शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

अँकुर-लघुकथा

1.बीज का अँकुर
पन्द्रह दिन पहले सोनाली की शादी हुई थी| सोनाली के मम्मी-पापा बेटी से मिलने ससुराल आए थे| सोनाली के सास, ससुर, ननद, देवर सबने दिल खोलकर स्वागत किया|
थोड़ी देर बाद ससुर जी ने कहा,”बहु, अपने मम्मी-पापा को अपने कमरे में ले जाओ|”जी पापा जी,’कहकर सोनाली माता पिता को अपने कमरे में ले गई|
बेटा, यहाँ सब ठीक तो है न|तुम्हारा मान सम्मान कैसा है| दामाद जी का व्यवहार कैसा है,’पिता की चिन्ता वाजिब थी|
जी पापा, सब ठीक है| बस मुझे एक ही बात अच्छी नहीं लगती कि सवेरे सवेरे उठकर ननद, देवर के लिए नाश्ता बनाना पड़ता है| ससुर जी के लिए चाय, सासु माँ के लिए पूजा की तयारी, साथ ही आपकेदामाद जी की फरमाइशें| दो घंटे चकरघिन्नी की तरह नाचने के बाद ही मैं अपना काम कर पातीहूँ|’और दिन भर’, पापा ने सवाल किया|
फिर दिन भर आराम है| टीवी देखती हूँ| इनके साथ घूमने जाने पर कोई रोक टोक नहीं|’
कोई तुमसे सख्त आवाज में बात भी करता है क्या,’
नहीं तो,’ सोनाली ने सच बताया|
फिर बेटा, ये शिकायत कैसी! क्या वहाँ तुम मेरा और अपनी माँ का ख्याल नहीं रखती थी? छोटे भाई बहन को खाना भी देती थी| वहाँ तो तुम्हें कोई शिकायत न थी|’
जीसोनाली ने सर झुकाकर कहा|
तभी सोनाली को उसकी सासू माँ नेआवाज दी| सोनाली चली गई तो उसकी माँ ने कहा, ‘बेचारी बच्ची ने अपने दिल की बातबताई और आपने उसे ही समझा दिया|’
नहीं सोनाली की माँ, उसे यहाँ कोई तकलीफ नहीं| जिम्मेदारियाँ निभाना हर बहु को आना चाहिए| यदि आज हम उसकी शिकायत सुन लेंगे, मतलब इस घर में विष का बीज बो देंगे| उसके विषैले अँकुर में पनपी परिस्थितियाँ सबके लिए भयावह हो जाएँगी|’
दरवाजे पर खड़ी सोनाली ने मुस्कुराकर कहा,’ मेरे पापा दुनिया के सबसे अच्छे पापा हैं|’
--ऋता शेखर मधु

गुरुवार, 25 अगस्त 2016

आज मैं...सबका दुलारा कृष्ण हूँ

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आज मैं....

आज मैं
देवकी का दर्द
यशोदा का वात्सल्य
राधिके का प्रेम
रुक्मिणी का खास हूँ

आज मै
वासुदेव की चिंता
नंद का उल्लास
गोपियों का माखनचोर
पनघट का रास हूँ

आज मैं
कंस का संहारक
कालिया का काल
सुदामा का सखा
योगमाया का विश्वास हूँ

आज मैं
द्रौपदी का भ्राता
पार्थ का सारथी
गीता का प्रणेता
युग युग की आस हूँ

आज मैं
सम्पूर्ण ब्रह्मांड लिए
जग का पालनहार
सोलह कलाओं से युक्त
नीला आकाश हूँ

हाँ, मैं सबका प्यारा, दुलारा कृष्ण हूँ|

--ऋता शेखर 'मधु'

