी खत्म होने से कुछ देर पहले ही बेला अपने कमरे में आकर बैठ गई|

‘’ अरे यार बेला, चल न डांस करते हैं’,सहेली सुवर्णा चहकते हुए कमरे में आ गई|

‘’नहीं सुवर्णा, मेरी तबियत ठीक नहीं लग रही, तू पार्टी एंजॉय कर| मैं थोड़ी देर में आती हूँ|’ बेला को विश्वास था कि तबतक वो लड़का बाबला चला जाएगा|

थोड़ी देर बाद वह कमरे से बाहर आई और सच में उसे न पाकर बहे खुश हुई|

‘बेटा, अब कहाँ एडमिशन लेने का इरादा है’, एक आंटी ने पूछा|

‘महिला कॉलेज या फिर साइंस कॉलेज में’

‘ठीक है बेटा, मेरी शुभकामनाएँ तुम्हारे साथ हैं,’कहकर आंटी ने प्यार से उसे देखा|

दूसरे दिन बेला ने दोनो महाविद्यालयों में फॉर्म भर दिया| प्रथम सूची में ही उसका नाम आ गया, जैसा कि होना ही था| बेला की इच्छा थी कि वह विज्ञान महाविद्यालय में नाम लिखवाए किन्तु पहली बार उसने महसूस किया कि बंधन क्या होता है| दादाजी ने साफ शब्दों में मना कर दिया कि सहशिक्षा वाले कॉलेज में नहीं पढ़ेगी| घर में कोई विरोध न कर पाया या शायद पिताजी भी न चाहते होंगे| तभी तो यह कहकर टाल दिया कि दादा की मर्जी के ख़िलाफ़ नहीं जा सकते| माँ ने भी चुप्पी साध ली| थोड़े बेमन से उसका नाम लिखवा दिया गया|

जब से क्लास शुरू होना था, उसके एक रात पहले का सारा समय रोमांच में बीत रहा था| बेला को खुशी थी कि अब वह स्कूल ड्रेस के बंधन से आजाद हो रही| समय पर प्रार्थना भी नहीं करना होगा| पूरे दिन भी नही रहना होगा जैसे स्कूल में बाँध कर रखा जाता है|अब वह अपनी मर्जी की मालकिन हो जाएगी| तरह तरह के ड्रेस के बारे में सोचती हुई वह सो गई| सुबह उठी तो जल्दी जल्दी उसने सारा काम किया क्योंकि समय पर कॉलेज बस पकड़ना था| समय पर बस स्टॉप पर पहुँच गई| वहाँ पर सीनियर लड़कियाँ भी थीं|

‘वाह बेला, चुड़ीदार में तो बहुत जँच रही’, एक सीनियर दीदी ने कहा तो बेला मुस्कुरा उठी|

‘अच्छा बेला, तुम्हें यह फिल्मी गीत याद है...रेशमी सलवार कुर्ता जाली का’

‘रूप सहा नहीं जाए नखरे वाली का’, आगे की पंक्ति गाते हुए बेला हँस पड़ी| हँसते हुए उसकी नजर थोड़ी दूर खड़े लड़कों पर पड़ गयी| वे सब भी बस के इंतेजार में खड़े थे| वह बाबला भी वहाँ खड़ा था और उसे एक टक देखे जा रहा था| बेला मुँह फेरकर खड़ी हो गई और सोचने लगी ”तो अब ये भी यहीं पर रहेगा, पर यह मुझे घूरता क्यों है’’| तब तक एक के बाद एक दो बसें आ गईं| एक बस लड़कियों की थी और दूसरी लड़कों की|

बस के अन्दर बेला ने राहत की साँस ली| दोनों बसें आपस में रेस लगाती चल रही थीं| कभी लड़कों की बस आगे होती तो लड़के चिल्लाते हुए अपनी खुशी जाहिर करतीं| जब लड़कियों की बस आगे जाती तो लड़कियाँ भी कहाँ पीछे रहतीम| उस समय बस शोर में डूब जाता| करीब पैंतालीस मिनट का समय लगा महिला महाविद्यालय आने में| सारी लड़कियाँ उतरने लगीं| बेला ने देखा कि लड़कों की बस आगे जा चुकी थी|

