शनिवार, 9 सितंबर 2017

दुर्गा कवच (संस्कृत और हिन्दी में) एवं देवीसूक्तम्‌

दुर्गा कवच
माँ दुर्गा का कवच अदभुत कल्याणकारी है। दुर्गा कवच मार्कंडेय पुराण से ली गई विशेष श्लोकों का एक संग्रह है और दुर्गा सप्तशी का हिस्सा है। नवरात्र के दौरान दुर्गा कवच का जाप देवी दुर्गा के भक्तों द्वारा शुभ माना जाता है।

ॐ नमश्चण्डिकायै।

ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्। 
यन्न कस्य चिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥१॥
॥ब्रह्मोवाच॥
अस्ति गुह्यतमं विप्रा सर्वभूतोपकारकम्।
दिव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्वा महामुने॥२॥
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। 
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥३॥
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च 
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥४॥
नवमं सिद्धिदात्री च नव दुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥५॥
अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे। 
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥६॥
न तेषां जायते किञ्चिदशुभं रणसङ्कटे। 
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न ही॥७॥
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते। 
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥८॥
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना। 
ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना॥९॥
माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना। 
लक्ष्मी: पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥१०॥
श्वेतरूपधारा देवी ईश्वरी वृषवाहना। 
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥११॥
इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः। 
नानाभरणशोभाढया नानारत्नोपशोभिता:॥१२॥
दृश्यन्ते रथमारूढा देव्याः क्रोधसमाकुला:।
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥१३॥
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च। 
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥१४॥
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च। 
धारयन्त्यायुद्धानीथं देवानां च हिताय वै॥१५॥
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे। 
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥१६॥
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि। 
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्रि आग्नेय्यामग्निदेवता॥१७॥
दक्षिणेऽवतु वाराही नैऋत्यां खङ्गधारिणी। 
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥१८॥
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी। 
ऊर्ध्वं ब्रह्माणी में रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥१९॥
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहाना। 
जाया मे चाग्रतः पातु: विजया पातु पृष्ठतः॥२०॥
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता। 
शिखामुद्योतिनि रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥२१॥
मालाधारी ललाटे च भ्रुवो रक्षेद् यशस्विनी। 
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥२२॥
शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी। 
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शङ्करी ॥२३॥
नासिकायां सुगन्‍धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका। 
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥२४॥
दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका। 
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥२५॥
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद्‍ वाचं मे सर्वमङ्गला। 
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धारी॥२६॥
नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी। 
स्कन्धयोः खङ्गिनी रक्षेद्‍ बाहू मे वज्रधारिणी॥२७॥
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चान्गुलीषु च। 
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥२८॥
स्तनौ रक्षेन्‍महादेवी मनः शोकविनाशिनी। 
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥२९॥
नाभौ च कामिनी रक्षेद्‍ गुह्यं गुह्येश्वरी तथा। 
पूतना कामिका मेढ्रं गुडे महिषवाहिनी॥३०॥
कट्यां भगवतीं रक्षेज्जानूनी विन्ध्यवासिनी। 
जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥३१॥
गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी। 
पादाङ्गुलीषु श्रीरक्षेत्पादाध:स्तलवासिनी॥३२॥
नखान् दंष्ट्रा कराली च केशांशचैवोर्ध्वकेशिनी। 
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥३३॥
रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती। 
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥३४॥
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा। 
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसन्धिषु॥३५॥
शुक्रं ब्रह्माणी मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा। 
अहङ्कारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥३६॥
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्। 
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥३७॥
रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी। 
सत्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥३८॥
आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी। 
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥३९॥
इन्द्राणि! आप मेरे गोत्र की रक्षा करें। चण्डिके! तुम मेरे पशुओं की रक्षा करो। महालक्ष्मी पुत्रों की रक्षा करे और भैरवी पत्नी की रक्षा करे।|४०||
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा। 
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥४१॥
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु। 
तत्सर्वं रक्ष मे देवी जयन्ती पापनाशिनी॥४२॥
पदमेकं न गच्छेतु यदिच्छेच्छुभमात्मनः। 
कवचेनावृतो नित्यं यात्र यत्रैव गच्छति॥४३॥
तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सर्वकामिकः। 
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥४४॥
निर्भयो जायते मर्त्यः सङ्ग्रमेष्वपराजितः। 
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥४५॥
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्। 
य: पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥४६॥
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः। 
जीवेद् वर्षशतं साग्रामपमृत्युविवर्जितः॥४७॥
नश्यन्ति टयाधय: सर्वे लूताविस्फोटकादयः। 
स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥४८॥
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले। 
भूचराः खेचराशचैव जलजाश्चोपदेशिकाः॥४९॥
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा। 
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबला॥५०॥
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसा:। 
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः॥५१॥
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते। 
मानोन्नतिर्भावेद्राज्यं तेजोवृद्धिकरं परम्॥५२॥
यशसा वद्धते सोऽपी कीर्तिमण्डितभूतले। 
जपेत्सप्तशतीं चणण्डीं कृत्वा तु कवचं पूरा॥५३॥
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्। 
तावत्तिष्ठति मेदिनयां सन्ततिः पुत्रपौत्रिकी॥५४॥
देहान्ते परमं स्थानं यात्सुरैरपि दुर्लभम्। 
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥५५॥
लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते ॥ॐ॥ ॥५६॥

।। इति देव्या: कवचं सम्पूर्णम् ।।||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||

दुर्गा कवच-हिन्दी में

ॐ नमश्चण्डिकायै।

परमशक्ति देवी दुर्गा को नमस्कार है|
1 मार्कण्डेय जी ने कहा– पितामह! जो इस संसार में परम गोपनीय तथा मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला है और जो अब तक आपने दूसरे किसी के सामने प्रकट नहीं किया हो, ऐसा कोई साधन मुझे बताइये।
2ब्रह्मन्! ऐसा साधन तो एक देवी का कवच ही है, जो गोपनीय से भी परम गोपनीय, पवित्र तथा सम्पूर्ण प्राणियों का उपकार करनेवाला है। महामुने! उसे श्रवण करो।
3प्रथम नाम शैलपुत्री है, दूसरी मूर्तिका नाम ब्रह्मचारिणी है। तीसरा स्वरूप चन्द्रघण्टा के नामसे प्रसिद्ध है। चौथी मूर्ति को कूष्माण्डा कहते हैं।
4 पाँचवीं दुर्गा का नाम स्कन्दमाता है। देवी के छठे रूप को कात्यायनी कहते हैं। सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ स्वरूप महागौरी के नाम से प्रसिद्ध है।
5 नवीं दुर्गा का नाम सिद्धिदात्री है। ये सब नाम सर्वज्ञ महात्मा वेदभगवान् के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं। ये सब नाम सर्वज्ञ महात्मा वेदभगवान् के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं|
6 जो मनुष्य अग्नि में जल रहा हो, रणभूमि में शत्रुओं से घिर गया हो, विषम संकट में फँस गया हो तथा इस प्रकार भय से आतुर होकर जो भगवती दुर्गा की शरण में प्राप्त हुए हों, उनका कभी कोई अमङ्गल नहीं होता।
7 युद्ध समय संकट में पड़ने पर भी उनके ऊपर कोई विपत्ति नहीं दिखाई देती। उनके शोक, दु:ख और भय की प्राप्ति नहीं होती।
8 जिन्होंने भक्तिपूर्वक देवी का स्मरण किया है, उनका निश्चय ही अभ्युदय होता है। देवेश्वरि! जो तुम्हारा चिन्तन करते हैं, उनकी तुम नि:सन्देह रक्षा करती हो।
9 चामुण्डादेवी प्रेत पर आरूढ़ होती हैं। वाराही भैंसे पर सवारी करती हैं। ऐन्द्री का वाहन ऐरावत हाथी है। वैष्णवी देवी गरुड़ पर ही आसन जमाती हैं।
10 माहेश्वरी वृषभ पर आरूढ़ होती हैं। कौमारी का मयूर है। भगवान् विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मीदेवी कमल के आसन पर विराजमान हैं,और हाथों में कमल धारण किये हुए हैं।
11 वृषभ पर आरूढ़ ईश्वरी देवी ने श्वेत रूप धारण कर रखा है। ब्राह्मी देवी हंस पर बैठी हुई हैं और सब प्रकार के आभूषणों से विभूिषत हैं।
12 इस प्रकार ये सभी माताएँ सब प्रकार की योग शक्तियों से सम्पन्न हैं। इनके सिवा और भी बहुत-सी देवियाँ हैं, जो अनेक प्रकार के आभूषणों की शोभा से युक्त तथा नाना प्रकार के रत्नों से सुशोभित हैं।
13,14,15 ये सम्पूर्ण देवियाँ क्रोध में भरी हुई हैं और भक्तों की रक्षा के लिए रथ पर बैठी दिखाई देती हैं। ये शङ्ख, चक्र, गदा, शक्ति, हल और मूसल, खेटक और तोमर, परशु तथा पाश, कुन्त औ त्रिशूल एवं उत्तम शार्ङ्गधनुष आदि अस्त्र-शस्त्र अपने हाथ में धारण करती हैं। दैत्यों के शरीर का नाश करना,भक्तों को अभयदान देना और देवताओं का कल्याण करना यही उनके शस्त्र-धारण का उद्देश्य है।
16 महान् रौद्ररूप, अत्यन्त घोर पराक्रम, महान् बल और महान् उत्साह वाली देवी तुम महान् भय का नाश करने वाली हो,तुम्हें नमस्कार है
17,18 तुम्हारी और देखना भी कठिन है। शत्रुओं का भय बढ़ाने वाली जगदम्बिक मेरी रक्षा करो। पूर्व दिशा में ऐन्द्री इन्द्रशक्ति)मेरी रक्षा करे। अग्निकोण में अग्निशक्ति,दक्षिण दिशा में वाराही तथा नैर्ऋत्यकोण में खड्गधारिणी मेरी रक्षा करे। पश्चिम दिशा में वारुणी और वायव्यकोण में मृग पर सवारी करने वाली देवी मेरी रक्षा करे।
19 उत्तर दिशा में कौमारी और ईशानकोण में शूलधारिणी देवी रक्षा करे। ब्रह्माणि!तुम ऊपर की ओर से मेरी रक्षा करो और वैष्णवी देवी नीचे की ओर से मेरी रक्षा करे ।
20 इसी प्रकार शव को अपना वाहन बनानेवाली चामुण्डा देवी दसों दिशाओं में मेरी रक्षा करे। जया आगे से और विजया पीछे की ओर से मेरी रक्षा करे।
21 वामभाग में अजिता और दक्षिण भाग में अपराजिता रक्षा करे। उद्योतिनी शिखा की रक्षा करे। उमा मेरे मस्तक पर विराजमान होकर रक्षा करे।
22 ललाट में मालाधरी रक्षा करे और यशस्विनी देवी मेरी भौंहों का संरक्षण करे। भौंहों के मध्य भाग में त्रिनेत्रा और नथुनों की यमघण्टा देवी रक्षा करे।
23 शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी। कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शङ्करी ॥२३॥
24 नासिका में सुगन्धा और ऊपर के ओंठ में चर्चिका देवी रक्षा करे। नीचे के ओंठ में अमृतकला तथा जिह्वा में सरस्वती रक्षा करे।
25 कौमारी दाँतों की और चण्डिका कण्ठप्रदेश की रक्षा करे। चित्रघण्टा गले की घाँटी और महामाया तालु में रहकर रक्षा करे।
26 कामाक्षी ठोढी की और सर्वमङ्गला मेरी वाणी की रक्षा करे। भद्रकाली ग्रीवा में और धनुर्धरी पृष्ठवंश (मेरुदण्ड)में रहकर रक्षा करे।
27 कण्ठ के बाहरी भाग में नीलग्रीवा और कण्ठ की नली में नलकूबरी रक्षा करे। दोनों कंधों में खड्गिनी और मेरी दोनों भुजाओं की वज्रधारिणी रक्षा करे।
28 दोनों हाथों में दण्डिनी और उँगलियों में अम्बिका रक्षा करे। शूलेश्वरी नखों की रक्षा करे। कुलेश्वरी कुक्षि पेट)में रहकर रक्षा करे।
29 महादेवी दोनों स्तनों की और शोकविनाशिनी देवी मन की रक्षा करे। ललिता देवी हृदय में और शूलधारिणी उदर में रहकर रक्षा करे।
30,31 नाभि में कामिनी और गुह्यभाग की गुह्येश्वरी रक्षा करे। पूतना और कामिका लिङ्ग की और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करे। भगवती कटि भाग में और विन्ध्यवासिनी घुटनों की रक्षा करे। सम्पूर्ण कामनाओं को देने वाली महाबला देवी दोनों पिण्डलियों की रक्षा करे।
32 नारसिंही दोनों घुट्ठियों की और तैजसी देवी दोनों चरणों के पृष्ठभाग की रक्षा करे। श्रीदेवी पैरों की उँगलियों में और तलवासिनी पैरों के तलुओं में रहकर रक्षा करे।
33 अपनी दाढों के कारण भयंकर दिखायी देनेवाली दंष्ट्राकराली देवी नखों की और ऊर्ध्वकेशिनी देवी केशों की रक्षा करे। रोमावलियों के छिद्रों में कौबेरी और त्वचा की वागीश्वरी देवी रक्षा करे।
34,35 पार्वती देवी रक्त, मज्जा, वसा, माँस, हड्डी और मेद की रक्षा करे। आँतों की कालरात्रि और पित्त की मुकुटेश्वरी रक्षा करे। मूलाधार आदि कमल-कोशों में पद्मावती देवी और कफ में चूड़ामणि देवी स्थित होकर रक्षा करे। नख के तेज की ज्वालामुखी रक्षा करे। जिसका किसी भी अस्त्र से भेदन नहीं हो सकता, वह अभेद्या देवी शरीर की समस्त संधियों में रहकर रक्षा करे।
36 ब्रह्माणी!आप मेरे वीर्य की रक्षा करें। छत्रेश्वरी छाया की तथा धर्मधारिणी देवी मेरे अहंकार,मन और बुद्धि की रक्षा करे।
37 हाथ में वज्र धारण करने वाली वज्रहस्ता देवी मेरे प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान वायु की रक्षा करे। कल्याण से शोभित होने वाली भगवती कल्याण शोभना मेरे प्राण की रक्षा करे।
38 रस, रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्श इन विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी रक्षा करे तथा सत्त्वगुण,रजोगुण और तमोगुण की रक्षा सदा नारायणी देवी करे।
39 वाराही आयु की रक्षा करे। वैष्णवी धर्म की रक्षा करे तथा चक्रिणी चक्र धारण करने वाली)देवी यश,कीर्ति,लक्ष्मी,धन तथा विद्या की रक्षा करे।
40 इन्द्राणि! आप मेरे गोत्र की रक्षा करें। चण्डिके! तुम मेरे पशुओं की रक्षा करो। महालक्ष्मी पुत्रों की रक्षा करे और भैरवी पत्नी की रक्षा करे।
41 मेरे पथ की सुपथा तथा मार्ग की क्षेमकरी रक्षा करे। राजा के दरबार में महालक्ष्मी रक्षा करे तथा सब ओर व्याप्त रहने वाली विजया देवी सम्पूर्ण भयों से मेरी रक्षा करे।
42 देवी! जो स्थान कवच में नहीं कहा गया है,अतएव रक्षा से रहित है,वह सब तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हो;क्योंकि तुम विजयशालिनी और पापनाशिनी हो।
43,44 यदि अपने शरीर का भला चाहे तो मनुष्य बिना कवच के कहीं एक पग भी न जाय कवच का पाठ करके ही यात्रा करे। कवच के द्वारा सब ओर से सुरक्षित मनुष्य जहाँ-जहाँ भी जाता है,वहाँ-वहाँ उसे धन-लाभ होता है तथा सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि करने वाली विजय की प्राप्ति होती है। वह जिस-जिस अभीष्ट वस्तु का चिन्तन करता है, उस-उसको निश्चय ही प्राप्त कर लेता है। वह पुरुष इस पृथ्वी पर तुलना रहित महान् ऐश्वर्य का भागी होता है।
45 कवच से सुरक्षित मनुष्य निर्भय हो जाता है। युद्ध में उसकी पराजय नहीं होती तथा वह तीनों लोकों में पूजनीय होता है।
46,47 देवी का यह कवच देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। जो प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों संध्याओं के समय श्रद्धा के साथ इसका पाठ करता है,उसे दैवी कला प्राप्त होती है। तथा वह तीनों लोकों में कहीं भी पराजित नहीं होता। इतना ही नहीं, वह अपमृत्यु रहित हो, सौ से भी अधिक वर्षों तक जीवित रहता है।
48मकरी, चेचक और कोढ़ आदि उसकी सम्पूर्ण व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं। कनेर,भाँग,अफीम,धतूरे आदि का स्थावर विष,साँप और बिच्छू आदि के काटने से चढ़ा हुआ जङ्गम विष तथा अहिफेन और तेल के संयोग आदि से बनने वाला कृत्रिम विष-ये सभी प्रकार के विष दूर हो जाते हैं,उनका कोई असर नहीं होता।
49,50,51,52 इस पृथ्वी पर मारण-मोहन आदि जितने आभिचारिक प्रयोग होते हैं तथा इस प्रकार के मन्त्र-यन्त्र होते हैं, वे सब इस कवच को हृदय में धारण कर लेने पर उस मनुष्य को देखते ही नष्ट हो जाते हैं। ये ही नहीं,पृथ्वी पर विचरने वाले ग्राम देवता,आकाशचारी देव विशेष,जल के सम्बन्ध से प्रकट होने वाले गण,उपदेश मात्र से सिद्ध होने वाले निम्नकोटि के देवता,अपने जन्म से साथ प्रकट होने वाले देवता, कुल देवता, माला (कण्ठमाला आदि), डाकिनी, शाकिनी, अन्तरिक्ष में विचरनेवाली अत्यन्त बलवती भयानक डाकिनियाँ,ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, बेताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि अनिष्टकारक देवता भी हृदय में कवच धारण किए रहने पर उस मनुष्य को देखते ही भाग जाते हैं। कवचधारी पुरुष को राजा से सम्मान वृद्धि प्राप्ति होती है। यह कवच मनुष्य के तेज की वृद्धि करने वाला और उत्तम है।
53,54 कवच का पाठ करने वाला पुरुष अपनी कीर्ति से विभूषित भूतल पर अपने सुयश से साथ-साथ वृद्धि को प्राप्त होता है। जो पहले कवच का पाठ करके उसके बाद सप्तशती चण्डी का पाठ करता है, उसकी जब तक वन, पर्वत और काननों सहित यह पृथ्वी टिकी रहती है, तब तक यहाँ पुत्र-पौत्र आदि संतान परम्परा बनी रहती है।
55,56 देह का अन्त होने पर वह पुरुष भगवती महामाया के प्रसाद से नित्य परमपद को प्राप्त होता है, जो देवतोओं के लिए भी दुर्लभ है। वह सुन्दर दिव्य रूप धारण करता और कल्याण शिव के साथ आनन्द का भागी होता है।
।। इति देव्या: कवचं सम्पूर्णम् ।।

