मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

कवि परिचय-1-गोपाल सिंह नेपाली


गोपाल सिंह नेपाली (1911 - 1963) हिन्दी एवं नेपाली के प्रसिद्ध कवि थे। गोपालसिंह नेपाली का जन्म चम्पारन जिले के बेतिया नामक स्थान पर 11 अगस्त 1911 को कालीबाग दरबार के नेपाली महल में हुआ था। इन्होंने प्रवेशिका तक शिक्षा प्राप्त की थी|उनका मूल नाम गोपाल बहादुर सिंह था| कई पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया और फिल्मों के गीत लिखे। कविता क्षेत्र में नेपाली ने देश-प्रेम, प्रकृति-प्रेम तथा मानवीय भावनाओं का सुंदर चित्रण किया है। वे मंचों के हिट कवि थे। उन्हें "गीतों का राजकुमार" कहा जाता था।1932 में उन्होंने 'प्रभात' और 'मुरली' नाम से क्रमशः हिन्दी और अंग्रेज़ी में हस्तलिखित पत्रिकाएँ भी निकालीं।
उनकी कुछ प्रमुख कृतियाँ हैं-
उमंग (1933), पंछी (1934), रागिनी (1935), पंचमी (1942), नवीन (1944), नीलिमा (1945), हिमालय ने पुकारा (1963)
उन्होंने फ़िल्मों में लगभग 400 धार्मिक गीत लिखे।
उन्होने बम्बइया हिन्दी फिल्मों के लिये गाने भी लिखे। वे एक पत्रकार भी थे जिन्होने "रतलाम टाइम्स", चित्रपट, सुधा, एवं योगी नामक चार पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया। सन् 1962 के चीनी आक्रमन के समय उन्होने कई देशभक्तिपूर्ण गीत एवं कविताएं लिखीं जिनमें 'सावन', 'कल्पना', 'नीलिमा', 'नवीन कल्पना करो' आदि बहुत प्रसिद्ध हैं।
1963 में मात्र 52 वर्ष की उम्र में भागलपुर रेलवे स्टेशन पर उनका देहांत हुआ।
नेपाली जी बहु-आयामी थे.
निर्माता-निर्देशक के तौर पर नेपाली जी ने तीन फीचर फिल्मों - नजराना, सनसनी और खुशबू का निर्माण भी किया था.
जिन फिल्मों के लिए उन्होंने गाने लिखे वो हैं - ‘नाग पंचमी’, ‘नवरात्रि’, ‘नई राहें’, ‘जय भवानी’, ‘गजरे’, ‘नरसी भगत’
नरसी भगत में ही नेपाली जी ने "दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी हैं" जैसा बेहतरीन भजन लिखा था, जो हम आज भी गाते हैं.
आपकी जिन कविताओं ने लोकप्रियता की ऊँचाइयों को छुआ उनमें कुछ का जिक्र इस आलेख में करने की चेष्टा की गई है| स्कूल के पाठ्यपुस्तक में सबने बड़े चाव से यह कविता पढ़ी है|
यह लघु सरिता का बहता जल
कितना शीतल, कितना निर्मल
हिमगिरि के हिम से निकल निकल,
यह निर्मल दूध सा हिम का जल,
कर-कर निनाद कल-कल छल-छल,

तन का चंचल मन का विह्वल
यह लघु सरिता का बहता जल
ऊँचे शिखरों से उतर-उतर,
गिर-गिर, गिरि की चट्टानों पर,
कंकड़-कंकड़ पैदल चलकर,
दिन भर, रजनी भर, जीवन भर,

धोता वसुधा का अन्तस्तल
यह लघु सरिता का बहता जल

हिम के पत्थर वो पिघल पिघल,
बन गए धरा का वारि विमल,
सुख पाता जिससे पथिक विकलच
पी-पी कर अंजलि भर मृदुजल,

नित जलकर भी कितना शीतल
यह लघु सरिता का बहता जल
कितना कोमल, कितना वत्सल,
रे जननी का वह अन्तस्तल,
जिसका यह शीतल करुणा जल,
बहता रहता युग-युग अविरल,

गंगा, यमुना, सरयू निर्मल
यह लघु सरिता का बहता जल
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एक बेटी के मनोभाव को उकेर कर कवि ने अपनी उत्कृष्ट सृजनशीलता का का परिचय दिया है|यह भावपूर्ण रचना पढ़कर किस माता पिता की आँखें नम न हो जाएँ|

बाबुल तुम बगिया के तरुवर, हम तरुवर की चिड़ियाँ रे
दाना चुगते उड़ जाएँ हम, पिया मिलन की घड़ियाँ रे
उड़ जाएँ तो लौट न आयें, ज्यों मोती की लडियां रे
बाबुल तुम बगिया के तरुवर …….

आँखों से आँसू निकले तो पीछे तके नहीं मुड़के
घर की कन्या बन का पंछी, फिरें न डाली से उड़के
बाजी हारी हुई त्रिया की
जनम -जनम सौगात पिया की
बाबुल तुम गूंगे नैना, हम आँसू की फुलझड़ियाँ रे
उड़ जाएँ तो लौट न आएँ ज्यों मोती की लडियाँ रे

हमको सुध न जनम के पहले , अपनी कहाँ अटारी थी
आँख खुली तो नभ के नीचे , हम थे गोद तुम्हारी थी
ऐसा था वह रैन -बसेरा
जहाँ सांझ भी लगे सवेरा
बाबुल तुम गिरिराज हिमालय , हम झरनों की कड़ियाँ रे
उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे

छितराए नौ लाख सितारे , तेरी नभ की छाया में
मंदिर -मूरत , तीरथ देखे , हमने तेरी काया में
दुःख में भी हमने सुख देखा
तुमने बस कन्या मुख देखा
बाबुल तुम कुलवंश कमल हो , हम कोमल पंखुड़ियां रे
उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे

बचपन के भोलेपन पर जब , छिटके रंग जवानी के
प्यास प्रीति की जागी तो हम , मीन बने बिन पानी के
जनम -जनम के प्यासे नैना
चाहे नहीं कुंवारे रहना
बाबुल ढूंढ फिरो तुम हमको , हम ढूंढें बावरिया रे
उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे

चढ़ती उमर बढ़ी तो कुल -मर्यादा से जा टकराई
पगड़ी गिरने के दर से , दुनिया जा डोली ले आई
मन रोया , गूंजी शहनाई
नयन बहे , चुनरी पहनाई
पहनाई चुनरी सुहाग की , या डाली हथकड़ियां रे
उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे

मंत्र पढ़े सौ सदी पुराने , रीत निभाई प्रीत नहीं
तन का सौदा कर के भी तो , पाया मन का मीत नहीं
गात फूल सा , कांटे पग में
जग के लिए जिए हम जग में
बाबुल तुम पगड़ी समाज के , हम पथ की कंकरियां रे
उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे

मांग रची आंसू के ऊपर , घूंघट गीली आँखों पर
ब्याह नाम से यह लीला ज़ाहिर करवाई लाखों पर

नेह लगा तो नैहर छूटा , पिया मिले बिछुड़ी सखियाँ
प्यार बताकर पीर मिली तो नीर बनीं फूटी अंखियाँ
हुई चलाकर चाल पुरानी
नयी जवानी पानी पानी
चली मनाने चिर वसंत में , ज्यों सावन की झाड़ियाँ रे
उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे

देखा जो ससुराल पहुंचकर , तो दुनिया ही न्यारी थी
फूलों सा था देश हरा , पर कांटो की फुलवारी थी
कहने को सारे अपने थे
पर दिन दुपहर के सपने थे
मिली नाम पर कोमलता के , केवल नरम कांकरिया रे
उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे

वेद-शास्त्र थे लिखे पुरुष के , मुश्किल था बचकर जाना
हारा दांव बचा लेने को , पति को परमेश्वर जाना
दुल्हन बनकर दिया जलाया
दासी बन घर बार चलाया
माँ बनकर ममता बांटी तो , महल बनी झोंपड़िया रे
उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे

मन की सेज सुला प्रियतम को , दीप नयन का मंद किया
छुड़ा जगत से अपने को , सिंदूर बिंदु में बंद किया
जंजीरों में बाँधा तन को
त्याग -राग से साधा मन को
पंछी के उड़ जाने पर ही , खोली नयन किवाड़ियाँ रे
उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे

जनम लिया तो जले पिता -माँ , यौवन खिला ननद -भाभी
ब्याह रचा तो जला मोहल्ला , पुत्र हुआ तो बंध्या भी
जले ह्रदय के अन्दर नारी
उस पर बाहर दुनिया सारी
मर जाने पर भी मरघट में , जल - जल उठी लकड़ियाँ रे
उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे

जनम -जनम जग के नखरे पर , सज -धजकर जाएँ वारी
फिर भी समझे गए रात -दिन हम ताड़न के अधिकारी
पहले गए पिया जो हमसे अधम बने हम यहाँ अधम से
पहले ही हम चल बसें , तो फिर जग बाटें रेवड़ियां रे
उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे

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स्वतंत्रता संग्राम के दौरान नारी शक्ति का आह्वान करते हुए उनकी यह कविता बहुत ओजपूर्ण है|
भाई बहन
तू चिंगारी बनकर उड़ री, जाग-जाग मैं ज्वाल बनूँ,
तू बन जा हहराती गँगा, मैं झेलम बेहाल बनूँ,
आज बसन्ती चोला तेरा, मैं भी सज लूँ लाल बनूँ,
तू भगिनी बन क्रान्ति कराली, मैं भाई विकराल बनूँ,
यहाँ न कोई राधारानी, वृन्दावन, बंशीवाला,

