रविवार, 2 जनवरी 2022

प्यार दो---प्यार लो...नव वर्ष पोस्ट



ग्रुप आइकन का चित्रांकन-आराधना मिश्रा


हमारा व्हाट्सऐप पर तीन वर्षों से चल रहा एक समूह है...
नाम है "गाएँ गुनगुनाएँ शौक से"
संस्थापक हैं जानी पहचानी ब्लॉगर अर्चना चावजी
२०२१ के दिसम्बर महीने में मेरा मन हुआ कि सभी गुणवान सुरीली सखियों पर दोहे लिखूँ|
मैं हर दिन एक दोहा लिखती और सबको बूझना होता था कि किसके लिए दोहा लिखा गया| मजे की बात यह कि सारी सखियाँ हर दोहे में फिट बैठती थीं...फिर भी कुछ अलग खासियत सभी में होती...जो व्यक्ति विशेष को खास पहचान देती है| उसी एक गुण के आधार पर समझना होता था| हमने सबके लिए दोहे लिखे...और मुझे भी सबकी ओर से वह अभिव्यक्ति मिली जिसमें मैं सराबोर...सखियों के प्रेम में डूबी रही|

पहले पढ़ें...वह दोहे जो मैंने लिखे|

दोहा1. प्रिय शुचि मिश्रा के लिए
पावन उसका नाम है, है सुन्दर  संस्कार।
चंचल चंचल हैं नयन, जिसपर आये प्यार।।💐💐

दोहा 2. प्रिय रश्मि कुच्छल जी के लिए
मन रमता अध्यात्म में, मन में बसते श्याम।
भोर किरण सी छा गयी, पाकर के पैगाम।।

दोहा 3. प्रिय संध्या शर्मा जी के लिए
जिसके गानों से लगे, कोयल का आभास।
जिसके शब्दों में बँधे, अवनि संग आकाश।

दोहा 4.प्रिय शिखा वार्ष्णेय जी के लिए-
आँखों में सपने भरे, पंखों में विस्तार।
फिर भी है कुछ अनकहा, क्यों वह जाती हार।।

दोहा 5. प्रिय वंदना अवस्थी जी- साधना दी की जोड़ी के लिए-
दोनों एक दूसरे की जानम-जानेमन-
इक दूजे की जान हैं, ऐसा होता भान।
शब्द-सुरों के मेल से, टपके उनका ज्ञान।।

 दोहा 6. प्रिय शोभना चौरे दी-गिरिजा दी के लिए-
साथ साथ हम घूमते, जिनके सारा गाँव।
अनसुने हैं गीत नवल, झूमे सबके पाँव।

दोहा 8. प्रिय संगीता अष्ठाना जी के लिए-
वह सुरीली एक सखी, ब्लॉग समय से खास।।
समझा हमने दर्द को, समझा था अहसास।।

दोहा 7. प्रिय आराधना मिश्रा के लिए-
तन्मयता की सीख में, रहता सदा धमाल।
पाठ-पूजा चाय कड़क, करते मालामाल।।

दोहा 9. प्रिय अर्चना चावजी के लिए
जीवन झंझावात में, धीरज अटल प्रबुद्ध ।
ढल जाते हैं श्लोक में, जाने कितने बुद्ध।।
गढ़ते हैं सबके लिए, सदा नए आयाम।
दो पंक्ति में बँधे नहीं, उनके अनगिन काम ।।

दोहा 10 प्रिय निरुपमा चौहान जी के लिए-
गाएँ या गाएँ नहीं, टिप्पणी मजेदार।
प्यार के संग डांट का , गुण भी अपरम्पार।।

दोहा 11.प्रिय रचना बजाज जी के लिए-
गहरी सी आवाज पर, ठहरे मोहक गीत।
भजन श्लोक शालीनता,खूब निभाये रीत।।

दोहा 12. प्रिय अंजू गुप्ता जी के लिए
लेखन गहरे प्यार का, सदा खोलता पोल।
स्वयं प्यार से हैं भरी, बाँट रहीं दिल खोल।।

