रविवार, 24 जनवरी 2016

सामर्थ्यवान लोगों की बेशर्म चुप्पी को समर्पित दिलबाग विर्क जी की पुस्तक — महाभारत जारी है


सामर्थ्यवान लोगों की बेशर्म चुप्पी को समर्पित दिलबाग विर्क जी की पुस्तक ---—                               महाभारत जारी है
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उपहार के रूप में मुझे आदरणीय दिलबाग विर्क जी की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ’महाभारत जारी है’ मिली| इसके लिए आभार आपका|
साहित्य की हर विधा पर समान रूप से पकड़ रखने वाले दिलबाग जी की यह पुस्तक छंदमुक्त है जहाँ बिना किसी बहर में बँधे उनकी सोच ने उन्मुक्त उड़ान भरी है| समाज की जिस किसी भी विसंगति ने उन्हें आहत किया वहाँ उनकी धारदार कलम चली जो पाठकों को भी सोचने पर निश्चय ही मजबूर करेगी|
पुस्तक अपने नाम के अनुरूप ही महाभारत का कारक वाले आकर्षक कलेवर में है| अंजुमन प्रकाशन ,इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित पुस्तक के पन्नों की क्वालिटी अच्छी है| पुस्तक की कीमत १२०/- रुपए है|
पुस्तक किसे समर्पित किया गया है यह भी आकर्षण की बात होती है| दिलबाग जी ने पुस्तक समर्पित किया हे,
‘’सामर्थ्यवान लोगों की बेशर्म चुप्पी के नाम’’ और यह गहरी सोच वाले बेबाक कवि की ही हो सकती है| माँ शारदे से भी लेखक ने यही माँगा है कि वे सदा सत्य की राह पर निडर होकर चलें|
पुस्तक की 58 कविताएँ दो खंडों मे विभाजित हैं|
खंड एक में जो 50 कविताएँ हैं जिनमें लेखक ने भावनाओं के ज्वार को सरल सुबोध भाषा में इस तरह से बाँधा है जैसे कि वह हर मनुष्य के दिल की बात हो|
हौआ एक ऐसा शब्द है जो हम न जाने कितनी बार बात बात में प्रयोग में लाते हैं| यही शब्द कविता में बँध जाए तो स्वभाविक है मन को भाएगा ही| हौआ के लिए बिम्ब भी लाजवाब है|पृ-१५
हौआ कौआ नहीं होता/ जिसे उड़ा दिया जाए/ हुर्र कहकर
हौआ तो वामन है/ जो कद बढ़ा लेता है अपना/ हर कदम के साथ
हौआ तो अमीबा है/ जितना तोड़ा इसे/ गिनती बढ़ी उतनी ही
वक्त की सीढ़ी(पृ-१७) प्रेरणादायी कविता है|
पृ-१८ पर ‘मन और पत्ते’ बहुत अच्छी कविता है|जिस तरह पत्ते डोलते हैं उसी तरह मन भी डोलता है मगर बहुत फर्क है दोनो के डोलने में| इसे कवि की लेखनी से जानते हैं|
पत्तों का डोलना/ हार नहीं होती पेड़ की/
लेकिन मन का डोलना/ हार होती है आदमी की
रिश्तों की फ़सल/ यूँ ही नहीं लहलहाती/ तप करना पड़ता है/ किसान की तरह (पृ-१९)
घर घर ही होता है/ और लौट आना होता है वापस/ परिंदों की तरह (पृ-२०)
जिंदगी पर कवि का नजरिया बहुत सकारात्मक है|
जिंदगी/ कोरी सैद्धांतिक/ और नीरस नहीं होती
जिंदगी/ एक गीत है/जिसमें सुर ताल की बंदिशें तो हैं/ मधुरता भी है/ सरसता भी है/ रोचकता भी है (पृ-२१)
एक कड़वा सच जो कवि ने इस तरह से उजागर किया है|
