मंगलवार, 1 मई 2018

प्रेम लिखो पाषाण पर, मन को कर लो नीर।

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प्रेम लिखो पाषाण पर, मन को कर लो नीर।
बह जाएगी पीर सब, देकर दिल को धीर।।1

मन दर्पण जब स्वच्छ हो, दिखते सुन्दर चित्र।
धब्बे कलुषित सोच के, धूमिल करें चरित्र।।2

मन के तरकश में भरे, बोली के लख बाण।
छूटें तो लौटें नहीं, ज्यों शरीर के प्राण।।3

अवसादों की आँधियाँ, दरकाती हैं भीत।
गठरी खोलो प्रीत की, जाए समय न बीत।।4

अमरबेल सा बढ़ गयी, मनु की ओछी बात।
शनै शनै होने लगा,मधुर सोच का पात।।5

उम्र बनी हैं पादुका, पल बन जाता चाल।
तन बचपन को छोड़कर, उजले करता बाल।।6

समय पर अधिकार नहीं, वश में रहती याद।
भूलें उनमें नीम को, आम रखें आबाद।।7

कौन सफल कितना कहो, कैसे हो यह माप।
यश, वैभव या विद्वता, खुद ही जानो आप।।8

तेज भागती जिंदगी, ब्रेकर की है नीड।
उतार चढ़ाव दुःख सुख, कंट्रोल करे स्पीड।।9

मन यायावर बावरा, करे जगत की सैर।
अपनी जूती ढूँढते, सिंड्रेला के पैर ।।10

जो एसी में बैठकर, दिनभर रहते मस्त।
गर्मी के अहसास से, कब होते हैं त्रस्त।।11

गर्मी के अहसास को, शीतल करती छाँव।
तरु को अब मत काट मनु, बिलख रहा है गाँव।12
-ऋता

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018

उत्तरदायित्व

उत्तरदायित्व का ज्ञान
"अंजना, जरा पानी देना।"
"अंजना, चादर ठीक से ओढ़ा दो बेटा।"
"अंजना, मन भारी लग रहा, कुछ देर मेरे पास बैठो।"
"माँ, पानी भी दिया, चादर भी दिया। पास बैठने का समय नहीं, आपके बेटे आएंगे, वही बैठेंगे।"
बहु की बात सुनकर प्रमिला जी की आंखें छलक गईं।

प्रमिला जी ने बेटे की शादी तब की थी जब उनकी सास जीवित थीं। तीन देवर और दो ननदों वाला भरा पूरा संयुक्त परिवार था। सबसे बड़ी बहू प्रमिला जी ने खुद को गृहस्थी में पूरी तरह से लगा दिया। सास के ताने सुनते सुनते आदी भी हो गईं थीं। बेटे की शादी हुई तो वे नहीं चाहती थीं कि उनकी बहु इस झमेले में पड़े। इसलिए कभी उसे अपने पास नहीं रखा। ईश्वर की निष्ठुरता से उस दिन बुरी तरह से टूट गईं जब उन्हें लिवर कैंसर निकल गया। बड़ी बेटी और दामाद ने उनकी भरपूर सेवा की। बाद में बेटा किसी तरह से तबादला करवाकर माँ के पास आ गया। अब वे बेटी के घर से अपने घर आ गई थीं।आये हुए सिर्फ पाँच दिन ही बीते थे।
अब बेटी रोज़ आकर माँ को देख जाती। कुछ चीज़ें न भी पसन्द आती तो चुप रहकर कर देती। उस दिन भी वह आई। माँ की छलकी आँखें उससे छुप न सकीं। कीमोथेरेपी ने माँ को बहुत कमजोर बना दिया था।
"भाभी, माँ अब कम दिनों की ही मेहमान है। थोड़ा वक्त उनके साथ बिता लिया कीजिये।" सहज भाव से बेटी ने कह दिया।
"तो मैं क्या करूँ, यहां आकर फंस गई हूँ।" भाभी की बात से वह आहत हो गयी।
"छह महीने लगे आपको आने में भाभी। "
"अब तुम मुझे मेरा उत्तरदायित्व बताओगी"
"नहीं, मैंने सोचा था कि बेटा बहु के आ जाने से अच्छा रहेगा। खैर, माँ को ले जा रही हूँ वापस। आप आराम करें।"
दरवाजे पर बेटे ने भी कोरों पर छलक आई बूंदों को चुपचाप से पोंछकर माँ के पास चला गया।
"भाई, आपकी कोई गलती नहीं। गलती तो माँ से हुई जो प्रेमवश आपको परिवार के जंजाल से दूर रखी। भाभी इसे अपना अधिकार समझ बैठीं और उत्तरदायित्व भूल गईं।"
-ऋता शेखर मधु

शनिवार, 14 अप्रैल 2018

उधम की परिणति

उधम की परिणति
शाम हो चली थी| हल्के अँधेरे अपने पाँव धीरे धीरे पसार रहे थे| मैं ऑफिस से लौट कर अपार्टमेंट की ओर बढ़ रहा था| पार्क में खेलता हुआ मेरा छह वर्षीय बेटा मुझे देखते ही मेरे पास आ गया| हम आगे बढ़ते जा रहे थे तभी रोने की आवाज़ आई| कौन रो रहा, यह देखने के लिए हम इमली के पेड़ वाले पार्क की ओर बढ़े| वहाँ बहुत बड़ा लोहे का पिंजरा था जिसके अन्दर तीन बड़े और दो नन्हें बन्दर कैद थे| वे ही बन्दर रो रहे थे और बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे| मुझे याद आया कि अपार्टमेंट की ओर से सुबह ही नोटिस आ चुका था कि अपने छोटे बच्चों को इमली पार्क में न जाने दें|
“पापा, इन बन्दरों को पिंजरे में क्यों बंद किया है|”

“ये सबको तंग करते थे बेटा| तुमने देखा था न कि गृह प्रवेश के दिन ये खिड़की से घुसकर पूजा के सारे केले उठाकर ले गए थे|”

“दादी ने कहा था कि हनुमान जी स्वयं आकर प्रसाद ग्रहण किये| तो ये तो भगवान हैं न |” बालमन बन्दरों को कैद में देखकर छटपटा रहा था| ”ये बन्दर शाम को यहाँ घूमते थे तो कितना अच्छा लगता था|”

“पर अब यहाँ हम मनुष्य रहेंगे तो वे कैसे रह सकते हैं,” मैंने बेटे की गाल थपथपाते हुए कहा|

“हम मनुष्य बहुत गंदे हैं पापा| उनके रहने के पेड़ काटकर अपना घर बना लिया| उनसे उनका घर छीन लिया| वे अपना घर खोजने आते हैं,” बेटे की बात मुझे भी आहत कर रही थी|

“उधम मचाएँगे तो यही होगा”, बात टालने के इरादे से मैंने कह दिया|

“दादी कहती हैं कि बच्चे भगवान का रूप होते हैं| मैं भी तो उधम मचाता हूँ तो क्या मुझे भी...”उसने अपना मुँह मेरे कंधे में छुपा लिया|

हर दिन सोने से पहले बिस्तर पर उधम मचाने वाला मेरा मासूम बेटा उस दिन चुपचाप सो गया और मैं शांत बिस्तर पर जाग रहा था|

-ऋता शेखर ‘मधु’
14/04/18
मौलिक, अप्रकाशित

बुधवार, 11 अप्रैल 2018

मी टू-लघुकथा

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मी टू

‘रमोला, ये तुम्हें क्या सूझी है| तुम्हारा हँसता खेलता परिवार बर्बाद हो जाएगा| परिणाम पर भी विचार किया है क्या?’’
‘जी दीदी, सब सोच कर ही फैसला लिया है| अब बात बाहर आनी ही चाहिए|”
‘किन्तु, रमेन्द्र जी ये सह नहीं पाएँगे| समाज में सशक्त लेखक के रूप में उनकी इज्जत है| पहले उनसे बात कर लो|’’
‘वो नारी सशक्तिकरण के घोर समर्थक हैं| कुछ न कहेंगे|’’
‘वे पुरुष भी हैं, यह सोच लेना| पर वह था कौन रमोला?’’ दीदी का भयभीत स्वर गूँज उठा|
‘वह तो ‘मी टू’ कैंपेन से जुड़कर ही बताऊँगी दीदी,’’ कहती हुई रमोला बाहर निकल गई|

थोड़ी देर बाद ब्रेकिंग न्यूज था, ‘प्रसिद्ध लेखक रमेन्द्र जी की पत्नी रमोला ''मी टू” कैंपेन से जुड़ी हैं| जब वे बारह वर्ष की थीं तो बड़ी बहन ने डिलीवरी के वक्त बुलाया था ताकि घर के कामों में मदद मिल सके| जब बहन अपनी ननद के साथ अस्पताल में थीं तो घर में बहन की ननद के पति ने उनके अकेलेपन का फायदा उठाया| बहन का घर न टूटे इस वजह से वे चुप थीं| किन्तु इस कैंपेन ने उन्हें अपनी बात कहने की हिम्मत दी है|’’
खबर सुनते ही रमेंन्द्र जी स्तब्ध रह गए| रात में बच्चों ने पिता को बाहर सोफे पर सोये देखा|
तभी दीदी का फोन आया,’’मेरी ननद सूटकेस के साथ मेरे घर आ गई हैं रमोला, शायद हमेशा के लिए| पर तू तो खुश है न’’
रमोला फोन रखते हुए सोच रही थी, कौन का अपराध ज्यादा बड़ा है...चुप रहने का या बोल देने का|
-ऋता शेखर ‘मधु’

सेलिब्रीटीज द्वारा मी टू कैंपेन के तहत किए जा रहे खुलासों के आधार पर रचित कथा

शनिवार, 7 अप्रैल 2018

संवैधानिक अधिकार-सदुपयोग या दुरुपयोग

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संवैधानिक अधिकार-सदुपयोग या दुरुपयोग

अधिकार, एक ऐसा शब्द जो सुख, सुविधा और सहुलियत के दरवाजे खोलता है| कहते हैं जब मनुष्य अपना कर्तव्य करता है तो अधिकार खुद ब खुद मिल जाते हैं| समाज में रहने के लिए कर्तव्य और अधिकार, दोनों आवश्यक हैं|

अब सवाल यह उठता है कि कानूनी रूप से अधिकार लेने की नौबत कब आती है| तभी न जब सामने वाला उसे वह सहुलियत देने में अनदेखी करे या आनाकानी करे| कई मामलों में अधिकार को कानूनी रूप देना आवश्यक हो जाता है|
किन्तु जब किसी को मिला हुआ अधिकार उसे अहंकारी बना दे, निरंकुश बना दे तो कानून पर पुनर्विचार की आवश्यकता आ जाती है|