दोहा 13. प्रिय पूजा साधवानी जी के लिए-
बोली है या है शहद, हो कैसे पहचान।
संयोजन का गुण बड़ा, कुटुम्बकम  अरमान।।

दोहा 14- प्रिय वंदना अवस्थी दूबे जी के लिए-
फर-फर चलती लेखनी, गजलों की सिरमौर।
लीक पर वह चलें नहीं, हो कोई भी  दौर।।

दोहा 15. प्रिय घुघुती वासुती(शशि जी) जी के लिए-
उमड़ घुमड़ कर मिल रहा, उनका पंछी प्रेम ।
घर से बाहर तक दिखे, उनके सुन्दर नेम।।

दोहा 16. प्रिय प्रियंका गुप्ता जी के लिए-
जापानी गुड़िया लगे, बोली में बिंदास।
 हाइकु या हो लघुकथा, मन में उतरे खास।।

दोहा 17. प्रिय रश्मिप्रभा दी के लिए-
मीलों तक है फैलता, आँचल का विस्तार।
सोख रहा है अश्रु कण, सुनकर करुण पुकार।।
कृष्ण पार्थ की हर व्यथा, लेखन का आधार ।
भाव सरल सद्भाव के , शब्दों के नव हार।।

दोहा 18. प्रिय उषा किरण दी के लिए-
शतदल मुरझाए नहीं, रहता है यह ध्यान।
रूठे जब कोई कभी, लौटता ससम्मान ।।
उत्कृष्ट भाव से सजे, शब्द रहे या रेख।
सरल सहज मुस्कान में, वह सुन्दर आलेख।।

दोहा 19. प्रिय सुनिति बैस जी के लिए-
गुलशन में बादे सबा, गुल पर सुन्दर रंग।
गजलों में वह सज रहे, भाव वज्न के संग।|

दोहा 20. प्रिय मंजुला पाण्डेय जी के लिए-
माहिर उनकी हर विधा, संस्कृत उनकी खास।
काव्यपाठ है कर्णप्रिय, चमक नाम के पास।

दोहा 21. प्रिय इस्मत जी के लिए-
यहाँ दूज का चाँद हैं, गजलों से पहचान।
किस्मत से मिलता रहा, यदा कदा  ही गान ।।

दोहा 22. प्रिय सोनिया जी के लिए-
प्यारा प्यारा गान है, प्यारी सी मुस्कान।
सात समंदर पार से, कर देतीं हैरान।।

दोहा 23. प्रिय शोभना चौरे दी के लिए-
नीम आम सौगान से, है अमीर सा गाँव।
वहाँ वृहद विस्तार में, वह बरगद की छाँव।।
भजन पूजन पाक कला, या हो चंचल गान।
उनके आने से लगे, आया यहाँ विहान।।

दोहा 24. प्रिय गिरिजा कुलश्रेष्ठ दी के लिए- 
उनकी बाल कहानियाँ, जैसे परी उड़ान।
ऐसा खींचे चित्र वह, आ जाती मुस्कान।।
डिप्लोमेटिक वह नहीं, बोलें सच्ची बात।
खुशकिस्मत साहित्य है, पाकर के सौगात ।।

 दोहा 25. प्रिय साधना वैद दी के लिए-
यात्रा उनकी है बड़ी, वियतनाम के देश।
काव्यपाठ या छंद हो, है पूजा परिवेश।।
ऊर्जा की वह स्रोत हैं, हैं समूह की जान।
टास्क में हो गीत सदा, होते यह अरमान।।
=================================
वह स्नेह जो मुझे मिला

मधु सी मीठी वाणी और 
समग्र सुधा सी बरसें
जब जब रचें नव बैन
सिद्धहस्त, मृदुभाषी, 
मन विभोर कर देतीं
हंसते कंवल से नैन
== संगीता अष्ठाना जी
*****************
(1) वेद की ऋचाएं कहूँ तुम्हें या फिर कहूँ कोई राग
पूरित क्रियाकलापों में आपके,, बिखरा हो जैसे पराग