शनिवार, 20 अगस्त 2016

कोरे विचार-लघुकथा

कोरे विचार
अनन्या और तुषार दोनो मल्टीनेशनल कम्पनी में इंजीनियर थे| एक प्रेजेंटेशन के दौरान दोनो एक दूसरे से मिले| तुषार को अनन्या अच्छी लगी तो उसने अपने माता पिता को बताया|
आज तुषार के घरवालों ने अनन्या के माता-पिता को बुलाया था|
“हमने अनन्या को अच्छी शिक्षा दी है| अच्छे पैकेज वाली नौकरी भी लगी है उसकी| हमें लगता है लेन देन जैसी कोई बात न होगी| लड़का लड़की ने एक दूसरे को पसंद कर लिया है| हमें पंडित जी से शुभ मुहुर्त निकलवा कर ही जाना चाहिए,” रास्ते में अनन्या की मम्मी बोले जा रही थीं|
तुषार के घर उनके स्वागत में कोई कमी नहीं की गई| बातों का क्रम आगे बढ़ा|
“देखिए, हम लेन देन की बात नहीं कर रहे| दोनों खुश रहें इससे बढ़कर हमें क्या चाहिए| बाकी लड़की को कपड़े, गहने, गाड़ी जो कुछ भी दें उससे हमें कोई मतलब नहीं| बस इंगेजमेंट, शादी और रिसेप्शन टॉप होटल में करें और वह खर्च उठा लें| शादी बार बार नहीं होती तो यह सब यादगार होना चाहिए| वो क्या है न कि तुषार की अच्छी शिक्षा में हमारा बैंक बैलेंस... ”
“बैंक बैलेंस तो हमारा भी...” सोचती हुई बिना दहेज की शादी के कोरे विचार पर हँस दी अनन्या की मम्मी|
--ऋता शेखर ‘मधु’

मंगलवार, 16 अगस्त 2016

धनवान-लघुकथा

धनवान 
मुसलाधार बारिश में माया छतरी लेकर जल्दी जल्दी घर जा रही थी|
''अरे माया, गाड़ी में आ जा" अचानक माया के बगल में एक बड़ी सी कार रुकी और ऐश्वर्या ने दरवाजा खोला|
''मैं चली जाऊँगी''
''अब आ भी जा न|''
माया फिर ना नहीं कह सकी| छतरी बन्द करके अन्दर आ गई|
अन्दर बैठकर अपनी अमीर सहेली की साड़ी की कीमत आँकती हुई अपने कपड़े से उसकी तुलना करने लगी|
''माया, मेरे घर चल| आज बड़े दिनों बाद मिले हैं| गप्पें शप्पें लड़ाएँगे|''
गाड़ी एक आलीशान बँगले के सामने रुकी| गार्ड ने दरवाजा खोला| दोनो उतरीं और अन्दर गई| माया उसकी शान शौकत देखकर हीनता से ग्रसित हो रही थी| ऐश्वर्या के दोस्ताना व्यवहार में कमी नहीं थी| दोनो खूब बातें करती हुई ठहाके लगाने लगीं|
तभी गार्ड ने सूचना दी,''मेम साब, साहब आ गए|''
माया जाने के लिए उठ खड़ी हुई| तब तक ऐश्वर्या के पति अन्दर आ गए| चाल की लड़खड़ाहट और मुँह से आती तेज दुर्गंध से माया थोड़ा घबरा गई| उसने जल्दी से हाथ जोड़कर नमस्ते किया और बाहर आ गई| अन्दर से ऐश्वर्या के तेज तेज बोलने की आवाज आ रही थी| शायद वह इस स्थिति का विरोध कर रही थी| फिर तेज थप्पड़ की आवाज सुनाई दी जिसकी गूँज माया को घर पहुँचने तक सुनाई देती रही|
घर पहुँच कर माया ने देखा, उसके पति गर्मागरम चाय के साथ उसका इन्तेजार कर रहे थे| माया ने धीमे से कहा,'' मैं बहुत धनवान हूँ|"
-ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 14 अगस्त 2016

एक शपथ-स्वतंत्रता दिवस के लिए

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जन कल्याण की लिए मशाल
हम सबको बढ़ते जाना है
जन हित हो जीवन का मकसद
दुनिया में अलख जगाना है

साफ सुलभ रस्तों पर चलकर
बन्धु बान्धव घर को जाएँ
कहीं मिले न कूड़ा कचरा
प्रयत्न सदा यहीं कर आएँ
गली मुहल्ले मह मह महकें
फूलों के बीज लगाना है

जन कल्याण की लिए मशाल
हम सबको बढ़ते जाना है

अंधियारों में पथ रौशन हो
पोल पोल पर बल्ब जले
ठोकर खाकर गिरे न कोई
गढ्ढे सड़कों के भरे मिलें
समवेत प्रयासों से सबको
ऐसा ही नगर बसाना है