*हम यहाँ पर शुरु करते हैं उस अधिकार की बात से जब वैवाहिक विच्छेद को कानूनन स्वीकृत किया गया| 1955 में हिन्दु मैरिज एक्ट के तहत हिन्दु रीति रिवाज से हुए विवाह को मान्यता प्राप्त थी| बाद में उसे कानून के हाथों में सौंपा गया जब किसी परिस्थिति में पति-पत्नी का साथ रहना सम्भव नहीं हो पाए तो विवाह विच्छेद ही एकमात्र विकल्प बचता है| यह परिस्थिति में पत्नी को क्या क्या सुविधाएँ मिलनी चाहिए, इसपर कई संशोधन हुए| धीरे धीरे यह कानून जहाँ एक ओर स्त्रियों को सहुलियत देने लगा वहीं कुछ इसका दुरुपयोग भी करने लगे| झूठे आरोप गढ़े जाने लगे| घरों को टूटने की संख्या बढ़ने लगी| संपत्ति के लिए या बदला लेने के लिए इन अधिकारों का दुरुपयोग किया जाने लगा|

*दहेज प्रतिबंध अधिनियम 1961 में बनाया गया| इसका उद्देश्य नवविवाहिता को दहेज उत्पीड़न से बचाना था| धीरे धीरे इन अधिकारों का दुरुपयोग आरम्भ होने लगा| तब संशोधन की आवश्यकता पड़ी|27 जुलाई 2017 में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आया|अब दहेज उत्पीड़न मामले में केस दर्ज होते ही गिरफ्तारी नहीं की जाएगी।

कोर्ट ने नाराज पत्नियों द्वारा अपने पति के खिलाफ दहेज-रोकथाम कानून का दुरुपयोग किए जाने पर चिंता जाहिर करते हुए निर्देश दिए कि इस मामले में आरोप की पुष्टि हो जाने तक कोई गिरफ्तारी ना की जाए। कोर्ट ने माना कि कई पत्नियां आईपीसी की धारा 498ए का दुरुपयोग करते हुए पति के माता-पिता, नाबालिग बच्चों, भाई-बहन और दादा-दादी समेत रिश्तेदारों पर भी आपराधिक केस कर देती हैं। जस्टिस एके गोयल और यूयू ललित की बेंच ने कहा कि अब समय आ गया है जब बेगुनाहों के मनवाधिकार का हनन करने वाले इस तरह के मामलों की जांच की जाए।

कोर्ट द्वारा जारी की गई गाइडलाइंस के मुताबिक, हर जिले में एक परिवार कल्याण समिति गठित की जाएगी और सेक्शन 498A के तहत की गई शिकायत को पहले समिति के समक्ष भेजा जाएगा। यह समिति आरोपों की पुष्टि के संबंध में एक रिपोर्ट भेजेगी, जिसके बाद ही गिरफ्तारी की जा सकेगी। बेंच ने यह भी कहा कि आरोपों की पुष्टि से पहले NRI आरोपियों का पासपोर्ट भी जब्त नहीं किया जाए और ना ही रेड कॉर्नर नोटिस जारी हो।

*हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 में संशोधन से पहले, परिवार के केवल पुरुष सदस्य ही प्रतिपक्षी थे, लेकिन बाद में बेटियों को भी एक हिस्सा पाने का हकदार बना दिया गया। अब सोचने वाली बात यह है कि इस संशोधन की आवश्यकता ही क्यों पड़ी| इसलिए न कि यदि बेटी किसी विशेष परिस्थिति में माता पिता की संपत्ति का कुछ हिस्सा चाहे तो भाई इसके लिए कदापि तैयार न होंगे| साधारणतंः विवाहित खुशहाल बेटियाँ संपत्ति पर अपन दावा नहीं ठोकतीं किंतु बेटी का किसी कारणवश पति से संबंध विच्छेद हो जाए तो वह कहाँ जाए| या फिर कोई बेटी अविवाहित रह जाए तो उसे भी माता पिता के घर में रहने का उतना ही अधिकार है जितना बेटे को| किसी भी घर की बिक्री के लिए बेटियों की सहमति भी आवश्यक है| इससे बेटों की मनमानी पर रोक लगी|

*एक एनजीओ कॉमन कॉज ने 2005 मेंसुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा था कि संविधान के आर्टिकल 21 के तहत जिस तरह नागरिकों को जीने का अधिकार दिया गया है, उसी तरह उन्हें मरने का भी अधिकार है। इस पर केंद्र सरकार ने कहा कि इच्छा मृत्यु की वसीयत (लिविंग विल) लिखने की अनुमति नहीं दी जा सकती, लेकिन मेडिकल बोर्ड के निर्देश पर मरणासन्न का सपॉर्ट सिस्टम हटाया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने 8 मार्च 2018 को ऐतिहासिक फैसले में मरणासन्न व्यक्ति द्वारा इच्छा मृत्यु के लिए लिखी गई वसीयत (लिविंग विल) को गाइडलाइन्स के साथ कानूनी मान्यता दे दी है। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि मरणासन्न व्यक्ति को यह अधिकार होगा कि कब वह आखिरी सांस ले। कोर्ट ने कहा कि लोगों को सम्मान से मरने का पूरा हक है। लिविंग विल' एक लिखित दस्तावेज होता है जिसमें कोई मरीज पहले से यह निर्देश देता है कि मरणासन्न स्थिति में पहुंचने या रजामंदी नहीं दे पाने की स्थिति में पहुंचने पर उसे किस तरह का इलाज दिया जाए। 'पैसिव यूथेनेशिया' (इच्छा मृत्यु) वह स्थिति है जब किसी मरणासन्न व्यक्ति की मौत की तरफ बढ़ाने की मंशा से उसे इलाज देना बंद कर दिया जाता है।

अब देखना यह है कि इस फेसले का  सदुपयोग ही हो|

*अब बात करते हैं अनुसूचित जाति/जनजाति के आरक्षण की| भारत के संविधान निर्माता बाबा साहब भीमराव रामजी आंबेडकर ने स्वतंत्र भारत में अनुसूचित जाति/जनजाति के उत्थान के लिए सभी सरकारी लाभ के लिए उनका प्रतिशत निश्चित किया था| यह सर्वप्रथम दस वर्षों के लिए लागू की गई| बाद में इसकी अवधि बढ़ाकर चालीस वर्ष की गई| आरक्षण तो मिला पर दलित समाज को उनकी जाति का नाम लेकर व्यंग्य और कटाक्ष करने वाले भी कम न थे| इसे मद्देनजर रखते हुए अगस्त 1989 में नियम बनाया गया कि कोई सवर्ण जाति यदि ऐसे शब्द इस्तेमाल करते हैं जिनसे उनकी भावनाएँ आहत होती हैं और उनकी शिकायत थाने में दर्ज की जाती है तो तुरंत उस तथाकथित व्यक्ति को गिरफ्तार करना होगा| उस दलित को मुआवजा भी दिया जाएगा|

कानून दलित समाज के भले के लिए था किन्तु धीरे धीरे यह धमकी का रूप लेने लगा| इसी कानून का हवाला देकर झूठे आरोप भी लगाए जाने लगे| जितने केस दर्ज़ हुए उनमें करीब सत्तर प्रतिशत केस झूठे साबित होने लगे| नौबत यहाँ तक पहुँच गई कि सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश को अनुसूचित जाति के उनके जुनियर जजों ने फँसा दिया| इन सबके मद्देनजर कानून में सुधार की आवश्यकता पड़ी| मार्च 2018 में इस नियम में बदलाव किया गया है और शिकायत पर तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगाई गई है||
-ऋता शेखर 'मधु'

गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

ग्रीष्म गुलमोहर हुई

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ग्रीष्म
ग्रीष्म गुलमोहर हुई है
मोगरे खिलने लगे
नभ अमलतासी हुआ जब
भाव गहराने लगे|

अब नवल हैं आम्रपल्लव
बौर भी अमिया बना
वीरता भी है पलाशी
शस्त्र दीवाने लगे|

तारबूजे ने दिखाया
रंग अब अपना यहाँ
दोपहर में जेठ की
स्वेदकण बहने लगे|

नीम भी करने लगे हैं
ताप से अठखेलियाँ
जी गईं उनकी शिराएँ
पात हरसाने लगे|

शौक से चढ़ने लगी हैं
मृत्तिकाएँ चाक पर
नीर घट के साथ रहकर
सौंधपन लाने लगे|

भोर की ठंडी हवाओं
ने दिया संदेश है
झूम लो क्षण भर यहा़ँ
हम फिर कहाँ अपने लगे|

-ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 1 अप्रैल 2018

धुंध

4
धुंध
नींद खुली
नव रश्मियाँ
भोर का सौंदर्य
कलरव
प्रकृति का माधुर्य
खिड़कियाँ
आज भी खोलीं
बाहर झांकते हुए
स्पष्ट नहीं था कुछ
धुंध छायी थी।
उज्ज्वल रास्तों के लिए
करना होगा वक्त का इंतेज़ार
धूप गहराएगी
तभी दिखेंगे
दूब और फूल
कि सब कुछ
हमारे वश में नहीं होता
करना ही होता है
समय का इंतेज़ार
मन में छाए धुंध को
छंट जाने का।
-ऋता
5
समानता
*
समान चेहरा फिर भी अलग
समान दिनचर्या होते अलग
समान समस्याएं निदान अलग
समान सोच अभिव्यक्ति अलग
समान जीवन क्रम उम्र अलग
सूर्य वही दिवस विस्तार अलग
चाँद वही रूप अलग

समानता में अलगाव
फिर क्यों हम चाहते
सामने वाले का निदान
वही हो
जैसा हमने किया
वह वैसे ही जीये
जैसे हमने जीया
समझो कभी उनके मन को
जिंदगी और मौत समान
जीने की कला अलग अलग
मरने के रास्ते अलग अलग।
-ऋता

शुक्रवार, 30 मार्च 2018

कोमल पत्ते

2
जिजीविषा
मन की धरती
जब होने लगे पठार
संवेदनाएँ तोड़ने लगें दम
उत्साह डूबने लगे
निराशा के समंदर में
आसपास के सूखे पत्ते
मन में शोर करने लगें
मधुर वाणी भी
कानों को बेधने लगें
तब जाना उस पठार पर
जहाँ दरारों से झाँकती है
दो नन्हीं कोमल पत्तियाँ
तब लगता है
कहीं तो दबी है जड़
उसके अहसासों की
नमी को सहेजे हुए।
-ऋता
3
मौज
उम्मीदों की खूँटी पर
ना उम्मीदों के वस्त्र टांगकर
मौज करना चाहती हूँ
मैं हर सोच से परे जाना चाहती हूँ।
रुई के फाहों जैसे उड़ते
नादान स्वप्न की तितली
धूप में खड़े गुलमोहर पर
बैठती फिर उड़ जाती
एक मुट्ठी छाँव की तलाश में
आकाश को
बादलों से ढक देना चाहती हूँ।
हाँ, मैं मौज से जीना चाहती हूँ।
कलकल नदियाँ
शोर नहीं करतीं
बहती जाती निश्चित रिदम में
मन मे बहती नदियों को
बांध कर रिदम देना चाहती हूँ।
बस, मौज से जीना चाहती हूँ।
जिंदगी नाम है
संघर्ष त्याग और प्रेम का
यह पाठ लिखा किसने
किसके लिए लिखा
अब बदल देती हूँ परिभाषा
तुम सब कुछ रख लो
अपनी मौज मुझे दे दो।
सही समझे
मैं भी मौज से जीना चाहती हूँ।
मौसम के अपने जलवे
अपने राग होते हैं
जो इन्हें हू ब हू जी ले
बड़े भाग्य होते हैं
मैं हवा बन जाना चाहती हूँ
फूलों से खुशबू लेकर
कायनात में बिखरना चाहती हूँ।
हाँजी हाँ,
मैँ मौज से जीना चाहती हूँ।
-ऋता