(2) "ऋता शेखर मधु"में समायें 
ऋता सी, शेखर में सम्भाले शिव का सम्पूर्ण
तो मधु में बिखेर मधुरस अपना 
डुबा ले जातीं सबको नशा सा करा साहित्य का
कि खड़े हैं मन्त्र मुग्ध से सभी
मद्य पान कर मधु से बने उन दोहों का
एक तरफ तो मधु से करा रहीं वो शहद का भान
वहीं दूसरी ओर लगता, जैसे किया हो कोई.... मद्यपान
== अंजू गुप्ता जी (तितली)...
********************
अब तक वो करती रही, सखियों का गुणगान!
अब सखियों की बारी है, उनका करें बखान! 
सबका मत बस एक ही है, 
ऋता ( जी) गुणों की खान !! 🥰
== रचना बजाज
*************************
हमारी सर्वगुण सम्पन्न हरफन मौला ऋता जी के प्रति मेरे उदगार । 

ऋता शारदा का तुम्हें, मिला खूब वरदान 
धन्य हुए पाकर तुम्हें ,अद्भुत गुण की खान । 

== साधना वैद 
***********************
रच रच दोहा छन्द नित, सबका किया बखान|
अजब गज़ब यह रूपसी, लगती नन्ही जान ||
नन्ही जान शरीर से मन की शक्ति अपार |
वाणी सा सुन्दर सृजन, नेह कुशल व्यवहार ||
== गिरिजा कुलश्रेष्ठ
*****************************
कविता की कल कल सरिता सी
नित नई लहर ले आती हैं दी 
सूक्ष्म शब्द ,अर्थ विस्तृत हैं लिए आनन्द अपार ,
ऋता लिखूं या ऋचा मैं उनको 
नेह भेंट करें स्वीकार 🙏💐🙂
मैंने दी को कोरोना काल में बराबर पढ़ा कि कितने नियमानुसार,अनुशासित रहकर उन्होंने धीरज से सब संभाला ।
पहले कुछ हायकू लिखे थे मैंने ,सिखाने के लिए ,स्नेहपूर्वक उनमें सुधार के लिए हमेशा उपस्थित रही दीदी ।
== रश्मि कुच्छल
*************************
हर विधा को साध ले, निभाये नियम सब साथ,
सुंदर निपुण निष्ठावान, ये कर्तव्यनिष्ठ अपार।
== शिखा वार्ष्णेय
***************************
धुन की पक्की
--अर्चना चावजी
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अद्भुत हैं अनमोल हैं, गुण भी अपरम्पार ।
इनके हर-इक शब्द में, प्यार भरा उपहार।।
@Rita दी ये दोहा आपके लिए हमारी तरफ से सादर सप्रेम भेंट 😍😘🤗🙏
== संध्या शर्मा 
*************************
हमें दोहे लिखने नहीं आते पर प्रयास किया है ऋता जी के लिए प्यार सहित-
सहज सरल मनभावनी, सभी गुणों की खान।
देखन में छोटी लगें, करतीं बड़े कमाल ।।
== उषा किरण
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शुक्रवार, 31 दिसंबर 2021

उम्मीदों के नए सफर में



नव वर्ष की शुभकामनाओं के साथ...

नवगीतों की पुरवाई

नवगीतों की पुरवाई में
नवल आस की कलियाँ चटकी |


किसलय आने को है आतुर
पेड़ों ने झाड़ी है डाली
नव खुश्बू की आशा लेकर
बगिया सजा रहा है माली
फूलों के काँधे चढ़ आई
खुशियों की सोंधी सी मटकी |


बीते वर्षों में बातों की
कहीं नुकीली फाँस लगी हो
नवल गगन में वही चाँदनी
शायद मधुरिम और सगी हो
नीलकंठ ने अमृत देने
नन्ही गरल- बूँद है गटकी |


कर्मों के जो वीर बने हैं
तम भी उनसे घबराता है
उमंगों भरी हर चौखट को
गम दूर से हाथ हिलाता है
छल प्रपंच की झूठी पटरी
प्रीत दिवानों को है खटकी |