रंग बिरंगे कपड़ों में नई लड़कियों का हुजूम कॉलेज के अन्दर दाख़िल होने लगा|

‘ओए लालपरी, इधर अइयो जरा,एक आवाज आई|

बेला ने इधर उधर देखा|

‘अरे, इधर उधर क्या देख रही हो| इधर आओ मेरी लालपरी’,और उसके बाद लड़कियों का एक झुंड खिलखिला उठा|

बेला सकुचाती हुई वहाँ गई|

‘बोलिए दीदी’

“दीदी किसको बोल रही’

‘जी आपको,आप हमसे सीनियर हो न’

‘ये कैसे जाना कि हम सीनियर हैं’

बेला चुप रही| उसे अचानक याद आया कि सुवर्णा बता रही थी कि पहले दिन रैगिंग भी होता है| तब ज्यादा जवाब नहीं देना चाहिए|

‘ अब ये बताओ, ये ड्रेस कितने में ली,’ नया सवाल आया|

‘जी, माँ ने खरीदी है’’

‘ओए, यह तो दूध पीती बच्ची है| अभी तक माँ इसके कपड़े खरीदती है’, इतना कहकर वह ठठाकर हँस पड़ी और साथ ही हँस पड़ीं उसकी साथी लड़कियाँ| बेला रुआँसी हो गई| उसने इधर उधर देखा| सामने से वही दीदी आ रही थी जो बस स्टॉप पर मिली थी|

‘क्यों तंग कर रही बेचारी को, अच्छा बेला, एक गाना सुना दो हम सबको’

‘पर हमें तो गाना नहीं आता’,

‘वही सुना दो जो स्टॉपेज पर गा रही थी|

‘अच्छा, रेशमी सलवार कुर्ता जाली का....’बेला ने रुकते हुए किसी तरह से गाया|

‘रूप सहा नहीं जाए नखरे वाली का...’इस बोल को पूरा करते हुए दीदी ने कहा, अब जाओ|

‘क्यों जाने दिया, अभी और रैगिंग लेनी थी न,’ बेला ने जाते जाते सुना|

‘नहीं जी, सीधी है बेचारी, देखा नहीं कैसी रोनी सूरत बना ली थी उसने|’

आज तो दीदी ने बचा लिया, यह सोचती हुई वह आगे बढ़ी| तबतक उन शैतान लड़कियों ने दूसरा शिकार ढूँढ लिया और उसके पीछे पड़ गईं|

वह पहला दिन गुजर गया| नियत समय पर बस भी आ गई| स्टॉप पर वह उतरी और घर जाने लगी| कुछ दूर आगे बढ़ने पर उसने महसूस किया कि कोई उसे देख रहा है| वह झट पीछे मुड़ी तो देखा कि सड़क के पहले मकान की गेट पर वह खड़ा था| तेज गति से बढ़ती हुई आगे जाकर मुड़ी तब उसकी सांस आई|

दूसरे दिन, तीसरे दिन वैसा ही हुआ|

‘’माँ, जब मैं आती हूँ तो आप भी स्टॉपेज पर रहा करो,’बेला माँ से बोली|

‘’क्यों बेटा, क्या बात है’’

‘’वो वो...’इसके आगे वह कह नहीं पाई|

दूसरे दिन जब वह स्टॉप पर पहुँची तो माँ खड़ी थी| वह निश्चिंत होकर चलने लगी| किन्तु वह नजर नहीं आया| शायद माँ के कारण वहाँ पर नहीं था| माँ ने भी कुछ नहीं पूछा|

कॉलेज जाना आना बेला के लिए डरावना होता जा रहा था| लगता है माँ यह सब समझ पा रही थी पर बात क्या है यह जानने में असमर्थ थी| बेला की माँ ने अब दूर से ही नजर रखनी शुरू की| दो तीन दिनों में ही सारा माजरा समझ गयी|

‘बेला, कहो तो मैं उसके घर जाकर उसकी माँ से बात करूँ’|

‘पर क्या बोलोगी माँ, वह कुछ अभद्रता तो नहीं करता न| पर उसका मुझे लगातार देखते रहना अच्छा नहीं लगता| मान लो वो बदमाश हुआ तो कहीं तेजाब...या’

‘न न बेटा, ऐसा नहीं कहते| मैं बात करती हूँ न उससे’|’