...तू आँगन की ज्योति बहन री, मैं घर का पहरे वाला ।

बहन प्रेम का पुतला हूँ मैं, तू ममता की गोद बनी,
मेरा जीवन क्रीड़ा-कौतुक तू प्रत्यक्ष प्रमोद भरी,
मैं भाई फूलों में भूला, मेरी बहन विनोद बनी,
भाई की गति, मति भगिनी की दोनों मंगल-मोद बनी
यह अपराध कलंक सुशीले, सारे फूल जला देना ।

जननी की जंजीर बज रही, चल तबियत बहला देना ।
भाई एक लहर बन आया, बहन नदी की धारा है,
संगम है, गँगा उमड़ी है, डूबा कूल-किनारा है,
यह उन्माद, बहन को अपना भाई एक सहारा है,
यह अलमस्ती, एक बहन ही भाई का ध्रुवतारा है,
पागल घडी, बहन-भाई है, वह आज़ाद तराना है ।
मुसीबतों से, बलिदानों से, पत्थर को समझाना है ।
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'धर्मयुग के 10 जून 1956 के अंक में प्रकाशित
तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ
तू चलती है पन्ने-पन्ने, मैं लोचन-लोचन बढ़ता हूँ

मै खुली क़लम का जादूगर, तू बंद क़िताब कहानी की
मैं हँसी-ख़ुशी का सौदागर, तू रात हसीन जवानी की
तू श्याम नयन से देखे तो, मैं नील गगन में उड़ता हूँ
तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ ।

तू मन के भाव मिलाती है, मेरी कविता के भावों से
मैं अपने भाव मिलाता हूँ, तेरी पलकों की छाँवों से
तू मेरी बात पकड़ती है, मैं तेरा मौन पकड़ता हूँ
तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ ।

तू पृष्ठ-पृष्ठ से खेल रही, मैं पृष्ठों से आगे-आगे
तू व्यर्थ अर्थ में उलझ रही, मेरी चुप्पी उत्तर माँगे
तू ढाल बनाती पुस्तक को, मैं अपने मन से लड़ता हूँ
तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ ।

तू छंदों के द्वारा जाने, मेरी उमंग के रंग-ढंग
मैं तेरी आँखों से देखूँ, अपने भविष्य का रूप-रंग
तू मन-मन मुझे बुलाती है, मैं नयना-नयना मुड़ता हूँ
तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ ।

मेरी कविता के दर्पण में, जो कुछ है तेरी परछाईं
कोने में मेरा नाम छपा, तू सारी पुस्तक में छाई
देवता समझती तू मुझको, मैं तेरे पैयां पड़ता हूँ
तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ ।

तेरी बातों की रिमझिम से, कानों में मिसरी घुलती है
मेरी तो पुस्तक बंद हुई, अब तेरी पुस्तक खुलती है
तू मेरे जीवन में आई, मैं जग से आज बिछड़ता हूँ
तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ ।

मेरे जीवन में फूल-फूल, तेरे मन में कलियाँ-कलियाँ
रेशमी शरम में सिमट चलीं, रंगीन रात की रंगरलियाँ
चंदा डूबे, सूरज डूबे, प्राणों से प्यार जकड़ता हूँ
तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ ।
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बदनाम रहे बटमार मगर, घर तो रखवालों ने लूटा
मेरी दुल्‍हन सी रातों को, नौलाख सितारों ने लूटा

दो दिन के रैन-बसेरे में, हर चीज़ चुराई जाती है
दीपक तो जलता रहता है, पर रात पराई होती है
गलियों से नैन चुरा लाई, तस्‍वीर किसी के मुखड़े की
रह गये खुले भर रात नयन, दिल तो दिलदारों ने लूटा

जुगनू से तारे बड़े लगे, तारों से सुंदर चाँद लगा
धरती पर जो देखा प्‍यारे, चल रहे चाँद हर नज़र बचा
उड़ रही हवा के साथ नज़र, दर-से-दर, खिड़की से खिड़की
प्‍यारे मन को रंग बदल-बदल, रंगीन इशारों ने लूटा

हर शाम गगन में चिपका दी, तारों के अधरों की पाती
किसने लिख दी, किसको लिख दी, देखी तो, कही नहीं जाती
कहते तो हैं ये किस्‍मत है, धरती पर रहने वालों की
पर मेरी किस्‍मत को तो, इन ठंडे अंगारों ने लूटा

जग में दो ही जने मिले, इनमें रूपयों का नाता है
जाती है किस्‍मत बैठ जहाँ, खोटा सिक्‍का चल जाता है
संगीत छिड़ा है सिक्‍कों का, फिर मीठी नींद नसीब कहाँ
नींदें तो लूटीं रूपयों ने, सपना झंकारों ने लूटा

वन में रोने वाला पक्षी, घर लौट शाम को आता है
जग से जानेवाला पक्षी, घर लौट नहीं पर पाता है
ससुराल चली जब डोली तो, बारात दुआरे तक आई
नैहर को लौटी डोली तो, बेदर्द कहारों ने लूटा
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घोर अंधकार हो, चल रही बयार हो,
आज द्वार द्वार पर यह दिया बुझे नहीं।
यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है ।

शक्ति का दिया हुआ, शक्ति को दिया हुआ,
भक्ति से दिया हुआ, यह स्‍वतंत्रतादिया,
रुक रही न नाव हो, जोर का बहाव हो,
आज गंगधार पर यह दिया बुझे नहीं!
यह स्‍वदेश का दिया हुआ प्राण के समान है!

यह अतीत कल्‍पना, यह विनीत प्रार्थना,
यह पुनीत भवना, यह अनंत साधना,
शांति हो, अशांति हो, युद्ध, संधि, क्रांति हो,
तीर पर, कछार पर, यह दिया बुझे नहीं!
देश पर, समाज पर, ज्‍योति का वितान है!

तीन चार फूल है, आस पास धूल है,
बाँस है, फूल है, घास के दुकूल है,
वायु भी हिलोर से, फूँक दे, झकोर दे,
कब्र पर, मजार पर, यह दिया बुझे नहीं!
यह किसी शहीद का पुण्‍य प्राणदान है!

झूम झूम बदलियाँ, चुम चुम बिजलियाँ
आँधियाँ उठा रही, हलचले मचा रही!
लड़ रहा स्‍वदेश हो, शांति का न लेश हो
क्षुद्र जीत हार पर, यह दिया बुझे नहीं!
यह स्‍वतंत्र भावना का स्‍वतंत्र गान है!
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ये रहे कवि नेपाली जी के कुछ गीत जो उन्होंने फिल्मों के लिए लिखे थे|
चलचित्र-नागपंचमी
गायक-मुहम्मद रफी, आशा भोसले
संगीतकार-चित्रगुप्त
गीतकार-गोपालसिंह नेपाली
कलाकार-निरूपा राय,बी एम व्यास, दुर्गा खोटे, मनहर देसाई
वर्ष- 1953, 1950s
चलचित्र-नवरात्रि
गायक-मुहम्मद रफी, आशा भोसले
संगीतकार-चित्रगुप्त
गीतकार-गोपालसिंह नेपाली
कलाकार-निरूपा राय,ललिता पवार, दुर्गा खोटे, मनहर देसाई, कुमकुम
वर्ष- 1955, 1950s
चलचित्र-नई राहें
गायक-मुहम्मद रफी
संगीतकार-रवि
गीतकार-गोपालसिंह नेपाली
कलाकार-अशोक कुमार, गीता बाली
वर्ष- 1959
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रोटियाँ ग़रीब की प्रार्थना बनी रही
एक ही तो प्रश्न है रोटियों की पीर का
पर उसे भी आसरा आँसुओं के नीर का
राज है ग़रीब का ताज दानवीर का
तख़्त भी पलट गया कामना गई नहीं
रोटियाँ ग़रीब की प्रार्थना बनी रही
चूम कर जिन्हें सदा क्राँतियाँ गुज़र गईं
गोद में लिये जिन्हें आँधियाँ बिखर गईं
पूछता ग़रीब वह रोटियाँ किधर गई
देश भी तो बँट गया वेदना बँटी नहीं
रोटियाँ ग़रीब की प्रार्थना बनी रही
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एक रुबाई
अफ़सोस नहीं इसका हमको, जीवन में हम कुछ कर न सके,
झोलियाँ किसी की भर न सके, सन्ताप किसी का हर न सके, 
अपने प्रति सच्चा रहने का, जीवन भर हमने काम किया,
देखा-देखी हम जी न सके, देखा-देखी हम मर न सके ।
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सन्दर्भ-कविता कोश, इंटरनेट,विकिपीडिया

रविवार, 26 फ़रवरी 2017

मनमर्जी - लघुकथा

मनमर्जी

"माँ, पिताजी, मुझे कुछ सालों के लिए विदेश जाना पड़ेगा। ऑफिस के काम से जाना है" अखिल ने एक दिन ऑफिस से आते ही कहा।


"लेकिन बेटा, जाना क्या टल नहीं सकता। तू मेरा अकेला पुत्र है और हमारी नजरों के सामने ही रहे तो हमें संतोष रहता है।"

"जाना टल सकता था माँ, किन्तु मैं क्या बोलूँ, मीरा ने जाने की जिद पकड़ रखी है।"

"उसे समझाओ, यहाँ सब एकसाथ रहते हैं तो कितना अच्छा लगता है।"

"कितना तो समझा रहा हूँ पर वो माने तब न" अखिल ने अपनी मजबूरी बताते हुए कहा।

" तब तो तुम्हे जो उचित लगे वही करो" मायूस माँ ने कहा।

अखिल ने कमरे में जाकर मीरा से भी यह बात बताई। उसके बाद वह किसी काम से बाहर चला गया।
मीरा आँखों में आंसू भरकर सास के पास गई।

"माँ जी, मैं यहीं रहना चाहती हूँ। आप अखिल से कहिये न कि न जाएँ।" यह सुनकर माँ कुछ कहना चाहती थी कि पिता ने उन्हें रोक दिया। मीरा चली गई।

"अखिल की माँ, आज मैं अपने बेटे की चालाकी और बहु की सच्चाई समझ पा रहा हूँ। पहले भी हमारी नजरों में बहु को बदनाम कर वह बहुत  मनमर्जी कर चुका है।"

तब तक अखिल वापस आ चुका था|

'बेटे अखिल, तुम निश्चिंत रहो, हम बहु को समझा लेंगे|'

'किन्तु पिता जी, वह झगड़ा करेगी|'

'वह या तुम...?'