बुधवार, 28 मार्च 2018

हैप्पी जर्नी

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हैप्पी जर्नी
--------------
जब भी कोई जाता है
सुदूर यात्रा पर
गाड़ी रेलगाड़ी
या हवाई जहाज से
दही खिलाकर बोलते
हैप्पी जर्नी

यह एक दुआ है
जो कवच बनने की
रखती है ताकत
एक विश्वास है
हादसों से परे
सुरक्षा का
यह संदेश है
उस परमपिता को
कि वापस भेजना होगा
परिजनों को सहेजना होगा।

जब उतर जाती है
पटरी से रेल
या लैंडिंग में
बिगड़ जाता है संतुलन
तब महसूस होता है
ईश्वर के अस्तित्व का
कुछ को मिलता जीवनदान
कुछ निकल जाते
अंतिम सफर को
और
हम कह नहीं पाते
हैप्पी जर्नी|

जिन्हें मिल जाता
जीवनदान
उनकी आस्था
पक्की हो जाती
तकदीर पर।

आखिर आदमी के पास
यदि कोई है चमत्कार
तो वह है शुभकामनाओं का।
दिल से मिले
दिल से हो स्वीकार
परमात्मा सोचेंगे
हर हादसे के पहले
सौ बार
सौ सौ बार !
-ऋता

मंगलवार, 27 मार्च 2018

गाँव की पगडंडी

गाँव की पगडंडी
खड़ी बोली/देशज बोली
हिंदी/मागधी
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बिहान* होते ही
खुश हो जाती
मेरे गाँव की पगडंडी

बैलों की जोड़ी देखकर
खेत की मोड़ी देखकर
हरियर दुब्बी* से खेलकर
खुश हो जाती
मेरे गाँव की पगडंडी

ननका ननकी* खेले डेंगा पानी*
घुप्पी* में पिलाएँ* गोली*
पिट्टो* खेल में ढेर* दौड़ाते
सुनकर प्यारी मगही* बोली
खुश हो जाती
मेरे गांव की पगडंडी

किसानों की मेहरारू* लातीं
अँचरा* में सत्तू और रोटी
उठती सोंधी सोंधी खुशबू
पायल की रुनझुन रुनझुन से
खुश हो जाती
मेरे गांव की पगडंडी

दलान* में दादी सुड़कती*
लोटा भरकर चाय
दादा जी खंखार* के रखते
घर के भीतर पाँव
लजाती नई बहुरिया*
खुश हो जाती
मेरे गांव की पगडंडी

पीपर* के फेरे लगते
अमा सोम जब होता
बड़* के पेड़ होते निहाल
बरसाइत* पूजा में
बेटी नथिया* पहनी गोर* रंगी
खुश हो जाती
मेरे गाँव की पगडंडी

इन्जोर*होते ही तुलसी पूजा
रोज साँझ को दिया बाती
गोबर से नीपल* अँगना
खन खन बाजे माइ के कंगना
देख पवित्तर* घर को
खुश हो जाती
मेरे गाँव की पगडंडी

रात में लड़कन* गिनें तरेंगन*
रट्टा मारें गिनती पहाड़े*
जीमें* थरिया *में
बेर बेर* मइया को पुकारे
घर की रौनक से
खुश हो जाती
मेरे गांव की पगडंडी
-ऋता


अर्थ-------
बिहान-सुबह
हरियर दुब्बी-हरी दूब
ननका ननकी-बेटा बेटी
डेंगा पानी-ेएक खेल का नाम
घुप्पी*(छेद) में पिलाएँ*(डालें गोली*(कंचे)
पिट्टो-सतोलिया
ढेर-बहुत
मेहरारू-औरत
अँचरा-आँचल
दलान-बैठका
सुड़कती-चुस्की लेकर पीना
खँखार-खाँसकर
बहुरिया-बहु
पीपर-पीपल
बड़-बरगद
बरसाइत पूजा-वट सावित्री पूजा
नथिया-नथ
गोर-पैर
इंजोर-उजाला
नीपल-लीपा हुआ
पवित्तर-पवित्र
लड़कन-बच्चे
तरेंगन-तारा
पहाड़े-टेबल अंग्रेजी में
जीमें-खायें
थरिया-थाली
बेर बेर-बार बार

गुरुवार, 15 मार्च 2018

करना अगर है कुछ तुझे तो इन्क़िलाब कर

करना अगर है कुछ तुझे तो इन्क़िलाब कर
छोड़े जो छाप, उम्र को ऐसी किताब कर

कीमत बहुत है वक़्त की जेहन में तू बिठा
बेकार बात में न समय को ख़राब कर

ये ज़िंदगी तेरी है तेरी ही रहे सदा
शिद्दत से तू निग़ाह को अपनी रुआब कर

शब भर रहेगा चाँद सितारे भी जाएँगे
लम्हे बिताए जो यहाँ उनका हिसाब कर

मुस्कान से सजा रहे मुखड़ा तेरा सदा
कुछ देर के लिए तू ग़मों से हिजाब कर

-ऋता शेखर 'मधु'

सोमवार, 12 मार्च 2018

नाज करो कि तुम नारी हो

नाज करो कि तुम नारी हो
नाज करो कि सब पर भारी हो
नाज करो कि तुमसे संसार है
नाज करो कि धुरी के साथ हाशिया भी हो
इतनी संपूर्णता किसे मिलती है


तुम बया हो जो खूबसूरत नीड़ बुनती है
गर आंधियों में बिखर भी गए
तो सम्बल और धैर्य चुनती हो
दुआ तुम्हारी प्रभु भी स्वीकारते
इतनी संपूर्णता किसे मिलती है

तलवों के नीचे की जमीन
शुष्क रूखी कठोर हो
या फिर मखमली शीतल दूब हो
नमी के साथ उर्वर रखती अहसास
इतनी संपूर्णता किसे मिलती है

पहाड़ जैसी अडिग हो
गलत को गलत कहने के लिए
नदी जैसी निर्मल हो
निश्छलता से बहने के लिए
इतनी संपूर्णता किसे मिलती है

एक कर में नवजीवन रखती
दूजा कर सेवा को समर्पित
तीजे कर में ई गैजेट्स संभालती
चौथा कर कलम को अर्पित
इतनी संपूर्णता किसे मिलती है

मधुर स्वरों की मालकिन तुम
हर क्षेत्र तुम्हीं से सज्जित है
आखिर क्यों फिर आधी दुनिया
तुम्हारे जन्म से लज्जित है
इतनी अपूर्णता भी किसे मिलती है

नाज करो कि नारी हो
-ऋता

शनिवार, 10 मार्च 2018

नारी

महिला दिवस विशेष रचना-दोहे
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नारी से ही रीत है, नारी से है प्रीत।
नारी से है सर्जना, नारी सुन्दर गीत।।


एक वृत्त के केंद्र में, नारी का संसार।
प्रेम त्याग के भाव से , देती है आकार।।

रिश्तों को सम्भालती, बन माला की डोर।
नारी से है अर्चना , तुलसी भावविभोर ।।

बस थोड़े सम्मान से, बन जाती है फूल।
कोमल मन की भावना, सह लेती हर शूल।।

मातृ रूप में है दुआ, बहन रूप में प्रीत।
पुत्री रूप अहसास का, पत्नी रूप है मीत।।

नर विस्तारित कीजिये, अपने मन का कूप।
वर्णित है हर वेद में, सरस्वती का स्वरूप।।

नदी पहाड़ धरा गगन, सभी जगह है राज।
खुल कर के अपनाइए , नारी की परवाज़।।

-ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 6 मार्च 2018

वक्त का बदलाव

वक्त का बदलाव
"जहाँ देखो सिर्फ बेटियों के लिए ही स्लोगन बन रहे।
मेरी बेटी मेरा अभिमान।
बेटी पढ़ाओ बेटी बढाओ।
बेटियों से संसार है....हुंह"
ननद रानी की बातें सुनकर सुहासिनी मुस्कुरा रही थी।
"तो इसमें दिक्कत क्या है जीजी। बेटियों को तो बढ़ावा मिलना ही चाहिए।"
"पर इस तरह के नारे बनाने की क्या जरूरत है। क्या बेटे वाले अपने बेटों पर अभिमान नहीं करते।" अब सुहासिनी दो बेटों वाली नन्दरानी का दर्द समझ रही थी।
"और बेटा या बेटी पैदा करना अपने हाथ में है क्या" जीजी अब भी बोले जा रही थीं।
"यही बात सदियों से कही जा रही। पर कहने वाले बदल गए। है न जीजी" सुहासिनी को वो दिन याद आ गया जब दूसरी बिटिया के जन्म पर बुरा सा मुँह बनाकर जीजी ने कहा था,"फिर से बेटी" ।
जीजी को भी शायद वही बात याद आयी थी इसलिए नजरें बचते हुए वहाँ से दूसरे कमरे में चली गईं।
-ऋता शेखर "मधु"

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

शापित फल्गु-लघुकथा


शापित फल्गु

"माँ, यहाँ तो रेत ही रेत है, फिर इसे नदी क्यों कहते हैं।" रेत पर बैठी मैनेजमेंट पढ़ रही प्रज्ञा पूछ रही थी।

"बेटे, यहाँ गड्ढा करोगी तो पानी निकल आएगा। कहते हैं इस फल्गु नदी को सीता माता ने श्राप दिया था । नदी ने सीता माता के सच की गवाही न देकर गुप्त रखा इसलिए नदी का जल भी गुप्त हो गया।"

"अच्छा! पर कौन सा सच माँ ," प्रज्ञा ने विस्मय से देखते हुए पूछा।

" जब श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वनवास पर थे तभी राजा दशरथ की मृत्यु हो गयी थी। हिन्दू रिवाजों के अनुसार वे तीनों गयाधाम में राजा दशरथ की आत्मा की मोक्षप्राप्ति के लिए तर्पण करने गए। समय निकला जा रहा था किन्तु राम और लक्ष्मण सामान लेकर लौटे नहीं थे। तब दशरथ की आत्मा ने सीता से तर्पण की माँग की। सीता ने श्वसुर के लिए बालू का पिंड बनाकर दान दिया और नदी को गवाह बनाया। राम के आने पर सीता ने सारी बात बताई किन्तु राम को विश्वास नहीं हुआ। सीता ने नदी से सच बताने को कहा पर वह चुप रह गयी। तब दशरथ की आत्मा ने आकर सच बताया। राम को विश्वास हो गया। किन्तु नदी के व्यवहार पर सीता ने क्रोधित होकर श्राप दिया।"

"बहुओं के नसीब में हमेशा अविश्वास ही क्यों रहता है माँ ? भाभी दिनभर आपकी और पापा की कितनी सेवा करती हैं। फिर भी हर शाम उनको भैया के संशय भरे सवालों का जवाब देना पड़ता है। जब एक मृत आत्मा बहु के तर्पण को स्वीकार कर उसका साथ दे सकती है तो जीवित आत्माएं क्यों चुप रह रह जाती हैं माँ ? अब मैं भाभी की आत्मा को दुःखी नहीं होने दूँगी। मुझे सच की गवाही देनी होगी माँ। मैं फल्गु नहीं बनूँगी।"

-ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ !!