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देवी सूक्तम्

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणता स्मरताम। ॥1॥
 रौद्रायै नमो नित्ययै गौर्य धात्र्यै नमो नमः।
ज्योत्यस्त्रायै चेन्दुरुपिण्यै सुखायै सततं नमः ॥2॥
कल्याण्यै प्रणतां वृद्धयै सिद्धयै कुर्मो नमो नमः।
नैर्ऋत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः ॥3॥
दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै।
ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः ॥4॥
अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः।

नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै नमो नमः ॥5॥  
या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥6॥
 या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥7॥  
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरुपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥8॥
 या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥9॥
 या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥10॥  
या देवी सर्वभूतेषुच्छायारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥11॥
 या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥12॥
 या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥13॥
 या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥14॥  
या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥15॥
या देवी सर्वभूतेषु लज्जारुपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥16॥  
 या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥17॥
 या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥18॥  
या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥19॥
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥20॥  
या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥21॥
 या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥22॥  
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥23॥
 या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥24॥  
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥25॥
 या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥26॥  
इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या।
भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदैव्यै नमो नमः ॥27॥
 चित्तिरूपेण या कृत्स्त्रमेतद्व्याप्त स्थिता जगत्‌।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥28॥  
स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रया -त्तथा सुरेन्द्रेणु दिनेषु सेविता॥
करोतु सा नः शुभहेतुरीश्र्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः ॥29॥
 या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितै -रस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते।
या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति नः सर्वापदो भक्तिविनम्रमूर्तिभिः ॥30॥  

॥ इति तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम्‌ सम्पूर्णम्‌ ॥  


देवी अर्गलास्तोत्रं


हाथ में अक्षत, जल और पुष्प लेकर संकल्प लें....
अस्यश्री अर्गला स्तोत्र मंत्रस्य विष्णुः ऋषि:। अनुष्टुप्छन्द:। श्री महालक्ष्मीर्देवता, श्री जगदम्बा प्रीत्यर्थे सप्तशती पठां गत्वेन|

श्रीचण्डिकाध्यानम्
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ॐ बन्धूककुसुमाभासां पञ्चमुण्डाधिवासिनीम् .

स्फुरच्चन्द्रकलारत्नमुकुटां मुण्डमालिनीम् ..

त्रिनेत्रां रक्तवसनां पीनोन्नतघटस्तनीम् .

पुस्तकं चाक्षमालां च वरं चाभयकं क्रमात् ..

दधतीं संस्मरेन्नित्यमुत्तराम्नायमानिताम् .

अथवा

या चण्डी मधुकैटभादिदैत्यदलनी या माहिषोन्मूलिनी

या धूम्रेक्षणचण्डमुण्डमथनी या रक्तबीजाशनी .

शक्तिः शुम्भनिशुम्भदैत्यदलनी या सिद्धिदात्री परा

सा देवी नवकोटिमूर्तिसहिता मां पातु विश्वेश्वरी ..
अथ अर्गलास्तोत्रम्

ॐ नमश्चण्काडिकायै

मार्कण्डेय उवाच .

ॐ जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतापहारिणि .

जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते .. 1..
 जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी .

दुर्गा शिवा क्षमा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते .. 2..

मधुकैटभविध्वंसि विधातृवरदे नमः .

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. 3..

महिषासुरनिर्नाशि भक्तानां सुखदे नमः .

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. 4..

धूम्रनेत्रवधे देवि धर्मकामार्थदायिनि .

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. 5..

रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि .

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. 6..

निशुम्भशुम्भनिर्नाशि त्रिलोक्यशुभदे नमः .

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. 7..

वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि .

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. 8..

अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि .

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. 9..

नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चापर्णे दुरितापहे .

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. 10..

स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि .

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. 11..

चण्डिके सततं युद्धे जयन्ति पापनाशिनि .

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. 12..

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि देवि परं सुखम् .

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. 13..

विधेहि देवि कल्याणं विधेहि विपुलां श्रियम् .

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. 14..

विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः .

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. 15..

सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके .

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. 16..

विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तञ्च मां कुरु .

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. 17..

देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पनिषूदिनि .

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. 18..

प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे .

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. 19..

चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसं
स्तुते परमेश्वरि .

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. 20..

कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके .

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. 21..

हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि .

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. 22..

इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि .

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. 23..

देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके .

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. 24..

भार्यां मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् .

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. 25..

तारिणि दुर्गसंसारसागरस्याचलोद्भवे .

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. 26..

इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः .

सप्तशतीं समाराध्य वरमाप्नोति दुर्लभम् .. 27..

.. इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे अर्गलास्तोत्रं समाप्तम् ..

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

दुर्गा द्वात्रिशनाम माला-दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं


दुर्गा द्वात्रिशनाम माला


गूगल से साभार
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दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं

शतनाम प्रवक्ष्यामि शृणुष्व कमलानने।

यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती॥१॥

ॐ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी।

आर्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी॥२॥

पिनाकधारिणी चित्रा चण्डघण्टा महातपा:।

मनो बुद्धिरहंकारा चित्तरूपा चिता चिति:॥३॥

सर्वमन्त्रमयी सत्ता सत्यानन्दस्वरूपिणी।

अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागति:॥४॥

शाम्भवी देवमाता च चिन्ता रत्‍‌नप्रिया सदा।

सर्वविद्या दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी॥५॥

अपर्णानेकवर्णा च पाटला पाटलावती।

पट्टाम्बरपरीधाना कलमञ्जीररञ्जिनी॥६॥

अमेयविक्रमा क्रूरा सुन्दरी सुरसुन्दरी।

वनदुर्गा च मातङ्गी मतङ्गमुनिपूजिता॥७॥

ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा।

चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीश्च पुरुषाकृति:॥८॥

विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा।

बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहनवाहना॥९॥

निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी।

मधुकैटभहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी॥१०॥

सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी।

सर्वशास्त्रमयी सत्या सर्वास्त्रधारिणी तथा॥११॥

अनेकशस्त्रहस्ता च अनेकास्त्रस्य धारिणी।

कुमारी चैककन्या च कैशोरी युवती यति:॥१२॥

अप्रौढा चैव प्रौढा च वृद्धमाता बलप्रदा।

महोदरी मुक्त केशी घोररूपा महाबला॥१३॥

अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपस्विनी।

नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी॥१४॥

शिवदूती कराली च अनन्ता परमेश्वरी।

कात्यायनी च सावित्री प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी॥१५॥

य इदं प्रपठेन्नित्यं दुर्गानामशताष्टकम्।

नासाध्यं विद्यते देवि त्रिषु लोकेषु पार्वति॥१६॥

धनं धान्यं सुतं जायां हयं हस्तिनमेव च।

चतुर्वर्ग तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं च शाश्वतीम्॥१७॥

कुमारीं पूजयित्वा तु ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम्।

पूजयेत् परया भक्त्या पठेन्नामशताष्टकम्॥१८॥

तस्य सिद्धिर्भवेद् देवि सर्वै: सुरवरैरपि।

राजानो दासतां यान्ति राज्यश्रियमवापनुयात्॥१९॥

गोरोचनालक्त ककुङ्कुमेन सिन्दूरकर्पूरमधुत्रयेण।

विलिख्य यन्त्रं विधिना विधिज्ञो भवेत् सदा धारयते पुरारि:॥२०॥

भौमावास्यानिशामग्रे चन्द्रे शतभिषां गते।

विलिख्य प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेत् सम्पदां पदम्॥२१॥

॥ इति श्रीविश्वसारतन्त्रे दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं समाप्तम्॥
अर्थ
शंकरजी पार्वतीजी से कहते हैं-कमलानने! अब मैं अष्टोत्तरशत (108) नाम का वर्णन करता हूँ, सुनो; जिसके प्रसाद (पाठ या श्रवण) मात्र से परम साध्वी भगवती दुर्गा प्रसन्न हो जाती हैं॥१॥



ॐ सती, साध्वी, भवप्रीता (भगवान् शिव पर प्रीति रखनेवाली), भवानी, भवमोचनी (संसारबन्धन से मुक्त करनेवाली), आर्या, दुर्गा, जया, आद्या, त्रिनेत्रा, शूलधारिणी, पिनाकधारिणी, चित्रा, चण्डघण्टा (प्रचण्ड स्वर से घण्टानाद करनेवाली), महातपा: (भारी तपस्या करनेवाली), मन: (मनन-शक्ति), बुद्धि: (बोधशक्ति), अहंकारा (अहंता का आश्रय), चित्तरूपा, चिता, चिति: (चेतना), सर्वमन्त्रमयी, सत्ता (सत्-स्वरूपा), सत्यानन्दस्वरूपिणी, अनन्ता (जिनके स्वरूप का कहीं अन्त नहीं), भाविनी (सबको उत्पन्न करनेवाली), भाव्या (भावना एवं ध्यान करने योग्य), भव्या (कल्याणरूपा), अभव्या (जिससे बढकर भव्य कहीं है नहीं), सदागति, शाम्भवी (शिवप्रिया), देवमाता, चिन्ता, रत्‍‌नप्रिया, सर्वविद्या, दक्षकन्या, दक्षयज्ञविनाशिनी, अपर्णा (तपस्या के समय पत्ते को भी न खानेवाली), अनेकवर्णा (अनेक रंगोंवाली), पाटला (लाल रंगवाली), पाटलावती (गुलाब के फूल या लाल फूल धारण करनेवाली), पट्टाम्बरपरीधाना (रेशमी वस्त्र पहननेवाली), कलमञ्जररञ्जिनी (मधुर ध्वनि करनेवाले मञ्जीर को धारण करके प्रसन्न रहनेवाली), अमेयविक्रमा (असीम पराक्रमवाली), क्रूरा (दैत्यों के प्रति कठोर), सुन्दरी, सुरसुन्दरी, वनदुर्गा, मातङ्गी, मतङ्गमुनिपूजिता, ब्राह्मी, माहेश्वरी, ऐन्द्री, कौमारी, वैष्णवी, चामुण्डा, वाराही, लक्ष्मी:, पुरुषाकृति:, विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, नित्या, बुद्धिदा, बहुला, बहुलप्रेमा, सर्ववाहनवाहना, सर्वासुरविनाशा, सर्वदानवघातिनी, सर्वशास्त्रमयी, सत्या, सर्वास्त्रधारिणी, अनेकशस्त्रहस्ता, अनेकास्त्रधारिणी, कुमारी, एककन्या, कैशोरी, युवती, यति, अप्रौढा, प्रौढा, वृद्धमाता, बलप्रदा, महोदरी, मुक्त केशी, घोररूपा, महाबला, अग्निज्वाला, रौद्रमुखी, कालरात्रि:, तपस्विनी, नारायणी, भद्रकाली, विष्णुमाया, जलोदरी, शिवदूती, करली, अनन्ता (विनाशरहिता), परमेश्वरी, कात्यायनी, सावित्री, प्रत्यक्षा, ब्रह्मवादिनी॥२-१५॥