अखिल निरुत्तर रह गया|
-ऋता शेखर "मधु"

रविवार, 19 फ़रवरी 2017

कॉमन एरिया

कॉमन एरिया

"दीदी, सीढियों पर अँधेरा क्यों है|" मोना ने अन्दर आते हुए कहा तब तक रमा ने लाइट जला दी थी|
आज बहुत दिनों बाद मोना अपनी बड़ी बहन रमा से मिलने उसकी ससुराल वाले मकान में आई थी| रमा की शादी चार भाइयों के परिवार में हुई थी| वह बड़ी थी और उसने परिवार को पूर्ण समर्पण दिया था| उस वक्त मोना वहाँ आती थी तो उसे परिवार की एकता बहुत भाती थी| फिर उसकी शादी हो गई तो वह पति के साथ विदेश चली गई | बहुत दिनों बाद वापस आई तो मन में वही तस्वीर थी| अब वहाँ पर चार तल्ले वाली मकान थी और सभी भाइयों की गृहस्थी भी अलग हो चुकी थी|
''दीदी, सबके घरों के लाइट निकल रही है और टीवी की आवाजें भी आ रही हैं| इसका अर्थ है सभी घर में ही हैं|किसी ने यहाँ पर लाइट नहीं जलाई|''

''अरी, यह तो कॉमन एरिया है न| मैं रहती तो जलाती| आज तुझे लाने सवेरे ही एयरपोर्ट चली गई थी तो कौन जलाता|''

''तो क्या यह लाइट जलाने की जिम्मेदारी सिर्फ आपकी है?''

''मोना, कॉमन और पर्सनल एरिया में फर्क समझा कर|''

दीदी का दर्द उनकी बोली में झलक ही गया| मोना रमा के कँधे पर हाथ रखकर चुपचाप उपर चढ़ने लगी|

-ऋता शेखर 'मधु'

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

रुख़ की बातें तो बस हवा जाने

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चित्र गूगल से साभार


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क्वाफ़ी-आ/ रदीफ-जाने


रुख़ की बातें तो बस हवा जाने
हर दुआ को वही खुदा जाने

जो लगी ना बुझी जमाने में
इश्क की दास्ताँ वफ़ा जाने

ख़ाक में मिल रहे जनाज़े जो
क्यों नहीं दे रहे पता जाने

नेक जो भी रहे इरादों में
बाद में खुद की ही ख़ता जाने

अक्स मिलते रहेंगे किरचों में
टूट के राज आइना जाने

वक्त का करवटी इशारा था
आज तिनकों में आसरा जाने

जो रखे है गुरूर चालों में
है मुसाफ़िर वो गुमशुदा जाने

हौसले में जुनून है जिसके
गुलशनी राह खुशनुमा जाने

ख्वाब में भी वही नजर आए
दिल को क्या हो गया खुदा जाने
--ऋता शेखर ‘मधु’

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

हँसते हुए पलों को रखो तुम सँभाल कर

लफ्जों में प्रीत पालकर उनको निहाल कर
दुखती हुई रगों से कभी ना सवाल कर

मिलती रही हैं मुश्किलें जीवन की राह में
हँसते हुए पलों को रखो तुम सँभाल कर

माना तेरी हर बात पर मुझको रहा यकीं
अब जिंदगी से पूछकर तू ना बवाल कर

कहती रही हैं कुछ तो ये अमराइयाँ हमें
उनको गज़ल में ढालकर तू भी कमाल कर

जो वक्त आज बीत गया अब वो अतीत है
क्या फायदा मिलेगा उसे ही उछाल कर
-ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 5 फ़रवरी 2017

स्वागत मधुमास का



पुखराजी पुष्प करें
स्वागत मधुमास का

कोहरे को पार कर
अँखुआता घाम है
सरसो पिरिआ गई
महका जो आम है
झूम झूम डालियाँ
करती व्यायाम है

वीणा की रागिनी में
स्वागत है आस का

मन्द मन्द पवन की
शीतल छुअन है
महुआ के गीत में
कमली मगन है
फगुआ के राग की
लागी लगन है

पतंग के परवाज में
स्वागत उल्लास का

प्रेम गीत गाने को
कलियाँ बेताब हैं
मौसम के खाते में
कइयों के ख्वाब हैं
पुस्तक के बीच में
दब रहे गुलाब हैं

बासंती झकोरे में
स्वागत विश्वास का

---ऋता

सोमवार, 30 जनवरी 2017

सरस्वती वंदना—हरिगीतिका छंद



सरस्वती वंदना—हरिगीतिका छंद

 
यह शीश कदमों पर नवा कर कर रहे हम वन्दना
माँ शारदे  कर दो कृपा तुम  ज्ञान की है कामना
संतान तेरी राह भूली दृष्टि की मनुहार है
उर में हमारे तुम पधारो पंचमी त्यौहार है

धारण मधुर वीणा किया है  दे रही सरगम हमें
संगीत से ही तुम सिखाती  एकता हरदम हमें
पद्‌मासिनी कर दो कृपा अब हो सुवासित यह जहाँ
कुसुमित रहे बगिया हमारी चम्पई भर दो यहाँ

है ज़िन्दगी की राह भीषण पग कहाँ पर हम धरें
मझधार में कश्ती फँसी है पार हम कैसे करें
तूफ़ान में पर्वत बनें हम शक्ति इतनी दो हमें
तेरे चरण- सेवी रहें हम  भक्ति से भर दो हमें

तेरे बिना कुछ भी नहीं हम  सब जगह अवरोध है
हों ज्ञान-रथ के सारथी हम  यह सरल अनुरोध है
करते तुझे शत-शत नमन हम, हो न तम का सामना
आसक्त तुझमें ही रहें हम  बस यही है कामना

हो शांति ही संदेश अपना  दो हमें यह भावना
भारत वतन ऐसा बने  हो सब जगह सद्‌भावना
साकार हों सपने सभी के  कर रहे आराधना
माता करो उपकार हमपर पूर्ण कर दो साधना

-ऋता शेखर ‘मधु’

बुधवार, 25 जनवरी 2017

मुसीबत राह में आई मिले हमदर्द भी हरदम

ग़ज़ल

जरा भर लो निगाहों में कि उल्फ़त और बढ़ती है
हया आए जो मुखड़े पर तो रंगत और बढ़ती है

निगहबानी खुदा की हो तो जीवन ये महक जाए
मुहब्बत हो बहारों से इबादत और बढ़ती है

मुसीबत राह में आई मिले हमदर्द भी हरदम
खिलाफ़त आँधियाँ करतीं तो हिम्मत और बढ़ती है

जमाने में शराफ़त की शिकायत भी लगी होने
ज़लालत की इसी हरकत से नफ़रत और बढ़ती है

फ़िजा महफ़ूज़ होगी तब कटे ना जब शज़र कोई
हवा में ताज़गी रहती तो सेहत और बढ़ती है
--ऋता शेखर 'मधु'

1222  1222  1222  1222

मंगलवार, 24 जनवरी 2017

समस्या-लघुकथा



समस्या

सुबह सुबह कमरे से आती खुसरफुसर की आवाज उनके कानों में पड़ रही थी|
''आज शाम को बॉस ने पार्टी में बुलाया है| जाना अत्यंत आवश्यक है| मैं तुम्हे बैंक से ही पिकअप कर लूँगा रमा| बॉस की बात है तो कुछ पहले जाना ही पड़ेगा ताकि उनकी मदद कर उनपर अपना इम्प्रेशन जमा सकूँ| अगले महीने ही प्रमोशन की लिस्ट निकलने वाली है|''


''किन्तु माँजी की व्यवस्था करनी होगी न संदीप| पार्टी से लौटते हुए देर भी हो सकती है| घर आकर खाना भी बनाना होगा माँजी के लिए|''

''अरे हाँ, ये तो सोचा ही नहीं| ठीक है मैं अकेले ही चला जाऊँगा| किन्तु तुम भी चलती तो...खैर जाने दो''

रसोई में बरतनों के खटपट की आवाज आने लगी| रमा चाय की कप लेकर सास के कमरे में पहुँची|
''बहू, आज मेरा व्रत है| मैं कुछ नहीं खाऊँगी| घर में जो फल है वही खा लूँगी|''
रमा के चेहरे पर की खुशी को उन्होंने भली भाँति महसूस किया|

''संदीप, समस्या खुद ही सुलझ गई| आज माँजी का व्रत है|''