‘पर क्या’, इसका जवाब माँ के पास भी नहीं था| कहीं उससे कुछ कहूँ तो बेला के बारे में कुछ उल्टा सीधा कहकर बदनाम न करे या सरेआम दुपट्टा न खींच ले| उस वक्त लड़कों की यह शैतानी प्रायः चलती थी| आज का जमाना नहीं था उस समय, अब तो दुपट्टे भी गुमनामी में जी रहे|

एक दिन बेला कॉलेज से घर पहुँची तो माँ पापा किसी लड़के के बारे में बात कर थे| बेला ने सुना कि लड़का अच्छी नौकरी करता है| घर भी संभ्रांत है| बेला अचकचा कर पूछ बैठी, ‘ये किस लड़के की बात कर रहे आपलोग’

‘तेरे रिश्ते की’

‘क्या, अभी तो मुझे बहुत पढ़ना है’

‘पढ़ लेना बेटा, पढ़ने से कौन रोकता है| शादी के बाद भी पढ़ा जा सकता है| इज्जत से बेटी विदा हो जाए इससे बढ़कर क्या हो सकता है,’ शायद उस लड़के का भय माँ को भी सताने लगा था|

जिस दिन बेला की बारात दरवाजे पर खड़ी हुई उस दिन बेला की फाइनल परीक्षा थी जो वह दे न सकी| दिल में अपार दुःख लिए उस बाबला को कोसती हुई ससुराल के लिए रवाना हो गई|

करीब दो वर्षों के बाद बेला मायके आयी|उसने फिर से इंटर की परीक्षा के लिए फॉर्म भरा था| छूट गई पढ़ाई को वह पुनः थामना चाहती थी जबकि यह आसान नहीं था| पूरे दो महीने की इजाजत मिली थी मायके में रहने की|

जिस दिन वह आयी, शाम को माँ कहीं जाने की तैयारी में थीं |

‘कहाँ जा रही माँ’

‘उस बाबला की बेटी की छठी है , उसकी माँ ने बुलाया है|’

बाबला का नाम सुनते ही बेला के चेहरे पर कड़वाहट फैल गयी|

‘मैं भी चलूँ माँ’, खुद को संयत करते हुए उसने पूछा|

‘चलो’

जब वह वहाँ पहुँची, बाबला की नजर फिर उसे एकटक देखने लगी|

अब बेला को डर नहीं लग रहा था|

‘’क्या कर लेगा, वह खुद बेटी का पिता बन गया है| अब उसे पता चलेगा कि बेटी वालों पर क्या बीतती है,’’ यही सब सोचती हुई रस्म वाले कमरे में गयी|

उसने बिटिया को बेला की गोद में देते हुए कहा,’’इसे आशीर्वाद दो बेला’’|

‘तुझे जीवन में कोई बाबला न मिले जिससे तेरी पढ़ाई छूट जाए’ फुसफुसाते हुए बेला ने कहा|

बाबला को उसके अस्फुट शब्द सुनाई न पड़े|

उसने कहना जारी रखा,’’ बेला, हम सिर्फ पाँच भाई हैं| इसकी कोई बुआ नहीं| काजल का रस्म तुम ही पूरा कर दो न| मुझे शुरु से ही तुम में बहन जैसा फ़ील आता था किन्तु कभी कह न सका| यह संयोग है कि आज तुम आ गई| और यह है राखी जो मैं खरीद कर रखा करता था किन्तु इसे मेरी कलाई पर बाँधने वाली कोई बहन नहीं थी|’’

बेला जड़वत् बैठी रही| उसकी नजरों से उमड़ते स्नेह को वह झेल न सकी और खुद भी आँसू बहाने लगी|

--ऋता शेखर ‘मधु’

गुरुवार, 9 अगस्त 2018

उनके चरणों की मैं हूँ पुजारन- भक्ति गीत

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जिसने मोर मुकुट किया है धारण
उनके चरणों की मैं हूँ पुजारन

अपने मुख से दधि लपटाए
बाल रूप में कान्हा भाए
मात जसोदा लेती बलैंयाँ
नंद मंद मंद मुस्काए

जिसने बैजंती किया है धारण
उनके चरणों की मैं हूँ पुजारन

गौर वर्ण की राधा प्यारी
कृष्ण की सूरत श्यामल न्यारी
सदा प्रीत की रीत निभाए
ग्वाल बाल सब हुए बलिहारी