माँ दुर्गा के नव-रूप के श्लोक





देवी दुर्गा के नौ रूप होते हैं।
नवरात्र-पूजन में हर रूप के लिए इनकी की पूजा और उपासना के मंत्र---


1.शैलपुत्री- मां दुर्गा का प्रथम रूप देवी शैलपुत्री 



वन्दे वांच्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्‌।
वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌ ॥

2. ब्रह्मचारिणी : मां दुर्गा का दूसरा स्वरूप



दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

3.चंद्रघंटा : मां दुर्गा का तीसरा स्वरूप



पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता। 
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥

4. कुष्मांडा : मां दुर्गा का चौथा स्वरूप




सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कुष्मांडा शुभदास्तु मे।

5. स्कंदमाता : मां दुर्गा का पांचवा स्वरूप



सिंहसनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी॥

6. कात्यायनी : मां दुर्गा का छठवां स्वरूप




चंद्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥

7. कालरात्रि मां : दुर्गा का सातवां स्वरूप




एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥

8. महागौरी : मां दुर्गा का आठवां स्वरूप



श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोदया॥

9.सिद्धिदात्री : मां दुर्गा का नौवां रूप





सिद्धगंधर्वयक्षादौर सुरैरमरै रवि।
सेव्यमाना सदाभूयात सिद्धिदा सिद्धिदायनी॥

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माँ दुर्गा के सभी चित्र गूगल से साभार लिये गए हैं|
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प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रहमचारणी

तृतीयं चंद्रघंटेति कुष्मांनडेति चतुर्थकम

पंचमं स्कन्दमातेती षष्ठम कात्यायनीति च

सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम

नवमं सिद्धि दात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः

दुर्गा के नौ रूपों की विवेचना सरल, सहज सन्दर्भ में---इन रूपों की आध्यात्मिक कथा अलग है|
1शैलपुत्री- सम्पूर्ण जड़ पदार्थ भगवती का पहिला स्वरूप हैं पत्थर मिटटी जल वायु अग्नि आकाश सब शैल पुत्री का प्रथम रूप हैं। इस पूजन का अर्थ है प्रत्येक जड़ पदार्थ में परमात्मा को महसूस करना.

2.ब्रह्मचारिणी- जड़ में ज्ञान का प्रस्फुरण, चेतना का संचार भगवती के दूसरे रूप का प्रादुर्भाव है। जड़ चेतन का संयोग है। प्रत्येक अंकुरण में इसे देख सकते हैं।

3.चंद्रघंटा-भगवती का तीसरा रूप है यहाँ जीव में वाणी प्रकट होती है जिसकी अंतिम परिणिति मनुष्य में बैखरी (वाणी) है।

4.कुष्मांडा- अर्थात अंडे को धारण करने वाली; स्त्री ओर पुरुष की गर्भधारण, गर्भाधान शक्ति है जो भगवती की ही शक्ति है, जिसे समस्त प्राणीमात्र में देखा जा सकता है।

5.स्कन्दमाता- पुत्रवती माता-पिता का स्वरूप है अथवा प्रत्येक पुत्रवान माता-पिता स्कन्द माता के रूप हैं। 6.कात्यायनी- के रूप में वही भगवती कन्या की माता-पिता हैं। यह देवी का छटा स्वरुप है।

7.कालरात्रि- देवी भगवती का सातवां रूप है जिससे सब जड़ चेतन मृत्यु को प्राप्त होते हैं ओर मृत्यु के समय सब प्राणियों को इस स्वरूप का अनुभव होता है। भगवती के इन सात स्वरूपों के दर्शन सबको प्रत्यक्ष सुलभ होते हैं| आठवां ओर नौवां स्वरूप सुलभ नहीं है।

8.महागौरी-- का आठवां स्वरूप गौर वर्ण है। यह ज्ञान अथवा बोध का प्रतीक है, जिसे जन्म जन्मांतर की साधना से पाया जा सकता है।

9. सिद्धिदात्री--इसे प्राप्त कर साधक परम सिद्ध हो जाता है। इसलिए इसे सिद्धिदात्री कहा है।
सन्दर्भ -प्रो बसंत प्रभात जोशी के आलेख से

अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व आठ सिद्धियां होती हैं। इसलिए इस देवी की सच्चे मन से विधि विधान से उपासना-आराधना करने से यह सभी सिद्धियां प्राप्त की जा सकती हैं|

बेतार संदेश-लघुकथा

बेतार संदेश

'' कहने को तो आठ दरवाजे हैं इस फ्लोर पर किन्तु सारे ही बन्द रहते हैं| किसी से किसी को कोई मतलब नहीं| किसी को अभी तक पहचानती भी नहीं| इससे अच्छा हमारा छोटा सा शहर था जहाँ नए पड़ोसी के आते ही सभी उनकी जरूरतें पूछने आते हैं| एक घर में मरीज हो और पथ्य दूसरे के घर से आए, ऐसी संवेदना यहाँ कहाँ| टोकरी न रखो तो दूधवाला दूध का पैकेट रखे बिना ही चला जाता है| बेल बजाकर कारण जानने की भी जरूरत महसूस नहीं करता| कचरा वाला एक बार बेल बजाता है| दरवाजा खोलकर कचरे दूँ या न दूँ, उसे फर्क नहीं पड़ता| सिर्फ ऊँची ऊँची इमारतें , सड़कों पर आदमी से अधिक गाड़ियाँ| लिफ्ट खराब हो जाए तो पन्दहवें तल्ले से नीचे कैसे जाऊँगी|अभी मेरी तबियत खराब हो जाए तो मैं क्या करूँगी...''

रात के नौ बज रहे थे| दूर तक रौशनी ही रौशनी| अपने अँधेरे बालकनी में खड़ी खड़ी सत्तर वर्षीया तुलिका देवी सोच के सागर में डूबी थीं| उन्होंने जिस सहजता और निडरता से बेटे को विदेश जाने की अनुमति दी थीं उसका कायान्तरण भयावह सोच के रूप में हो रहा था|

जाते जाते बेटे ने कहा था,''मैं अफ्रीका के जिस ग्रामीण इलाके क्षेत्र में जा रहा हूँ वहाँ से शायद फोन भी न कर पाऊँ| माँ, आपको वृद्धाश्रम मे छोड़ दूँ उतने दिनों ले लिए?''
''नहीं , मैं रह लूँगी'', दृढ़ता से कह दिया था उन्होंने|
फिर यह भय क्यों...रह रह कर उनकी बूढ़ी हडँडियाँ कँपकँपा जाती|
तभी डोर बेल बजी|
इतनी रात को कौन हो सकता है...कहीं किसी को पता तो नहीं चल गया कि घर में बुढ़िया अकेली है| दरवाजे पर लगी लेंस से भी धुँधला दिखता है|
डरते डरते उन्होंने दरवाजा खोला|
''आंटी, मैं इसी फ्लोर पर रहती हूँ| मुझे पता है कि अभी कुछ महीने आप अकेली रहेंगी| कुछ जरूरत हो तो बता दीजिएगा|''
''मगर कैसे, यदि आधी रात में जरूरत हुई तो...'' मन का भय छुप न पाया|
''आंटी, आप यह रिमोट रखिए| इसकी घंटी मेरे पास रहेगी| आपको जब भी जरूरत हो, बिना संकोच के रिमोट दबा दीजिएगा| मैं आ जाऊँगी|''
''ओह, मैंने सोचा , मैं बिल्कुल अकेली हूँ| हमेशा खुश रहो बेटी|''
कुछ देर बाद रिमोट को सीने से दबाए तुलिका देवी खर्राटें भर रही थीं|
--ऋता शेखर 'मधु'

शनिवार, 2 सितंबर 2017

सोच के बादल-लघुकथा

सोच के बादल

आज गणेश चतुर्थी के कारण ड्राइवर और मेड छुट्टी पर थे| अमृता और सरस पूजा की तैयारी में व्यस्त थे|
अचानक सरस को इमर्जेंसी कॉल आ गया | कोई ऊँची इमारत से गिर गया था और तुरंत इलाज की जरूरत थी|
''यार अमृता, जल्दी निकलना पड़ेगा| मैं शावर के लिए जा रहा हूँ| मेरी एक ड्रेस निकालकर प्रेस कर देना|''
''ठीक है'', अमृता ने कहा किन्तु वह भूल गई|
बाथरूम से निकलने पर सरस को कपड़े नहीं मिले तो वह चिल्ला पड़ा| हड़बड़ाई सी अमृता ने आकर कपड़े निकालने चाहे तो सरस ने उसका हाथ झटकते हुए कहा,''रहने दो, मैं कर लूँगा|''
सरस का ऐसा रूप अमृता ने पहले नहीं देखा था| रुआँसी होकर वह किचेन में गई और चाय बिस्किट ले आई|
''रहने दो, ऐसे ही जाऊँगा| जो कहा वह तो किया नहीं अब ये क्या है'', कहता हुआ दरवाजा खोल वह बाहर निकल गया|
आज कोर्ट में अमृता के वो क्लाइंट आने वाले थे जिन्होंने दो महीने पहले तलाक की अर्जी दी थी और अमृता ने उन्हें समझाते हुए दो महीने और साथ रहने को कहा था| उसका मन यह जानने को उत्सुक था कि दोनों ने क्या सोचा है|
किन्तु अब उसका मन कोर्ट जाने का नहीं हो रहा था| उसने मन ही मन कुछ निर्णय लिया| अपने जरूरत का सामान रखकर अमृता ने सूटकेस की जिप लगाई और दरवाजे से सटी दीवार के पास रख दिया| किचेन में जाकर चाय बनाई और कप लेकर बालकनी में खड़ी हो गई| आज आसमान मेघाच्छादित था| बादलों ने सूर्य को पूरी तरह से ढक रखा था| क्षण भर को उनकी गिरफ़्त से सूर्य निकल आता किंतु बादलों के झुँड उसे पुनः दबोच लेते| अमृता के दिमाग में विचारों की आवाजाही तेजी से चल रही थी|
''कोई इतनी बुरी तरह किसी को कैसे डाँट सकता है| मुझे भी तो कोर्ट जाने की जल्दी थी| जल्दी पूजा करके निकलना था|''
उसे सहेलियों का मजाक में यह कहना याद आ रहा था,''अमृता वकालत पढ़ेगी और जब उसका पति उसे डाँटेगा तो न जाने उसपर कौन सी धारा ठोक देगी...च्च्च बेचारा पति'' फिर खिलखिला पड़तीं सब के सब|
''और नहीं तो क्या, हम नारियाँ होने वाले अत्याचार के लिए खुद दोषी हैं,''वह भी कहाँ चुप रहती थी|
चाय पीते पीते वह वह ड्राइंग रूम के उस कोने में जा पहुँची जहाँ सरस की दादी माँ की तस्वीर लगी थी| ध्यान से वह तस्वीर देखने लगी| चंदन की माला के पीछे से दादी की स्नेहिल मुस्कान छलक रही थी| उसे लगा कि वह आज फिर से कह रही हैं'' बेटा , सरस में तुमने अभी प्रेमी का रूप देखा है| जब उसके गुस्से को झेल लोगी तब सही मायने में उसकी प्रेमिका बनोगी| मैं जानती हूँ कि तुम झेल लोगी''
ओह, दादी जानती थीं कि उनका पोता बहुत गुस्सैल है| किन्तु उन्होंने मुझमें भी तो विश्वास दिखाया था|
''उफ्फ, क्या करूँ'' अपने ही विचारों से आँखमिचौनी खेलती हुई अमृता बेचैनी से टहल रही थी| तभी फोन की घंटी बज उठी|
''मैम, हम दोनो को तलाक की अर्जी वापस लेनी है, आप जल्दी आइए''
''पर यह चमत्कार कैसे''
''आपके कहे अनुसार इन दो महीनों में हमने सिर्फ एक दूसरे की अच्छाइयों पर ही बातें कीं|
''अरे वाह! आती हूँ'', कहकर सूटकेस वापस कमरे में ले आई| सारे सामान जगह पर रखे |
तब तक आसमान में सूर्य भी बादलों की पकड़ से छूटकर पूर्ण प्रकाश के साथ चमक रहा था|
-ऋता शेखर 'मधु'
31/08/17

गुरुवार, 31 अगस्त 2017

आकलन-लघुकथा

आकलन
स्कूल जाने के लिए रेवा बस स्टॉप पर पहुँच चुकी थी| वहाँ पहुँच कर पता चला कि उस दिन बस हड़ताल थी| अब क्या करे रेवा| तभी अत्याधुनिक कपड़ों मे स्कूटी चलाकर जाती हुई एक महिला दिखी| उसने लिफ्ट के लिए हाथ दिया| स्कूटी वहाँ पर रुकी|
''क्या आप मुझे जीरो माइल तक लिफ्ट देंगी| मैं वहाँ से पैदल ही स्कूल चली जाऊँगी| आज स्कूल में एक महत्वपूर्ण आयोजन है और जाना जरूरी है| ''
वह रेवा के ढीले ढाले सलवार समीज को देखकर उसके स्तर का अंदाज लगा रही थी| फिर ''समय नहीं'' कहती हुई फर्राटे से निकल गई|
अभी रेवा ने दूसरी सवारी की ओर देखना शुरु ही किया था कि धम से आवाज सुनाई दी | रेवा ने पलट कर देखा|
''अरे , यह तो वही है'' सोचती हुई वह उस तरफ बढ़ी| सड़क पर बड़ा सा पत्थर था और स्कूटी शायद उसी से टकरा गई थी| उसे सिर पर जोर से चोट लगी थी इसलिए थोड़ी बेहोशी थी शायद| रेवा ने अपने बैग से पानी का बॉटल निकाला और उसे पिलाया| चेहरे पर पानी के छींटे भी दिए| धीरे धीरे उसने आँखें खोली|
''चलिए, आपको घर छोड़ दूँ,''रेवा ने उसे सहारा देते हुए उठाया|
''मैं चली जाऊँगी''
''नहीं, आप स्कूटी पर बैठें , मैं चलाकर ले जाऊँगी' 'रेवा ने सख्ती से कहा|
वह पीछे बैठ गई|
''मेरी स्कूटी खराब थी इसलिए...'' उसकी प्रश्न भरी नजरों को समझ कर रेवा ने मुसकुरा कर स्वयं ही कह दिया|
-ऋता शेखर 'मधु'