उम्मीदों के नए सफर पर
हर्ष भरा जो झोला टाँगे
छींट चले हैं स्वप्न-बीज को
झिलमिल जुगनू ने जब माँगे
द्वार- द्वार भी थिरक उठे हैं
तोरण में जूही है लटकी |


आएँगे अब रंग बसंती
फूलों की चौपाल सजेगी
मटकेगी सरसों दुल्हनिया
नए वर्ष के गीत बजेंगे
उठ चुकी डोली बहार की
हौले से फुनगी पर अटकी |
—-ऋता शेखर ‘मधु’

रविवार, 12 दिसंबर 2021

दोहे



दोहे
1.
सुदामा संग कृष्ण ने, खींचा ऐसा चित्र |
बिना बोले समझ सके, वह है सच्चा मित्र ||
2.
एक ही खान में रहें, कोयला- कोहिनूर |
एक जलकर राख हुआ, एक न खोए नूर ||
3.
भवसागर में जब कभी, मिल जाए मझधार |
हर मा़ँझी को चाहिए, हिम्मत की पतवार ||
4.
प्राची में हो लालिमा , खग चहके चहुँ ओर |
वेद ऋचाओं से भरे, वह सिन्दूरी भोर ||
5.
आँखों में सपने भरे, पंखों में विस्तार |
सबके मन को जीतकर, जाती खुद को हार ||
6.
होता है हर बात में , समझ- समझ का फेर |
समझ सके न प्रीत लखन | राम चख लिये बेर ||
7.
मन पूरा ब्रह्मांड है, मन है विस्तृत व्योम |
बस थोड़ा सा ध्यान हो, गूँज उठेगा ओम ||
8.
मन मंदिर में जब बसे, रघुनंदन श्रीराम |
सारी चिंता त्याग कर, मन पाता विश्राम ||
9.
अंतर-आत्मा से सदा, निकले सच्ची बात |
मिलावट है दिमाग में, करे घात-प्रतिघात ||
10.
कड़े दन्त से जो भ्रमर, करे काष्ठ में छेद|
शतदल में कैदी बने, कैसा है यह भेद ||
--ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 2 जुलाई 2021

वर्ण सितारे - हाइकु संग्रह

 आज ब्लॉगिंग डे है| ब्लॉग पर आये दस वर्ष बीत चुके हैं| आप सभी मित्रों के उत्साहवर्धन से लिखती रही| यहाँ पर कई विधाओं से परिचित हुई| सर्वप्रथम हाइकु से लेखन की शुरुआत हुई थी| जब पुस्तक प्रकाशन की ओर बढ़ी तो सबसे पहले हाइकु संग्रह प्रकाशित करना था|

मित्रों , मेरा हाइकु संग्रह प्रकाशित हो चुका है| आज ब्लॉगिंग डे पर यह पोस्ट लगाते हुए खुशी महसूस हो रही| यह पुस्तक शीघ्र ही अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध होगी| आप चाहें तो मेल पर सीधे मुझे भी लिख सकते हैं | आशा है पुस्तक को आपकी सराहना मिलेगी| धन्यवाद ः)



मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

चैत्र माह-हिन्दू नवसंवत्सर-होली के संग


धरती को रंगों से भर दें
सबके माथे खुशियाँ जड़ दें
घोलो अब रंग

गुझियों की जो टाल लगाएँ
सबका मन मीठा करवाएँ
प्रीत भरा लेकर आलिंगन
शिकवे कोसों दूर भगाएँ
झूम जाएँ सारे हुरियार
पीसो अब भंग

आम्रकुंज में बौर जो महका
गूंज उठे कोयल के राग
समय न देखे उम्र न देखे
किलक उठे रंगीले फाग
देखो बोल रहा त्योहार
छू लो अब चंग

धरती पर जब उड़े गुलाल
हो जाता है अम्बर लाल
मस्त हुए हैं पवन झकोरे
झुक झुक जाती है डाल
भरकर अपनी पिचकारी
हो लो अब संग