जिसने बंसी धुन किया है धारण
उनके चरणों की मैं हूँ पुजारन

कोपित इंद्र जब झुक नहीं पाए
बूँद झमाझम वह बरसाए
अँगुली पर पर्वत को थामे
सबको बा़के बिहारी बचाए

जिसने गोवर्धन किया है धारण
उनके चरणों की मैं हूँ पुजारन

बाल सखा को देखके रोए
फटे पाँव वह प्रेम से धोए
पूछें आलिंगन में भर भर
मित्र अभी तक कहाँ थे खोए

जिसने दिल में दया किया है धारण
उनके चरणों की मैं हूँ पुजारन

चक्र लिए विष्णु जी आए
कृष्ण रूप में खूब समाए
कुरुक्षेत्र में रण के रथ पर
विकल पार्थ को वह समझाए

जिसने सारथि रूप किया है धारण
उनके चरणों की मैं हूँ पुजारन
जिसने मोर मुकुट किया है धारण
उनके चरणों की मैं हूँ पुजारन
--ऋता शेखर मधु

रविवार, 1 जुलाई 2018

ग़ज़ल

2122 1122 22

उल्फतों का वो समंदर होता
पास में उसके कोई घर होता

दर्द उसके हों और आँसू मेरे
प्रेम का ऐसा ही मंजर होता

दिल के जज़्बात कलम से बिखरे
काग़ज़ों पर वही अक्षर होता

मुस्कुराता रहा जो बारिश में
दीन में मस्त कलन्दर होता

सर्द मौसम या तपन सूरज की
झेलता मैं तो सिकन्दर होता
-ऋता

शुक्रवार, 22 जून 2018

पुरस्कार

पुरस्कार 

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लगभग चार वर्ष पहले अनीता की नियुक्ति मध्य विद्यालय में हुई थी| जिस दिन वह विद्यालय में योगदान देने गईं , सभी शिक्षक और बच्चे बहुत खुश हुए थे क्योंकि वहाँ गणित के लिए कोई शिक्षक न था| 
योगदान देने के बाद प्रधानाध्यापिका ने उन्हें बैठने को कहा और बोलीं, “अनीता जी, आप कल से क्लास लीजिएगा| हम आपको आठवीं कक्षा की क्लास टीचर बनाएँगे|" 
उसके बाद उन्होंने एक बच्चे को पुकारा,”रोहित बेटा, ये नई मैडम आई हैं| जरा बाहर चाय वाले को कह दो कि चाय दे जाए|’ 
“जी मैम, “कहकर वह बाहर गेट पर के चायवाले को कह आया| 
“पर आपने बच्चे को क्यों भेजा,”बात अनीता के गले से न उतरी| 
“मध्य और प्राथमिक विद्यालयों के लिए सरकार ने चपरासी और क्लर्क का पद नहीं रखा है| इसलिए कुछ काम बच्चों से भी करवा लेते हैं|’जवाब सुनकर अनीता ने उनकी लाचारी को समझा| 
कुछ देर बाद किसी कागज की फोटो कॉपी करवाने और मध्यान्ह भोजन के लिए दाल मँगवाने के लिए उन्होंने रोहित को भेजा| 
“मैम, आप बार बार रोहित को ही क्यों भेजती हैं काम के लिए| किसी अन्य को भी भेजिए,”अनीता ने जिज्ञासा प्रकट की| 
“क्योंकि वह स्कूल का सबसे जिम्मेदार बच्चा है,” कह कर वह आफिस में चली गईं| 
दूसरे दिन अनीता समय से कुछ पूर्व विद्यालय पहुँचीं| उन्होंने देखा कि रोहित भी आ चुका था| उसने विद्यालय के सभी कमरों के ताले खोले| कुछ कुर्सियाँ निकाल कर बाहर बरामदे में रखी| प्रार्थना सत्र समाप्त हुआ तो सभी बच्चे अपनी अपनी कक्षा में चले गए| 
अनीता रजिस्टर लेकर आठवीं क्लास में गई| सबसे पहले बच्चों के स्तर को जाँचने के लिए उसने गणित का एक सवाल दिया| रोहित ने झटपट बना कर दिखा दिया| अनीता ने बोर्ड पर फिर दूसरा सवाल दिया| सभी बच्चे हल करने लगे| तभी बाहर से रोहित की पुकार हुई| 