करती समर्पित काव्य उनको, देश हित में जो डटे|
वे वेदना सहते विरह की, संगिनी से हैं कटे ||


दिल में बसा के प्रेम तेरा, हर घड़ी वह राह तके|
लाली अरुण या अस्त की हो, नैन उसके नहिं थके||

जब देश की सीमा पुकारे, दूर हो सरहद कहीं|
इतना समझ लो प्यार उसका, राह का बाधक नहीं||

तुम हो बहादुर, ओ सिपाही, याद उसकी ले चलो|
संबल वही है जिंदगी का, साथ में फूलो फलो||

आशा, कवच बन कर रहेगी, बात यह बांधो गिरह|
तुम लौट आना एक दिन तब, भूल जाएगी विरह|

फिर मांग में भर के सितारे, वह सजी तेरे लिए|
अर्पण करेगी प्रीत अपना, आँख में भर के दिए||

ले लो दुआएँ इस जहाँ की, भूल जाओ पीर को|
आबाद हो संसार तेरा, अंक भर लो हीर को||

जब जब तिरंगा आसमाँ में, शान की गाथा लिखे|
हम सब नमन करते रहेंगे, वीर, तुम मन में दिखे ||
....................ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

आत्मबोध जागृत रहे, कर में हो संघर्ष--दोहे

जब छाए मन व्योम पर, पीर घटा घनघोर|
समझो लेखन बढ़ चला, इंद्रधनुष की ओर||

दिशा हवा की मोड़ते, हिम से भरे पहाड़।
हिम्मत की तलवार से, कटते बाधा बाड़।।

खुशी शोक की रागिनी, खूब दिखाते प्रीत।
जीवन के सुर ताल पर, गाये जा तू गीत।।

शब्द शब्द के मोल हैं, शब्द शब्द के बोल।
मधुरिम बात विचार से, शब्द हुए अनमोल||

नफऱत कभी न कीजिये, ना कीजे अभिमान।
घुन समान खोखल करे, मन के सारे ज्ञान।।

हरे भरे मन खेत पर, उगे ज्ञान का धान।
छल के खरपतवार से, कुंठित होता मान।।

जग के माया मोह में, आते खाली हाथ।
सखा बना लो पुण्य को, वही चलेंगे साथ।।

आत्मबोध जागृत रहे, कर में हो संघर्ष|
आत्मशक्ति लिखती रही, जीवन का उत्कर्ष||

भाई है इक छोर पर, बहना दूजी ओर|
ये मीलों की दूरियाँ, पाटें रेशम डोर||

लिखने को तो सब लिखें, रचते हैं कुछ चंद।
छोड़े गहरी छाप जो, वही है प्रेमचंद।।

ज्ञानी ध्यानी नम्र हो, फिर भी करना शोध।
छीने आधी बुद्धि को, तेरा अपना क्रोध ।।

बात बात पर दे रहे, फूलों की सौगंध।
बगिया मुरझाने लगी, खोकर अपनी गंध।

बहु रंगों को धारता, कृष्ण मयूरी पंख।
श्याम दरस की आस से , विकल बजावे शंख।।

अफ़रातफ़री से कहाँ,होते अच्छे काम।
सही समय पर ही लगे,मीठे मीठे आम||
--ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 14 जनवरी 2018

बिसात जीवन की














देखो बंधु बाँधवों,
जिंदगी ने बिछायी है
बिसात शतरंज की
बिखरायी है उसने
मोहरें भाव-पुंज की
श्वेत-श्याम खानों के संग
दिख जाते सुख-दुःख के रंग
प्यादे बनते सोच हमारी
सीधी राह पर चलते हुए
सरल मना को किश्ती प्यारी
तीव्र चतुर दलबदलू ही
करते हैं घोड़ों की सवारी
व्यंग्य वाण में माहिर की
तिरछी चाल विशप कटारी
समयानुकूल वजीर बने जो
चाणक्य नीति के वो पिटारी
सबकी चालें सहता हुआ
बादशाह है हृदय बेचारा
नाप रहा उल्फ़त से पग
कैसे  विजय मिले दोबारा
विषयासक्त अनुरागी को
यह टकराव बना रहेगा
कुछ भी कर लो जेहनवालों
अज्ञानी से ठना रहेगा
पूर्वाग्रह के पिंजरे में बैठे
अजनबी  क्षितिज पर दिखते
हल्की सी भी ठेस लगे तो
यातना के नज़्म लिखते
ऐ जिंदगी,
छलिया बन तूने
हम सबको है नाच नचाया
बाँध के धागे भाव पगे
तूने सबसे रास रचाया
पर समझ लेना यह बात
मात हमें न दे पाएगी
मनु के अंतर्मन की शक्ति
तेरा हर घात सह जाएगी|
चालें चाहे हों जितनी शतरंजी
बस एक निवेदन करती हूँ
उनकी खुशियाँ खोने न देना
जिन रिश्तों पर मरती हूँ|
-ऋता शेखर ‘मधु’

शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

स्वप्नलोक


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स्वप्नलोक....


बचपन का वह स्वप्नलोक अब विस्मृत होता जाता है
जलपरियाँ जादुई समंदर सन्नाटे में खोता जाता है

सीप वहाँ थे रंग बिरंगे मीन का नटखट खेल था
सजा सजीला राज भवन जहाँ तिलस्म का मेल था

सजा सजीला एक कुँवर बेमिसाल इक राजकुमारी
प्रीत कँवल खिलते चुपके से छाती दोनो पर खुमारी

हस्तक दे दे हँसते थे वो इक दूजे की करें प्रतिष्ठा
प्रेम भरी आँखों में, दिखती रहती सच्ची निष्ठा

दूर कहीं से देखा करता सींगों वाला दैत्य भयानक
अशांति का दूत बड़ा वह बन जाता था खलनायक

एक दिवस ऐसा भी आया विपत्ति बन वह मँडराया
शहजादा बनकर आया और परी कुमारी को भरमाया

पल भर बीते तभी वहाँ पर राजकुमार की आई सवारी
विस्मित रह गई भोली परियाँ, थी अवाक वह राजकुमारी
*
ओह, जुदा होकर कैसे जीएँगे, नींद में वह धीरे से बोली
कौन जुदा होता है मुनिया, पूछी रही सखियों की टोली

झट उठ बैठी बिस्तर पर, अपनी बोझिल पलकें खोली
रब ऐसे सपने न देना जिसमें कोई, किसी की तोड़े डोली

इस प्रलाप से जन्म ले रही थी, कहीं पर एक कहानी
जब पुरातन वह हो जाएगी, इसे कहेगी बनकर नानी

ऋता शेखर ‘मधु’

बुधवार, 10 जनवरी 2018

संक्रांति की सौगात

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संक्रांति की सौगात
मकर संक्रांति के दिन सुषमा ने नहा धोकर तिलवा और गुड़ चढ़ाकर विष्णु पूजन किया| सास, ससुर, देवर, ननद पति,जेठ, जेठानी सबको प्रसाद दे आई| यह सब करते हुए वह अनमयस्क सी लग रही थी| सास की अनुभवी आँखों ने समझ लिया था उसकी उदासी का कारण| कल जबसे बड़ी बहु के मैके से मकर संक्राति की सौगात आई थी तब से सुषमा के चेहरे पर एक उदासी तिर गई थी| अभी चार महीने पहले ही उसकी माँ का स्वर्गवास हुआ था| पहले सुषमा के घर से भी मकर संक्रांति के उपहार आते थे| उसके शादीशुदा भाई को बहनों से कोई खास लगाव नहीं था इसलिए किसी सौगात की उम्मीद भी न थी|

‘सुषमा, खाना के बाद हमलोग छत पर पतंग उड़ाने जाएँगे| तुम भी तैयार हो जाना उस समय, पतंग खूब ऊँचे तक उड़ा लेती हो तुम’, सास की आवाज़ आई|

‘मगर माँजी, मेरी तबियत ठीक नहीं लग रही| शायद तैयार न हो पाऊँ’, सुषमा ने धीमे से कहा|

‘मन ठीक हो जाए तो आ जाना,’ कहकर सासू माँ अपने कमरे में चली गईं और जाते जाते सुषमा के पति को भी आने को कहा|

दोपहर कीं नींद सुषमा की आँखों को बोझिल बना रही थी| तभी डोरबेल बजी| कुछ पल सुषमा ने इन्तेज़ार किया कि कोई खोलेगा किन्तु शायद सब सो गए थे| सुषमा ने दरवाजा खोला| दरवाजे पर कोई पार्सल लेकर आया था| सुषमा ने देखा कि पैकेट पर उसका ही नाम था| उसे आश्चर्य हुआ तो जल्दी से उसने भेजने वाले का नाम देखा|

‘महेश वर्मा’ खुशी से लगभग चीख पड़ी सुषमा| पार्सल रिसीव किया और पैकेट खोलने लगी| तब तक सास और पति वहाँ आ गए थे|

‘ये क्या है, किसने भेजा’ लगभग एक साथ सास और पति पूछ बैठे|

‘भइया ने संक्रांति गिफ़्ट भेजा है’ चहकती हुई वह बोली,मैं पतंग उड़ाने छत पर अवश्य जाऊँगी|’’

सास और पति एक दूसरे की ओर देखकर मुस्कुरा दिए|


आधे घंटे बाद सब लोग तैयार हो चुके थे| तभी फिर से डोरबेल बजी|

“कौन होगा”, ये सोचती हुई सुषमा देवाजे पर गई| दरवाजा खोलते ही उसकी आँखें विस्फरित रह गईं|

‘भइया-भाभी, आप दोनो” अविश्वास से उसने कहा|

“और नहीं तो क्या, संक्रांति की सौगात ननद रानी को देना था न” कहते हुए भाभी ने सुषमा के हाथों में पैकेट पकड़ाया|

‘तो अभी जो पार्सल आया वो किसने भेजा’ सोचती हुई सुषमा भाई भाभी के साथ कमरे की ओर बढ़ी|

वहाँ सास और पति अर्थपूर्ण ढ़ग से मुस्कुरा रहे थे|

‘अच्छा, तो ये माँ-बेटे की मिलीभगत थी ’ सोचती हुई वह भी मुस्कुरा दी|

--ऋता शेखर ‘मधु’

बुधवार, 3 जनवरी 2018

नए साल पर....