संदीप ने हिंदी महीने का कैलेंडर देखा| माँ द्वारा किए जाने वाले सभी व्रत से वह वाकिफ़ था| फिर आज कौन सा व्रत है यह देखने गया| कोई व्रत नहीं था| रमा की खुशी देखकर वह कुछ कहने की हिम्मत न जुटा सका|
रसोई से आती आवाज सुनकर उन्होंने नमी को पलकों पर ही थाम लिया|
--ऋता शेखर 'मधु'

सोमवार, 23 जनवरी 2017

फेसबुकिया स्टेटस-2



इतनी तेजी से Whatsapp पर हम सुविचारों को forward करते हैं कि...
उसपर विचार करने का अवसर ही नहीं मिलता
यदि उतनी ही तेजी से परोसी हुई थाली को जरूरतमंदों की ओर खिसका सकें तो.......छोड़िये, यह फालतू बात लगेगी|22/01/17

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नशा करना छोड़ दो
दारु की बोतल तोड़ दो

जो पीयेगा दारू
भाग जायेगी उसकी मेहरारू

मद्य का हो बहिष्कार
खुशहाल हो घर परिवार

एक घंटे तक लगता रहा ये नारा...
पूरी तरह सफल रहा आयोजन
परिणाम अच्छा ही रहना चाहिए।

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कहते हैं किसी भी परिवार, राज्य या देश को सुरक्षित और अनुशासित रखने के लिए एक अकाट्य श्रृंखला की आवश्यकता होती है...श्रृंखला की एक कड़ी भी कमजोर पड़े तो उधर से घुसपैठियों को आते देर नहीं लगती।
आज ऐसी ही एक मानव श्रृंखला का निर्माण होने जा रहा है बिहार राज्य के चारो ओर... उद्देश्य है मद्य निषेध को पूरी तरह कायम रखना...मद्य का हो बहिष्कार खुशहाल हो घर परिवार...घिरे हुए क्षेत्र में पूरी तरह से शराबबंदी होगी...इस श्रृंखला की एक कड़ी बनते हुए हर्ष का अनुभव हो रहा है...बस, मुख्यमंत्री जी का यह कार्यक्रम सफल हो जाए यह दिली कामना है।
जय बिहार
जय भारत21/01/17

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सब तरह का काम शिक्षक के जिम्मे...अब एक झाड़ू भी पकड़ा दो...यह काम भी कर ही देंगे आज्ञाकारी शिक्षकगण।
साथ ही designation भी बदल देना चाहिए।
M P W---Multipurpose Worker
शिक्षा का स्तर शिक्षक ही सुधारेंगे, तब न जब सिर्फ पढ़ाने का ही काम दिया जाये। 20/01/17

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एक तांका...

कद का क्या है
कही वह ऊँचा है
कहीं है नीचा
अभिमान ये कैसा
शबनम के जैसा
ऋता19/01/17

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लड़कर मिल जाती है सायकिल
मना कर मिलता आशीर्वाद
पिता पुत्र के प्रेम में
फिर कैसा था वाद विवाद ?
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बॉयोमेट्रिक लग जाने के बाद भी होड़ खत्म न होगी...पहले देर से आने की थी अब सवेरे आने की...
:D :D
यह विचारणीय है...बिना भय के सही काम करवाना मुश्किल है।
अँगूठा छाप बनते ही सारी लेट लतीफी फुर्र हो गई ।18/01/17

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एक दोहा
मैं सही और तुम गलत, समझाते हर बार
इससे ऊपर सोच हो, शान्त रहे घर द्वार
-ऋता
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संवेदनाओं के चाक पर
शब्दों की माटी को
मिल जाये जब
भाव की नमी
फिर होगी जो रचना तैयार
वो बेमिसाल होगी
कभी कुछ शब्द हो भी जाएँ
इधर उधर
वो तराश देता है
कुशल कुम्भकार की तरह
और
वो फनकार बसता है
हम सभी के भीतर
जरा तलाशिये तो 💐💐
--ऋता

17/01/17

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कॉमेडी शो में ताल ठोक ठोक कर हँसनेवाले ने ऐसा क्या किया कि लोग उनपर हँसने के लिए मजबूर हो गए 😊😊 बूझ सकें तो बूझ लें।15/01/17

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जिसने जिंदगी में कभी किसी को माफ़ न किया हो वह माफ़ी का हक़दार नहीं हो सकता।14/01/17

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अब आती नहीं है बेला गोधूलि की
न झुण्ड में गउएँ चरने जाती हैं
न तो लौटते हुए धूलि उड़ाती हैं
वे बन्द रहती हैं चारदीवारी में
मिल जाता है वहीं खाना पानी
बड़े बड़े नाद में पड़ी रहती सानी

अब हो जाती है शाम
नहीं होती गोधूलि बेला 12/01/17

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हिंदी में ही सोचते, अपने मन की बात
जिह्वा पर क्यों थोपते, रोमन का उत्पात
रोमन का उत्पात, बिगाड़े अपनी भाषा
देवनागरी शब्द, निखारे निज परिभाषा
बने श्लोक जब मन्त्र, सजे पूजन में बिंदी
घर है हिन्दुस्तान, बोलते क्यों ना हिंदी

विश्व हिंदी दिवस पर
-ऋता 10/01/17

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एक दोहा
पतझर में झरते रहे, यत्र तत्र सर्वत्र
पत्ते पत्ते ने लिखे,ऋतु बसंत को पत्र
--ऋता10/01/17

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बैंक बैलेंस, मकान, जमीन...अर्थात् इस तरह की संपत्ति सँभालने वाले सब है...
लिखित साहित्यिक संपत्ति संभालेगा कौन ?09/01/17

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योग्यता हमेशा वरदान ही साबित हो...यह सच नहीं। 08/01/17

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स्त्रियाँ पब्लिक स्पॉट पर भी आराम से फैमिली प्रॉब्लम डिस्कस कर लेती है।
.....सच , स्त्रियां बहुत बोलती हैं ☺0

07/01/17

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अच्छा लग रहा...एक राह भूला दोस्त पुनः दोस्त को पहचान रहा।
बिहार को प्रकाशोत्सव की सबसे बड़ी देन... मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री...दोनों ने एक ही मंच पर एक दूसरे की भरपूर सराहना की।06/01/17

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बदबस्तगी का आलम सड़कों पे यूँ दिखा
उड़ते रहे हिजाब तमाशबीनों की भीड़ में
---बेंगलुरु में 31 दिसम्बर की रात 06/01/17

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बेटा और बेटी...उच्च या मध्य वर्ग में कमोबेश बराबरी का दर्जा पा चुके है तभी तो देर रात में दोनों ही सड़कों पर पाये जाते है। सावधानी बुद्धिमानी की निशानी है...बुजुर्ग कह गए इसे..जिसे दोनों को समझना होगा।

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बाहर से आये सिक्ख भाइयों के सुन्दर सुन्दर उदगार...
सच पटना की शोभा देखते ही बन रही...लोगो की कई गलतफहमियां मिट गईं यहाँ आने के बाद...सब कह रहे...बिहार आने के बाद विचार ही बदल गए ...बिहार और पटना के बारे में बहुत बुरा सुना था पर यहां सब उल्टा दिख रहा...सब लोग बहुत सहयोगी हैं...गुरुघर की व्यवस्था पंजाब से कम नहीं...सच, बहुत अच्छा लग रहा।
पटना किन्ना सोणा शहर है...यह हम नहीं कह रहे, हमारे सिक्ख अतिथि कह रहे।

04/01/17

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गुरु गोबिंद सिंघ जी महाराज के कवित्त
3
कोऊ भइओ मुंडिया कोऊ जोगी भइओ
कोऊ ब्रह्मचारी कोऊ जति अनुमानबो
हिन्दु तुरक कोऊ राफ़ज़ी इमाम साफ़ी
मानस के जात सबै एकै पहिचानबौ
अर्थ---
कोई सर मुड़ाकर बैरागी बन गया, कोई सन्यासी, कोई जोगी, कोई जति, कोई हिन्दू, कोई तुर्क, कोई शिया, कोई सुन्नी है, परंतु मैं सब मनुष्यों को एक जैसा समझता हूँ।03/01/17

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हमलोग कबीर और रहीम के लगभग सभी दोहों से वाकिफ हैं। मैं गुरु गोबिंद सिंघ के कुछ कवित्त अर्थ सहित देने जा रही हूँ।
अभी सिक्खों के दसवें गुरु के जन्मदिवस को 350वे प्रकाशोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है...तो जाहिर है पटना साहिब का माहौल बिलकुल मत्था टेकने वाला...और लंगर का हो गया है। जनता में भी गजब का उत्साह है।
अब कवित्त
1
खूक मलहारी गज गदहा बिभूतधारी
गिदुआ मसान बास करिओ ई करत हैं
अर्थ-
यदि शरीर पर मिट्टी लगाने से परमात्मा प्राप्त होते है तो हाथी और गधे सदा मिट्टी धारण किये रहते हैं। यदि प्रभु सदा श्मशान में रहने से मिलते हैं तो गिद्ध तो सदा श्मशान में ही रहते हैं।
2
घुघू मट बासी लगे डोलत उदासी मृग
तरवर सदीव मोन साधे ही मरत हैं
अर्थ-
यदि मठ में रहने से मुक्ति प्राप्त होती हो तो उल्लू सदा मठों में रहता है। उदास रहने से भी मुक्ति प्राप्त नहीं होती, देखो हिरण सदा उदास एक स्थान से दुसरे स्थान स्थान की ओर भागते रहर हैं। चुप्पी साधने से भी मुक्ति नहीं मिलती, वृक्ष भी सदा चुप ही खड़े रहते हैं।
02/01/17