“सुनकर आता हूँ मैम, “कहकर वह चला गया| अनीता ने उसकी कॉपी देखी| वह आधा सवाल हल कर चुका था| रोहित वापस आकर उत्तर पूरा करने लगा| पाँच मिनट बीत गये| दूसरे बच्चों ने तबतक दिखा दिया| रोहित के माथे पर पसीने की बूँदें थीं| 
‘ क्या हुआ रोहित, नहीं बन रहा क्या”,अनीता ने पूछा| 
“मैम, बार बार भाग देने में गल्ती हो जा रही|” 
अनीता समझ गई कि ध्यान भंग होने की वजह से ऐसा हो रहा| वह रोहित से कुछ कहने ही वाली थी कि बाहर से फिर बुलावा आ गया| इस बार रोहित ज्यों ही उठा, अनीता ने उसे बैठकर सवाल हल करने को कहा और स्वयं बाहर चली गई| 
“आप क्यों आ आईं क्लास छोड़कर,” हेड मैम को अनीता का आना अच्छा नहीं लगा था| 
“रोहित भी तो क्लास छोड़कर ही आता मैम| बताइए, क्या करना है| मैं कर देती हूँ| मैं अपने क्लास से पढ़ाई के दौरान किसी को निकलने नहीं दूँगी|” दृढ़ता से अनीता ने कहा| 
“वैसा कुछ काम नहीं है, आप जाइए,” अनीता वापस आ गई| रोहित ने वह सवाल हल कर लिया था| उसकी कॉपी देखते हुए अनीता ने पूछा,”देखो रोहित, काम करना अच्छी बात है किन्तु इससे एकाग्रता भंग होती है, तुमने देखा न अभी|पढ़ने वाले बच्चों को हमेशा पढ़ाई पर ही एकाग्र रहना चाहिए|” 
“किन्तु मैम, मुझे बुलाया जाए तो क्या करूँ, क्या कहूँ|” 
“देखो बेटा, तुम वे सारे काम लंच ब्रेक में भी कर सकते हो न| सुबह भी मैं बच्चों की पारी बनाकर विद्यालय खोलने की जिम्मेवारी बाँट दूँगी| सुबह का समय भी पढ़ाई में लगाया करो| पढ़ाई ही तुम्हारा भविष्य है| दसवीं में अच्छे नम्बर नहीं आए तो अच्छी जगह दाखिला नहीं मिलेगा|” 
उस दिन के बाद से रोहित को बीच कक्षा से नहीं बुलाया गया| आठवीं पूरी करके वह किसी दूसरे शहर चला गया था जहाँ उसके पिता का तबादला हो गया था| 
दसवीं की बोर्ड परीक्षा का परिणाम आ चुका था| विद्यालय में जिला शिक्षा पदाधिकारी का निमंत्रण पत्र आया हुआ था| बोर्ड परीक्षा में जिलास्तर और राज्यस्तर पर अच्छा रैंक लाने वाले बच्चों को आज सरकार की ओर से सम्मानित किया जाना था| वहाँ जाने की जिम्मेदारी अनीता को सौंपी गई| मंच पर कार्यक्रम शुरु हो चुका था| बच्चे आते और अपना सम्मान शिक्षा मंत्री से लेकर वापस चले जाते| अनीता का ध्यान आज रोहित की ओर जा रहा था| पता नहीं रोहित को कितने प्रतिशत नम्बर आए होंगे, बार बार यह बात जेहन में आ रही थी| 
“और जिला स्तर पर प्रथम स्थान पाने वाले बच्चे का नाम है, रोहित कुमार”, मंच पर आनेवाला बालक सम्मान ग्रहण कर चुका था| 
उससे पूछा गया,”तुम अपनी सफलता का श्रेय किसे देना चाहोगे|” “अनीता मैम को,”सुनकर अनीता की तंद्रा अचानक भंग हुई| 
“यदि अनीता मैम यहाँ हैं तो मंच पर आने की कृपा करें| मैं उनका आशीर्वाद लेना चाहता हूँ|” हॉल के पिछले सीट पर बैठी अनीता रोहित को पहचान नहीं पाई थी| 
अब उसके कदम मंच की ओर बढ़ रहे थे, आख की कोरों पर आई बूँदें ढलक जाना चाहती थीं| 
“मैम, आपने मुझे समझाया न होता तो आज मैं यहाँ नहीं होता,” कहते हुए रोहित अनीता के पैरों पर झुक गया| तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूँज रहा था| अनीता को लग रहा था जैसे रोहित ने उसे बेस्ट टीचर का पुरस्कार दिया है| 
@ऋता शेखर ‘मधु’