मैं वाकिफ़ हूँ तेरी सच्चाई से/तू वाकिफ़ है मेरी सच्चाई से/मगर अफ़सोस/स्वयं के सच से/न तू वाकिफ़ है/ न मैं वाकिफ़ हूँ|(पृ-२८)
कवि ने समझदार की समझदारी को बखूबी उतारा है अपनी कविता मे, देखिए किस तरह|
हर अच्छा कार्य/ संभव हो सका है/ मेरे कारण/हर बुरे परिणाम के लिए उत्तरदायी हैं दूसरे लोग/ और जो सफल हो जाते हैं/वही कहलाते हैं समझदार लोग|
इस तरह कई कविताएँ मिलेंगी जो हर व्यक्ति को अपनी सोच लगेगी| यही विशेषता होती है सफल कवि की जो जनमानस के आंतरिक सोच को व्यक्त कर सके जिसमें दिलबाग जी पूरी तरह सफल रहे हैं| अपाहिज, जिंदादिली, आवरण, दोषी हम भी हैं आदि कई कविताएँ समाज पर कुठारघात है और कवि की बेबाक लेखनी का परिचय भी देती है|
पतंग के माद्यम से कवि ने जो बात कही है वह गहन ,सूक्ष्म और बारीक अध्ययन है|दूसरों की पतंग काट कर बड़े बच्चों को सिखा देते हैं दूसरों की वस्तुएँ छीनकर खुश होना| इस कविता के लिए मैं दिलबाग जी को बधाई देती हूँ|
समाज में बढ़ रही ‘लिवींग टू-गेदर’ की परम्परा परिवारों में विखंडन का प्रतिफल है जहाँ कवि ने परमाणु विस्फोट की कल्पना की है जहाँ सब कुछ खत्म हो जाएगा| ऐसी ही कितनी कविताएँ हैं जो पाठक पढ़ना चाहेंगे और अनुभव करेंगे कि समाज की तत्कालीन स्थितियों को कवि ने कितनी बारीकी से उकेरा है|
पुस्तक के खंड २ में महाभारत के पात्रों के माध्यम से कई सवाल प्रस्तुत किए हैं कवि ने जो अंदर तक उद्वेलित करते हैं| इस खंड की प्रथम कविता ‘आत्ममंथन’ भीष्म पितामह का आत्ममंथन है| उन्होंने जो प्रतिज्ञा अपने पिता की इच्छापूर्ति के लिए लिया आज उसका प्रतिफल उन्हें शर शय्या पर यह सोचने को मजबूर कर रहा है कि गल्ती कहाँ हुई जो सभी अपने आमने सामने खड़े हैं युद्ध के लिए| कवि ने कई विचारणीय तथ्य पाठकों के सामने रखा है जो पुस्तक में पढेँ जाएँ तो अधिक सही रूप में उभर कर सामने आएगा|
गुरु दक्षिणा के रूप में अपना अँगूठा देने वाला एकलव्य पाठकों के समक्ष कई सवालों के साथ प्रस्तुत है |
गाँधारी का अपने आँखों पर पट्टी बाँध लेना पति का समर्थन था या कर्तव्य से पलायन, यह पढ़कर ही सुनिश्चित करें पाठक तो अधिक न्याय हो पाएगा|
माननीय सभासदों से भरे दरबार में द्रौपदी का चीरहरण स्वार्थपरता की निशानी ही रही होगी तभी तो अपने पदों को बचाने के लिए सभी खामोश रहे| इसे आज के समाज से भी जोड़कर देखा जा सकता है|
इस तरह महाभारत के पात्र आज भी जीवित हैं और पुस्तक के नाम ‘’महाभारत जारी है’’ को सार्थकता मिल रही है|
मैं दिलबाग विर्क जी को बधाई देती हूँ कि समाज में फैली कुरीतियों को कविता के माध्यम से व्यक्त करके उन्होंने कलम की ताकत का उत्कृष्ट परिचय दिया है| साथ ही पुस्तक के बारे में विचार प्रस्तुत करने में मुझे जो विलम्ब हुआ उसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ|
दिलबाग जी से भविष्य में भी इस तरह की सार्थक रचनाओं की आशा के साथ शुभकामनाएँ|