सोमवार, 28 अगस्त 2017

भूख का पलड़ा-लघुकथा

भूख का पलड़ा

तीन माले वाले मकान की ऊपरी छत पर मालिक- मालकिन से लेकर नौकर- चाकर सब जमा थे| चार दिन हो चुके थे बस्ती को बाढ़ की चपेट में आए हुए| पहले दो दिन तो वही बिस्किट और चूड़ा चलता रहा जो लेकर वे चढ़ पाए थे|तीसरा दिन फाँके में बीता| 

आज चौथे दिन अचानक एक हेलीकॉप्टर छत पर आया और राहत सामग्री के रूप में कुछ खाने के पैकेट गिरा कर चला गया| पैकेट लेने सब दौड़ पड़े|  भूख के आगे नौकर और मालिक का भेद मिट चुका था| जिसे जो मिला वही खाने लगा|कौशल्या देवी छत के कोने में बिछी दरी पर चुपचाप बैठी थीं|उन्होंने कुछ नहीं उठाया था|
"मालकिन, आपहुँ कुछ खा लेव '', घर की सबसे पुरानी दासी ने कौशल्या देवी की ओर बिस्किट का पैकेट बढ़ाया|
''ना री, तू ही खा ले| भूख नहीं है।'
''अइसे कइसे, जब तक अपने ना खाइब, हम भी ना खइबे|''
'' देख रामपीरितिया, जिद ना कर और खा ले|''
''भूख के मरम हम जानत रहीं मालकिन| केकरो सामने हाथ पसारे के मरम हम जानत रहीं| जी मार के रहे के मरम हम जानत रहीं। आप भी केतना दिन भुखले रहीं| पेट भरल में सब इज्जत-बेइज्जती सोचे के चाहीं| भुख्खल पेट के तो खाली खाना चाहीं|''
इस बार खाने का पैकेट दासी के हाथ मे था और उसे लेने के लिए कौशल्या देवी के हाथ धीरे धीरे आगे बढ़ रहे थे।
-ऋता शेखर 'मधु'

गुरुवार, 24 अगस्त 2017

पुनर्घटित-लघुकथा

पुनर्घटित
''माँ, भइया, देखिए, मेरा निफ़्ट का रिज़ल्ट आ गया है| मैं टॉप टेन में हूँ| मुझे मनचाही जगह मिल जाएगी| मुझे बताइए आपलोग कि कहाँ एडमिशन लूँ?'' निम्मी ने चहकते हुए आवाज दी|
''कोई जरूरत नहीं कहीं भी जाने की| यहीं से ग्रेजुएशन करो चुपचाप'', अचानक भाई निखिल की आवाज आई|
''क्यों जरूरत नहीं, मेरी एक फ्रेंड का भी हुआ है, वो कोलकाता जाएगी|'' ''उसे जाने दो, तुम्हें कहीं नहीं जाना|''
''भइया..." निम्मी रोकर पैर पटकती हुई कमरे में चली गई|
पापा का नहीं रहना आज से पहले उसे नहीं खला था|
तब तक माँ आ गई थी| उन्हें लगा जैसे निम्मी की जगह वह खड़ी हैं और निखिल की जगह उनका भाई जो उच्च स्वर में कह रहा हो,''मेरे दोस्त का छोटा भाई उच्च पद पर है| रुनी के लिए इससे अच्छा वर नहीं मिलेगा| माँ, इस वर्ष इसकी परीक्षा छुड़वा दीजिए और उसकी शादी कीजिए| बाकी पढ़ाई शादी के बाद भी कर सकती है,'' और माँ कुछ न बोली| एक मलाल लिए रुक्मणि ससुराल चली गई |
आज वह भी उसी जगह खड़ी थी किन्तु वह अपनी माँ की तरह चुप नहीं रहना चाहती थी|
''वह जाएगी, अभी उसकी माँ जिन्दा है|''
बेटे की बात का कभी विरोध न करने वाली माँ आज अचानक भाई-बहन के बीच ढाल बनकर खड़ी हो गई|
-ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 22 अगस्त 2017

अमरत्व-लघुकथा

अमरत्व

भारत में कम्पनी स्थापित करने के इरादे से अमरीका से मिस्टर हैरी की अगुआई में एक टीम भारत आई थी| वे महानगर के आसपास की पर्यावरणीय स्थिति का अवलोकन करना चाहते थे इसलिए उन्हें बंगलोर के निकटस्थ जंगल में लाया गया था| वहाँ लगे आम्रकुँज, जामुन , पीपल, बरगद और चीर के समूह से वे बहुत प्रभावित हो रहे थे| जंगल के बीचोबीच एक स्मारक था जहाँ लिखा था-

'' लोग जंगल काटकर इमारत बनाते हैं| मैं इमारत ढाहकर जंगल बसा रही हूँ| अगली पीढ़ी के लिए मैं विरासत में हरियाली और ऑक्सीजन की दौलत छोड़े जा रही हूँ| मुझे पूरा विश्वास है कि एक दिन मेरा पोता यहाँ जरूर आएगा| उस वक्त इन पेड़ों की हवाएँ उसे सहलाएँगी और वह मुझे याद करेगा| कोयल और पपीहों की आवाज में उसे मेरी लोरी सुनाई देगी| फूलों की खुश्बू में वह अगबत्ती की सुगंध महसूस करेगा| आओगे न हरीश...
तुम्हारी दादी-मालती स्वामी "
''मैं आ गया हूँ दादी, तुम्हारा हरीश आ गया,'' नम आँखों से अचानक मिस्टर हैरी स्मारक से लिपट गए|
उनके मस्तिष्क में चलचित्र की भाँति एक धुँधला सीन चल रहा था|
''माँ, ये इमारत बेच दीजिए और हमारे साथ अमरीका चलिए| मैं हरीश को भारत में नहीं रखना चाहता| अमरीका की उच्च जीवन शैली में उसे उच्च शिक्षा दूँगा|''
''नहीं , मैं अपना देश छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगी| इमारत भी नहीं बेचनी है| यहाँ मैं जंगल बसाऊँगी,''दस वर्ष की उम्र में सुनी हुई दादी की दृढ़ आवाज आज फिर हरीश के कानों में गूँज गई|
''मिस्टर हैरी, दिस लोकेशन इज़ ब्यूटिफ़ुल| वी शुड एस्टैब्लिश आवर कम्पनी हियर| व्हाट इज़ योर ओपिनियन,'' साथ आए मिस्टर डिसूजा ने पूछा|
''इस जंगल को मैं नहीं काट सकता| यहाँ मेरी ग्रैंडमॉम रहती है|''
कहते हुए मिस्टर हैरी दूसरे स्थान के अवलोकन के लिए बढ़ गए|
--ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 20 अगस्त 2017

हर घर में पल रहा है इक साथी नवाब का--ग़ज़ल

आज एक ग़ज़ल

मजमून ही न पढ़ पाए दिल की किताब का
क्या फ़ायदा मिला उसे फिर आफ़ताब का

हर पल बसी निगाह में सूरत जो आपकी
फिर रायगाँ है रखना रुख पर हिजाब का

इस ख़ल्क की खूबसूरती होती रही बयाँ
हर बाग में दिखे है नजारा गुलाब का

हाथों में थाम कर के वो रखते रिमोट को
हर घर में पल रहा है इक साथी नवाब का

हल्की हुई गुलाब की लाली जो धूप से
देखा न जाए हमसे उतरना शबाब का

लिखती रही है मधु सदा जोश-ए-जुनून से
मिलता नहीं पता उसे कोई ख़िताब का

--ऋता शेखर 'मधु'
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शनिवार, 19 अगस्त 2017

तुम अब भी हो-लघुकथा

तुम अब भी हो

ट्रेन पहले ही सोलह घंटे लेट हो चुकी थी| विह्वल सा आकाश बार बार घड़ी देखे जा रहा था| व्हाट्स एप पर हर मिनट एक ही मेसेज भेजे जा रहा था,''कैसी हो''
अब जवाब आना भी बन्द हो गया था| पास बैठे बुजुर्ग सहयात्री तक को उसकी आकुलता समझ में आ रही थी|
''बेटे, अब तो पाँच मिनट में ट्रेन पहुँचने ही वाली है| तुम इतने परेशान क्यों हो|''
''बाबा, मेरी आशु आई सी यू में है और चन्द घंटे ही बचे हैं उसकी जीवन लीला खत्म होने में| हम दोनो एक दूसरे को बहुत प्यार करते हैं बाबा| मैं जाते जाते उसकी माँग में सिंदूर भरना चाहता हूँ ताकि वह सुहागन बनकर इस दुनिया से जाए| फिर मैं पूरी जिंदगी उसकी याद में बिता दूँगा', बोलते हुए आकाश ने एक सिंदूर की डिबिया निकाली और भर्राकर रो पड़ा|
ट्रेन में भी माहौल कुछ भारी सा हो गया| तब तक जंक्शन पर गाड़ी लग चुकी थी|
तुरंत टैक्सी कर के आकाश अस्पताल की ओर भागा| चूँकि आशु का जाना तय था इसलिए डॉक्टर ने सबको मिलने की छूट दे दी थी| आकाश ने पहुँचते ही आशु का हाथ अपने हाथ में ले लिया|
''आशु, यहाँ तुम्हारे और मेरे पापा- मम्मी और सब भाई- बहन मौजूद हैं| मैं सबके सामने तुम्हारी माँग भरना चाहता हूँ,'' कहते हुए आकाश ने डिबिया निकाली किन्तु आशु ने महीन आवाज में धीरे धीरे कहा,''मैं जाते जाते रिश्तों में नहीं बँधना चाहती आकाश| मुझे याद तो रखोगे न'', अब आशु की आँखों में कोई बूँद न थी, बस प्रेम था जो छलक रहा था|
आकाश ने कुछ पल सोचा और थके कदमों से पास ही बैठी आशू की दृष्टिबाधित बहन नयना के पास गया|
''नयना, क्या तुम मेरी पत्नी बनना स्वीकार करोगी|''
नयना की आँखों से अविरल धार बह निकली|
आकाश ने आशु की ओर देखा| एक सुकून पसरा हुआ था वहाँ|
आकाश की चुटकी का सिंदूर नयना की माँग को सजा चुका था|
''देखो आशु, तुम अब हमेशा मेरे पास रहोगी'', कहते हुए आकाश ने आशू की ओर देखा किन्तु वह प्रेम दीवानी तो अपने दीवाने को छोड़कर जा चुकी थी|
--ऋता शेखर 'मधु'

गुरुवार, 17 अगस्त 2017

हमारी दोस्ती-लघुकथा

हमारी दोस्ती

''अर्णव, एक महीने से ऊपर हो गया यहाँ आए हुए,'' पिता ने आखिरकार इकलौते पुत्र को टोक ही दिया|
''तो'' अर्णव ने थोड़ी लापरवाही से कहा|
''अपना रेज्युमें सभी जगह भेज तो रहे हो न''
''नहीं'' फिर से उसका संक्षिप्त जवाब आया|
''एग्रीकल्चर साइंस की पढ़ाई विदेश से पूरी करने के बाद यहाँ रहने का मतलब''अब पिता की आवाज में थोड़ी खीझ भरी हुई थी|

गाँव की पगडंडी पर तीन पीढ़ियाँ एक साथ चल रही थीं|पिता- पुत्र के संवाद के दौरान दादा जी चुप थे|खेत आ चुका था और धान के नन्हें नन्हें पौधे हवा के साथ अठखेलियाँ कर रहे थे| अर्णव ने हरियालियों के बीच अपना चार्जर खोंस दिया|

''ये क्या है बेटे'' अब दादा जी बोले|

''दोस्ती, एग्रीकल्चर की दोस्ती आधुनिक तकनीक के साथ| ये दोनों ही ऊर्जा के स्रोत हैं| मैंने विदेश से एग्रीकल्चर साइंस की पढ़ाई की है और उसका उपयोग अपने देश में करना चाहता हूँ दादा जी| आप अब बूढ़े हो गए हैं| इन खेतों का विस्तार नहीं संभाल पाएँगे| इसे मैं सम्भालता हूँ और आप गैजेट्स संभाल लीजिए|''
''मतलब'', पलकें झपकाते हुए दादा जी बोले|
''मतलब दादा जी, आप व्हाट्स एप और फेसबुक चलाना सीख लीजिए, मैं खेती करना सीखता हूँ| जहाँ भी हम अटकेंगे, एक दूसरे की मदद करेंगे पक्के दोस्त की तरह,'' चुहल भरे अंदाज में अर्णव ने कहा|
दो कलों का सामंजस्य देखकर पिता की आँखें छलछला गईं|
-ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