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क्रिसमस ट्री के साथ तुलसी पूजन की बात हुई|
वैलेंनटाइन डे आएगा तो माता पिता को याद किया जाएगा|
अच्छा लगता है नकारात्मकता में सकारात्मकता देखना...
जो कैलेंडर पूरे विश्व में मान्य है उसके अनुसार शुभकामनाएँ देने में परहेज कैसा|
खुले दिल से स्वागत करें हर शुभ दिन का..
2017.शुभ ही शुभ हो सभी मित्रों के लिए|01/01/17

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मुझे नही पता
मैं बेहतरीन मित्र हूँ या नही,
लेकिन मेरी मित्र सूची में
सारे मित्र बहुत बेहतरीन हैं
नया साल ढेर सारी खुशियाँ लाये आपके जीवन में।
शुभकामनायें सभी को।३1/1२/16

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7:30 की इतनी उत्सुकता कभी न थी
खूब कयास लगाये जा रहे चैनलों पर...मोदी जी का राष्ट्र के नाम संदेश

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जॉनी जॉनी
यस पापा
ईटिंग शुगर
नो पापा
टेलिंग lie
नो पापा
ओपन योर माउथ
हा हा हा
...पप्पा- बेटे की यह राइम अच्छी है न।
मुलायम रिश्ते मुलायम बने रहें तो मन भाते हैं।
(बुद्धिमान सन्दर्भ ढूँढ ही लेंगे) उत्तर प्रदेश चुनाव के सन्दर्भ में

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पूरी सज धज ले साथ पटना का तख़्त हरमंदिर साहिब तैयार है...जी आयां नूँ... कहते हुए मत्था टेकने आना है।
सिख संप्रदाय के दसवें गुरु -गुरु गोविन्द सिंह जी का 350वां जन्मदिवस प्रकाशोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है जिसके लिए तीन दिनों की सार्वजानिक छुट्टी घोषित की गयी है। एक निश्चित दिशा में निश्चित दूरी के लिए मुफ़्त बस सेवा का प्रावधान है। कहीं कोई कचरा नहीं...गंभीरता से यातायात व्यवस्था देखी जा रही...चारो ओर पुलिस ही पुलिस ...प्रशासन की और से सुरक्षा का पुख्ता इंतेजाम....बिहार पटना पर गर्वानुभूति
प्रकाश पर्व की बहुत शुभकामनायें।30/12/16

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नव वर्ष में एक शपथ
ले रहा जमाना

हम भी लेंगे नई शपथ
करेंगे ना बहाना

गुणों की अदला-बदली कर
मैं वक्ता तुम श्रोता बन जाना।
-ऋता

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बिछड़ने से पहले मिलन अवश्यम्भावी है।
जाने वाला 2016 और आने वाला 2017 पल भर के लिए अवश्य मिलेंगे...31 दिसम्बर की रात पक्का 12 बजे जब घड़ी की छोटी सूई और बड़ी सूई आपस में मिलेंगे...और उसके साक्षी होंगे हम सब... विदाई के लिए भी और स्वागत के लिए भी। जाने वाले को ख़ुशी से विदा करें और आने वाले का प्रेम से स्वागत हो।
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कभी किसी को अकेला रहना पड़ता है एक दो दिन के लिए...... तो अक्सर सुनने को मिलता है...कुछ भी खा लेंगे...ये "कुछ भी" कौन सी डिश है किसी को पता है क्या ?

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हम अपनी रचनाओं के फ्रेम में सुन्दर सुन्दर शब्दों को कितनी सुन्दरता से सजा पाने में सफल हो पाते हैं...यह शब्दों की अमीरी पर निर्भर है| कभी कभी बहुत गरीबी का अनुभव होता है|
जज्बात , एहसास और भावनाओं के करोड़पति सभी मनुष्य होते हैं|

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ये दुनिया ये समाज क्या है
भौतिकता का पर्याय
मैं इनकी परवाह नहीं करता

अच्छा जी, जब इतने ही निर्विकार हो तो तो तो
यहां से हमेशा के लिए deactivate होकर दिखाओ

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जो पुरुष अपने जीवन साथी या किसी भी महिला के लिए 'अनलकी' या कोई भी अपशब्द का इस्तेमाल करते हैं वे निश्चित रूप से दिमागी तौर पर अस्वस्थ होते हैं |............तीस वर्ष साथ रहने के बाद एक पत्नी जिसने कैंसर से पीड़ित पति की सेवा की ...और एक दिन अपने पति के साथ अपने कार्यस्थल पर आई तो उनके पति ने दस बार से भी ज्यादा उन्हें अनलकी कहा| उस वक्त उन महिला के चेहरे पर जो अपमान की रेखाएँ थीं उसने हम सभी महिलाओं को उद्वेलित कर दिया|-----------------------

जहाँ में कौन कितना आग या पानी रहा
न थी मर्जी बशर की वो ख़ुदा की नेमतें
-ऋता

मुकद्दर के भरोसे जिंदगी कटती नहीं
हुनर भी तो समर्पण त्याग का ही चाहिए
-ऋता
0☺



रविवार, 22 जनवरी 2017

सरजमीं पर वक्त की तू इम्तिहाँ की बात कर



चाँद वाली रौशनी में आसमाँ की बात कर
ऐ मुहब्बत अब सितारों के जहाँ की बात कर

मुफलिसी में भी रहे आबाद रिश्तों का जहाँ
हो मुरव्वत हर किसी से उस मकाँ की बात कर

जो तस्सव्वुर में दिखे वो सच सदा होते नहीं
सरजमीं पर वक्त की तू इम्तिहाँ की बात कर

ओ मुसाफिर आज तू जाता कहाँ यह बोल दे
हो सके रहकर यहीं पर आशियाँ की बात कर

अजनबी से रास्ते अनजान सी वो मंजिलें
वस्ल की हो रात जब तो ना ख़िजाँ की बात कर

रेत पर आती लहर वापस गुजर कर जा रही
है दिलेरी गर बशर में तो निशाँ की बात कर
--ऋता शेखर ‘मधु’
2122  2122  2122  212

सोमवार, 16 जनवरी 2017

उत्तरायण हुए भास्कर



उत्तरायण हुए भास्कर
भक्त नहाए गंग
उम्मीदों की डोर से
उड़ा लो आज पतंग

रग रग में जागी है ऊर्जा
शिशिर गया है खिल
एहसासों के गुड़ में लिपटे
सोंधे सोंधे तिल
थक्के थक्के में दही जमे

लिए गुलाबी रंग
किसका माँझा किससे तेज
आसमान में ठनी लड़ाई
इसका पेंच या उसका पेंच
बढ़ी काटने की चतुराई
पोहा खिचड़ी तिलछड़ी में
उमग रही उमंग

मौसम बदला रिश्ते बदले
ग्राह पकड़ता गज के पैर
पलक झपकते किसी बात पर
अपने भी हो जाते गैर
फन काढ़ता लोभ मोह का
सोया हुआ भुजंग

रामखिलावन बुधिया के घर
लेकर जाता कड़क रेवड़ी
सासू माँ बिटिया रानी की
दिखा रही है अजब हेकड़ी
मकर काल में सूर्य भ्रमण
फड़काता है अंग

खरमास का अवसान हो रहा
अब शुभ मुहुर्त आने को है
दिन बढ़ना रातों का घटना
राग फाग का छाने को है
देख थाल में शगुन का कँगन
कम्मो होती दंग

उम्मीदों की डोर से
उड़ा लो आज पतंग

--ऋता शेखर ‘मधु’

रविवार, 1 जनवरी 2017

नया साल आया है

नया साल ले आ गया
धवल सलोना प्रात
गया वर्ष लिखता रहा
अनुभव के अनुपात

चल कमली कोहरे के पार
वहाँ सजा है अपना खेत
खुद से खुद ही आगे बढ़ जा
झँझवाती से अब तो चेत

भोर किरण देने लगी
खुशियों की सौगात

हम ऐसे मजबूर हुए
कुछ अपने भी दूर हुए
गम की काली चादर फेंक
रमिया अब तू रोटी सेंक

जीवन में करना सदा
उम्मीदों की बात

करो प्रदीप्त प्रेम की ज्वाला
मुँह में सबके पड़े निवाला
सुनो सुहासी तोड़ो फूल
परे हटाओ निर्मम शूल

पलकों पर जाकर रुके
सपनों की बारात

मन का संबल मन की जीत
मन हरसे तो रच दे गीत
ओ जमनी, बन मीठी धारा
घुट घुट कर क्यों होना खारा

आँचल में अधिकार मिले
अटल रहे अहिवात

- ऋता शेखर ‘मधु’

मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

प्रैक्टिकल नॉलेज



प्रैक्टिकल नॉलेज

'अरे, आज ये महाशय ऑटो में', मन ही मन आश्चर्यचकित होते हुए मैं भी उसी ऑटो में बैठ गई|

वो सज्जन मेरी कॉलनी के थे| रइसों में गिनती होती थी उनकी| काम पर जाने का उनका समय भी सुबह नौ बजे ही होगा तभी लगभग हर दिन रास्ते में बड़े गेट से निकलती बड़ी सी गाड़ी में उन्हें देख देखकर पहचान गई थी| वे मुझे नहीं जानते थे|


ऑटो तेजी से गंतव्य की ओर बढ़ रहा था| जगह पर पहुँच कर वे उतरे और ड्राइवर की ओर पाँच सौ का नोट बढ़ाया|