जन कल्याण की लिए मशाल
हम सबको बढ़ते जाना है

सड़कों पर नारी निडर रहे
बच्चों को मिल जाये पोषण
अमीर गरीब का भेद मिटे
मजदूरों का हो न शोषण
छोटे छोटे डग भर भर कर
हमे हिमालय पाना है

जन कल्याण की लिए मशाल
हम सबको बढ़ते जाना है
-ऋता शेखर मधु

बुधवार, 10 अगस्त 2016

तुम जिन्दा हो - लघुकथा

 तुम जिन्दा हो 

आइने के सामने खड़ा होकर वह सोच रहा था, 

“वो कौन सी शक्ति थी जो बार बार उससे कह रही थी - कूद जाओ, तुम्हारी किसी को जरूरत नहीं|”

सेन फांसिसको के गोल्डन ब्रिज से वह प्रायः गुजरता था फिर उस दिन उसके मन में यह बात क्यों आई| क्या वाकई सागर की लहरों ने उसे बुलाया या वह मात्र वहम् था| प्यार में धोखा खाने के बाद खुद को खत्म कर लेने का विचार ही तो उन लहरों से नहीं गूँज रहा था|

“जिन्दगी से भागने वाले कायर होते हैं,” दृढ़तापूर्वक दोस्तों के बीच यह कहने वाला खुद जिन्दगी से भाग खड़ा होने को तैयार था|"

यह कुदरत का करिश्मा ही था कि उस दिन ब्रिज से बीच महासागर में छलांग लगाने के बाद वह सी- लायन की पीठ पर अटक गया था| बचाव दस्ता की नजर पड़ी और उसे बचा लिया गया|

आज आइने का अक्स कह रहा था, “जिन्दगी को तुम्हारी जरूरत थी इसलिए तुम जिन्दा हो| पर कायर भी हो, इसे स्वीकार कर लो|”

“ हाँ, हाँ मैं कायर हूँ और वह निर्णय मेरी सबसे बड़ी भूल थी,” उसका दिल चीख चीख कर कह रहा था|

--ऋता शेखर ‘मधु’

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

व्यवस्था का नकाब-लघुकथा

. व्यवस्था का नकाब

व्यवस्था सभी काम सुव्यवस्थित तरीके से करना चाहती थी पर हो नहीं पाता था| इसी परेशानी में वह दफ़्तर की कुर्सी पर बैठी थी कि उसे सुखद आश्चर्य हुआ जब उसने सामने अपनी पुरानी सहेली नकाब को देखा|

‘’क्या बात है भई, बड़ी परेशान दिख रही हो,’’ नकाब ने हँसते हुए पूछा|

‘’ देखो न सखी, मैं चाहती हूँ कि सब कर्मचारी सही समय पर आएँ और पूरी लगन, इमानदारी और निष्ठा से काम करें| लेकिन यह मुमकिन नहीं हो पाता| कोई देर से आता है और कोई समय से आकर भी गप्पें हाँकता रहता है|  मैं अपने से ऊपर वाले पदाधिकारी को क्या जवाब दूँगी,’’ माथे पर हाथ रखकर व्यवस्था कह रही थी|

‘’ क्या यहाँ कोई मेहनती और सत्यवादी नहीं|’’

‘’ हाँ, एक बेचारा भला आदमी है जो कर्तव्यनिष्ठ है|’’

‘’ फिर तो बात बन गई| जब कोई पदाधिकारी आए तो उसे सामने कर दे और वह सत्यनिष्ठ नकाब का काम करेगा और तेरी सारी अव्यवस्था को अपने भीतर छुपा लेगा,’’ मुस्कुराते हुए नकाब ने कहा|

व्यवस्था न चाहते हुए भी मान गई क्योंकि व्यवस्था ही कुछ ऐसी थी|


-ऋता शेखर ‘मधु’ 

सोमवार, 1 अगस्त 2016

गुलामों की भीड़ - लघुकथा

गुलामों की भीड़

जिलाधिकारी महोदय के करीबी मित्र कवि थे और शहर में कविता पाठ करना चाहते थे। इसके तहत एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया और भीड़ जुटाने की जिम्मेदारी जिलाधिकारी महोदय ने ली, आखिर मित्र जो थे।