कर्मयोगी-लघुकथा

कर्मयोगी
''मिसेज अणिमा, आपकी नियुक्ति यहाँ जीव विज्ञान के पद पर हुई है|स्नातक में आपने भोतिकी की पढ़ाई की हुई है| अभी इस विद्यालय में भौतिक विज्ञान के लिए कोई शिक्षक नहीं| बोर्ड की परीक्षा का समय नजदीक आ रहा| क्या आप बच्चों को भौतिकी पढ़ा देंगी?'' प्राच्रार्य महोदय ने अनुरोध के भाव से कहा|
''किन्तु सर, ये सब्जेक्ट गणित के शिक्षक को पढ़ाना चाहिए'' अणिमा ने कुछ सोचकर कहा|
''आपकी बात सही है| मैंने उनसे भी कहा था किन्तु....'' प्राचार्य महोदय ने अपनी बात पूरी नहीं की|
''किन्तु'' के आगे बोलने की जरूरत भी नहीं थी|
उच्च माध्यमिक विद्यालय में नियुक्त हुए अणिमा को लगभग एक महीना हो चुका था| नियुक्ति के बाद से उसने एक दिन के लिए भी अपना कोई भी क्लास मिस नहीं किया था जबकि कुछ सहशिक्षक बैठ कर गप्पें लड़ाते रहते| बरसों से बंद पड़ी प्रयोगशाला को खुलवाकर उसने सफाई करवाई और प्रयोग करवाने बच्चों को ले जाने लगी| बच्चे अणिमा मैम को पसंद करने लगे और यही बात पुराने शिक्षकों को नागवार लगने लगी| 
स्टाफ रूम में अणिमा कई कटाक्षों का शिकार होती रहती|
''आप तो बहुत काम करते हैं| इस बार राष्ट्पति अवार्ड के लिए आपका नाम जाना चाहिए|''
''इतना काम करके क्या होगा| ज्यादा तनख्वाह मिलेगी क्या''
''यह सरकारी संस्थान है| कोई नौकरी से थोड़े ही निकाल देगा|''
''हम जिस सब्जेक्ट के लिए आए हैं सिर्फ वही पढ़ाएँगे, दूसरा पढ़ाने से क्या मिलेगा| 
कर्मयोगियों की यहाँ कोई वैल्यू नहीं|''
प्राचार्य महोदय के प्रस्ताव पर यह सारी बातें अणिमा के मन में आने लगीं| उसे लगा कि क्यों वह इतनी मेहनत करे| इससे क्या फायदा होगा| फिर अगले ही पल प्राचार्य की उम्मीद भरी नजरें उसे उद्वेलित करने लगीं|
''जी सर, बच्चों के भविष्य का सवाल है और मैं तैयार हूँ|''
''मुझे आपसे यही उम्मीद थी'' मुस्कुराते हुए प्रिंसिपल ने कहा|
''मुझे आपसे यह उम्मीद नहीं थी'' स्टाफ रूम में घुसते ही गणित के शिक्षक ने तोप दाग ही दिया|
_ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 9 अगस्त 2017

कासे कहूँ-लघुकथा

कासे कहूँ
भाई के पास जाते हुए अचला ने अटलता से निर्णय कर लिया था। आज भाई से जानकर ही रहेगी कि वह कौन-सी बात है, जो उसे गाहे-बेगाहे उदास कर देती है|
भाई को उसके बच्चों से कितना अधिक प्यार हैं। हमेशा तरह-तरह के उपहार लाते हैं बच्चों के लिए, खूब हँसते, खिलखिलाते हैं बच्चों के साथ, किन्तु...! उसकी नजरें भाई की आँखों की नीरवता पढ़ लेतीं हैं। पिछले कई वर्षों से उसे महसूस हो रहा था, कि कुछ तो ऐसा दुख है जो भाई किसी से बाँटतें नहीं, मन ही मन घुटते रहतें हैं|

''भइया!'' अचला चहकती हुई घर में घुसी|
''आ गई बहन मेरी!'' भाई ने बहन का स्वागत किया|
अचला स्वयं ही प्लेट लाई| राखी,रोली, अक्षत , दीपक और मिठीइयों से प्लेट को सजाया| प्रेम से भाई को राखी बाँधी |
उसके बाद भाई ने उपहारस्वरूप एक लिफाफा आगे बढ़ा‌या|
''ना, नहीं लूँगी'' अचला ने हाथ पीछे कर लिया|
''क्यों री, ये नखरे क्यों, अगले साल गले का हार दूँगा | इस बार ये रख ले|''
''नहीं भइया, अगले साल उपहार स्वरूप एक भाभी चाहिए'' अचला ने भाई की आँखों में झाँकते हुए कहा जहाँ उदासी तिर चुकी थी|
''अचला, बेकार की जिद नहीं करते''
''ये बेकार की जिद नहीं भइया, आप मेरे बच्चों से कितना प्यार करते हो| मुझे भी तो बुआ बनने का शौक है, ये क्यों नहीं समझते आप|''
''तुम क्यों नहीं समझती कि अपनी अक्षमता के कारण मैं किसी लड़की को बाँझ का विशेषण नहीं दे सकता|''कहते कहते आवाज भर्रा गई थी भाई की |
अचला सन्न-सी कुछ देर चुप रही, फिर धीरे-से हाथ बढ़ा लिफाफा पकड़ लिया और कहा, "कल मेरे साथ आपको अस्पताल चलना है, सुना है इसका भी इलाज होता है।

अपनी कमी को स्वयं स्वीकारने वाले भाई के प्रति नतमस्तक थी अचला|

-ऋता शेखर 'मधु'
स्वरचित
8/08/17

मंगलवार, 8 अगस्त 2017

पूजा के फूल-लघुकथा

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पूजा के फूल
''माँ, मैंने पूजा के पास फूल रख दिए हैं,''यह ऋषभ की आवाज थी|
''मम्मी जी, जल्दी उठिए, चाय के लिए पानी चढ़ा दिया है चुल्हे पर, आपके कपड़े भी बाथरूम में रख दिए हैं,''यह बहु रीमा कह रही थी|
''अच्छा बाबा उठती हूँ, बहु, जरा पैर तो दबा दे पहले| और हाँ, तेरे पापा जी को मूली के पराठे पसन्द हैं| जरा मूली कस के रख दीजो|''
''ठीक है मम्मी जी,'' बहु गुनगुनाती हुई काम में व्यस्त थी|
कामिनी जी ध्यान से सुनने की कोशिश करने लगीं|
''मैं तो भूल चली बाबुल का देस....सासू जी मेरी हैं ममता की मूरत'' यह सुनते हुए कामिनी जी के चेहरे पर मुस्कान तैर गई|
कामिनी जी को जगाने के लिए उनके पति सुरेश बाबू कमरे में आए तो पत्नी के चेहरे पर मधुर स्मित देखा| समझ गए स्वप्न देख रही|
''कामिनी, चाय लाया हूँ''
''आपने चाय क्यूँ बनाई, बहु है न घर को स़भाल लेगी| बिल्कुल अपना घर समझती है इसे,'' उनींदे स्वर में कामिनी जी ने कहा|
''नींद से जगो कामिनी| ऋषभ का फोन आया था|''
''अच्छा, भारत आ रहा है न मेरा सपूत और रीमा से क्या बात हुई|दोनो आएँगे तो हमारी खूब सेवा करेंगे जी '' कामिनी जी बोले जा रही थीं|
सुरेश बाबू से यह बोलते न बना कि ऋषभ ने विदेश में ही रहने का फैसला कर लिया है|
--ऋता शेखर 'मधु'

शनिवार, 5 अगस्त 2017

गठबंधन-लघुकथा

गठबंधन

''दो विरोधी पार्टियों का गठबंधन, चुनाव में दोनो नजर आएँगे साथ साथ''
समाचार पत्र के मुखपृष्ठ पर छपे समाचार से पूरे राज्य में सनसनी फैल गई|
लाला जी की पत्नी ने ज्योंहि यह पढ़ा , पति के पास सच्चाई जानने पहुँच गईं|
लाला जी चाय का प्याला हाथ में लिए मंद मंद मुसकुरा रहे थे| पत्नी के हाथ में समाचारपत्र देखा तो जोर से हँस पड़े|
''जैसे कि आसार थे, इस बार आपकी पार्टी न जीतती| गठबंधन से अवश्य लाभ पहुँचेगा| मगर आपने यह चमत्कार किया कैसे|'' पत्नी की जिज्ञासा चरम सीमा पर थी |
''कल मैंने गोप जी को बुलाया था| बातचीत की| किन्तु वे अपने सिद्धांतों से समझौता करने को तैयार न थे|''
''फिर'' पत्नी अपलक लाला जी को देख रही थी|
''फिर क्या, मैंने एक तस्वीर की ओर इशारा किया जिसे कुछ देर देखने के बाद उन्होंने हामी भर दी|"
''कौन सी तस्वीर'' पत्नी ने चारो ओर दीवारों को ताक लिया जहाँ कई तस्वीरें लगी थीं|''
''वो वाली'' लाला जी ने एक तस्वीर की ओर इशारा किया|
पत्नी ने देखा, चित्र में दुश्मन समझे जाने वाले दो जन्तु,एक कुत्ता और एक बिल्ली मुस्कुरा कर एक दूसरे को देख रहे थे|
-ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

नचिकेता-लघुकथा

नचिकेता

प्राची ने आज फिर एक लघुकथा पोस्ट की थी| कथा माता-पिता के सम्बंध-विच्छेद पर आधारित थी| उस कथा में उसके सात वर्ष के पात्र ने वह कहा जो साधारणतया बच्चे नहीं कह सकते| कथा की यही बात आलोचना का विषय बन गई|
चूँकि कथा प्रतियोगिता के लिए थी और अच्छी भी थी इसलिए प्राची से कहा गया,'' आप वह बात किसी बड़े से कहलवाइए, तब हम आपकी कथा को विजेता बना देंगे''
''मगर क्यों''
''क्योंकि छोटे बच्चे इतनी बड़ी बात नहीं कह सकते प्राची जी |''
''मगर जो बच्चा विच्छेद का दंश सह रहा हो....''
''मतलब आप अन्त नहीं बदलेंगी'' प्राची की बात पूरी भी न हुई कि जवाब आ गया|
''विजेता बनने के लिए मैं कोई फेर बदल नहीं करूँगी| अनुभव के सामने उम्र मायने नहीं रखती | कभी नचिकेता-यमराज संवाद पढ़ लीजिएगा| ''
जवाब की प्रतीक्षा किए बिना प्राची ने लॉग आउट कर दिया|


-ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 2 अगस्त 2017

सोचो अम्मा-लघुकथा


''बेटे, सौरभ की शादी की बात कहीं पक्की हुई?'' फोन पर रमोला जी ने बेटे मनोज से यह बात पूछी|

सौरभ रमोला जी का पोता था और मल्टीनेशनल कम्पनी में काम करता था| सरल सहज सौरभ ने कभी किसी लड़की की ओर आँख उठाकर नहीं देखा, इसलिए प्रेम विवाह का प्रश्न ही नहीं उठता था| अरेंज्ड मैरिज में उसकी शर्त थी कि लड़की भी कामकाजी चाहिए थी|

''नहीं माँ, अभी नहीं| तीन जगहों पर बात आगे बढ़ी, दोनो मिले फिर लड़की ने इन्कार कर दिया|''

''क्यों, क्या कमी है हमारे सौरभ मे," रमोला जी ने आहत स्वर में पूछा|

''उसका श्यामल वर्ण'' मनोज जी ने बताया|

''उफ, लड़कियों की हिम्मत तो देखो| लड़के की सीरत देखी जाती है सूरत नहीं| ,'' माँ को यह बात हजम नहीं हुई|

सारी बातें स्पीकर पर हो रही थीं और रमोला जी की बेटी सृष्टि भी सुन रही थी|

''अब लड़कियाँ आत्मनिर्भर हो चुकी हैं| उन्हें भी निर्णय का अधिकार मिल चुका है| अब सोचो अम्मा , मनोज भैया के लिए लड़की देखने के समय आपने भी कई सर्वगुणसंपन्न लड़कियों को साँवले होने की वजह से छोड़ दिया था|''

सोचती हुई माँ को छोड़कर सृष्टि दूसरे काम निपटाने चली गई थी|
--ऋता शेखर 'मधु'

सोमवार, 31 जुलाई 2017

कसम-लघुकथा

कसम

"ममा, आज स्कूल में हम सभी ने मोमबत्तियां जलाकर कारगिल के शहीदों को श्रद्धाजंलि दी। ममा, हमारा देश सबसे दोस्त बनकर रहना चाहता है फिर ये लड़ाइयाँ क्यो होती हैं।" आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले राहुल ने घर आते ही मां से बातें करने लगा।
"बेटा, हमारा देश अहिंसा का पुजारी है। हम किसी को नुकसान नहीं पहुँचाना चाहते। " कहते हुए अंजलि ने टी वी ऑन कर दिया। वहाँ कारगिल युद्ध से संबंधित समाचार आ रहे थे। यह भी बताया जा रहा कि किस तरह देश के एक पत्रकार ने मनाही के बावजूद भारतीय छावनी के पास फोटो खींचने के बहाने फ़्लैश चमका दिया था और दुश्मन देश ने बम वर्षा कर दी जिसके कारण कई सैनिक मारे गए।
"ममा, हम दुश्मन देश से कमजोर हैं क्या।"
"नही, हम ताकतवर है साथ ही सहनशील भी।" ममा ने बताया।
"और इसी सहनशीलता का दंड हम सैनिकों की आहुति देकर चुकाते रहते है।" अचानक महेश आ गए थे कमरे में।
उन्होंने छोटे भाई की फोटो को माला पहनाया।


राहुल तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। उसे किसी ने नहीं बताया था कि तस्वीर उसके पिता की है। जब वह दुनिया मे आने वाला था तभी कारगिल युद्ध मे वे शहीद हो गए थे। उनके गम में उसकी माँ बहुत कमजोर हो गई और राहुल को जन्म देते समय चल बसी थी।
तब अंजलि ने बढ़कर दुधमुँहे को छाती से लगाया था और अपने बच्चे को जन्म न देने की कसम खाई थी।
-ऋता शेखर "मधु"

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

व्हाट्स-एप ग्रुप-लघुकथा

व्हाट्स-एप ग्रुप
व्हाट्स एप पर एक नया ग्रुप अवतरित हुआ-''हम साथ साथ हैं''
परिवार के सभी सदस्यों ने ग्रुप इंफो में जाकर देखा तो उसमें एक परिवार पूरी तरह से नदारद था| घर के सबसे समझदार और न्यायपूर्ण तरीके से सोचने वाले परिवार के बड़े दामाद आनंदी बाबू मुस्कुरा उठे|
उधर आनंदी बाबू की पत्नी लाली ने भी ग्रुप को देखा और पति के पास आकर बोली,''देखा न आपने,रोमा भाभी ने नया ग्रुप बनाया और उसमें मयंक को और उसके परिवार को शामिल नहीं किया''
''ठीक ही है न, कल मयंक ने भी तो एक समूह बनाया था-हमारा परिवार| उसमें उसने बड़े भइया,रोमा भाभी एव उनके बच्चों को नहीं रखा| तब तो तुमने कुछ नहीं कहा लाली|''आनंदी बाबू ने सहज तरीके से कहा|
''मयंक छोटा है, उसकी बातों का क्या लेना'' लाली ने भाई का पक्ष लेते हुए कहा|
'' तुम्हारे छह भाई- बहनों के भरे पूरे परिवार को भाभी ने बहुत समेट कर रखा और तुम सबकी ज्यादतियाँ और नादानियाँ बरदाश्त करती रहीं| मयंक की पत्नी ने आते ही परिवार में राजनीति का खेल शुरु कर दिया| बड़ी भाभी की लोकप्रियता से उसे इर्ष्या होने लगी थी| सबसे बुरी बात यह रही कि तुम सबने उसका साथ दिया| बड़े भइया और मयंक, दोनो तुम्हारे भाई हैं लाली| परिवार में एकता बनी रहे इसकी जिम्मेदारी सबकी होती है|''
''किन्तु भाभी ऐसा कैसे कर सकती हैं|''अभी भी लाली को विश्वास नहीं हो रहा था|
'' तुम्हारी भोली-भाली भाभी ने अब जाकर दुनियादारी सीखी है|''अर्थपूर्ण नजरों से देखते हुए आनंदी बाबू बोले और लाली कुछ न बोल सकी|
--ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