' साहब जी, आपको सिर्फ आठ रुपए देने हैं| इतनी सुबह मैं पाँच सौ के छुट्टे न दे पाऊँगा|'

'आज ऐन वक्त पर मेरी गाड़ी खराब हो गई| समय नहीं था तो ऑटो पर आ गया|छुट्टे रखने की आदत नहीं और वॉलेट में सारे नोट पाँच सौ के ही हैं', उन्होंने ऑटो से आने की मजबूरी बताई|

' जाइए साहब जी, कोई बात नहीं| कभी कभी आम पब्लिक की तरह सफर करेंगे तभी प्रैक्टिकल नॉलेज होगी न| हर तरह की सवारी के अपने कायदे होते हैं,'मुस्कुराते हुए ड्राइवर ने कहा|

वे बेबस से खड़े थे|

'सर, वो नोट इधर दीजिए', तब तक मैं सौ सौ के पाँच नोट निकाल चुकी थी|
उन्होंने धन्यवाद कहते हुए सारे नोट लिए और एक नोट ऑटो वाले को दिया|
वापसी में पचास , बीस और दस के नोट के साथ दो का सिक्का भी था|

सिक्के ने अपना महत्व बताते हुए अमीर वॉलेट में जगह बना लिया|

--ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 25 दिसंबर 2016

मरियम

मरियम
गिरजाघर की रौनक देखते ही बन रही थी| चारों तरफ क्रिसमस ट्री पर सजे रंग बिरंगे बल्ब जुगनू की तरह टिमटिमा रहे थे| दुधिया रौशनी से नहाया गिरजाघर का घंटा, अतिथियों के आने जाने का ताँता, हर्षपूर्ण वातावरण, तितलियों की तरह उड़ती फिरती परियों सी नन्हीं बच्चियाँ, इशारों ही इशारों में प्यार का इजहार करने वाले नौजवानों की टोलियों ने त्योहार में इंद्रधनुषी रंग बिखेर दिए थे| ‘मेरी क्रिसमस’ के उल्लसित स्वर बरबस ही बता रहे थे कि आज के पावन दिन पर किसी देवदूत ने अवतार लिया था जिसने अत्याचार और अन्याय के विरुद्ध जंग लड़ी और जनमानस के जीवन में छाए तम को हटाकर सूर्य की उज्जवलता भर दी| सूली पर कीलों से ठोके गए पर उफ्फ न की|
निश्चित समय पर गिरजाघर के पादरी ने अतिथियों को सम्बोधित कर बधाइयाँ देते हुए कहा-
‘ धरती पर आने वाले हर नवजात में यीशु है| उनका दिल से स्वागत करो| कौन हमारी मुश्किलों से हमें निकालने वाला है यह भविष्य की तिजोरी में कैद है| हम नन्हें यीशु का स्वागत करेंगे तो माँ मरियम की ममता का अस्तित्व रहेगा|’
पादरी के सम्भाषण के बाद लोग कतारों में आकर मरियम और यीशु मूर्ति को देखते और सम्मान में सिर झुकाते| इसके बाद देर रात तक पार्टी चलती रही| नाच गाना से हॉल थिरक रहा था|
उसी हॉल में एक कोने में टेबल पर बैठी स्टेला गोद में एक शिशु को लिए बार बार ढक कर उसे कड़ाके की ठंड से बचाने की कोशिश कर रही थी| उसकी आँखें किसी को ढूँढ रही थीं| पादरी भी इधर उधर घूमते हुए कई बार स्टेला के पास से गुजरे, ठिठके, फिर बिना कुछ कहे आगे बढ़ गए| स्टेला निर्विकार आँखों से उन्हें ताकती रही|
धीरे धीरे रात गहराने लगी| माहौल थमने लगा| अचानक एक बड़ी सी गाड़ी गिरजाघर के सामने आकर रुकी| पादरी के साथ साथ स्टेला की नजर भी उठी| गाड़ी से शहर के बड़े उद्योगपियों में एक मिस्टर अल्वा अपने बेटे जॉन के साथ उतरे|उन्होंने सीधे जाकर मरियम-यीशु के पास जाकर सिर झुकाया फिर पादरी के पास गए| पादरी ने देखा कि स्टेला भी धीरे धीरे चलकर उधर ही आ रही थी|
‘जॉन ये देखो, हमारा बेटा’ स्टेला ने रुक रुक कर कहा|
‘व्हाट रबिश, ये क्या कह रही,’ हड़बड़ा गया था जॉन| पादरी और मिस्टर अल्वा चौंक गए|

‘मैं चाहती तो दुनिया में इसे नहीं लाती, मगर मैंने ऐसा नहीं किया| फ़ादर हमेशा कहते हैं कि हर नवजात में यीशु है| मैं यीशु को आने से कैसे रोक सकती थी| इसे अपना लो जॉन|’ स्टेला के स्वर में आग्रह था|
‘नही लड़की, इस बात का जिक्र कहीं नहीं करना| तुम भी चाहो तो अनाथालय में इसे रखकर आजाद हो सकती हो|’ मिस्तर अल्वा ने कड़े स्वर में कहा|
‘नहीं, मैं भी मरियम हूँ| यह शिशु मेरा यीशु है| मैं पालूँगी इसे|’ पादरी पर गहरी नजर डालते हुए स्टेला ने कहा|
धीरे धीरे स्टेला के कदम गिरजाघर से बाहर निकल रहे थे| पादरी कभी मरियम की मूर्ति को देखते और कभी स्टेला को, परन्तु वे स्टेला को आगे बढ़कर रोक न सके| उन्होंने मिस्टर अल्वा के सामने हाथ जोड़ दिया-
‘ मरियम तो चली गई, अब कैसा क्रिसमस !! गिरजाघर बन्द करना चाहता हूँ| इजाजत दीजिए|’
---ऋता शेखर ‘मधु’

सोमवार, 19 दिसंबर 2016

रोला छंद

रोला छंद
1
देखो आई रात, चाँद भी नभ में आया
झरते हरसिंगार, भ्रमर ने राग सुनाया
फूले सरसो खेत, पंक ने कमल खिलाये
दे बासंती भाव, फूल गेंदा हरषाये
2
हरे हुए हर पात, दूब की बात निराली
झूल रही है ओस, पवन बनती मतवाली
हौले हौले सूर्य, गरम होता जाता है
शिशिर शरद के बाद, ग्रीष्म ही मन भाता है
3
चाह रहे बदलाव, तनिक धीरज से रहना
यह तो है संग्राम, जिसे मिलकर के सहना
मन में रखकर आस, जहाँ में सूरज भरना
गम को पीछे छोड़, कालिमा हर क्षण हरना
--ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 14 दिसंबर 2016

जमाना हर किसी को तोलता है


शराफ़त से सभी को जोड़ता है
किसी खुदग़र्ज से वो भी अड़ा है

न कोई बच सका है आइने से
जमाना हर किसी को तोलता है

नदी को बाँध लेते हैं किनारे
यही तहज़ीब की परिकल्पना है

बिखरती पत्तियाँ भी पतझरों में
दुखों के सिलसिले में क्या नया है

नजरअंदाज ना करना कभी भी
बड़ों में अनुभवों का मशवरा है

दिलों में है नहीं बाकी मुहब्बत
*कोई आहट न कोई बोलता है*

--ऋता शेखर 'मधु'

1222/ 1222/ 122

काफ़िया- आ

रदीफ़-है

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

तोटक छंद

तोटक छंद (वर्णवृत छंद)
वर्णिक मापनी - 112 112 112 112

मनु के मन में जब आस रही
हर बात तभी कुछ खास रही
उर में बहती नित प्रेम सुधा
जग में हर भोर प्रभास रही

प्रिय है जिनका ब्रजधाम सखी
मन में रहते वह श्याम सखी
मुरली धुन से हरसी यमुना
जपती रहती नित नाम सखी

पथ के सब भीषण घात कहो
मिलती रहती वह मात कहो
बहती नदिया खिलती कलियाँ
मनभावन सी तुम बात कहो

लिखना कविता रसधार सखे
उतरे दिल के उस पार सखे
मिलते जब कंटक जीवन में
बन औषध दे यह सार सखे

रहता जिनके मन खोट नहीं
उनको सच से कुछ ओट नहीं
समभाव रहे सुख या दुख में
दिल को लगती फिर चोट नहीं
---ऋता

बुधवार, 30 नवंबर 2016

वंश - लघुकथा

वंश
पूरा घर नन्हे रौशन के पहले जन्मदिन की तैयारी में व्यस्त था| किन्तु रौशन की माँ कमला निर्विकार भाव से बैठी थी| दो वर्ष पहले की बात उसे परेशान कर रही थी|
'बहुरिया, चल तैयार हो जा| बहुत पहुँचे हुए बाबा आए हैं| सायद कोनो किरपा हो जाए तब यहाँ भी बाल गोपाल की किलकारी गूँजे|'
'ना अम्मा जी, हम नहीं जाएँगे| हमरी अम्मा कहती थी कि जवान बेटी बहु को कोई बाबा उबा के पास नहीं जाना चाहिए|'
'काहे नहीं जाना चाहिए| अब जादे सिखाओ मत अउर चुपचाप तैयार हो जाओ|'
'अरे , काहे बहस लड़ाती है| अम्मा कह रही है तो जाओ न|'
पति की बात सुनकर बड़े बेमन से कमला तैयार हो गई|
'शुभ मुहुरत में बहुरिया को झाड़ फूँक देंगे| उसको यहीं छोड़ जाओ| मुहुरत आधी रात को है' बाबा ने कमला के चेहरे को पढ़ते हुए कहा|
'नहीं अम्मा, हमको छोड़ के मत जाओ|'
''छोड़ के जाने कौन कह रहा है| तुम्हारी अम्मा भी रहेगी|''
यह सुन कमला आश्वस्त हो गई| मुहुर्त देखकर बाबा ने कुछ जड़ी बूटी पीने को दिया| उसे पीकर कब वह बेहोश हो गई पता ही नहीं चला| जब होश आया तो सास के पास ही थी|
'बहुरिया, उठ कर रौशन को नए कपड़े पहनाओ| हमरा वंश बढ़ाने वाला वही तो है| '
सास की बात से कमला की तन्द्रा टूटी|
वह उस हरकत को महसूस कर रही थी जो अचानक होश आ जाने पर उसने महसूस किया था|
''हुँह,काहे का वंश...'घृणा से मु़ब बनाती कमला रौशन के पास चली गई|
ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