भाव भरी सुन्दर बोली हो
सबके हिस्से शुभ होली हो
सजे रहेंगे रिश्ते प्यारे
गरिमा में हँसी ठिठोली हो
मिल जाएँ हाथों से हाथ
छोड़ो अब जंग

@ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 11 अप्रैल 2021

चले थे कहाँ से कहाँ जा रहे हैं

 122 122 122 122

चले थे कहाँ से कहाँ जा रहे हैं
शजर काट कैसी हवा पा रहे हैं

न दिन है सुहाना न रातें सुहानी
ख़बर में कहर हर तरफ़ छा रहे हैं

मुहब्बत की बातों को दे दो रवानी
न जाने ग़दर गीत क्यों गा रहे हैं

है रंगीन दुनिया सभी को बताना
ये सिर फाँसियों पर बहुत आ रहे हैं

विरासत में हमने बहुत कुछ था पाया
क्यों माटी में घुलता ज़हर खा रहे हैं

@ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

समय कठिन है

 












समय कठिन है

क्या कुंठा या क्या गिला
जो मिलना था वही मिला
मन को खुशियों से भर लो
समय कठिन है

किसने किसको क्या- क्या बोला
शब्द शब्द किसने है तोला
मन को अब तो पावन कर लो
समय कठिन है

जिन बन्धु की याद हो आती
उनको झट से लिख दो पाती
या फिर डायल नम्बर कर दो
समय कठिन है

यदि बाकी है इच्छित काम
आरम्भ करो कहकर के राम
बाँध लो अब दुआ के धागे
समय कठिन है

समझौते भी होते अच्छे
कर लेते हैं दिल के सच्चे
झूठे अहं की तोड़ो दीवार
समय कठिन है

कोविड की कैसी अनहोनी है
कौन साँस अंतिम होनी है
मन में रच लो मोहक संसार
समय कठिन है
@ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 14 मार्च 2021

लंच बॉक्स- लघुकथा

 लघुकथा- 

लंच बॉक्स

दसवीं कक्षा की क्लास लेते हुए अचानक सुधा मैम ने पूछा," बच्चों, यह बताओ कि आज सुबह का नाश्ता किये बगैर कौन कौन आया है।"

एक छात्रा ने हाथ उठाया।

" क्या घर में कुछ बन नहीं पाया था"

"बना था, पर उसे छोटी बहन के लंच बॉक्स में मम्मी ने देकर भेजा।"

"ऐसा क्यों, तुम्हें क्यों न मिला।"

"वह अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़ती है न।मम्मी उसे अच्छा लंच देती है और उसके ड्रेस भी कड़क होते है।"

सुधा मैम ने ध्यान दिया कि उसने स्कूल शूज़ न पहन कर चप्पल पहन रखी था।

"सुनो, मम्मी को कहना कि वह तुम्हें भी साफ कपड़े दे और टिफिन भी"

"पर वह हमेशा कहती हैं कि सरकारी स्कूल में सब चलता है।"

सुधा मैम ने स्कूल के समापन सभा के समय कड़ाई से कहा," कल से सभी को पूरे स्कूल ड्रेस में आना है और सभी के साथ लंच बॉक्स और पानी की बोतल होनी चाहिए।"

सभा विसर्जित होने के बाद सुधा मैम की कुलीग ने पूछा, " यह अचानक इतनी कड़ाई क्यों"

" इसी कड़ाई की कमी है, तभी तो सरकारी उपेक्षित है। इसके लिए सरकार क्या करेगी जब मानसिकता ही सरकारी बनी रहेगी।"