एक मेसेज टाइप कर सबको S M S किया गया-
" सभी बी एल ओ को सूचित किया जाता है कि हिंदी भवन में आज शाम 4 बजे मीटिंग है। सबको आना अनिवार्य है। न आने वालों को " कारण बताओ" नोटिस जारी किया जाएगा।"

खचाखच भरे हॉल में कविता पाठ सुन रही गुलामों की भीड़ "कारण बताओ (show cause)" से बच जाने के कारण खुश थी।

-ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 27 जुलाई 2016

सुराख वाले छप्पर - लघुकथा

सुराख वाले छप्पर 

कॉल बेल बजते ही मिसेज तनेजा दरवाजे पर पहुँचीं| बगल के फ्लैट की नई पड़ोसन मिसेज भल्ला थीं| हाथ जोड़कर नमस्ते बोलते हुए मिसेज तनेजा ने उन्हें ड्राइंग रूम में बैठाया और हँस हँस कर बातें करने लगीं| सौम्य मिसेज भल्ला सिर्फ मुस्कुराकर थोड़े शब्दों में जवाब दे रही थीं|

“ पता है मिसेज भल्ला, सामने वाली मिसेज वर्मा ने अपनी सास को वृद्धाश्रम में छोड़ रखा है| पति पत्नी दोनों सुबह काम पर निकल जाते हैं| उनका कहना है कि वे सास को किसपर छोड़ें| किसी कामवाली पर छोड़ने से अच्छा है वृद्धाश्रम में रखना| ये कोई बात हुई भला, क्या जमाना आ गया है”, मिसेज तनेजा बोले जा रही थीं|
मिसेज भल्ला ने धीरे धीरे कहना शुरु किया|

” मेरी सास नहीं हैं| मेरा छोटा सा बेटा दोस्तों से सुन सुन कर दादी को देखना चाहता था| कल मैं उसे वृद्धाश्रम लेकर गई| मेरे साथ मिसेज वर्मा भी थीं| उन्होंने सास के लिए बहुत सारा सामान ले रखा था| वृद्ध महिलाओं ने बेटे से खूब लाड़ लगाया| वहीं बिस्तर पर पड़ी एक वृद्धा ने बताया कि उनकी बहु घर में रहती है फिर भी मैं यहाँ रहती हूँ| मैं ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि वह हमेशा खुश रहे जिससे मेरा बेटा और पोता खुश रहें| उनके हाथों में एक फोटो ले रखा था जो वह था| ’’ शो केस में लगे मिसेज तनेजा के परिवार की फोटो की ओर इशारा किया मिसेज भल्ला ने|

मिसेज तनेजा के पीले पड़ते चेहरे को देखकर मिसेज भल्ला चुपचाप बाहर निकल गईं|

--ऋता शेखर ‘मधु’

शनिवार, 23 जुलाई 2016

संवेदना-लघुकथा

संवेदना
किरण और सुमन फेसबुक मित्र थीं| फेसबुक पर पोस्ट की गई किरण की कविताएँ सुमन को बहुत अच्छी लगती थीं | किरण की हर संवेदना पर लाइक की मुहर लगाने वाली वह प्रथम पाठक हुआ करती थी| इधर कई दिनों से किरण की कोई पोस्ट न देखकर सुमन ने इनबॉक्स में पूछा|
“अपने मित्रों की पोस्ट पर सैकड़ों लाइक और कमेंट देखकर मैं हीन भाव से ग्रसित हो जाती हूँ कि मैं वैसा क्यों नहीं लिख पाती’’, किरण ने रोने वाली स्माइली के साथ बताया| सुमन ने समझाने की कोशिश की पर वह समझने को तैयार नहीं थी|
आज एक बेबी शो में रु-ब-रु मिलने का मौका मिला था| गर्मजोशी से एक दूसरे से गले मिलकर दोनों बहुत खुश थीं|’बेबी शो’ की प्रतिस्पर्धा में किरण का आठ महीने का गुलथुल बेटा भी शामिल था| हर तरह के परीक्षणों के बाद परिणाम की बारी थी| जीत वाली लिस्ट में किरण के बेबी का नाम नहीं था मगर इससे बेखबर वह अपने बच्चे को प्यार किए जा रही थी|
‘ तुम्हारा बेटा नहीं जीत सका फिर भी तुम उससे प्यार क्यों किए जा रही हो”, सुमन ने तीखी बात कही|
“जीत से क्या मतलब, यह मेरा बच्चा है तो प्यार क्यों न करूँ,” किरण ने तल्खी से कहा|
“वही तो किरण, तुम्हारी कविताएँ तुम्हारी अपनी संवेदनाएँ हैं| उनसे प्यार करना क्यों छोड़ दिया,” सुमन ने कहा|
किरण के चेहरे की चमक बता रही थी कि हीनता का बदरंग आवरण गिर चुका था|
(मौलिक एवं अप्रकाशित )
----ऋता शेखर ‘मधु’