वक्त की झुर्रियाँ-लघुकथा



वक्त की झुर्रियाँ

आज फेसबुक पर सर्फिंग करते हुए अरुण बाबू अचानक लालिमा जी की प्रोफाइल पर पहुँच गए| उसने प्रोफाइल पर वही पिक लगा के रखा था जो चालीस साल पहले कॉलेज के पहचान पत्र पर था इसलिए नजर पड़ते ही अरुण बाबू पहचान गए| जल्दी जल्दी पूरी प्रोफाइल खंगाल डाले पर सिर्फ वही तस्वीर देख पाए| शायद प्राइवेसी सेटिंग थी या फिर वह कोई पोस्ट नहीं डालती थी|

अरुण बाबू ने मेसेज में लिखा,’ यदि मैं गलत नहीं हूँ तो तुम लालिमा ही हो न| इस तरह अचानक कॉलेज छोड़कर क्यों चली गई थी|” मेसेज भेजकर पुरानी यादों में खो गए जब लालिमा की खूबसूरती दोस्तों के बीच चर्चा का विषय थी| लालिमा मेसेज देखेगी भी या नहीं इसमें संदेह था कि अचानक मेसेज देख लेने का संकेत दिखा| अरुण बाबू उत्तर का इन्तेजार करने लगे|

‘आप कौन’ अचानक मेसेज बॉक्स की लाल बत्ती जल गई|

‘मैं अरुण जिसके नोट्स तुम्हें बहुत पसंद थे’|

कुछ देर बातें होती रहीं| अरुण बाबू ने लालिमा जी को हैंग आउट पर आने को कहा| उनकी कल्पना में वही बाइस साल की लालिमा की तस्वीर घूम रही थी| तभी लालिमा जी टैबलेट पर दिखने लगीं| दोनों दोस्तों ने एक दूसरे को देखा| कुछ देर देखते रहे फिर ठठाकर हँस पड़े|

‘’उम्र के इस पड़ाव पर भी कल्पना पुरानी है मगर झुर्रियाँ भी सुखद हैं’’ अरुण बाबू ने हँसते हुए कहा|

--ऋता शेखर "मधु"

फेसबुक की प्रतिक्रियाएँ

१ वाह, वाह।खूब बढ़िया लिखा आपने।मनभावन कथा।बधाई हो सुन्दर लेखन हेतु।–गीता सिंह

२. Behad sundar ehsaso ki mala Piro di aap nai-कुलविंदर सिंह

३. अत्यंत लुभावनी कथा ,हार्दिक बधाई ऋता शेखर 'मधु' जी-अर्चना त्रिपाठी

४. समय के साथ चेहरा बदल गया लेकिन मन के भाव नहीं, बहुत बढ़िया| बधाई इस सुंदर रचना के लिए-विनय कुमार

५. फेसबुक में झुर्रीदार सुखद मिलन, नये कलेवर में अच्छी रचना। बधाई।रूपेंन्द्र सामंत

६. वाह ख्वाबों की तस्वीर सदा जवांरहती है समय का प्रभाव नही पडता है यादों पर सुन्दर भाव वाली रचना बधाई ऋता जी-जितेंद्र गुप्ता

७. बहुत बढ़िया रचना बनी है चित्र के भाव को देखते हुए, कही भी ऐसा नहीं लगता कि रचना को जबरन लिखा गया हो ....... बधाई स्वीकार करे ऋता शेखर जी—वीरेंद्र वीर मेहता

८. बहुत सुंदर अंत के साथ एक बढ़िया कथा-जानकी वाही

९. अक्सर पुराना कोई दोस्त मिलता है तो ज़ेहन में उसका वही बरसों पुराना रूप समाया रहता है, अरसे बाद मिले मित्र में आये परिवर्तन खुद को भी उम्रदराज़ होने का अहसास करा जातें ,, बेहद सुन्दर रचना चित्र पर,----महिमा वर्मा

बुधवार, 23 नवंबर 2016

अंतर्देशीय



अंतर्देशीय--

इमेल, एसएमएस, व्हाट्स एप के जमाने में ऑफिस के लिफाफों के ढेर में एक अन्तर्देशीय देखकर अविनाश चौंक गया| लिखने वाले ने अन्तर्देशीय के पीछे अपना नाम नहीं लिखा था| उत्सुकता से अविनाश ने सबसे पहले वही खोला|

''सॉरी भइया, तुमसे बात करने का कोई रास्ता नहीं था| इसलिए यह खत लिखा|
याद है बचपन में हम कितना लड़ा करते थे| मैं ही ज्यादा बदमाश थी और तुम हमेशा चुप लगाकर झगड़ा शात कर देते थे| तुम्हें याद है न, होमवर्क नहीं करने पर मैं स्कूल न जाने के कई बहाने ढूँढती थी और तुम चुपके से मेरा होमवर्क पूरा कर दिया करते थे| भाई, तुम्हें याद है एक बार कॉलेज से जाने वाले एजुकेश्नल ट्रिप पर जाने देने के लिए पापा राजी नहीं थे तब तुमने ही तो मेरी सिफारिश की थी और पापा तैयार हो गए थे| एक बार एक प्रोजेक्ट बनाने के लिए सैंड कलर नहीं मिल रहा था तो तुमने कई दुकानों के चक्कर लगाए थे और लाकर दिए थे|
माना कि तुम्हें बहुत आगे तक जाने की महत्वाकांक्षा थी| एम बी बी एस के बाद आगे की पढ़ाई विदेश में पढ़ना चाहते थे तुम| इसके लिए तुमने भाभी के पापा के दबाव में आकर उनके घर में ही रहना स्वीकार कर लिया| हमें या मम्मी पापा को इससे कोई एतराज नहीं था लेकिन तुम धीरे धीरे हमसे दूर होते चले गए| मैं चाह कर भी तुमसे बात नहीं कर पा रही थी| मुझे मालूम था कि तुम्हारे फोन, मेल सब कुछ भाभी देखती हैं इसलिए कोई बात न बढ़ जाए मैंने भी दूरी बना ली थी|
भइया, मेरे इंगेजमेंट में भी तुम मेहमान बन कर आए और चले गए| अब मैं भी तो घर से जा रही हूँ| लोग कहते हैं कि बेटियाँ परायी होती हैं| तुम तो बेटा हो न| मम्मी पापा बिल्कुल टूट जाएँगे भाई|
भइया, दूसरे घर जाने से पहले मैं तुम्हें अपने हाथों से वो सभी राखियाँ बाँधना चाहती हूँ जिसे हर रक्षाबंधन पर मैंने खरीदे पर तुम्हारे पास जाने की हिम्मत न कर सकी| मुझे एक दिन के लिए मेरा भाई लौटा दो भइया| फिर आगे कुछ नहीं माँगूँगी | भइया प्लीज़, आशा है बचपन की प्यारी बहन का मान रख लोगे|
अनु
आँखें पोंछते हुए अविनाश टेबल पर पड़े सभी कागजों को समेट उठ गया|
''सर, आज की डील फाइनल नहीं हुई तो देर हो जाएगी| "
'' अगर आज नहीं गया तो मेरी बहन खो जाएगी'', कहता हुआ अविनाश बाहर निकल गया|
--ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 20 नवंबर 2016

मूक बनोगे आज जब, हो जाएगी चूक

दो पहलू हर बात के, सहमति और विरोध
कह दो मन के भाव को,नहीं कहीं अवरोध


मूक बनोगे आज जब, हो जाएगी चूक
होंगे कल के बोल तब, वीराने की कूक


चुप रहने से जिंदगी, बदले अपनी चाल
क्यों पूछे उस वक्त में, कोई तुम्हारा हाल


नित नित लिखते मित्र जो, बनते थे चर्वाक
चुप रहकर के वो बने, बड़े चतुर चालाक


रुक जाए जो लेखनी, कौन बने आवाज
खंगालो इतिहास को, कवि बदलो अंदाज


--ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 15 नवंबर 2016

हैप्पी बर्थडे - लघुकथा

हैप्पी बर्थडे
‘आज माँ को क्या हो गया है’, पत्नी शिप्रा ने आते ही अभिनव से कहा|
“क्या किया माँ ने”, अभिनव सोचते हुए बोला|
“माँ ने मिठाई मँगवाई है और सजधज कर बैठी हैं|”
“देखता हूँ,” कहकर अभिनव माँ के कमरे की ओर गया|
अन्दर से कुछ आवाज आ रही थी| अभिनव बाहर ही रुककर सुनने लगा|
“अभिनव के पापा, याद है न वह गाना जो तुम अक्सर गाया करते थे....
मैं जब हूँगा साठ साल का और तुम होगी पचपन की...
...बोलो प्रीत निभाओगी न|
देखो जी, आज मैं पचपन की हो गई मगर तुम साठ के न हो सके|
मुझे देखो, बुढ़ापा चेहरे पर आने लगा है किन्तु तुम तो अब भी युवा दिखते हो|
तुम्हें साठ की देखने की मेरी ख्वाहिश पूरी न हो सकी|...अच्छा छोड़ो ये बातें, मिठाई खाओ|’’
इसके बाद माँ के हँसने की आवाज आई|
मात्र पाँच साल की उम्र में अपने पिता को खो चुका अभिनव कमरे में घुसकर
अपने पिता की उसी युवा तस्वीर देखते हुए आँखें पोंछ रहा था जिससे  माँ बातें कर रही थी|
‘हैप्पी बर्थडे माँ’’, कहते हुए उसने माँ के प्लेट से मिठाई उठाकर खा ली|
ऋता शेखर ‘मधु’