सुधा मैम की चाल में बदलाव लाने की दृढ़ता झलक रही थी।

ऋता शेखर मधु

शनिवार, 13 मार्च 2021

मन सबका है एक सा- दोहा गीतिका


दोहा गीतिका

रंग बिरंगे पुष्प हैं, बगिया के आधार।

मिलजुल कर मानव रहें, सुन्दर हो संसार।।


तरह तरह की बोलियाँ, तरह तरह के लोग।

मन सबका है एक सा, सुखद यही है सार।।


मंदिर में हैं घण्टियाँ, पड़ता कहीं अजान।

धर्म मज़हब कभी कहाँ, बना यहाँ दीवार।।


दान पुण्य  से है धनी, अपना भारत देश।

वीर दे रहे जान भी, जब जब लगी पुकार।।


यहाँ कृष्ण का प्रेम है, यहीं राम का धैर्य।

जगपालक जगदीश हैं, शिव करते संहार।।


चैती से ही चैत्र है , होली से है फाग।

आल्हा ऊदल ने कभी, भरी यहाँ हुंकार।।


अतिथि यहाँ पर देव हैं, पितरन पाते मान।

कोविड औषध बाँटकर, बना वतन दिलदार।।

----ऋता शेखर 'मधु'

सोमवार, 8 मार्च 2021

कर्णेभिः 29-लघुकथा- आठवाँ वचन-ज्योतिर्मयी पंत, स्वर- समीक्षा व प्रस्तुति...


महिला दिवस के उपलक्ष्य में कर्णेभिः में आज लेकर आई हूँ...आठवाँ वचन|
सात वचन तो विवाह वेदी पर दिए जाते...
लघुकथा में जानिये कि आठवाँ वचन कौन सा होना चाहिए|

महिला दिवस की क्षणिकाएँ

महिला दिवस की क्षणिकाएँ शुभकामनाओं के साथ 🌹🌹

1
जो तन मन से रहे
हरदम घर में रत
तभी तो  संसार में
नाम पड़ा औ-रत।
2
चकरघिन्नी देखने को
इधर उधर न झाँको
दिख जाएगी घर में ही
नजर खोलकर ताको।
3
भोर की लालिमा में
पूजा का आलोक है
महिला के जाप में
गायत्री का श्लोक है।
4
छोड़ रहा छाप है
पाँव का आलता
बिछड़न का दुःख
बेटी को सालता।
5
महिला की महिमा
ईश्वर भी जानते
शक्ति के रूप में
दुर्गा को मानते।
6
जब जब पड़ा है
त्याग का काम
पुरुषों ने कर दिए
महिलाओं के नाम।
7
जिसके आँचल पर टिकी
इस सृष्टि की आशा
लिख  सका है कौन
नारी की परिभाषा।
8
जिसके आँचल में बँधी
दो दो कुल की मर्यादा
माप सका न धीर कोई
राजा हो या प्यादा।
9
नारी को स्वीकार नहीं
बनना चरणों की रज
वक्त की पुकार पर वह
मुट्ठी में बाँध रही सूरज।
10
शीतल छाँव को खोजने
दुनिया सारी घूम आया
खुद को अज्ञानी समझा
जब आँचल माँ का पाया।
11
जिससे घर, घर लगता है
रखते उससे गिला
महिला को भी चाहिए
काम का सिला।
🙏🙏🌹🌹
ऋता शेखर 'मधु'




रविवार, 28 फ़रवरी 2021

कर्णेभिः 28- पीढ़ियों का अन्तर- #पवन जैन, वाचन व प्रस्तुति- ऋता शेखर मधु


पद, परिस्थिति और संस्कार...किस प्रकार सोच को प्रभावित करते हैं...लघुकथा में सुन्दरता से संप्रेषित किया गया है|

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

चाँद-चाँदनी

 चाँद- चाँदनी...