---ऋता शेखर ‘मधु’

शनिवार, 23 जनवरी 2016

नव वर्ष का नवगीत

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नव वर्ष का नवगीत
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नव प्रभात की नवल किरण
अब डाल रही है डेरा
नील गगन में मृदुल गान
खग में ज्यूँ करे
बसेरा

पँखुड़ियों पर गिरती हुई
वो मखमल जैसी बूँदें
थिरकी तितली बागों में
अँखियों को अपनी मूँदे
मोती मन को परख रहे
शब्दों का डाले घेरा
नव्य वर्ष का नवीकरण
पंजी में हुआ
घनेरा

नई फसल की मादकता
खेत खेत में झूम रही
नई नवेली सी चाहत
पलक छाँव में घूम रही
आँख मिचौली खेल रहा
चपल धूप संग मुँडेरा
हर साल की भाँति आए
रंग दीप का
पगफेरा

सुख की नदिया पैर रही
दिन दुख के अब दूर हुए
गम की आँधी चली गई
खुशियों के संतूर हुए
इस नश्वर जग में ना कुछ
तेरा या फिर है मेरा
नई सोच से हो शोभित
मानव का नया
सवेरा
*ऋता शेखर ‘मधु’*

गुरुवार, 21 जनवरी 2016

त्रिवेणी

पाँच त्रिवेणियाँ...
१.
सत्य का तेज सहना आसान नहीं
जो नैनो से बोले वो बेजुबान नहीं

ऐ झूठ, तू काले चश्मे से ही इसे देख पाएगा
२.
मन मेरा पतंग हुआ जाता है
बे रोक टोक स्वच्छंद हुआ जाता है

मँझे डोर में बंधे रहना ही हमें भाता है
३.
सरसो के खेत से जो देखा आसमान
पीत वर्ण में दिखे अपने सारे अरमान

पुलकारी दुपट्टे पर बसंत छा गया
४.
श्मशान से उठता रहा घना घना धुआँ
लम्हा लम्हा जिन्दगी उड़ती रही

नश्वरता की झलक गहरे उतर गई
५.
वो बन्द कमरे में पड़ा खाँसता रहा
मन ही मन जीवन को बाँचता रहा

उम्र की वह दहलीज मन दहला गई

*ऋता शेखर ‘मधु’*

बुधवार, 6 जनवरी 2016

जज्बात

जज़्बात-लघुकथा

'अदिति, भाई के लिए दही बड़े भी बना लेना| उसे बहुत पसन्द है| और हाँ, इमली वाली खट्टी मीठी चटनी भी भाभी के लिए'- माँ ने कहा|

जी माँ- कहती हुई अदिति किचेन में जुट गई| शाम को उसके भाइ-भाभी आलोक और अन्वेषा पूरे दो साल बाद विदेश से आ रहे थे|
हवाई जहाज आने की सूचना मिल चुकी थी| बस आधे घंटे में वे पहुँचने वाले थे| हर आहट पर अदिति और उसकी माँ की आँखें दरवाजे की ओर उठ जाती| तभी फोन की घंटी बजी|
''माँ, हवाई अड्डा से मैं सीधे अन्वेषा के घर आ गया हूँ| उसकी इच्छा थी कि पहले वह अपनी माँ से मिले|''
''अच्छा किया बेटा जो उसके जज्बात की कद्र की तुमने'',-थरथरा गए शब्दों को माँ ने आलोक को नहीं सुनने दिया|
*ऋता शेखर 'मधु'*

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

क्रिसमस कहमुकरी

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तीन कहमुकरियाँ...
१.
बड़ा दिवस में वापस आता
झोली भरकर चीजें लाता
खुश हो जाती प्यारी कांता
का सखि साजन?
ना सखि सांता
२.
प्रेम का तोहफ़ा उसकी बोली
भरी यीशु से उसकी झोली
दूर रखे वह सैनिटोरियम
का सखि साजन?
ना सखि मरियम
३.
उसकी गलियाँ बड़ी सुहानी
शाति प्रीति लगी हैं रुहानी
दया क्षमा वह बाँटे हँस-हँस
का सखि साजन?
ना सखि क्रिसमस