गुरुवार, 10 नवंबर 2016

भली लगे सबके कानों को, बोलो ऐसी बोली

११
जीवन जीने के कौशल में, होती कई परीक्षा
वो ही अव्वल आ पाते जो, पाते नैतिक शिक्षा
१२.
सावन भादो के मौसम में, करता है खुदगर्जी
बादल को अब आने भी दे, नभ को भेजो अर्जी
१३.
बासंती मौसम में आईं, कलियाँ नई नवेली
मनभावन खुश्बू से देखो, सबकी बनीं सहेली
१४.
भली लगे सबके कानों को, बोलो ऐसी बोली
कूक कूक कर अमराई में, कोयल शरबत घोली
१५.
मन माटी की हर क्यारी में, बीज प्रेम के बोना
सद्भावों से महक उठेगा, घर का कोना कोना
१६.
देशप्रेम की स्वच्छ सोच में, कैसी नफरत जागी
जात धर्म की उग्र हवा में, फूल हुए हैं बागी
१७.
स्वस्थ बीज अच्छी सिंचन से, आती है हरियाली
गेहूँ की बाली के संग संग, आएगी खुशहाली
१८.
इंद्रधनुष के सप्तवर्ण में, हमें तीन है प्यारा
प्रगतिशील झंडे में सजकर, चक्र लगे है न्यारा
१९.
निर्निमेष व्याकुल अँखियों से, ताक रहा है चातक
मिलती ना बूँदें स्वाती की, प्यास बनी है घातक
२०.
नई राह पर नए कदम की, दुनिया है अनजानी
मायावी बातों में आकर, ना करना नादानी
२१.
पवन मेघ अरु धूप रूप में, आया है वनमाली
उसकी अगवानी करने को, झुकी फूल की डाली
२२.
अथक परिश्रम अटल आस से, दूर करो हर बाधा
खुशियों से खुशियाँ मिलती हैं, गम होता है आधा
२३.
कंकड़ पाथर के ऊपर से, निर्मल सरि सा बहना
सदा पहन कर सुन्दर दिखना, निश्छलता का गहना
२४.

ताकधिना धिन ताकधिना धिन, जमकर बरसा सावन
पुलकित बूँदों के नर्तन से, पात बने हैं पावन
२५.
रातों को जल्दी सो जाओ, सुबह सवेरे जागो
लाख टके की हवा मिलेगी, प्रातभ्रमण को भागो
२६.
बड़े दिनों पर पोते के घर, दादी अम्मा आई
बालक मन के गुलमोहर पर, डोली है पुरवाई
२७.
अरुणाचल की लाली में अब, जागी है अरुणाई
कोयल कूकी, बैल चले हैं, फैल रही तरुणाई
२८.
लम्बे चौड़े वादे मुकरे , उम्मीदें हैं भूखी
जबसे उनको वोट मिला है, बातें करते रूखी
२९.
मँहगाई के डंडे से वे, छीन रहे हैं रोटी
जाने किस किस हथकंडे से, जेब हुई है मोटी
३०.
हहराती बलखाती गंगा, धरती पर मुड़ जाती
फसलों की जड़ तक वह जाए, ऐसी जुगत लगाती
३१.
इस नश्वर दुनिया में मानव, जोड़ के रखो कड़ियाँ
जाने कब कौन कहाँ छूटे, बोल रही हैं घड़ियाँ
३२.
धरती की बढ़ती गरमी से, घबराती है बरखा
सत्य अहिंसा के दामन से, किसने छीना चरखा

---------ऋता शेखर मधु

शनिवार, 5 नवंबर 2016

प्रतिकार-लघुकथा

प्रतिकार
चिता पर पत्नी के शव के अंतिम संस्कार के लिए शिवशंकर बाबू के हाथों में अग्नि थमाई जा चुकी थी| अचानक तेज आँधी आई| बगल की चिता से चिंगारी उड़ी और शिवशंकर बाबू की पत्नी की चिता से जा लगी| धू धू कर जलने लगी चिता और अग्नि को हाथ में पकड़े पति को दग्ध करने लगी|
 “आज उस मौन बर्फ ने आपकी अग्नि को नकार दिया जीजा| जो काम वह जीते जी नहीं कर सकी, मरकर कर दिया उसने,” रोष फूट पड़ा भाई संजीव का|
 अवाक् खड़ी अपनों की भीड़ की ओर मुखातिब होकर संजीव कहने लगा, “ तीन बेटियों के लिए जीजा और उनके घरवालों से प्रताड़ित होती रही थी हमारी बहन| बाद में बेटे की चाह में अबॉर्शन पर अबॉर्शन ने उसके शरीर को खोखला कर दिया| क्षीण कमजोर शरीर पर लकवा का प्रकोप हुआ| उसकी शिथिल आँखें भाई को देखते ही बह जाने को आतुर दिखती थी| हम चाह कर भी कुछ न कर सके क्योंकि वह रोक देती थी हमें| ”
 संजीव ने अपनी बात जारी रखी, “ उसकी तीनों बेटियों को खरोंच भी आई तो देख लेना आप| संस्कारों का हवाला देकर हमें रोकने वाली बहन जा चुकी है| ”
 “उफ्फ, सज्जन दिखने वाले इस इंसान की इतनी क्रूर मानसिकता कि प्रकृति भी मरने वाली के मौन चीत्कार को अनदेखा न कर सकी,”भीड़ में से आई आवाज ने एकबारगी सबको दहला दिया|

--ऋता शेखर ‘मधु’

शनिवार, 29 अक्टूबर 2016

जगमग दीप जले

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नवगीत
नए नए दीपों की माला
पथ में रोज सजाना प्रियवर
अँधियारी रातों के साथी
जगमग कर बन जाना प्रियवर

जिनके दृग की ज्योति छिन गई
उनके मन को रौशन करना
द्वार रंगोली जहाँ मिटी है
तँह रंगों की छिटकन भरना

ख्वाबों से मोती चुन चुन कर
तोरण एक बनाना प्रियवर

तारों की अवली से अवनी
अपनी माँग सजाती जाती
गहन बादलों के पीछे से
चपल दामिनी रूप दिखाती

सूरज के तपते कदमों पर
शबनम बन झर जाना प्रियवर

निश्छल मन पर हुए वार से
जग में लाखों दर्पण टूटे
मंदिर की सीढ़ी पर चढ़कर
जाने कितने अर्पण छूटे

नन्हे दीपक की बाती में
आस बिम्ब लहराना प्रियवर

सबके चैन अमन की खातिर
ओढ़ तिरंगा सरहद से आये
कोमल मन की सूनी बगिया
पारिजात फिर कहाँ से पाये

मुर्छित होते घर के ऊपर
विटप वृक्ष बन जाना प्रियवर

--ऋता शेखर ‘मधु’

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2016

हम उन्हें आफ़ताब कहते हैं-ग़ज़ल

हम तो दिल की किताब कहते हैं
आप जिसको गुलाब कहते हैं

जो उलझते रहे अँधेरों से
हम उन्हें आफ़ताब कहते हैं

धर्म के नाम पर मिटेंगे हम
उस गली के जनाब कहते हैं

हुक्म की फ़ेहरिस्त लम्बी है
शौहरों को नवाब कहते हैं

तोड़ दो नफरतों की दीवारें
उल्फतों का हिसाब कहते हैं

मुस्कुराके नजर मिलाते हैं
क्या इसी को नकाब कहते हैं

--ऋता शेखर ‘मधु’

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2016

भूख-लघुकथा


“अरे ओ रामू, उठ रे, उत्तर से पानी बढ़ता ही जा रहा है| हमारी मकई खराब हो जाएगी रे| अब का होगा”
“चिन्ता ना कर कलुआ, जो भगवान पेट दिया है वोही अनाज भी देगा|”
“भगवान का करेगा| बाढ़ लाकर वोही तो तबाह करता है| हमरे माई बापू मेहरारु लइका सब का खाएँगे| चल, जो बोरी शहर भेजे खातिर रखे हैं वोही निकालते हैं| वैसे भी भीगी बोरी किस काम की|”
रामू और कलुआ ने बोरी खोली|थोड़ी सड़ाँध आ चुकी थी| कलुआ ने वही चावल पकाने के लिए ले लिया|
“ना रे कलुआ, हम तो इसका भात नाहिं खाएँगे|”
“तब इ का शहर वाले खाएँगे| वहाँ तो सब अच्छा अच्छा जाएगा| हमारा पेट सब पचा लेता है रे रामू|”

--ऋता