चंदा की तुम चाँदनी, झरती सारी रात।

गगन अनोखा दे रहा, धरती को सौगात।।1


देख अमा की रात को, नहीं मनाना शोक।

घट-बढ़ ही है जिन्दगी, सीखे तुमसे लोक।।2


रूप रुपहला है मिला, लगते वृत्ताकार।

सूरज से रौशन रहे, लेकर किरण उधार।।3


तुमसे मनता चौथ है, तुम करवा त्योहार।

जग को तुम आशीष दो, मिले सभी को प्यार।।4


व्यथित हुई है चाँदनी, जाओ उसके पास।

क्यों छुपे अमा की रात में, क्यों करते परिहास।।5


जिस सूरज की रश्मियाँ, रखते अपने पास।

ग्रहण बने कृतघ्न तुम , देते हो संत्रास।।6


चन्द्र सलोने कृष्ण के, शायर के महबूब।

माँ की लोरी तुम बने, भाते सबको खूब।।7


बुढ़िया काते सूत जब, कट जाती है रात।

तन्हाई को बाँटकर, करते हो तुम बात।8


कहीं स्वप्न के पृष्ठ हो, कहीं किसी के राज।

गुड़िया के मामा बने, प्यारा हर अंदाज।।9

....ऋता शेखर

स्वप्न

तुम जब तक दूर हो

आँखों का नूर हो

तुम्हारे पूरा होते ही

तुम हकीकत हो जाओगे

तब फिर से उगेगा एक स्वप्न

फिर से परियों को पँख मिलेंगे

फिर से एक सफर का आगाज होगा

तब हकीकत बन गए स्वप्न तुम

सम्भाल लेना वह कहानी

जिसमें बिता दी हमने ज़िन्दगानी।

कल्पना का घोड़ा 

सपनों के तांगे में बैठ

गया है चाँद के पास

नटखट चाँदनी

झूला झुलाती हुई

उसे बहला रही ।

तारे भी आ गए 

सब हो गए हैं मगन 

स्वप्नों के आसपास

सब के नए स्वप्न हैं

सबका है नया आकाश।

*****

चाँद रोता है

धरती भी भीगती है

कभी भोर होते ही

हरे घास की कालीन पर

चलकर तो देखना

कभी 

हरसिंगार की पंखुड़ियों को

सहलाकर देखना

@ ऋता शेखर मधु


रविवार, 21 फ़रवरी 2021

माँ की माँ

 एक  माँ

जो बन चुकी होती है

माँ की भी माँ

मतलब

माँ बन चुकी बहू बेटी की माँ

जी लेती है 

अपने बच्चों का बचपन

अक्सर मिलाती है 

उस समय को इस समय से

जब आज की माएँ

कड़ी आवाज में भी

बच्चों को कुछ नहीं कहतीं

उसे याद आता है

अपना उठा हुआ हाथ

जो उठते थे देर तक सोने के लिए

समय पर पढ़ाई के लिए नहीं बैठने पर

जब वह देखती है 

नाती पोतों के नखरे 

उसे याद आती है

दूध रोटी

या लौकी पालक

जिसे खिलाकर ही छोड़ती थी

जब वह देखती है

बस एक डिमांड पर

नई कॉपी 

नए जिओमेट्री बॉक्स आते

उसे याद आता है

एक ही किताब को सम्भालना

जो काम आते थे छोटे को

दो या चार बार पहने गए

बच्चों के नए कपड़े

जब किनारे धर देती हैं बेटियाँ

तब माँ की माँ याद करती है

होली के कपड़े

दशहरे तक चलते हुए

पैसे तब भी थे

किन्तु साथ ही होते थे 

संयुक्त परिवार

नए बनाने हों तो

सभी के बनेंगे

यह अवधारणा जोड़ती थी

रिश्तों को, परिवार को

वह माँ की माँ

आंखों पर हाथ धरे आज भी

जाने क्या क्या ढूँढती है

उसके अनुभव

या तो हँसकर टाल दिए जाते

या शिकार हो जाते उपेक्षा के

वह माँ की माँ

आज भी समझौते कर लेती है

नए जमाने की माँ से

लेती नहीं है पंगा

उसकी हाँ में हाँ मिलाती

चुपके से देती है अपने सुझाव

बाद में जब मिलती है शाबासी

वह देती है एक सहज मुस्कान

मन ही मन बोलती हुई

ओल्ड इज गोल्ड बेटा 😊

ऋता.....

कर्णेभिः 27- दृष्टिकोण - मधु जैन, वाचन व प्रस्तुति- ऋता शेखर मधु #लघुकथा


जरूरत है दृष्टिकोण बदलने की...कैसा दृष्टिकोण...मधु जी की लघुकथा में सुनिए
लघुकथाएँ नन्हें कलेवर में बहुत कुछ सिखा जाती हैं|