मंगलवार, 19 जुलाई 2016

देवदूत - लघुकथा

देवदूत 


ऑपरेशन थियेटर में कल्याणी देवी की बहु गंभीर अवस्था में जा चुकी थी| डेलिवरी के लिए सबकुछ सामान्य था कि अचानक बच्चे की पोजीशन गड़बड़ हो गई| शिशु का हृदय स्पंदन मंद पड़ने लगा और माँ की स्थिति भी बिगड़ने लगी| थियेटर में जाते वक्त लेडी डॉक्टर क्षण भर के लिए कल्याणी देवी के सामने रुकी फिर अन्दर चली गई|
करीब एक घंटे बाद डॉक्टर अपने हाथों में नवजात को लेकर आई| 
''आंटी, मैं आयुषी'', शिशु को दादी के हाथों में देकर उसने कल्याणी देवी के पैर छूते हुए कहा|
''आयुषी बेटा,''भावातिरेक में कल्याणी देवी कुछ कह नहीं पाई| पच्चीस साल पहले की वह घटना उनकी आँखों के सामने चलचित्र की भाँति घूम गई|

इस शहर से उस शहर का फासला ट्रेन से चार घंटे का था| मेडिकल की प्रवेश परीक्षा देने के लिए परीक्षार्थियों की भीड़ उमड़ पड़ी थी| एक छोटी कमसिन सुन्दर लड़की अपने वृद्ध पिता के साथ कल्याणी देवी के कम्पार्टमेंट में आकर बैठी| कुछ देर बाद  ट्रेन अगले स्टेशन पर रुकी| पीने का पानी घर में ही छूट गया था और लड़की को प्यास लगी थी| वहाँ ट्रेन को कुछ देर रुकना था सो वह वृद्ध पानी लाने स्टेशन पर उतरे| पानी का नल उस डिब्बे से थोड़ी दूरी पर था| पानी लेकर लौटते तबतक इंजन ने सीटी दे दिया और ट्रेन धीरे धीरे सरकने लगी| लड़की हड़बड़ाई सी गेट पर गई| अभी उसके पिता कुछ दूरी पर ही थे कि ट्रेन ने पूरी रफ़्तार पकड़ ली| लड़की वापस अपनी सीट पर आकर बैठी और रोने लगी| मनचलों की  फब्तियों का दौर शुरु हो गया|
''बेटी, कहाँ जाना है,''कल्याणी देवी ने पूछा|
''मैं मेडिकल की परीक्षा देने जा रही हूँ| उस शहर तक पिता जी अगली ट्रेन पकड़कर आ जाएँगे| लेकिन आंटी, मेरी परीक्षा छूट जाएगी| मैं वहाँ किसी को नहीं जानती| परीक्षा केंद्र भी कहाँ है , नहीं जानती| '' सुबकते हुए लड़की ने बताया|
''अजी हम जानते हैं परीक्षा केंद्र, हमारे साथ चलना, पहुँचा देंगे,''  मनचलों के ठहाकों के बीच से यह आवाज आई|
लड़की थरथर काँपने लगी|
कल्याणी देवी ने एडमिट कार्ड देखा| लड़की का नाम आयुषी था|
'' बेटी, हम उसी शहर के हैं|  तुम्हें ले चलेंगे,'' मनचलों की भीड़ को घूरते हुए कल्याणी देवी ने कहा|
ट्रेन रुकी| कल्याणी देवी सीधे केंद्र पर पहुँचीं| आयुषी को अन्दर भेज उन्होंने राहत की साँस ली| तीन घंटे की परीक्षा थी|
''निकलकर कहाँ जाएगी आयुषी,'' यह सोचकर केंद्र पर ही बैठ गईं| दो घंटे बाद अचानक किसी ने पूछा,''आपने देखा है मेरी आयुषी को''
मुड़कर कल्याणी देवी ने देखा| वही वृद्ध आँखों में आँसू लिए खड़े थै|
'' जी, वह परीक्षा देने अन्दर गई है'' कल्याणी देवी ने मुस्कुराते हुए कहा|
वृद्ध के दोनों हाथ आसमान की ओर उठ गए और उनकी आँखों से आँसुओं की अविरल धार बही जा रही थी|
--ऋता शेखर 'मधु'