यह नवगीत प्रतिष्ठित ई-पत्रिका "अनुभूति" के नववर्ष विशेषांक पर प्रकाशित है...यहाँ क्लिक करें |

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नए साल पर....
फिर से रमिया चलो गाँव में

लेकर अपनी टोली
छोड़ चलो अब महानगर की
चिकनी चुपड़ी बोली

नए साल पर हम लीपेंगे
चौखट गोबर वाली
अँगना में खटिया के ऊपर
छाँव तरेंगन वाली
श्रीचरणों की छाप लगाकर
काढ़ेंगे रंगोली

फिर से रमिया चलो गाँव में
लेकर अपनी टोली
बरगद की दाढ़ी पर चढ़कर
फिर झूला झूलेंगे
पनघट पर जब घट भर लेंगे
हर झगड़ा भूलेंगे
बीच दोपहर में खेलेंगे
गिल्ली डंडा गोली

फिर से रमिया चलो गाँव में
लेकर अपनी टोली

दिन भर मोबाइल को लेकर
कोई नहीं हिलता है
हर सुविधा के बीच कहें सब
समय नहीं मिलता हैं
धींगामस्ती को जी चाहे
सखियों संग ठिठोली

फिर से रमिया चलो गाँव में
लेकर अपनी टोली

अब गाँव में सभी वर्जना
हम मिलकर तोड़ेंगे
शिक्षा की नव ज्योत जलाकर
हर नारी को जोड़ेंगे
सुता जन्म पर हम डालेंगे
सबके माथे रोली

फिर से रमिया चलो गाँव में
लेकर अपनी टोली
_ऋता शेखर ‘मधु’

रविवार, 31 दिसंबर 2017

सभी ब्लॉगर मित्रों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ !!

सभी ब्लॉगर मित्रों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ !!

     ब्लॉग पर जितने भी मित्र हैं वो बहुत से बहुत तो बारह या तेरह वर्षों से ब्लॉग पर होंगे| ब्लॉग ने मन की बात कहने का सहज सरल रास्ता दिया| जो भावनाएँ या बातें पहले मन में घुटकर रह जाती थीं वो ब्लॉग के स्क्रीन पर उतरने लगी| जिन्हें जो फ़ील्ड पसंद था उसके अनुसार सबने ब्लॉग बनाएँ| कहानी, कविता, खेलकूद, समाचार...इस तरह के ब्लॉग बने| बलॉगर .कॉम ने ब्लॉग को फ़ौलो करने की सुविधा दी जिससे हम अपनी पसंद के लेखक और ब्लॉग्स तक पहुँचने लगे| शुरुआत के दिनों में हम सभी बहुत सक्रियता से एक दूसरे के ब्लॉग पर कमेंट दिया करते थे जो अब रास्ता बदलकर फेसबुक की ओर मुड़ गया है|  मित्रों...फेसबुक पर त्वरित कमेंट्स का लालच रहता है...पर हमें अपना पुरानी डायरी नहीं भूलनी चाहिए| नए वर्ष में हमे यह शपथ लेना चाहिए कि जितना समय हम फेसबुक पर बिताते हैं उसका आधा ब्लॉग पढ़ने में बिताएँ और वहाँ भी अपने विचार देकर संजीवनी का काम करें|

अभी भी जो ब्लॉग एग्रीगेटर सक्रिय हैं और नियमित रूप से लिंक लगाते हैं उन सभी को धन्यवाद देना चाहती हूँ जिनमें चर्चामंच, पाँच लिंकों का आनंद, ब्लॉग बुलेटिन आदि हैं| 

उनसभी मित्रों का दिल से आभार है जो कमेंट के जरिए उत्साह बढ़ा जाते हैं| पुराने ब्लॉगर मित्रों में आ० संगीता दी, रश्मिप्रभा दी,अनुलता राज नायर जी, मोनिका शर्मा जी, प्रियंका जी,अर्चना चावजी, दिलबाग विर्क जी, रूपचंद्र शास्त्री सर, सुशील जोशी जी, देवेन्द्र कुमार पाणडेय जी जो बेचैन आत्मा के नाम से लिखते थे, दिगम्बर नासवा जी, दिनेशचन्द्र गुप्ता सर, ओंकार जी,नीतू ठाकुर जी, ध्रुव सिंह जी, सुधा देवरानी जी, सदा जी, गगन शर्मा जी, पम्मी जी, अनु लागुरी जी, अमित जैन मौलिक जी,अभिषेक कुमार, नवीन जी......कुछ नाम छूट रहे.......आप सभी को बहुत बहुत धन्यवाद|

नव वर्ष में आप सभी को मनचाही खुशियाँ मिलें...हम सभी का साथ बना रहे , ईश्वर से यही प्रार्थना है|
-ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

नए गगन में अब लो पंछी, अपने पंख पसार||

सरसी छंद -- बढ़े देश का मान.....

नया साल लेकर आया है, पीत सुमन के हार|
नए गगन में अब लो पंछी, अपने पंख पसार||
हम बसंत के मस्त पवन में, गाएँ अपना गान|
झंडा ऊँचा रहे हमारा, बढ़े देश का मान||1||


हिम की नदिया जब पिघलेगी, फेनिल होगी धार|
सुर की देवी फिर छेड़ेंगी, निज वीणा के तार||
नीला नीला अम्बर होगा, होंगे प्रेम पराग |
मेघ नेह का जब उमड़ेगा, उमग उठेगा फाग ||2||


गले मिलेंगे भाई भाई, मिट जाएँगे द्वेष |
चैत्र माह में फिर पाएगा, अपना सूरज मेष ||
कोयलिया राग सुनाएगी, महक उठेंगे बौर |
फूलों की डोली लाएँगे, ऋतुओं के सिरमौर||3||


नारी मर्यादा लौटेगी, खुशियाँ होंगी पास|
जात पात का भेद न होगा, ऐसा है विश्वास ||
मानवता की चौखट पर, सुरभित होगा हर्ष |
दिल से दिल के तार बँधेंगे, आएगा नव वर्ष ||4||

*-ऋता शेखर ‘मधु’-*

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

सरकारी नौकरी के लिए रुझान-एक रिपोर्ट

     
पढ़ाई पूरी करने के बाद जब रोजी रोटी की बात आती है तो हमारे पास तीन विकल्प होते हैं|
1बहुराष्ट्रीय कम्पनी/प्राइवेट की नौकरी
2.सरकारी नौकरी
3.स्वरोजगार
फेसबुक पर मैंने एक वोटिंग कराई| वोटिंग सिर्फ एक दिन के लिए थी और सिर्फ मित्रसूची में शामिल मित्रों के लिए थी| जो उस वक्त ऑनलाइन हो पाए उन्होंने सहर्ष भाग लिया| वोटिंग का उद्येश्य यह जानना था कि भारत में किन नौकरियों के लिए क्या रुझान है | जितने लोगों ने और जिन लोगों ने अपने मत और मंतव्य दिये उसका एक ब्योरा प्रस्तुत कर रही हूँ|

कुल 56 लोगों की वोटिंग के आधार पर जो प्रतिशत निकले उनके अनुसार...

1बहुराष्ट्रीय कम्पनी/प्राइवेट की नौकरी—20%

2.सरकारी नौकरी..66%

3.स्वरोजगार..13%

1.सबसे पहले बात करते हैं बहुराष्ट्रीय कम्पनी की...

इतिहास-- भारत में विदेशी कम्पनियाँ तीन तरीके से कम कर रही है। पहला, सीधे अपनी शाखायें स्थापित करके, दूसरा अपनी सहायक कम्पनियों के माध्यम से, तीसरा देश की अन्य कम्पनियों के साथ साझेदार कम्पनी के रूप में।

8 विशालकाय ब्रिटिश कम्पनियाँ सन् 1853 से ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा भारत में घुसना शुरू हो गयी थीं।

आजादी के पूर्व सन् 1940 में 55 विदेशी कम्पनियाँ देश में सीधे कार्यरत थीं। आजादी के बाद सन् 1952 में किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार ब्रिटेन की 8 विशालकाय कम्पनियों के सीधे नियन्त्रण में 701 कम्पनियाँ भारत में व्यापार कर रही थीं। सन् 1972 के अन्त तक देश में कुल 740 विदेशी कम्पनियाँ थीं। जिनमें से 538 अपनी शाखायें खोलकर व 202 अपनी सहायक कम्पनियों के रूप में काम कर रही थीं। इनमें सबसे अधिक कम्पनियाँ ब्रिटेन की थीं। लेकिन आज सबसे अधिक कम्पनियाँ अमेरिका की हैं। समझौते के अन्तर्गत काम करने वाली सबसे अधिक कम्पनियाँ जर्मनी की हैं। 1977 में विदेशी कम्पनियों की संख्या 1136 हो गयी।

जून 1995 तक प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 3500 से कुछ अधिक विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ, अपनी शाखाओं या सहायक कम्पनियों के रूप में देश में घुसकर व्यापार कर रही हैं। 20,000 से अधिक विदेशी समझौते देश में चल रहे हैं।

लाभ-जब भारत बेरोजगारी से जूझ रहा था तब ये विदेशी कम्पनियों ने संजीवनी का काम किया| नौकरी के कई विकल्प उन्होंने दिए| सैलरी आकर्षक थी| समय की पाबंदी भी नहीं थी...जब मन करे ऑफिस जाओ, सिर्फ काम के घंटे पूरे होने चाहिए|

स्वतंत्रता भरा जीवन उन्हें अच्छा लगा| समय पर आत्मनिर्भर हुए|

विदेश जाने का मौका मिला|

श्रम की कद्र होती है

हानि- बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने भारत में महानगरों को अपना केंद्र बनाया जिसके फलस्वरूप बच्चे नौकरी करने के लिए अपने घर परिवार से दूर होने लगे| कई परम्पराएँ और संस्कार अनजाने ही विलुप्त होते चले गए| बाहर का पैकेज़्ड फुड खाकर उनके सेहत पर भी असर आने लगा| किराया का व्यापार बढ़ाने लगा जहाँ नौकरी वाले बच्चे एक साथ शेयर वाले घर लेने को मजबूर हो जाते|

हर वर्ष फायर किए जाते हैं कर्मचारी...यदि काम में

बुज़ुर्ग दम्पति अपने अपने शहरों में अकेले होते चले गये| छोटे बच्चे दादी-दादी और नाना-नानी से अलग हो गए |

वोट देने वाले मित्र---

1.Nivedita srivastava जी

2.Abhishek Jain जी

3.Rupa Madhav जी

4.Pawan Jain जी

5.Rochika Sharma जी

6.Arun Singh Ruhela जी

7.Sandeep Kumar जी

8.महिमा श्रीवास्तव ‘वर्मा’ जी

9.Ankit Khare जी

10.Udan Tashtari जी

11.Kanchan Aparajita जी

मित्रों के विचार उनके ही शब्दों में---
Arun Singh Ruhela- मैं मार्केटिंग मैनेजमेंट पढ़ाता हूँ , साथ ही इंजीनिरिंग के बच्चों को स्वरोजगार के लिए स्पेशल कोर्स (EDP) कराता हूँ ! अच्छी कम्पनी में प्लेस्मेंट हो तो शुरुवाती सालों में अच्छा है, बालक हीरा बन के निखरता है और दुनिया भर में उसके हुनर की माँग होती है !
Pawan Jain- फायर काम चोरों को,काम करो अच्छे पैसे लो,पर सरकारी नोकरी में काम न करने की आदत पड़ जाती ओर आपके काम की कोई कीमत नहीं।सरकारी नोकरी में कुव्यवस्था के जाल से मुक्ति नहीं।पर अब परिवर्तन हो रहा है।
Poornima Sharma- मुझे तो सरकारी नौकरी मिल गयी थी,लेकिन मेरे दोनों बेटों को सरकारी जॉब मिलने तक मल्टीनेशनल में काम करना पड़ा।पैसे कारण नहीं था,कारण था अनुभव प्राप्त करना।
महिमा 'श्रीवास्तव' वर्मा- निश्चित रूप से मल्टीनेशनल कंपनी में,, हमारे अनुसार ये इसलिए कि मेहनत अब दोनों ही तरह की नौकरी में है तो पहला कारण ये है कि आरक्षण के कारण कोई नुकसान नहीं होगा किसी योग्य और परिश्रमी व्यक्ति का. ,,दूसरा ये कि जरुरत के वक़्त नौकरी छोड़ सकते हैं,, बाद में मनचाहे वक़्त पर आप में योग्यता है तो फिर से मिल ही जाएगी.