*ऋता शेखर ‘मधु’*

सोमवार, 21 दिसंबर 2015

तुम हँसो तो साथ में हँसता जमाना

2122 2122 2122

देश को हर हाल में बस है बचाना
हो सके तो जान भी अपनी गँवाना

तुम हँसो तो साथ में हँसता जमाना
अश्क आँखों में सदा सबसे छुपाना

क्या खरी ही तुम सदा कहते रहे हो
मिर्च तुमको इसलिए कहता जमाना

वे चुरा लेते हमेशा भाव मेरे
है नहीं आसान अब इसको पचाना

चाँद में भी दाग है कहते रहे हो
बोल कर यह चाहते किसको बचाना

फावड़े यूँ ही नहीं थामे हैं हमने
जानता हूँ राह अपनी खुद बनाना

बेटियाँ फ़नकार हैं मानो इसे भी
पंख से उनको हमें ही है सजाना

*ऋता शेखर ‘मधु’*

शनिवार, 14 नवंबर 2015

सच्ची भक्ति-लघुकथा

''आंटी, आप मंदिर जा रही हैं|" नेहा के हाथों में पूजा की थाल देखकर रहमान ने पूछा|
वह अभी अभी उसके बेटे प्रबोध के साथ आया था|
''हाँ बेटे, पूजा करके आती हूँ|"
जब वह मंदिर से लौटी तो उसने देखा कि रहमान अपने बैग के पास बैठा था और बैग के खुले मुँह से पिस्तौल झाँक रही थी| एकबारगी सिहर गई नेहा| बेटे का मित्र था इसलिए कुछ कह नहीं सकती थी|
दूसरे दिन पास के ही मस्जिद के पास नमाज के लिए रहमान तैयार होने लगा तो नेहा के पास आया| प्रबोध भी उसी वक्त आया और मंदिर जाने की इच्छा व्यक्त करने लगा|
नेहा बोली, तुम दोनो आपने भगवान या खुदा के पास दर्शन के लिए जाओ| पर यह हमेशा याद रखना कि उससे मन की बातें छुपती नहीं| ईश्वर उनकी ही सुनते हैं जो सच्चे दिल से उनकी आराधना करता है| ऐसे में सिर्फ दिखावा के लिए पूजा करना या नमाज के लिए जाना उनकी तौहीन है|
जाने से पहले रहमान ने अपना बैग नेहा को दे दिया और सच्ची भक्ति के लिए चला गया|
नेहा टुकुर टुकुर देख रही थी, वह वाकई निश्छल था या उसकी बातों का असर था|
*ऋता शेखर 'मधु'*

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

बात बन गई -लघुकथा

बात बन गई 
जब भी ग्यारहवीं कक्षा का प्रथम दिन रहता, नेहा महापात्र के लिए बहुत जिज्ञासा का दिन रहता| दसवीं के बाद बहुत तरह के संस्कार और माहौल से बच्चे आते जिन्हें समझने में थोड़ा वक्त लग जाता| कुछ शरारती बच्चों से भी पाला पड़ जाता कभी कभी|
रजिस्टर लेकर नेहा ने क्लासरूम में प्रवेश किया| वह सर झुकाकर हाजिरी लेने लगी तभी सीटी की आवाज आई| नेहा ने सिर उपर उठाया किन्तु सभी भोले बनकर बैठे थे| जाहिर सी बात थी कि कुछ पूछना बेकार था| नेहा ने हाजिरी लिया| बॅाटनी का प्रथम चैप्टर पढाया और चली गई|
दूसरे दिन भी वही सीटी की आवाज और बच्चों के चेहरों पर दबी सी हँसी थी|
आज नेहा कुछ सोच कर आई थी|
उसने कहा,''बच्चों , अगले महीने स्कूल का वार्षिक महोत्सव है जिसमें सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं| इसमें हम अच्छी उत्कृष्ट कला को बढ़ावा देते हैं| मैं अभी आपलोगों को अच्छी तरह से नहीं जानती पर दो दिनों में यह जान गई हूँ कि आपके बीच कोई है जो सीटियों के माध्यम से अच्छी धुन निकाल सकता है| मैं उस बच्चे का नाम सांस्कृतिक उत्सव के लिए देना चाहती हूँ|''
कुछ देर की शाति के बाद एक छात्र खड़ा हुअा|
नेहा की मुस्कान बता रही थी कि बात बन गई थी|
*ऋता शेखर मधु*