गुरुवार, 14 जुलाई 2016

वजन - लघुकथा

वजन
पुलिस ने धर्मेश जी को रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार कर लिया।
पत्नी और बेटा सामने ही खड़े थे किन्तु उनकी आँखों में कोई सहानुभूति न थी।
धर्मेश बाबू को अपने वृद्ध पिता की बात याद आ गई।

" बेटे, सरकारी नौकरी में सावधानी की बहुत जरूरत होती है। बिना वजन के सरकारी कागज को निपटाना सीखो। आज जिनकी सुख सुविधा के लिए वजन रखवाते हो, क्या पकडे जाने पर वे तुम्हारा साथ देंगे।"

" पिता जी, आप तो बस शुरू हो जाते हैं। बहती गंगा में हाथ धोने में क्या बुराई है।"

"बुराई है बेटा, इज्जत खो जाये तो फिर से वापस नहीं मिलती।  उस निर्जन राह का साथी कोई नहीं होता।"

जाते जाते पत्नी को कहते सुना धर्मेश जी ने, " इज्जत मिटटी में मिला दी इन्होंने, सहेलियो को क्या मुँह दिखाऊँगी।"

सरकारी फाइलों पर रखे वजन का बोझ सीने पर महसूस करते हुए धर्मेश जी मायूस और थके कदमों से पुलिस की गाड़ी में बैठ गए।
-----ऋता शेखर -----

शनिवार, 9 जुलाई 2016

नेग - लघुकथा

नेग
ड्राइंगरूम मिडिया वालों से भरा था। प्रसिद्ध समाजसेविका सुषमा जी एवम् उनकी नवविवाहिता बहु को रु ब रु होना था।
पन्द्रह दिन पहले ही सुषमा जी का पुत्र निचली जाति की लड़की को ब्याह लाया था। सुषमा जी ने दिल पर पत्थर रखकर बहु का स्वागत किया। सुखी संपन्न घर में बहु को सुख सुविधा की कोई कमी नहीं थी। घर के लोग भी नई बहु के साथ सहज थे। नई बहु की चुल्हा छुलाई की रस्म भी हो चुकी थी। उस दिन सबने बहु के हाथ की बनी खीर खाई किन्तु सुषमा जी ने तबियत खराब का बहाना बना कर खीर नहीं खाई। बिना खाये ही वह गले से चेन उतारकर बहु को नेग देने लगीं।
" मम्मी जी, मैं यह नेग बाद में लूँगी," कहकर बहु ने आदर के साथ चेन लौट दिया।
उस दिन के बाद भी जब वह कुछ भी अपने हाथों से बनाकर लाती, सुषमा जी किसी न किसी बहाने टाल जातीं ।
निचली जाति की बहु को अपनाने का आदर्श समाज में स्थापित हो चुका था। मीडिया वाले समाज को अच्छा सन्देश देना चाहते थे इसलिए वे दोनों साक्षात्कार देने वाली थीं।
सवाल जवाब का सिलसिला शुरू हुआ।
" जब आप ब्याहकर आईं तो घरवालों का व्यवहार कैसा था।"
" जी, बहुत अच्छा। सबने बहुत प्यार से अपनाया मुझे। "
" जाति को लेकर किसी तरह का भेदभाव महसूस किया आपने।"
"बिल्कुल नहीं।"
"सुषमा जी आपके हाथों का बना खाना कहती है।"
जिस सवाल का डर था वह सामने आ चुका था। सुषमा जी के माथे पर पसीना चुहचुहा गया।
" जी, बिलकुल खाती हैं। माँ अपनी बेटी के हाथों का खाना क्यों न खायेंगी भला।" सुनकर सुषमा देवी की आँखें भर आयीं।
मीडिया वाले ख़ुशी ख़ुशी चले गए।
"बहु, तुमने आज जो सेवइयां बनाई है, लाकर देना जरा।"
कमरे की और जाती बहु ठिठक गई।
सुषमा जी के पति ने चुहल किया,"तुम्हारी जात भ्रष्ट हो जायेगी।"
तब तक बहु कटोरा लिए आ चुकी थी और चुपचाप खड़ी थी।
"दो बेटी", सुषमा जी ने हाथ बढ़ाया।
"मम्मी जी, पहले नेग।"
ठहाकों की गर्मी से जाति रुपी बर्फ की परत पिघल रही थी।
---ऋता शेखर मधु

झूठ...