फ्रेंडशिप बैंड-लघुकथा

प्रेरणा

डोर बेल बजते ही आशा ने दरवाजा खोला|
''हैप्पी फ्रेंडशिप डे" कहती हुई छह सात महिलाएँ अन्दर आ चुकी थीं||
''अरे यार, यूँ आँखें फाड़ फाड़ कर क्या देख रही है आशु डियर| माना कि हम तीस सालों के बाद मिल रहे किन्तु इतने तो न बदल गए कि एक दूसरे को पहचान ही न सकें''|
आशु डियर...ये कहने वाली तो उसकी एक ही दोस्त थी मंजरी जो उसे हमेशा आशा के बजाय आशु ही कहा करती थी| चश्मे के भीतर से झाँकती उसकी आँखों ने सिर्फ मंजरी को ही नहीं बल्कि स्कूल की सभी सहेलियों को पहचान लिया जो आई थीं| उसकी इच्छा हुई कि वह सबके गले से लग जाए और स्कूल के दिनों वाली चुलबुली आशा बन जाए किन्तु वह ऐसा नहीं कर सकी|  उसके उदासीन चेहरे को लखती हुई मंजरी ने सबसे कहा, ''अरे, तुम सब खड़ी क्यों हो, फ्रेंडशिपबैंड बाँधो उसे|"
हाँ हाँ कहती हुई सभी ने उसका हाथ खींचकर बैंड से भर दिया| आशा अचानक उनके गले लगकर फूटफूटकर रोने लगी| मंजरी ने इशारे से सबको चुप रहने को कहा और कुछ देर तक आशा को रोने दिया| थोड़ी देर बाद जब वह शांत हुई तो उसने पूछा, ''तुमलोगों को मेरी खबर कैसे मिली"
मंजरी ने शांति से बताया,'' समय के झंझावात में हम सभी खो गए थे| जब फेसबुक पर आई तो सभी सहेलियों को ढूँढना शुरू किया| रोमा, नेहा, पूजा, अनामिका, पुतुल, उर्मिला सभी मिल गईं, एक तू न मिली| एक दिन फेसबुक पर मैंने तेरे भाई वीरेंद्र को देखा| उनसे ही पूछा तेरे बारे में|शादी होते की पति की मृत्यु होने से ससुराल वाले तुझे कितना भी मनहूस कहें , तू तो हम सबकी वही प्यारी चहकने वाली आशू है न| खुद को दुनिया से काटकर तू सबको कितना दुखी कर रही यह मैंने तब जाना जब तेरे भाई के आँसूओं में देखा| आशू, चल न, वीरेन्द्र और भाभी, बच्चे तेरा इंन्तेजार कर रहे| सबसे पहले एक अच्छे से होटल में चलते हैं, फिर थोड़ी शॉपिंग करेंगे | '' स्कूल के दिनों में दोनों फास्ट फ्रेंड हुआ करती थीं | मंजरी का मन रखने के लिए आशा तैयार होने लगी| मंजरी ने उसे पर्स में चुपके से एक राखी रखते देख लिया|
''एक बात और है आशु, ये सफेद साड़ी क्यों|''
''एक विधवा...'' इसके आगे आशा कुछ कहती तभी मंजरी ने उसके मुख पर हाथ रख दिया|
''ना, ऐसे नहीं बोलते| औरतें ईश्वर की अनुपम कृति हैं| एक विधवा भी बेटी, बहन और माँ होती है| उनके लिए अपनी वेशभूषा बदल दे''|
''अभी आई'' कहकर आशा अन्दर गई| जब वापस लौटी तो उसने आसमानी रंग की सिल्क की साड़ी पहनी थी| माथे पर छोटी सी बिंदी और हाथों में साड़ी से मेल खाती दो दो चूड़ियाँ थीं|
''ये हुई न बात, जल्दी चल|''
ज्योंहि दोनो बाहर निकलीं भाई वीरेन्द्र को देखकर रुक गईं| वीरेंद्र की आँखों में मंजरी के लिए कृतज्ञता झलक रही थी|
--ऋता शेखर 'मधु'

पिता की कोख-लघुकथा

पिता की कोख

सासू माँ के आने से तेजस खुश था| उसकी गर्भवती पत्नी मृणाल का ख्याल रखने के लिए अब कोई तो था घर में| जबसे उसे मृणाल की प्रेगनेंसी का पता चला था वह उसे घर में बिल्कुल भी अकेला नहीं छोड़ना चाहता था| उसकी माँ नहीं थी तो उसने खुद सासू माँ को फोन करके बुलाया था|

"मृणाल, भारी मत उठाना| मृणाल, ऑफिस से लौटते हुए क्या लाऊँ खाने के लिए| मृणाल, तुम्हें अच्छी अच्छी किताबें पढ़नी चाहिए| मृणाल, सुबह उठो तो सबसे पहले बाल गोपाल के कैलेंडर की ओर देखना| मृणाल, खूब खुश रहा करो| मृणाल , मम्मी से पूछकर लाभ वाले फल खाना,"तेजस की हिदायतें जारी थीं|

"उफ, अब बस भी करो तेजस, तुम ऑफिस जाओ|"

"अच्छा बाबा, जाता हूँ", कहकर तेजस गुनगुनाता हुआ चला गया|

''माँ, आपने देखा न, कितनी हिदायतें देते हैं तेजस," मृणाल माँ से बातें करने लगी|
'' बेटा, बच्चा माँ की कोख में रहता है और एक कोख पिता के पास भी होती है|'

'पिता की कोख', मृणाल समझ नहीं पाई|

"हाँ, पिता की कोख उसका मस्तिष्क है जहाँ से वह भी बच्चे को उतना ही महसूस कर रहा है जितना की तुम| वहीं से गर्भ में पल रहे के लिये अहसास ,सपने, परवाह और जिम्मेदारी जन्म लेती है," माँ ने मुस्कुराते हुए कहा|

'' ये है पिता की अनदेखी ममता...' सोचती हुई मृणाल शाम का बेसब्री से इन्तेजार करने लगी|

--ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 23 जुलाई 2017

रिमाइंडर-लघुकथा

रिमाइंडर
" मनीषा, एल आई सी की किश्त भरने का समय निकल गया। अब फाइन देना होगा। रिमाइंडर तो लगा दिया होता।"
मनीषा चाय बनाते बनाते रुक गई। उसने अमित की ओर देखा और एक फीकी हँसी हँस दी।
अमित को सहसा याद आ गया वह पार्टी वाला दिन जब उसने अपने दोस्तों से परिचय करवाते हुए कहा था" ये हैं हमारी श्रीमती जी जो सारे काम रिमाइंडर से ही करती है। साल बदलते ही सभी खास मौकों के लिए रिमाइंडर सेट कर देती हैं। मुझे लगता है आगे रिमाइंडर पर यह भी लगा देंगी की मैं ही इनका पति हूँ।"
और दोस्तों के ठहाको के बीच किसी ने उस अपमान की रेखा को नहीं देखा जो मनीषा के चेहरे पर उभरी थी।
अमित ने आज अचानक महसूस किया और स्वयं मोबाइल लेकर मनीषा के सामने खड़ा हो गया।
-ऋता

शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

ताटंक छंद



ताटंक छंद

1 लावणी
मोहन के माथे केशों की, अवली बड़ी निराली है|
हौले हौले खेल खेल कर, पवन हुई मतवाली है|
थिरक रही अधरों पर बंसी,तन्मय झूम रही गइया|
मोहिनी छवि नंदलाला की, निरखतीं यशोमति मइया||


2 लावणी
रचकर लाली हाथों में तुम, ज़ुल्फ़ें यूँ बिखराती हो|
बादल की बूँदों से छनकर, इंद्रधनुष बन जाती हो|
चमका सूरज बिंदी बनकर, संगीत सुनाये कँगना|
करता जगमग तुलसी चौरा, तुम से ही चहके अँगना||

3 ताटंक
सीमा पर वह डटे हुए हैं, भारत की रखवाली में|
स्वर्ण बाल हैं भुट्टों के भी, कृषकों की हरियाली में|
सोच रहे जब देश के लिए, निज कर्तव्य निभा लेना|
लोक हितों की खातिर साथी, मन का स्वार्थ हटा देना||
--ऋता शेखर 'मधु'

ताटंक-16-14 पर यति...अन्त में गुरु गुरु गुरु

लावणी-16-14 पर यति... लघु लघु गुरु

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

आदर्श घर

आदर्श घर

डॉक्टर बन चुकी निकिता भाई की शादी में आई थी . उसका जन्म ऐसे परिवार में हुआ था जहाँ बेटा-बेटी का कोई भेदभाव न था| अच्छे संस्कारों के साथ बड़ी हुई थी .

सबने उसे सर-माथे पे बिठाया | वह भी पूरे घर में चहकी फिर रही थी| माँ कुलदेवता की पूजा में व्यस्त थी और निकिता कहती जा रही थी-

'माँ , हमारा घर कितना आदर्श है न! बेटा- बेटी में फर्क नहीं करता|'

पूजा के बाद प्रसाद बँटने लगा तो दादी की आवाज आई|

"बहू, सबसे किनारे वाले देवता का प्रसाद निक्की को न देना|"

"क्यों दादी" निकिता की आवाज में हल्की सी नाराजगी थी|

"निक्की बेटा, वो प्रसाद सिर्फ खानदान के बच्चे ही खा सकते हैं| वह तेरा भाई ही खा सकता है|"

अचंभित सी निकिता ने अपना बढ़ा हुआ हाथ पीछे खींच लिया|


--ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 19 जुलाई 2017

दोहे की दुनिया

दोहे

1
बहन रेशमी डोर को, खुद देना आकार |
चीनी राखी त्याग कर, पूर्ण करो त्योहार||
2
महकी जूही की कली, देखन को शुभ भोर
खग मनुष्य पादप सभी, किलक रहे चहुँ ओर
3
मन के भीतर आग है, ऊपर दिखता बर्फ़।
अपने अपनों के लिए, तरल हुए हैं हर्फ़।।
4
ज्ञान, दान, मुस्कान धन, दिल को रखे करीब।
भौतिक धन ज्यों ज्यों बढ़े, होने लगे गरीब।।
5
जब जब भी उठने लगा, तुझपर से विश्वास|
दूर कहीं लहरा गई, दीप किरण सी आस||
6
इधर उधर क्या ढूँढता, सब तेरे ही पास|
नारिकेल के बीच है, मीठी मीठी आस||
7
अफ़रातफ़री से कहाँ,होते अच्छे काम।
सही समय पर ही लगे,मीठे मीठे आम||
8
बिन काँटों के ना मिले, खुश्बूदार गुलाब|
सब कुछ दामन में लिए, बनो तुम आफ़ताब||
9
पावन श्रावण मास की, महिमा अपरम्पार।
बूँद बूँद है शिवमयी, भीगा है संसार।।.
10
जब जब पढ़ते लिस्ट में, लम्बी चौड़ी माँग|
नीलकंठ भगवान को,तब भाते हैं भाँग||
11
फूल खिलें सद्भाव के, खुश्बू मिले अपार।
कटुक वचन है दलदली, रिश्तों को दे मार।।

--ऋता

शनिवार, 1 जुलाई 2017

टैक्स के आतंक से मुक्ति- जी एस टी (GST)

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GST- Goods & Services tax.....

इसे good and simple tax के रूप में बताया जा रहा है|
30 जून और 1 जुलाई 17 की मध्यरात्रि को GST का लॉन्च समारोह संसद के सेन्ट्रल हॉल में हुआ जिसमें वित्तमंत्री अरुण जेटली ने बताया कि एक राष्ट्र एक टैक्स- One nation one tax ही इसका उद्देश्य है और इससे टैक्स चोरी से राहत मिलेगी|
कर प्रणाली व्यवस्था आसान होगी|
केलकर ने 2003 मे एक ऐतिहासिक फैसला लिया था कि पूरे देश में एक तरह का टैक्स हो|
इसमें17 टैक्स और 22 सेस को खत्म किया गया|

प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा ---
यह व्यवस्था किसी एक सरकार की देन नहीं बल्कि सा़ँझा प्रयास का फल है|
जी एस टी की कुल18 बैठकें हुईं|
जी एस टी संघीय ढाँचे की मिसाल है|
जी एस टी लंबी परिचर्चा का परिणाम है|
सवा सौ करोड़ जनता साक्षी बनी|
आर्थिक एकीकरण होगा|
आइंसटीन ने कहा था- इन्कम टैस्क समझना सबसे कठिन काम |
गरीबों का खास ख्याल रखा गया है|
देश आधुनिक टैक्स व्यवस्था की ओर बढ़ रहा|
बीस लाख वाले कारोबारियों को कोई टैक्स नहीं देना पड़ेगा |
यह व्यवस्था इमानदारी का अवसर देगी|
यह सरल पारदर्शी व्यवस्था है|
कच्चा बिल और पक्के बिल का चक्कर खत्म हुआ|
विदेशी व्यापारियों को सुविधा मिलेगी|
आर्थिक से भी आगे सामाजिक क्रा़ंति है जी एस टी|
टैक्स पर टैक्स...टैक्स पर टैक्स से मुक्ति मिली|
यह सरल पारदर्शी व्यवस्था है|
इससे आर्थिक एकीकरण होगा|
राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा...
14 वर्षों का सफर है जी एस टी का
रात के बारह बजे से जी एस टी लागू
दुनिया का सबसे बड़ा टैक्स सुधार
=============================
देश में कहीं भी सामान खरीदो, एक ही मूल्य लगेगा|
सबसे खुशी की बात है कि सभी पार्टियों ने इसे समर्थन दिया है|
ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 30 जून 2017

आ, अब लौट चलें...