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015

रोग दिल का न यूँ तुम बढ़ाओ कभी

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चल के सपने कहीं तो सजाओ कभी

आसमाँ में परिंदे उड़ाओ कभी


आज है ये जमाना कहाँ से कहाँ

पाँव छूने की रस्में निभाओ कभी


बेटियों के जनम से होते हो दुखी

उनको भी तो गले से लगाओ कभी


अश्क आँखों में रखते दिखाते नहीं

रोग दिल का न यूँ तुम बढ़ाओ कभी


जान हाजिर है अपने वतन के लिए

सरहदों पर इसे आजमाओ कभी

*ऋता शेखर मधु*

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015

जीजिविषा-

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जीजिविषा--
घर में आनेजाने वालों का और साथ ही फोन पर बधाई देने वालों का ताँता लगा था| शशांक ने इंजीनियरिंग के लिए आइ आइ टी की परीक्षा में अच्छे रैंक लाए थे| घर में उत्सव सा माहौल था|
दो दिनों बाद बारहवीं का परिणाम घोषित होना था| समय पर परिणाम निकला|
मगर यह क्या! शशांक का नाम कहीं नहीं था| सबके पैरों तले की जमीन खिसक गई| तुरंत स्कूल में फोन लगाया गया| पता चला कि भोतिकी में उसे उत्तीर्णांक से कम थे|
एकाएक माहौल गमगीन हो गया| शशांक गुमसुम अपने कमरे में बैठ गया| सबने कहा था, पहले बारहवीं पर ध्यान दो|
उस परिश्रमी बालक की मनःस्थिति कल्पनीय थी| अब न उसे पढ़ने में रुचि थी, न खेलने मे, न कहीं बाहर जाने , और न ही ढंग से खाना खाता|
स्वाति , उसकी बड़ी बहन समझाकर थक गई कि वह अगले साल के लिए जमकर तैयारी करे| मगर उसका निराश मन बड़ा ही मायूस था|
एक दिन शाम को घर के कंक्रीट अहाते में टहलते हुए स्वाति को कुछ दिखा| वह दौड़कर भाई को बाहर घसीट लाई| चिकने चुपड़े साफ कंक्रीट रास्ते पर हल्की दरार से एक नन्हा सा कोंपल झाँक रहा था| उसकी गुलाबी कोमल पत्तियाँ बड़ी सुहावनी थी|
शशांक गौर से उसे देख रहा था|इधर स्वाति भी बड़े गौर से भाई का मन टटोलने की कोशिश कर रही थी |
कुछ देर रुककर स्वाति ने कहा-"भाई, इसे काट देते हैं| नाहक ही यह बढ़ता जाएगा|"
"नही, इसे मत काटो| बहुत मेहनत से इसने ऊपर आने का रास्ता बनाया है|" शशांक ने दृढ़ता से कहा|
इसके बाद वह दौड़कर अपने कमरे में गया और अपनी सारी किताबें व्यवस्थित करने लगा| स्वाति भी पीछे पीछे गई| वापस आकर संतुष्टि से कोमल पत्तियों को सहलाने लगी|
दोनो भाई बहन ने पौधे का नाम रखा, 'जीजिविषा"
*ऋता शेखर 'मधु'*

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

गुलामी-लघुकथा

गुलामी-
''मैम, जल जमाव के कारण हमारे इलाके की स्थिति बहुत खराब है| गाड़ी निकल नहीं सकती और पैदल चलकर आऊँ तो कमर जितने पानी में चलना होगा|''
एक मिनट की चुप्पी के पश्चात प्राचार्या ने कहा," आप डूबकर आएँ, तैर कर आएँ इससे हमे कोई मतलब नहीं|आना है तो आना है| यदि आप झंडोत्तोलन के दिन नहीं आईं तो आपकी गिनती देशद्रोही में की जाएगी|"
यह कहकर उन्होंने फोन काट दिया|
आजादी वाले दिन अपनी गुलामी पर नेहा रो दी| 
किसी तरह  नुक्कड़ पर पहुँची जहाँ से प्रतिदिन रिक्शा लिया करती थी| वहाँ लगभग सभी रिक्शावाले उसे पहचानते थे|
सभी अपने अपने रिक्शे में ताला लगाकर बैठे थे| एक बूढ़े रिक्शावाले ने कहा-'' आप मेरे रिक्शे में बैठ जाएँ, मैं पहुँचा दूँगा|''
उस कमजोर से रिक्शे वाले के रिक्शा पर बैठते हुए नेहा का दिल रो दिया| मगर वह करती भी क्या|
पन्द्रह रुपया और दस मिनट की दूरी वाले विद्यालय की दूरी अचानक बहुत बड़ी लगने लगी|
चारो तरफ पानी ही पानी और रिक्शावाला किसी तरह पूरे दमखम के साथ रिक्शा खींच रहा था| पूरे पैंतालीस मिनट लगे गंतव्य पर पहुँचने में|
उसने सौ रुपए बढ़ाए उस गरीब की ओर| मगर उसने अपने लिए पन्द्रह रुपए रखकर बाकी पैसे लौटा दिए| नेहा का दिल भर आया| उसने वहीं से देखा कि विद्यालय के बरामदे में खड़ी प्राचार्या मुस्कुरा रही थी|