बुधवार, 6 जुलाई 2016

सफेद झूठ - लघुकथा

सफेद झूठ

कम्पनी की ओर से आशु को दो वर्षों के लिए विदेश भेजा गया था| पिता अनिकेत और पुत्र आशु विडियो कॉल से ही बातें करते|

इधर कई दिनों से अनिकेत की बात बेटे आशु से नहीं हो पा रही थीं| फोन पर भी एक दो शब्दों में आशु का जवाब देना अनिकेत को सशंकित कर रहा था| 
आज अनिकेत से नहीं रहा गया तो उसने विडियो कॉल पर आशु को बुलाया| रात के आठ बज रहे थे और सोफे पर पसरा आशु पेट पर ही लैपटॉप रखकर बातें करने लगा| 

कुशलक्षेम पूछने के बाद अचानक अनिकेत ने कहा,''बेटे, नौकरी करते हुए तुम्हें पाँच वर्ष हो गए| अब विवाह कर लेना चाहिए तुम्हें| कोई लड़की पसन्द है तो बता दो , या हम यहाँ लड़की देखें|''

''पापा, मैं आपलोगों की पसन्द की लड़की से ही शादी करूँगा| पर जब मैं वापस आऊँ तभी बात बढ़ाना|'' आशु हड़बड़ी में बोल गया| 

आशु को दादी माँ की हिदायत याद आ गई थी कि शादी के लिए उन्होंने लड़की देख रखी है |

अनिकेत ने यह कहकर कॉल समाप्त कर दिया,'' बेटा, वापस लौटना तो बहु को साथ लेकर आना|''

पापा ने ऐसा क्यों कहा, यह सोचते हुए आशु उठा तो पीछे की मेज पर सजी उसकी और माही की युगल फोटो पर उसका ध्यान गया|

'सॉरी पापा', आशु ने तुरंत अनिकेत को फोन लगाया| 

''किसलिए'', अनिकेत ने जानबूझ कर अनजान बनने का नाटक किया|

'' आपने मेरी और माही की पेअर फोटो देख ली न| मैं बताने ही वाला था...''

''एक मधुर सच पर तुम्हारे झूठ ने अविश्वास की चादर डाल दी'' आशु जबतक कुछ बोलता, फोन कट चुका था|
--ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 3 जुलाई 2016

पक्की छत - लघुकथा

पक्की  छत
आने वाले बरसात के लिए हरिया परिवार के साथ मिलकर नई छप्पर बना रहा था। सब आपस में बोलते बतियाते काम पर लगे थे।

हरिया की पत्नी ने पूछा- " गोलू के बापू, सहर में तो बड़ी ऊँच ऊँच इमारत बनत रहे। तुहनी सब मिलके हुआँ भी काम करत रहन। एक बार पक्का छत बन जाए से बार बार के मुसीबत खतम हो जा ला। उ घर में रहे वाला आदमियन के कोनो परेसानी न लगत होइ, चाहे कोई मौसम आये जाए।"

" अरी ना री, ओहि से तो उ लोग आपस में परिवारो से नहीं मिलते हैं। छप्पर चुएगा तबहिये तो छप्पर छाने के लिए सब एकजुट होएँगे। सब मसीन जइसन लगते हैं वहाँ। न कोनो हंसी मजाक, न चेहरा पर कोई हंसी मुस्कान। अइसे कहो तो इहाँ भी पक्का छत बना दें"- मुस्कुराते हुए हरिया ने कहा।

" न बाबा, ई फूस के छप्पर ठीक हई। सब आदमियन जिन्दा जइसन तो लग अ हई।- कहकर खिलखिला उठी रामकली।
-----ऋता शेखर मधु--------