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कहते हैं जीवन में कभी न कभी हम सब उन सभी चीजों से आकर्षित हो जाते हैं जो सहज उपलब्ध हो| जहाँ वाहवाही मिले वहाँ बार बार जाने की इच्छा होती है| त्वरित मिली प्रतिक्रियाएँ लुभाने लगती हैं और हम भूल जाते हैं उस पुश्तैनी मकान को जहाँ हमने बचपन गुजारा था| कुछ दिनों की चमक दमक के बाद पुराने संगी साथी याद आने लगते हैं और दिल बार बार कहने लगता है...आ , अब लौट चलें...या फिर...ओ साथी रे, तेरे बिना भी क्या जीना...
ऐसा ही कुछ हुआ हम सभी ब्लॉगर्स के साथ...जब नेट की दुनिया में हमने कदम रखा तो मन के भीतर उमड़ते घुमड़ते विचारों को लिखने के लिए एक डायरी मिल गई ब्लॉग के रूप में| ब्लॉग पर एक सुविधा थी फौलोवर बनने की...तो जिनकी पोस्ट पसंद आने लगी उस ब्लॉग को फौलो करने लगे| जब भी उस ब्लॉग पर नई पोस्ट आती हमें सूचना मिल जाती और हम वहाँ टहल आते| एकाध कमेंट भी डाल देते और फिर जाकर देखते कि उन ब्लॉगर महोदय/ महोदया ने रेस्पॉंस दिया या नहीं| हमारे ब्लॉग पर भी लोग आने लगे और हम खुद को लेखिका समझने की भूल कर बैठेः)
कुछ ब्लॉग, एग्रीगेटर का काम करते और हमलोगों की जो पोस्ट उन्हें अच्छी लगती उसका लिंक एक स्थान पर इकट्ठा कर के पाठकों तक पहुँचाते| उनमें "चर्चा मंच" और "हलचल" उन दिनों प्रमुख हुआ करते थे| इससे page view भी बढ़ता और रचनाएँ ज्यादा से ज्यादा लोगों तक चली जातीं| उस समय अच्छा से अच्छा लिखने की तीव्र लालसा रहती और सच कहें तो उस समय जो लिखी वह फिर नहीं लिख पाई| हम, बच्चों को अक्सर यह कहते हैं कि किसी भी चीज की लत बुरी होती है| पर जब बात खुद पर आई तो फेसबुक की लत लगने लगी और चाह कर भी हम उस लालसा को छोड़ नहीं पाए और रोजाना अपना कीमती वक्त फेसबुक को देने लगे इससे रचनकर्म पर बहुत प्रभाव पड़ा| जो भी विचार मन में आया वह मन की कोठरी में कैद न रहकर फेसबुक स्टेटस बनने लगा| जब हमने फेसबुक अकाउंट खोला तो जिन ब्लॉगर मित्रों को जानते थे उन्हें फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दिया| छोटी कविताएँ पोस्ट करने लगे| फिर मित्रता अनुरोध आने लगे तो फटाफट स्वीकार भी की| लेकिन क्षेत्र कोई भी हो, कुछ खट्टे मीठे अनुभव भी हुए जिसे इग्नोर किया| व्हाट्स एप ने रही सही कसर पूरी की और सभी उसकी गिरफ्त में आने लगे| सबके पास मोबाइल और सोशल मिडिया का जुड़ाव बढ़ा| जहाँ पहले ब्लॉगर्स महीने में ज्यादा से ज्यादा पोस्ट डालने के लिए श्रम करते वहाँ अब महीनों तक इधर झाँकना भी बन्द कर दिया सबने| ब्लॉगर साथी फेसबुक पर दिखने लगे और हमारा ब्लॉग भूतबँगला बनने लगा |
एक दिन बुद्धत्व जैसा कुछ ज्ञान मिला तब लगा कि फेसबुक चौराहा है और ब्लॉग सुरक्षित घर जैसा| इधर कुछ महीने पहले से हमने पोस्ट फिर से डालना शुरु किया| तीन चार पोस्ट आकर शिड्यूल कर जाते जो समय समय पर स्वयम् प्रकाशित हो जाते| पहले जो एग्रीगेटर हमारी पोस्ट ले जाते उन्हे धन्यवाद देने जरूर जाते| बाद में उसमें भी सुस्ती होने लगी|
तो दोस्तो, फेसबुक के द्वारा मित्रता कायम रखें पर ब्लॉगिंग की ओर भी ध्यान दें| सार्थक बाते यहीं मिलेंगी|
पोस्ट लिखें...दूसरों की पोस्ट पर भी जाएँ...यहाँ लाइक का ऑप्शन तो नहीं है पर टिप्पणी तो कर ही सकते|
ब्लॉग पोस्ट को मनचाहा सजाएँ और लगाएँ| एक आह्वान था कि 1 जुलाई से सबके कदम पुनः ब्लॉग की ओर मुड़ें| इस आह्वान का मैं तहेदिल से स्वागत करती हूँ और समय प्रबंधन भी करना होगा कि कोई भी स्थान छूटे नहीं|
ब्लॉगर ऋता

गुरुवार, 22 जून 2017

यादें हरसिंगार हों

दोहे 
 1
दादी अम्मी टोकते, टोकें अब्बूजान
लगा सोलवां साल अब, आफत में है जान
2
महँगाई की मार से बिलख रहा इंसान
जीवनयापन के लिए आफत में है जान

 3
इधर उधर क्या ढूँढता, सब कुछ तेरे पास
नारियल के बीच बसी, मीठी मीठी प्यास

 4
यादें हरसिंगार हों, वादे गेंदा फूल
आस बने सूरजमुखी, कहाँ टिके फिर शूल
5
कड़ी धूप की लालिमा दिल में है आबाद
गर्मी में आती सदा गुलमोहर की याद
6
चुप रहना अद्भुत कला, जान न पाये आप
मनमोहन से सीख कर, मन में ही करिये जाप ऋता
7
 हृदय पुष्प को खोलकर, बोले अपना हाल
बिन गुलाल के मैं सखी, हुई शर्म से लाल
8 गुणीजनों के साथ हों, जब अच्छे संवाद
समझो माटी को मिला, उर्वरता का खाद
9
 नित प्रातः हरि नाम से, दिन को मिले मिठास
थाली को ज्यों गुड़ मिले, भोजन बनता खास
10
 कहो कौन किसके लिए जग में रोता यार
अपने अपने स्वार्थ में जीता है संसार
11
निज गुण के जो हैं धनी, झेलें नहीं अभाव
खुद से वह रखते परे, दूसरों का प्रभाव
-ऋता
==============================


कुण्डलिया ...

सावन आया झूमकर, नाचे है मन मोर
नभ में बादल घूमते, खूब मचाते शोर
खूब मचाते शोर, गीत खुशियों के गाते
तितली भँवरे बाग़, हृदय को हैं हुलसाते
मीठे झरनों का राग, लगे है सुन्दर पावन
नाचे है मन मोर, झूमकर आया सावन
-ऋता

================================

 हाइकु-

वृक्ष सम्पदा
हर मनु के नाम
एक हो वृक्ष

अश्व लेखनी
सरकारी कागज
दौड़ते अश्व
ऋता शेखर 'मधु'


रविवार, 18 जून 2017

प्रतिबिम्ब--कुछ भाव कुछ क्षणिकाएँ

बँधे हाथ

अपने वतन के वास्ते
गुलमोहर सा प्यार तुम्हारा
अनुशासन के कदम ताल पर
केसरिया श्रृंगार तुम्हारा
 

पत्थर बाजों की बस्ती में
जीना है दुश्वार तुम्हारा
चोट सहो तुम सीने पर
पर कचनारी हो वार तुम्हारा

हा! कैसा है सन्देश देश का
चुप रहकर शोले पी लेना
उन आतंकी की खातिर तुम
अपमानित होकर जी लेना।

अच्छी नहीं सहिष्णुता इतनी भी
रामलला को याद करो
कोमल मन की बगिया में
कंटक वन आबाद करो
-ऋता
============================

बुद्धत्व

मंजिल पर शून्य है
रे मन, सफ़र में ही रहा कर

संसार में
रोग क्यों है
शोक क्यों है
बुढ़ापा क्यों है
मृत्यु क्यों है
इस शाश्वत सत्य की खोज में
सिद्धार्थ को बुद्धत्व प्राप्त हुआ।
क्यों है...इसका उत्तर सहज नहीं
और यदि ये सब है ही
तो सहज स्वीकार्यता ही
संसार में बुद्धत्व पाने का सरल मार्ग है
ये मार्ग सरल होते हुए भी सहज नहीं
जीवन में हर मनुष्य इनकी खोज में है
मन का बूद्ध हो जाना भी
शाश्वत सत्य है।
-ऋता

 ===================
प्रतिबिम्ब
 
सागर भी है
तलैया भी
गगन का प्रतिबिम्ब
दोनों में समाया
अशांत लहरो में
गगन भी अशांत सा
तलैये के मौन में
महफूज़ चाँद सितारे
-ऋता
====================

एक सवाल

मनु,
तू कौन है, क्या है?
एक आकार
एक आत्मा
एक भाव
एक सोच
एक मन
एक यात्री
एक रास्ता
एक मंजिल
एक नागरिक
एक धर्म
एक मानवता
एक मोह
एक त्याग
एक अभिलाषा
एक लिप्सा
एक क्रोध
एक भाषा
एक जनक
एक सार
एक तत्व
एक प्रेम
एक विरह
एक भोग
एक विलास
एक क्रिया
एक प्रक्रिया
एक प्रशंसा
एक आलोचना
एक सत्यवादी
एक चापलूस
एक वक्ता
एक श्रोता
एक अभिव्यक्ति
एक पीर
एक हास्य
एक गंभीर

मनु: सुन ले
तू एक व्यक्तित्व हूँ
उपरोक्त सारे गुणों से लबरेज
प्रभु की अनुपम कृति है।

=========================

उम्मीदें

उम्मीदें तो बीज हैं
उनकी अवस्था
सुसुप्त नहीं होती
बार बार अंकुरण
बार बार आघात
फिर भी कोंपल
झाँकने को आतुर
मुरझाने का सिलसिला
जाने कब तक चले
अंकुरण की प्रक्रिया
जारी रहती है
अनवरत
===========================


 ये जरूरी नहीं कि हमारे शुभचिंतक सिर्फ हमारे अपने रिश्तेदार या मित्र ही हों...कई शुभचिंतक वो भी होते है जो राह चलते मिल जाते है...
जैसे जब आप ट्रेन में हो और गंतव्य के पास से गाडी धीरे धीरे गुजर रही हो तब उतरने की चेष्टा करते हुए किसी का टोक देना...
जब फ्लाइट में थोड़े हेवी सामन के साथ आप अकेले हों तब किसी का हाथ बढाकर आपका बैग उतार देना...
जब आप बेध्यानी में पटरी क्रॉस करके प्लेटफॉर्म पर आते हुए उधर से आ रही ट्रेन न देख पाएं हो तो पब्लिक का एक साथ चिल्ला देना...
जब आधे किलोमीटर की दूरी तय करवाकर ऑटो वाले का पैसा न लेना...
और भी बहुत कुछ जो याद रह जाता है और उन अजनबियों को मन बार बार धन्यवाद के साथ दुआएँ भी देता है। यदि आप किसी की मदद के लिए हाथ बढ़ाते है तो बदले में बहुत कुछ अर्जित कर लेते है।

आज उन सभी को धन्यवाद।

 


शुक्रवार, 16 जून 2017

संस्कारहीन

संस्कारहीन

' देखिए जी, लेन देन पर हम थोड़ा बात कर लें, फिर बात पक्की ही समझें| आपकी बेटी बहुत संस्कारी है और हमें ऐसी ही लड़की की जरूरत है,' लड़के के पिता ने रोब लेते हुए कहा|

'जी, आप जैसा कहैं हम अपनी हैसियत के अनुसार देने के लिए तैयार हैं,' मद्धिम आवाज थी लड़की के पिता की|

'समान तो जो आप अपनी लड़की को गृहस्थी जमाने के लिए देंगे वो तो देंगे ही| हमें कैश के रूप में दस लाख दे दें, बस| बारातियों का स्वागत तो आप अच्छे से करेंगे ही| हमारा घर भी बहुत संस्कारी है, बिटिया को कोई तकलीफ न होगी' लड़के के पिता की आवाज थी|

'अंकल' अचानक लड़की बोल पड़ी, 'आप जो दस लाख लेंगे उसमें से मेरे लिएआठ लाख के जेवर तो बनवाएँगे ही जो संस्कारी घर में चलता है|'

'संस्कारहीन लड़की, लेन देन की बात करती है' लड़के के पिता भड़क गए|

'अब मैं क्या बोलूँ संस्कारहीनता पर...'लड़की ने मुस्कुराकर कहा और कमरे से बाहर निकल गई|

--ऋता


मंगलवार, 16 मई 2017

डील-लघुकथा

डील

कॉफी कैफे में बैठे मोहित और अनन्या औपचारिक बातचीत कर रहे थे। दोनों ही अच्छे पैकेज वाले मल्टी नेशनल कम्पनी में कार्यरत थे। शादी डॉट कॉम वाली साइट से दोनों परिवारों ने अपनी सहमति दी थी।चूँकि दोनों एक ही शहर में कार्यरत थे इसलिए अपने अभिभावकों की अनुमति से एक दूसरे को देखने और मिलने आये थे।

कॉरपोरेट स्टाइल में दोनों की बातें इस तरह से चल रही थीं जैसे कोई डील पक्की कर रहे हों।

"मोहित, आप खाना तो बना लेते होंगे।"

"बिलकुल बना लेता हूँ। "

"तो वीक में तीन दिन मैं और तीन दिन आप किचेन देख लेंगे"

" मैं पूरे वीक देख लूँगा।"

"सच ! बाहर से सामान कौन लाएगा।"

"मैं हूँ न", मोहित ने मुस्कुराते हुए कहा।

"अच्छा, शॉपिंग भी करवाएंगे।"

"वीकेंड में शॉपिंग भी और खाना भी बाहर खाएंगे।"

"एक बात और मोहित, आपके पैरेंट्स हमारे साथ ही रहेंगे क्या।"

माता पिता का एकमात्र पुत्र मोहित यह सुनकर मन ही मन आहत हुआ किन्तु बात सँभालते हुए बोला-

"जैसा तुम चाहोगी"

"मैं नहीं चाहती कि हमारी आजादी में कोई खलल हो।रोक टोक बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगी।"

"ओके, फिर मैं अपने पेरेंट्स को नहीं रखूँगा "