बुधवार, 20 जून 2018

मिट्टी वाले खेत

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मिट्टी वाले खेत
रडार ट्वेनटी फोर की साइट पर आसमान में वायुयानों का गमन देखने वाले अधिकारियों के बीच खलबली मच गई| तिरंगे साफे में ये कौन प्रकट हो रहा है| मजबूत नसों वाली दुबली काया किसकी है?
किसी आशंका ने सबको डरा दिया| रक्षा मंत्रालय को फोन किया गया| मंत्रालय में फोन रिसीव करने वाले ने फोन रखा ही था कि दूसरी बार घंटी बजी| यह फोन मेट्रो के अधिकारी का था|
‘सर, हम अपने मेट्रो पर चौबीस घंटे नजर रखते हैं| हमारे स्क्रीन पर तिरंगे साफे में ये कौन प्रकट हो रहा है| मजबूत नसों वाली दुबली काया किसकी है?कहीं हमारा मेट्रो निशाने पर तो नहीं’
अगला फोन एक बड़े बिल्डर का था| उसने भी वैसा ही कुछ देखा था अपनी गगनचुम्बी इमारत के पास|
रेलवे से भी इसी आशय का फोन आया| अभी रक्षामंत्री को बताने की योजना बन ही रही थी कि मंत्रालय में अब जो फोन आया उससे हड़कम्प मच गया| एटॉमिक सेन्टर ,जहाँ से कुछ देर में ही एक उपग्रह छोड़ा जाने वाला था, वहाँ भी वह प्रकट हो गया था| अफरा तफरी मच गई| सबको रक्षा मंत्रालय से नेटवर्किंग के जरिए जोड़ा गया|
रक्षामंत्री ने सवाल किया,”तुम कौन हो| यदि तुम सुन और बोल सकते हो तो जवाब दो| यदि हमारे देश को नुकसान पहुँचाने आए हो तो तुम्हारा इरादा कभी पूरा नहीं होगा|हम सभी देशभक्त हैं|”
अचानक उसने अपना साफा हवा में लहरा दिया,” मेरे इस साफे को देखो| इसकी हरियाली धूमिल हो रही है तुम लोगों की वजह से| अब ध्यान से देखो मुझे, जब मैं ही न रहूँगा तो तुम और तुम्हारे ये सारे आधुनिक उपकरण भी न रहेंगे|’
‘अरे , तुम तो किसान लगते है| पर तुम्हारी हमसे क्या शिकायत है|”
“शिकायत, हा हा हा, फसल कंक्रीटों पर नहीं उगते साहब| उसके लिये मिट्टी वाले खेत चाहिए जिसे तुमलोग हमसे छीनते जा रहे हो| देश को कौन नुकसान पहुँचा रहा, सभी देशभक्त सोचिएगा,’ यह कहते हुए वह धीरे धीरे विलुप्त हो गया|
अब सबकी नजरें अपने अपने स्क्रीन पर थीं जहाँ दूर दूर तक हरियाली का नामोनिशान नहीं था|
-ऋता शेखर ‘मधु’

शुक्रवार, 8 जून 2018

मौसम गर्मी का- बाल गीत


बाल-गीत




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मौसम गर्मी का है आया
सूरज छतरी से शरमाया


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गुलमोहर की लाली देखो
उसमें तुम खुशहाली देखो


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तरबूजों की शान निराली
शर्बत बनकर भरती प्याली


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पीले पीले आम सुहाने
ठेलों पर आ गए रिझाने


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हुई गुलाबी लीची रानी
पेटी में भर लाई नानी


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छुट्टी में तुम पढ़ो कहानी
पीकर मीठा नरियल पानी


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बच्चों मन को कर लो ताज़ा
खाओ सॉफ्टी पी लो माज़ा

ऋता शेखर मधु