2. सरकारी नौकरी—

वेतनमान और सीनियरिटी के अनुसार पगार

सुरक्षित भविष्य

किसी हादसा दुर्घटन में मृत सरकारी व्यक्ति के परिवार के एक सदस्य को नौकरी

ताउम्र पेंशन

काम से निकाले जाने का खतरा नगण्य

वोट देने वाले मित्र-

1.Mahfooz Ali जी

2.Vibha rani srivastava जी

3.Rashmi Prabha जी

4.रेखा श्रीवास्तव जी

5.Poornima Sharma जी

6.Anjali Agraval जी

7.सुश्री इंदु सिंह जी

8.Rekha Joshi जी

9.Kusum Shukla जी

10.Sanjay Kumar जी

11.Sandhya Tiwari जी

12.Priyanka pandey जी

13.Daisy jaiswal जी

14.Deepshikha sagar जी

15.Jagdish Vyom जी

16.Upasna Siag जी

17Dilbag virk जी

18.Manish Tyagi जी

19.Pooja Singh जी

20.मधु जैन जी

21.Vanphool Sharma Dadhich जी

22.धरणीधर मणि त्रिपाठी जी

23.Neilam Mahajan जी

24.कुमार गौरव अजीतेन्दु जी

25.Asha Singh जी

26.Pradyumn Sharma जी

27.Vinay Chaudhary जी

28.Ashok Yadav जी

29.Jyotsna Saxena जी

30.Mridula Pradhan जी

31.अंकिता कुलश्रेष्ठ जी

32. अराधना अराधना जी

33.Geeta Verma जी

34.Ratna Verma जी

35.Dheerendra Singh Bhadauriya जी

36. Meenakshi TapanSharma जी

सरकारी नौकरी के लिए मित्रों के विचार
Sadhana Agnihotri -सरकारी नौकरी सिर्फ़ आरक्षित वर्ग को ही मिलती है ,
ऐसे में अनारक्षित वर्ग प्राईवेट नौकरी करने को मजबूर है ।।
Dheerendra Singh Bhadauriya- kisi ki Naukri karna Mujhe pasand hai nhi. agar Karna pade to sarkari naukri karunga.

3.
Self Employment-स्वरोजगार
वोट देने वाले मित्र
1.Ashish Rai जी

2.Shashi Bansal जी

3.Shalini Srivastava जी

4.Mukesh Sharma जी

5.Sadhna Agnihotri जी

6.Sandhya Sharma जी

7.पूर्णिमा वर्मन जी

कुछ कह नहीं सकते
सीमा भाटिया


इस बारे में मित्रों के विचार उनके ही शब्दों में साझा कर रही हूँ|
Ashish Rai- उ वाली कहावत सुनी होगी, उत्तम खेती मध्यम बान , निषिध चाकरी भीख निदान।

Mukesh Sharma- वो व्यक्ति जिन्हें अपने कार्य कौशल तथा बुद्धिमता पर पूर्ण विश्वास है और अच्छा काम करते हुए लगातार आगे बढ़ने की ललक है, उन्हें निजी क्षेत्र ही भाता है । राजकीय उपक्रमों में आपको तरह-तरह के अड़ंगे लगाकर कार्य नहीं करने दिया जाता, क्योंकि ज्यादातर लोग काम करते नहीं है और किसी को करने भी नहीं देते । ऐसे लोगों ने बरसों बरस से सारी व्यवस्थाओ को घुन लगा दिया है और इन स्थितियों में कार्यशील व्यक्ति का दम घुटने लगता है एंवम वह स्वयं को असहाय सा महसूस करता है ।मैं स्वरोजगार को ही महत्ता दूँगा । इससे ना केवल आप सक्रिय ही रह पाते है, वरन अन्य लोगों के लिए भी रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की क्षमताओं में इज़ाफ़ा करते है ।
Sandhya Sharma- मैं भी स्वरोजगार को ही प्राथमिकता देने पसंद करूँगी, अपने साथ साथ अनेकों को रोजगार के अवसर देने का सामर्थ्य भी प्राप्त होता है।
पूर्णिमा वर्मन- स्वरोजगार... अपने हाथ जगन्नाथ और साथ ही साथ देश की सेवा और देश का निर्माण |
Udan Tashtari केरियर में और जीवन में हर वक्त एक चैलेंज जरुरी है कुछ भी बेहतर करने के लिए|
Mani Ben Dwivedi -मल्टी नेशनल नौकरी तो लोग तो मजबूरी में पसंद कर रहे है,,....सरकारी नौकरी में तो जिंदगी और टैलेंट सब आरक्षण के भेट चढ़ जा रहे हैं------मैं खुद भुक्तभोगी हूँ। मल्टीनेशनल में कम से आपकी योग्यता का तो क़दर होता है।
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ब्लॉगर मित्रों से अनुरोध है कि आप भी अपनी कीमती राय यहाँ कमेंट में दें|
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रविवार, 24 दिसंबर 2017

राह...


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राह....

राह अनगिन हैं जग में
राह का ले लो संज्ञान

कहीं राह सीधी सरल
कहीं वक्र बन जाती
कहीं पर्वत कहीं खाई
कभी नदिया में समाती
सभी पार कर लोगे बंधु
त्याग चलो अभिमान

कहीं मिलेंगे सुमन राह में
कहीं कंटक वन पाओगे
कहीं है मुनियों का बसेरा
कहीं चंबल से घबराओगे
धैर्य जरा रख लेना बंधु
खिलेगी होठों पर मुस्कान

दोराहे होते हैं मुश्किल
रुक कर सोचो पल दो पल
स्वविवेक का काम वहाँ है
अवश्य मिलेगा कोई हल
नम्र नीति अपनाना बंधु
जरा लगाकर ध्यान

राह अनगिन हैं जग में
राह का ले लो संज्ञान
--ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

न्यु इयर

न्यु इयर

माँ के स्वर्गवास के बाद अवनि को मैके जाने का मन नहीं होता था| फोन पर भाई भाभी हमेशा उसे बुलाते किन्तु वह उदासीन भाव से मना कर देती| उसे लगता कि अब सभी भाई बहनों का अपना अपना परिवार है तो वह किसी को डिस्टर्ब करने क्यों जाए| उस दिन भी फोन पर भाई से बातें हो रही थीं| भाई ने बात बात में बताया कि कुहू को पढ़ने में मन नहीं लगता है| हर समय या तो फोन पर बातें करती रहती है या फिर फेसबुक में उलझी रहती है| वह कैसे दसवीं की बोर्ड परीक्षा निकाल पाएगी|’
‘’तो फोन क्यों दे रखा है उसे’’ अवनि ने एकाएक बोला था|
‘क्या करूँ, दोस्तों के फोन आते हैं| मना करने पर पढ़ना छोड़कर बैठी रहती है,’’ भाई की आवाज में विवशता झलक रही थी| उसके बाद उसने फोन रख दिया|


“कुहू, अवनि बुआ का फोन आया है, वह आ रही हैं अभी एक घंटे में| उन्होंने कहा है कि वह नया साल हमलोगों के साथ ही मनाएँगी,” मम्मी बोल रही थी|
“अच्छा”, पल भर को कुहू का चेहरा प्रफुल्लित हुआ फिर बुझ गया|
‘वह भी तो पढ़ने का ही उपदेश देंगी ”, मन ही मन सोचकर वह फिर से मोबाइल लेकर बैठ गई|

बुआ के आने पर वह प्रणाम करके कमरे मे चली गई| परदे की ओट से अवनि ने देखा कि वह मोबाइल गेम खेल रही थी|
डिनर के लिए सब साथ ही बैठे|
‘अरे, तुमलोगों ने टीवी क्यों बन्द करके रखा हुआ है| कोई हास्य धारावाहिक लगाओ कुहू,” अवनि सहमे से माहौल को हल्का करना चाहती थी|
“वही तो“ कुहू की आवाज़ थोड़ी तल्ख़ थी|
भाई भाभी ने कुछ नहीं कहा| हास्य धारावाहिक देखते हुए सब खाना खाने लगे| धीरे धीरे माहौल हल्का हुआ| कुहू का तनावपूर्ण चेहरा फूल के समान खिल गया|
“कुहू बेटा, तुम्हारी परीक्षा कब से है?”अवनि ने अब पूछना उचित समझा|
“फर्स्ट मार्च से” कुहू के नजरें नीचे करके कहा|
“अच्छा, मतलब अगले साल”, हँसते हुए अवनि ने कहा|
“क्या बुआ...अगला साल आने में कुछ घंटे ही तो बचे है”, खिलखिला पड़ी कुहू|
“ हाँ, उसके पहले ही पढ़ाई पढ़ाई की रट लगाना बुरी बात है| खूब मस्ती करो, फोन पर बातें करो, वीडियो गेम खेलो, टीवी देखो, है न कुहू”, अवनि कुहू की आँखों में झाँकती हुई बोली|
“हाँ बुआ, ये सब करने से मेरा मूड फ्रेश हो जाता है और मैं ज्यादा मन लगाकर पढ़ पाती हूँ”, कुहू ने दिल की बात कही| भाई भाभी सिर झुकाए सुन रहे थे| वे अब समझ पा रहे थे कि उन्होंने कुहू पर जरूरत से ज्यादा पाबंदी लगाई हुई थी|

बहुत दिनों के बाद आज की सुबह कुहू को बहुत प्यारी लग रही थी|
“हैप्पी न्यु इयर बुआ’’ उठते ही कुहू ने अवनी को विश किया|
“हैप्पी न्यु इयर मेरी प्यारी कुहू’, उतनी ही गर्मजोशी से अवनि ने कहा और कुहू को गले से लगा लिया|
पीछे भाई खड़ा था जिसके चेहरे पर भी प्रसन्नता झलक रही थी|
“कुहू, कुछ देर मेरे पास बैठो”, अवनि ने चाय पीते हुए कहा|
“नहीं बुआ, इसी साल मेरी परीक्षा है और मैं समय नहीं बरबाद करना चाहती| मैं पढ़ने जा रही किन्तु आप अभी नहीं जाना बुआ, मुझे आपसे ढेर सारी बातें करनी हैं”, अवनि को एक चुम्मी देकर कुहू चली गई|
‘आपके आने से कुहू बहुत खुश है दीदी, वह आज खुद पढ़ने चली गई , यह तो चमत्कार जैसा लग रहा|’ भाभी की बात सुनकर अवनि मुस्कुरा दी|
“होता है ऐसा, बच्चे कभी कभी माता पिता का उपदेश सुनते सुनते ऊब जाते है और वही बात कोई और कहे तो समझ जाते हैं”, अवनि यह कहते हुए मन ही मन सोच रही थी कि मायके नहीं आने का उसका कदम कितना ग़ल़त था| माँ के बाद सबको देखने की जिम्मेदारी उसकी भी बनती थी|
-ऋता शेखर ‘मधु’
15/12/17

गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

धूप एक नन्हीं सी

धूप एक नन्हीं सी

धुंध को ठेल कर
हवा से खेलकर
धूप एक नन्हीं सी
धरती पर आई


बगिया के फूलों पर
ओज फैलाती है
फुनगी पर बैठकर
बच्चों को बुलाती है
सन्नाटों के भीड़ में
उनको न देखकर
कूद फांद भागकर
की है ढूँढाई

धूप एक नन्हीं सी
धरती पर आई

स्कूल की कोठरी में
पोथियों का ढेर है
अनगिन है सी एफ एल
दिखता अबेर है
नन्हें नन्हें हाथों से
कागज़ पर रंग रहे
सूरज की रौशनी
देख देख धूप को
आती रुलाई

धूप एक नन्हीं सी
धरती पर आई

खाट पर सास है
कुर्सी पर ससुर जी
अंदर के हीटर में
सीटर पर बहूजी
एप को खोलकर
दुनिया से बतियाई
दिखती नहीं कहीं
ननद भौजाई

धूप एक नन्हीं सी
धरती पर आई

चावल हैं चुने हुए
दाल भी भुने हुए
लहसुन की कलियाँ
छीलकर मँगवाई
कटे हुए कटहल में
मसालों के चूरन से
कूकर में झटपट
सब्जी बनाई
देती है बार बार
थकन की दुहाई

धूप एक नन्हीं सी
धरती पर आई
--ऋता शेखर "मधु"

कोमल घरौंदे रेत के वो, टूटकर बिखरे रहे-हरिगीतिका

नौका समय की जब बनी वो, अनवरत बहने लगी |
मासूम बचपन की कहानी, प्यार से कहने लगी ||
कोमल घरौंदे रेत के वो, टूटकर बिखरे रहे |
हम तो वहीं पर आस बनकर, पुष्प में निखरे रहे ||1||

तरुणी परी बन खिलखिलाई, चूड़ियों में आ बसी |
अनुराग की वो प्रीत बनकर, रागिनी में जा बसी ||
वो बंसरी में बंदिनी थी, कृष्ण की राधा बनी |
नक्षत्र सत्रह में मिली वो, रात अनुराधा बनी ||2||

सजनी सजन को भा रहा अब, श्रावणी पावन पवन |
दौलत बना है तर्जनी में, वो अँगूठी का रतन ||
बुलबुल बनी पीहर गई वो, डाल पींगें झूलती |
‘’मेरा बसेरा है कहाँ अब’’, टीस को वो भूलती ||3||

नानी बनी, आया बुढ़ापा, लौट आया बचपना |
बढ़ती लकीरों में सजाई, नित नई अभिकल्पना ||
गुड़िया बना गुझिया पिरोती, और कहती थी कथा |
संसार में अनमोल बनना, ना झगड़ना अन्यथा ||4||
-ऋता शेखर ‘मधु’

बुधवार, 13 दिसंबर 2017

करामात होती नहीं ज़िन्दगी में



निग़ाहों की बातें छुपाने से पहले
नज़र को झुकाए थे आने से पहले

नदी के किनारे जो नौका लगी थी
बहुत डगमगाई बिठाने से पहले

जो आज़ाद रहने के आदी हुए थे
बहुत फड़फड़ाए निभाने से पहले

करामात होती नहीं ज़िन्दगी में
पकड़ना समय बीत जाने से पहले

बहन की दुआ आँक पाते न भाई
कलाई पे राखी सजाने से पहले

दफ़ा हो न जाए सुकूँ ज़िन्दगी का
ऋता सोचना आजमाने से पहले

ऋता शेखर 'मधु'

122*4

गुरुवार, 30 नवंबर 2017

जिंदगी में हर किसी को है किसी का इन्तिज़ार

इन्तिज़ार

सर्वशक्तिमान को है बंदगी का इन्तिज़ार
जिंदगी में हर किसी को है किसी का इन्तिज़ार

लाद कर किताब पीठ पर थके हैं नौनिहाल
'वो प्रथम आए', विकल है अंजनी का इन्तिज़ार

पढ़ लिए हैं लिख लिए हैं ज्ञान भी वे पा लिए हैं
अब उन्हें है व्यग्रता से नौकरी का इन्तिज़ार

बूँद स्वाति की मिले, समुद्र को लगी ये आस
तलछटी के सीप को है मंजरी का इन्तिज़ार

ब़ाग़वाँ को त्याग कर विदेश को जो चल दिये हैं
निर्दयी वो भूल जाते भारती का इन्तिज़ार

--ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 22 नवंबर 2017

रास्तों को ग़र्द से पहचान लेती मुफ़लिसी

ग़ज़ल

बेबसी की ज़िन्दगी से ज्ञान लेती मुफ़लिसी
मुश्किलों से जीतने की ठान लेती मुफ़लिसी


आसमाँ के धुंध में अनजान सारे पथ हुए
रास्तों को ग़र्द से पहचान लेती मुफ़लिसी

बारिशों में भीगते वो सर्दियों में काँपते
माहताबी उल्फ़तों का दान लेती मुफ़लिसी

भूख की ज्वाला बढ़ी तब पेट पकड़े सो गए
घ्राण से ही रोटियों का पान लेती मुफ़लिसी

धूप को सिर पर लिए जो ईंट गारा ढो रहे
वो ख़ुदा के हैं क़रीबी मान लेती मुफ़लिसी

ठोकरों से भी बिखर कर धूल जो बनते नहीं
पर्वतों से स्वाभिमानी शान लेती मुफ़लिसी

यह ख़ला है ख़ूबसूरत बरक़तें होती जहाँ
गुलशनों में शोख़ सी मुस्कान लेती मुफ़लिसी

-ऋता शेखर ‘मधु’

बुधवार, 15 नवंबर 2017

मन में जले जो दीप अक़ीदत का दोस्तो


नभ अब्र से भरा हो निहाँ चाँदनी रहे
तब जुगनुओं से ही यहाँ शबगर्दगी रहे

मन में जले जो दीप अक़ीदत का दोस्तो
उनके घरों में फिर न कभी तीरगी रहे

कटते रहे शजर और बनते रहे मकाँ
हर ही तरफ धुआँ है कहाँ आदमी रहे

आकाश में बची हुई बूँदें धनक बनीं
हमदर्द जो हों लफ़्ज़ तो यह ज़िन्दगी रहे

हर उलझनों के बाद भी ये ज़िन्दगी चली
बचपन के जैसा मन में सदा ताज़गी रहे

*गिरह
भायी नहीं हमें तो कभी चापलूसियाँ
मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे(ज़नाब निदा फ़ाज़ली)

-ऋता शेखर ‘मधु’
अब्र-बादल
निहाँ- छुपी रही
शबगर्दगी-रात की पहरेदारी

शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

बचपन के जैसा फिर यहाँ मंजर नहीं देखा

बचपन के जैसा फिर यहाँ मंजर नहीं देखा
गोदी हो जैसे माँ की, वो बिस्तर नहीं देखा

हिन्दू या मुसलमान में आदम यहाँ उलझे
हों सिर्फ़ जो इंसान वो लश्कर नहीं देखा

धरती पे लकीरें हैं दिलों में हैं दरारें
काटे जो समंदर वही नश्तर नहीं देखा

बिखरे जो कभी गुल तो, रहे साथ में ख़ुशबू
जो तोड़ दे जज़्बात वो पत्थर नहीं देखा

शीरीं हो ज़ुबाँ और मुहब्बत की अदब हो
संसार में उसको किसी का डर नहीं देखा
-ऋता शेखर ‘मधु’

मंगलवार, 7 नवंबर 2017

पत्ते और फूल

पत्ते और फूल

दोनों संस्कारी थे। दोनों पढ़े लिखे थे। दोनो अपने घर के बुजुर्गों के लिए समर्पित थे।दोनो बच्चों की भलाई के लिए उन्हें पर्याप्त समय देते थे। दोनो अपने अपने कार्यस्थल के कुशल अधिकारी थे। मानव स्वभाव के एक पहलू का अतिरेक उनकी अच्छाइयों के ऊपर काली कम्बल डाल देता। अपनी अपनी बातों के ऊपर डटे रहने की उनकी आदत कई बार भीषण बहस का रूप धारण कर लेती जिस कारण माहौल सहम जाता घर का। घर के बुजुर्ग और बच्चे मौन होकर दुबके हुए से दिखाई देते।
उस दिन उनकी छुट्टी थी। किसी बात पर बहस जारी थी।अचानक जोर की आँधी चलने लगी। गरिमा ने घर की खिड़कियाँ बंद कर दीं किन्तु आंधियों का शोर तब भी दरवाजों को बेधकर अंदर आ रहा था। विवेक भी अपने कमरे की खिड़की से आंधियों का जायजा ले रहे थे।
जब आँधियाँ थम गईं तो गरिमा ने चाय बनाई। एक कप विवेक को थमा कर खुद बालकनी में खड़ी हो गई।
विवेक भी कप लिए वहीं पर आ गए।
पीछे छठी क्लास में पढ़ने वाली छोटी बबली भी आ गई।
" ममा, ये आँधियाँ शोर क्यों करती हैं।"
" जब हवाएँ खुद पर काबू नहीं रख पातीं तो उनके आवेग शोर का रूप धारण कर लेते हैं। "
विवेक ने बबली के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।
" हाँ, पापा, मैंने भी देखा कि पेड़ की डालें एक दूसरे से खूब टकरा रही थी", बबली ने बालसुलभ बात कही।
" हाँ, अब देखो, दोनो डालें धीरे धीरे हिलकर कितनी अच्छी हवा दे रही," इस बार गरिमा ने उत्तर दिया।
"किन्तु उनके टकराने से पुराने पत्ते और फूल जमीन पर गिर गए न।"
इसका जवाब दोनो में किसी ने नहीं दिया।
-ऋता शेखर मधु

शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

कोमल हथेली

कोमल हथेली
छह महीने बाद नौकरी से घर लौटे हुए पति अविनाश ने एकांत होते ही रमोला का हाथ पकड़ना चाहा, किन्तु यह क्या! रमोला ने हाथ परे करते हुए मुस्कुराकर पति को गलबहियाँ डाल दी| अविनाश को रमोला का व्यवहार कुछ अजीब सा लगा|
''ठीक तो हो'' अविनाश ने प्यार से पूछा|
''जी, बिल्कुल ठीक हूँ'', कहते हुए उसके थरथरा गए होंठ और आँखों में आई नन्हीं बूँद ने उसके झूठ की चुगली कर ही दी|
अविनाश ने गले से उसकी बाँहों को हटाते हुए हथेली पलट दी उसकी| चिथड़ी हथेलियों ने सच की गवाही दे दी|
शादी के सिर्फ एक वर्ष ही हुए थे| नौकरी पर रहने का इन्तेजाम ठीक से नहीं कर पाया था तो घरवालों के पास ही पत्नी को छोड़ गया था|
रमोला का हाथ पकड़े पकड़े वह माँ के पास गया|
''माँ, कमली कहाँ है? दिख नहीं रही|''
''बेटा, उसे काम छोड़े तो छह महीने हो गए|''