अनन्या का चेहरा ख़ुशी से खिल गया।

"अनन्या, तुम्हारी सारी डील मुझे स्वीकार है। एक बात मेरी भी मान लो।"

"जी, बोलिये।"

"तुम्हे भी अपने पेरेंट्स के आने पर पाबन्दी लगानी होगी। मेरी यह बात मान्य है तो फिर रिश्ता पक्का समझो।"

मोहित गंभीरता से बोला।

"मोहित, पेरेंट्स वाली डील कैंसिल कर देते है।" अनन्या के चेहरे के बदलते भाव मोहित महसूस कर रहा था।

"ऐज यू विश" कहते हुए विजयी मुस्कान मोहित के चेहरे पर फ़ैल गई।

-ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 30 अप्रैल 2017

प्राथमिकता-लघुकथा

प्राथमिकता

"कुमार साहब, ये फाइलें हैं। आप सबकी सॉफ्ट कॉपी बनाकर अधिकारी को मेल कर दें, आज ही, अर्जेंटली।"
"लेकिन सर, कल मेरी बेटी का छेका है।आज बहुत सारे काम है। मुझे छुट्टी चाहिए थी।"
"कुमार साहब, अब ये आप तय करें कि सरकारी और घर के काम में आप किसे ज्यादा महत्व देंगे।"
कुमार साहब के सहयोगी ने थोड़े मजाकिया अंदाज़ में कहा, "यार कुमार,ये तो सरकारी काम है, हो ही जायेगा। तुम नहीं करोगे तो कोई और कर देगा।मैं तो कहता हूँ छुट्टी ले लो।"
"यही बात तो घर के काम पर भी लागू हो सकती है।"
कहते हुए कुमार साहब ने घर पर फोन लगाया।
"मैं आज छुट्टी नहीं ले सकता। सरिता, तुम संभाल लेना।"
-ऋता शेखर "मधु"

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

दोहे



1.
फूल शूल से है भरा दुनिया का यह पन्थ
चक्षु सीप में रच रहा बूँदों का इक ग्रन्थ
2.
ज्ञान डोर को थाम कर तैरे सागर बीच
तंतु पर है कमल टिका छोड़ घनेरी कीच
3.
पहन सुनहरा घाघरा, आई स्वर्णिम भोर
देशवासियो अब उठो, सरहद पर है चोर
4.
तपी धरा वैशाख की आया सावन याद
मन की पीर कौन गहे गुलमोहर के बाद
5.
शब्द चयन में हो रही जबसे भारीभूल
राई से पर्वत बने उड़े बात के धूल
6.
बेचैनी से घूमते हवाजनित ये रोग
राजनीति के पेंच में उलझे उलझे लोग
7.
क्या देना क्या पावना जब तन त्यागे प्राण
तड़प तड़प के हो गई याद मीन निष्प्राण

--ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 26 अप्रैल 2017

छंदमुक्त



1.पाने को किनारा

फैसला था
मझधार में जाने का
डुबकियाँ लगती रहीं
सीप की मोतियाँ मिलीं
अब किनारे की चाह
चाह न रही
ज्ञान की तली ने
ठहराव जो दिया
मिटने लगी थीं
अपेक्षाएँ
जगने लगी पिपासा
परमात्मा में लीन होने की

2. दुःख के पके पत्ते

दुःख के पके पत्ते गिरे
मन की संधियों से झाँकने लगीं
कोंपलें सुख की
वह तूफ़ान
जो ले गया दूर
जीवन के विक्षत पन्ने
उसी से बने दलदल में
एक सुबह फूले आशाओं के कँवल
चाँद भी लौटा अमा से जीतकर
मन के आकाश में
कुछ ही पल के तो रहे जीवन के सूर्य ग्रहण
मुश्किल वक़्त ने ही मुझे दिए
करुणा के स्वर
और कर्म निश्छल
दुःख की कुदाल से ही हटे
जीवन की जमीन के जिद्दी अधिग्रहण.

3.दरीचे

बीती बातों के खंडहर में
जाने अनजाने क्यों घूमना
भविष्य के दरीचे से
जरा झाँक कर देख लो
सुवासित उपवन है

4.जादू की छड़ी
आने दो
मन के बसंत पर
व्यथा का पतझर
तभी मिलेंगे
खुशियों के किसलय
अँखियों में
घनघोर बदरिया
छाने दो
पल की परी
जादूई बड़ी
एक बार क्षण भर को
मुस्कानों वाली
छड़ी परी से
पाने दो

5.गुलमोहर
गुलमोहर सी जिंदगी
वीरता के नारंगी साफे में
जीत लेती है
अग्नि मिसाइल छोड़ते हुए
शत्रु धूप को
ख्वाब के पुष्प से
सज जाता आसमान
गुलमोहर
सिर्फ कवि की कविता नहीं
डायरी है साहस की
जिसने पंखुरियों के पन्ने पर
उकेरे हैं
मानव जीवन
6.बदलाव

बचपन की चटाई पर
बिखरे बिखरे खेल
गुड़ियों का घर
रसोई में पकते
झूठमूठ के चावल
और झूठमूठ से
चटखारे ले ले कर
खाती हुई माँ
कि
सच में अब
प्रोत्साहित करने को
माँ नहीं होती
कि
लैपटॉप में रमी
गुड़िया खेलने वाली
बेटियाँ नहीं होतीं

7.सतोलिया

चटपटी चाट सी चटपटी यादें
मन के मैदान पर
सतोलिया सजाती हुई
उस अल्हड़ किशोरी की बाट देखती
जो खिलखिलाकर
गिरा देती
सारी गोटियाँ
और पुनः सजाने की धुन में
निरीह हो जाता
वह विश्वास
जो उसकी सम्पदा थी।

8.मेरी बात

मैं अच्छी हूँ
तुमने कहा
समाज ने माना

मैं बुरी हूँ
तुमने कहा
समाज ने माना

मैं अच्छी ही हूँ
यह मैं कहती हूँ
समाज को मानना होगा
और तुम्हे भी

समाज में मेरा अस्तित्व
मेरी इज्जत
सिर्फ मेरे कर्मों से है
तुम्हारे वचन ने नहीं


9.बँधे हाथ

अपने वतन के वास्ते
गुलमोहर सा प्यार तुम्हारा
अनुशासन के कदम ताल पर
केसरिया श्रृंगार तुम्हारा


पत्थर बाजों की बस्ती में
जीना है दुश्वार तुम्हारा
चोट सहो तुम सीने पर
पर कचनारी हो वार तुम्हारा

हा! कैसा है सन्देश देश का
चुप रहकर शोले पी लेना
उन आतंकी की खातिर तुम
अपमानित होकर जी लेना।

अच्छी नहीं सहिष्णुता इतनी भी
रामलला को याद करो
कोमल मन की बगिया में
कंटक वन आबाद करो
-ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 15 मार्च 2017

अब और नहीं...लघुकथा

अब नहीं...
घर में विवाह का माहौल था| सभी परिवार जन जुटे थे| हँसी ठिठोली चल रही थी| रसोई में उर्मिला जी खाना बनाने में तल्लीन थीं| बीच बीच में देवरानी रसोई में झाँककर औपचारिकता वश पूछ लेती,’’आपको कुछ चाहिए जिज्जी’’|
‘’नहीं, तुम बाहर सभी मेहमानों का ख्याल रखो’’
कहती हुई उनकी आवाज में गम्भीरता आ जाती क्योंकि वह जानती थीं कि उन्हे शहर से लाया ही गया है काम करने के लिए| वह विरोध भी नहीं कर सकती थीं| पति को अपने परिवार से अटूट लगाव था और पत्नी उनके परिवार की अवहेलना करे यह कतई बरदाश्त नहीं था|
दो वर्षों वाली टीचर्स ट्रेनिंग की डिग्री भी थी उनके पास| एक बार नौकरी के लिए नियुक्ति पत्र आया था किन्तु देवर और देवरानी ने कहा था,’’आपको नौकरी की क्या जरूरत है भाभी| सब कुछ तो आपका ही है|’’
‘सब सिर्फ काम के भागी हैं’ , यह सोचकर भी वे जवाब नहीं दे सकी थीं|
रसोई में बैठी चुल्हे में लकड़ी डालती हुई काठ की हाँडी में चढ़े चावल चला रही थीं| खदकते हुए चावल के साथ उनके विचार भी खदक रहे थे| सरकार ने पुराने ट्रेंड लोगों को उम्र से परे फिर से नियुक्त करने का फैसला लिया था| उन्होंने वहाँ आवेदन दिया हुआ था| गाँव आने के लिए जब वे घर से निकल रही थीं तभी डाकिया ने नियुक्ति पत्र का लिफाफा पकडाया था| पति ने देखा पर कुछ बोले नहीं| रसोई में वही नियुक्ति पत्र पड़ा था जो उनके विचारों में खदक रहा था|
भोजन का वक्त हो चुका था| देवरानी अन्दर देखने आई तबतक उर्मिला जी माँड पसा रही थीं| उत्सुकतावश देवरानी ने वह कागज उठा लिया| पढ़ते ही स्याह हो गई| फिर खुद को संयत करते हुए बोली, ‘’जिज्जी, अब इस उम्र में नौकरी....’’
‘’छोटी, देख , इस काठ की हाँडी में मैने चावल पकाया है| आगे यह हाँडी नहीं चढ़ेगी|’’
‘’जी, जिज्जी’’ समझदार देवरानी, जेठानी के स्वाभिमान से दीप्त चेहरे को पढ़कर चुप रह गई|
--ऋता

शुक्रवार, 10 मार्च 2017

रे मन! तू भीग जा


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रे मन! तू भीग जा

रंगों में प्रीत की
हो रही बौछार है
रे! मन तू भीग जा
होली का त्योहार है


पुलक रहा है रोम रोम
हुलस रही है रागिनी
रुप रस गंध लिए
हुई धरा पावनी

बसंत बना जादूगर
मकरंद का अंबार है
रे मन! तू भीग जा
पुष्प की मनुहार है

गलियों की टोलियों में
बाल बाल कृष्ण लगे
गोपियाँ नटखट हुईं
पलाश भी हुए सगे

ठिठोलियाँ गूँज रहीं
अबीर की भरमार है
रे मन! तू भीग जा
फागुनी बयार है

हृदय पटल पर घूमती
मायूसियों को त्याग दो
कह रही हैं तितलियाँ
धमनियों को राग दो

भंग की ठंडई में
विचित्र चमत्कार है
रे मन! तू भीग जा
प्रेम की पुकार है
-ऋता शेखर ‘मध

गुरुवार, 2 मार्च 2017

ये मिजाज़ है वक़्त का



अपने गम को खुद सहो, खुशियाँ देना बाँट
अर्पित करते फूल जब, कंटक देते छाँट

ये मिजाज़ है वक़्त का, गहरे इसके काज
राजा रंक फ़कीर सब, किस विधि जाने राज

दुख सुख की हर भावना, खो दे जब आकार
वो मनुष्य ही संत है, रहे जो निर्विकार

दरिया हो जब दर्द का, रह रह भरते नैन
हल्की सी इक ठेस भी, लूटे दिल का चैन

उड़ती हुई सोन चिड़ी, जा उलझी इक झाड़
ज्यों फड़काती पंख वो, बढ़ती जाती बाड़

गर्म तवे पर गिर गया, एक बूँद जो नीर
नाच नाच विलुप्त हुआ, कह ना पाया पीर

तितली भँवरे ने किया, फूल फूल से प्यार
हुलस हुलस कहती फ़िजा, सुन्दर है संसार

न दिख रही हैं तितलियाँ, न है भ्रमर का शोर
सिमट रही है वाटिका, घर है चारो ओर

सौ सौ हों बीमार जब, का करि एक अनार
सौ कामों के बोझ से, दबा रहा इतवार
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सब सुनाने लगे दास्ताँ अपनी अपनी
रफ़्ता रफ़्ता मैं चाँद हो गया

वक्त हमारा इंतजार नहीं करता
हम वक्त का क्यों करे
जो ख्वाब अधूरे हैं
पूरा करने में जुट जाएँ
आगे ये न कहें -"वक्त ही नहीं मिला "
तब वही वक्त कहेगा-"मैं तो हमेशा तुम्हारे साथ था"

काँटे मिलें या चाँटे
हमने तो बस
गुलाब ही बाँटे
मुक्तक

अंतस में हों भाव सुनहरे मुखड़े तभी सजा करते हैं
खिले गुलाबी रौनक से ही नैनन पात पढ़ा करते हैं
उबड़ खाबड़ रस्तो पर मनुज धैर्य से चलते जाना
बुलंद इरादों वाले ही चेहरों पर दृढ़ता गढ़ा करते हैं

गर गुलाब से जीवन की चाहत हो
दोस्ती काँटों से भी करना होगा
हुनर की खुश्बू फिजाओं में होगी
धैर्य की नदिया में भी बहना होगा
शे'र
बशर की हुनर में है पहचान उसकी
वो मिटकर भी दुनिया में आता रहेगा

किसे ये पता है किसे ये ख़बर है
वो किस किस को मरकर रुलाता रहेगा

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

रिटायर्ड-लघुकथा

रिटायर्ड
''आइए सर, आपका आना बहुत अच्छा लगा|'' वर्तमान प्राचार्य महोदय शर्मा जी पूर्व प्राचार्य सिन्हा जी का स्वागत करते हुए कहा|

''घर में बैठे बैठे मन नहीं लग रहा था तो सोचा स्कूल से हो लूँ|''

''आपके अनुभव हमारे बहुत काम आएँगे|''शर्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा|
विद्यालय के सभी शिक्षकगण आए और अभिवादन किया| जो पहले उनके सामने कुर्सी पर बैठते हुए झिझकते थे, आज आराम से बैठकर सर से हालचाल पूछने लगे|

''आपलोग अपने अपने क्लास में जाएँ| बच्चे शोर मचा रहे हैं|''शर्मा जी ने आदेशात्मक लहजे में कहा|

'जी', कहते हुए सभी शिक्षक वहाँ से चले गए |

शर्मा जी वहीं पर बैठकर सिन्हा जी से बातें करने लगे| तभी मोबाइल बज उठा|

मोबाइल पर बात करने के बाद शर्मा जी ने कहा,''सर, बारह बजे मीटिंग है| सभी प्रिंसिपल को फौरन बुलाया गया है| मैं निकलता हूँ|मुन्ना को कह देता हूँ वह चाय बना देगा| आप चाय पीकर ही जाइएगा|''

''नहीं, मै भी निकलता हूँ'',कहते हुए सिन्हा जी भी उठ खड़े हुए|

-ऋता शेखर 'मधु'