*ऋता शेखर 'मधु'*

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015

बंदगी जब की खुदा की हौसले मिलते गए

मतला--
दो दिनों की जिंदगी है आदमी के सामने
जान है क्या चीज बोलो दोस्ती के सामने

हुस्ने मतला--

आँधियाँ भी जा रुकी हैं हिमगिरी के सामने
चाल भी बेजार बनती सादगी के सामने

अशआर--

बेटियाँ हों ना अगर तो बहु मिलेगी फिर कहाँ
कौन सी दौलत बड़ी है इस परी के सामने

बंदगी जब की खुदा की हौसले मिलते गए
झुक न पाया सिर मिरा फिर तो किसी के सामने

नारियाँ सहमी दबी सी ठोकरों में जी रहीं
हर खुशी बेकार है उनकी नमी के सामने

हो अमीरी या गरीबी रख रही इक सी नजर
रौशनी की बात क्या है कौमुदी के सामने

फूल भी खिलते रहे हैं कंटकों के बीच में
खुश्बुएँ बिखरी रही हैं हर किसी  के सामने

*ऋता शेखर 'मधु'*

बह्र -- 2122 2122 2122 212
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
काफिया -- ई (स्वर)
रदीफ़ -- के सामने

सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

सिलसिला आज तो जुड़ा कोई

2122 1212 22
काफ़िया-आ
रदीफ़-कोई

सिलसिला आज तो जुड़ा कोई
नफ़रतें छोड़ कर मिला कोई

आसरो से बँधा रहा जीवन
मोगरा डाल पर खिला कोई

नज़्म धड़कन बनी रही हरदम
ख्वाब ऐसा जगा गया कोई

देश मेरा सदा रहे कायम
फाँसियों में इसे लिखा कोई

मुल्क में चैन हो अमन भी हो
लाठियाँ भाँज कर कहा कोई

*ऋता शेखर 'मधु'*


मंगलवार, 29 सितंबर 2015

रंगा सियार

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"हरीश बाबू, अभी आधे घंटे में विद्यालय का कार्यक्रम शुरू होने वाला है। हमें ऊर्जा संरक्षण पर बोलना है और हमने कोई तयारी नहीं की है। आप कृपाकर उसपर आलेख तैयार कर दें।" सह अध्यापक अभिषेक कुमार ने  आग्रहपूर्वक कहा। 

विद्यालय में नए नए आये हरीश बाबू ने हामी भर ली। 


मगर अचानक वे भी कैसे तैयार करते। विद्यालय में इंटरनेट की सुविधा नहीं थी। संयोग से उसी दिन उन्होंने नेटपैक लिया था। उसे ही ऑन किया और गूगल पर गए। सारी जानकारियाँ इकठ्ठा कर के फटाफट आलेख तैयार किया। तब तक अभिषेक बाबू इधर उधर घूमते दिखे। 


कार्यक्रम शुरू हुआ और अभिषेक बाबू ने उस आलेख को पढ़कर सुनाया। आलेख ने खूब वाहवाही बटोरी। जब पुरस्कारों की घोषणा हुई तो प्रथम पुरस्कार अभिषेक बाबू के उत्कृष्ट आलेख को मिला था। हरीश बाबू के चेहरे पर ख़ुशी की लहर दौड़ गई। 
पुरस्कार लेने अभिषेक बाबू मंच पर गए। उनसे पूछा गया कि इस आलेख के लिए उन्होंने कहीं से सहयोग लिया है तो उसका जिक्र अवश्य करें। 


"इसे मैंने खुद अपनी मेहनत से तैयार किया है" 


यह सुनकर हरीश बाबू अवाक् रह गए। अभिषेक बाबू के प्रफुल्लित चेहरे की कुटिल लकीर भी दिख चुकी थी उन्हें। 
हरीश बाबू ने मन में कहा,"रंगा सियार की असलियत कभी न कभी तो सबके सामने आएगी ही"। 
-ऋता शेखर "मधु"