अविनाश के सामने सब कुछ स्पष्ट हो गया|
''माँ, इस छुट्टी के बाद जाऊँगा तो रमोला को साथ ले जाऊँगा|''
''क्यों बेटा, हमसे कोई भूल हुई क्या|''
''नहीं, भूल तो मुझसे हुई| रमोला के पिता ने मुझे कोमल हथेली सौंपी थी| इन हथेलियों को कोमल रखना मेरी जिम्मेदारी है'', कहकर अविनाश ने माँ के सामने रमोला की हथेली फैला दी|
-ऋता शेखर 'मधु'

07/10/17
आश्विन शुक्ल तृतीया-२०७४

शनिवार, 28 अक्टूबर 2017

रसकदम-लघुकथा



रसकदम
========
‘’पिता जी, अपना मुँह खोलिए| मैं आपके पसंद की मिठाई लाई हूँ| एक गप्प और रसकदम मुँह के अन्दर|’’


‘’अरे, ये क्या कर रही हो स्निग्धा| तुम्हे पता है न कि पिताजी को डायबिटीज है फिर भी मिठाई...’’ सामने पिता का मुँह खुला ही रह गया और मिठाई स्निग्धा के हाथ में रह गई|

पिता की आँखों में छलक आए आँसूओं ने जाने कितना कुछ कह दिया|
‘’भइया, डायबिटीज के नाम पर किसी की क्षुधा को इस तरह कल्हटाना अच्छी बात नहीं| बीमारी एक ओर है और कठोरता एक ओर| आप दस की जगह बारह युनिट इंसुलिन दे देना...पर भइया , पिता जी को ऐसे न तरसाओ|’’

‘’अच्छा, तो अब तुम मुझे सिखाओगी|’’

‘’ठीक है, नहीं सिखाती| पिता जी को मिठाई भी नहीं देती| पर मैं आपके पसंद की पैटीज़ भी लाई हूँ| अब आप अपना मुँह खोलो|’’

‘’अरे, ये क्या कर रही स्निग्धा| तुम्हें पता है न तुम्हारे भइया का कोलेस्ट्रॉल बढ़ गया है| पैटीज खिलाकर जान लोगी उनकी,’’ भाभी ने टोका|

अचानक स्निग्धा को लगा कि आज वह सिर्फ गल्तियाँ ही कर रही|

‘’स्निग्धा, पैटीज़ दो मुझे, मैं आज रोज से ज्यादा टहल लूँगा और कुछ ज्यादा कैलोरी बर्न कर लूँगा| और वह रसकदम भी दो मुझे|’’

‘’पिता जी, मुँह खोलिए|एक गप्प और रसकदम मुँह के भीतर|’’

‘’भइया, ये क्या|’’

‘’अरे पागल, दो युनिट अधिक दे दूँगा, सब पच जाएगा|’’

भाभी मुस्कुराती हुई घर के अन्दर जा रही थीं स्निग्धा के लिए खाना लाने...आखिर पूरे दो साल पर ननदरानी भाईदूज में मायके आई थी|
--ऋता शेखर ‘मधु’

मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

साँझ ढले बिटिया पढ़ती है--छंद


मापनीयुक्त मात्रिक छंद -
1.
हरिगीतिका- गागालगा गागालगा गागालगा गागालगा

सूरज उगा ज्यों ही गगन में, कालिमा घटने लगी|
मन व्योम के विस्तृत पटल पर, लालिमा बढ़ने लगी||
कलकल सरित अपनी लहर में, गीतिका कहती रही|
पाषाण वाली राह पर भी, प्रेम से बहती रही|
-ऋता शेखर 'मधु'
=======================
मापनीयुक्त वर्णिक छंद -
2.
तिलका- ललगा ललगा

यह दीप कहे
तम दूर रहे
हिय प्यार खिले
शुभ लाभ मिले
-ऋता शेखर 'मधु'
===================
3.
तोटक- ललगा ललगा ललगा ललगा

जब भोर हुई निखरी कलियाँ|
घट हाथ लिए जुटती सखियाँ||
बृजभान लली घर से निकली|
चुपके यमुना तट को तक ली||
-ऋता शेखर 'मधु'
===================
4.
दोधक- गालल गालल गालल गागा
साँझ ढले बिटिया पढ़ती है|
दीप तले सपने गढ़ती है||
मैं घर की अब शान बनूँगी
जीवन का इतिहास रचूँगी||
-ऋता शेखर 'मधु'
=================
5.
विद्याधारी- गागागा गागागा, गागागा गागागा

जो जागा सो पाया, जो सोया सो खोया|
जो बोया सो खाया, जो बैठा सो रोया||
आने वाला आता, जाने वाला जाता|
दीदी खेले खोखो, भाई सोलो गाता||
-ऋता शेखर मधु
======================
6.
चंचला- गाल X 4, गाल X 4
.आन, ज्ञान, मान संग, बेटियाँ बनीं महान|
राग, रंग, आसमान, वे बढ़ा रहीं वितान||
सैन्य के समूह बीच, ले उड़ीं बड़े विमान|
देख कोख शानदार, है निहाल खानदान||
-ऋता शेखर 'मधु'

***************************************

बुधवार, 11 अक्टूबर 2017

आसमाँ पर चाँद ढाला कौन है

आसमाँ पर चाँद ढाला कौन है
राह में दीपक जलाता कौन है

जा छुपी है बादलों में चाँदनी
इस कदर उसको डराता कौन है

उस किनारे एक साया है खड़ा
पूछने को हाल जाता कौन है

बतकही में आज माहिर हैं सभी
अब जहाँ में चुप से रहता कौन है

झूठ में लिपटे हुए किरदार सब
आइना सच का दिखाता कौन है

है पड़ी अपनी सभी को आज ‘मधु’
अब यहाँ रिश्ते निभाता कौन है
-ऋता शेखर ‘मधु’
2122 2122 212
काफिया-आ
रदीफ़-कौन है

सोमवार, 9 अक्टूबर 2017

छंदमुक्त- मैं गुलाब


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छंदमुक्त...
शाख से टूटा हूँ तो क्या
मेरा हुनर मेरे पास है
मेरे खुश्बुओं की तिजोरी
सूख कर भी महकती रहेगी
मैं काँटों से न घबराया कभी
न धूप में कुम्हलाया कभी
गुलदस्तों में सजता रहा
अर्थियों पर गिरता रहा
प्रेमियों की अभिव्यक्ति बना
जीवन दर्शन की युक्ति बना
मैं आभारी हूँ सृष्टि का
समग्रता के मिसाल में
खुश हूँ हर हाल में
यूँ तोड़कर मुझे
इतना न इतराओ
ओ पवन सुहानी!
तुम लेकर मेरी खुश्बू
वहाँ बिखरा देना
जहाँ होगा कोई बालक
रूठा रूठा सा
जहाँ होगी ममता
सिसकी सिसकी सी
तो जनाब, मैं हूँ गुलाब
शाख से टूटा हूँ तो क्या
मेरा हुनर मेरे पास है|
-ऋता शेखर 'मधु'

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

शरद पूर्णिमा

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1
चाँदनी युक्त
गर्वीला रूप तेरा
सम्पूर्ण तुम
आज की रात
तीन रंग की चुन्नी
ओढ़ ली मैंने
चन्दा, बता दे जरा
कहाँ है मीत मेरा।


2
खिलखिलाता
चन्द्रमा रुपहला
मुग्धा नायिका
पी के आलिंगन में
घूँट घूँट पी रही
अमृत धारा।

3
तुम्हे सताने
छुप जाती चाँदनी
तड़पे तुम
अमा में सारी रात
ऐ चाँद
कभी तुम भी तो कहो
अपने दिल की बात
4
शरद पूर्णिमा
चन्दा मामा की
सज धज निराली
लपका मुन्ना
खिलखिल कर
माँ ने बुलाया
आओ बेटा
चांदी की कटोरी में
खीर भरें हम सब
आएगी चाँदनी मामी
रूप और मिठास लिए
अंजुरी भर आस लिए।
--ऋता शेखर मधु

मुक्तक

बाँटना हो गर तुम्हें कुछ, बाँट दो शुभ ज्ञान को|
त्यागना हो गर तुम्हें कुछ, त्याग दो अभिमान को|
जिंदगी में हर कदम पर शुभ्रता शुचिता रहे,
वक्त देकर जब सहेजो वृद्ध की मुस्कान को|

-ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

निदान-लघुकथा


निदान

''रौल वन, टू, थ्री,फोर.....ट्वेन्टी सिक्स...''
''ये ट्वेन्टी सिक्स, अपराजिता स्कूल क्यों नहीं आ रही| पिछले पच्चीस दिनों से वह अनुपस्थित है''...हाजिरी लेते हुए ममता ने क्लास की लड़कियों से पूछा|
''उसकी शादी है दो दिनों बाद'' लड़कियों की ओर से आवाज आई|
''क्या !!, इतनी छोटी उम्र में शादी| सिर्फ चार महीने बाद उसे बोर्ड की परीक्षा देनी है|वह पढ़|ई में भी होशियार है| विद्यालय की उम्मीद टिकी है उसपर'' ममता को यह बात बिल्कुल भी हजम नहीं हो रही थी|
''मैम, इधर कई महीनों से जब वह स्कूल आती जाती थी तो कुछ लड़के उसे छेड़ते थे| वह रो देती थी|''
''तुमलोग उसके साथ क्यों नहीं जाती थी|''
''जाते थे, पर उनलोगों ने हमे डाँट दिया था कि ज्यादा साथ रहेगी तो तुमलोगों का भी स्कूल जाना मुश्किल कर देंगे|''
''अच्छा, उसके पिता क्या करते हैं''
''रिक्शा चलाते हैं|''
''हम्म, आज उसके घर ले चलना मुझे''
''जी मैम''
छुट्टी हुई तो ममता अपराजिता के घर गई| उसने देखा कि खिड़की से लगी वह खड़ी थी शून्य आँखों से ताकती हुई| ममता को देखते ही खुशी की लहर फेल गई चेहरे पर|
''मैम, मैं शादी नहीं करना चाहती| मुझे पढ़ना है| मुझे बचा लीजिए मैम|''
''मैम क्या करेंगी री| तू अपने घर चली जा, फिर जो जी चाहे करना'' कब पीछे उसका पिता आकर खड़ा हो गया ममता को पता नहीं चला|
ममता ने समझाने की कोशिश की किन्तु वह एक ही चीज बोले जा रहा था,''हमें अपनी बिटिया बहुत प्यारी है मैडम जी पर वे गुंडे खतरनाक हैं...''
शायद आगे कहने की जरूरत नहीं थी|
''अपराजिता, तुम्हारे नाम में ही विजय है, शादी के बाद पढ़ाई नहीं छोड़ना'', इतना कहकर वह उस बेबस शिष्या को छोड़कर जल्दी से बाहर निकल गई|इसका निदान कर पाने में वह खुद को असमर्थ महसूस कर रही थी|
ऋता शेखर 'मधु'





30/09/17