शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

दोहों के प्रकार-४ श्येन,५ मण्डूक,६ मर्कट,७ करभ दोहे

दोहे तेइस प्रकार के होते हैं...पिछले पोस्ट में तीन प्रकार के दोहे प्रकाशित हैं|
4- श्येन दोहा
19 गुरु और 10 लघु वर्ण

22 2 11 2 12 ,22 2 2 21
2 2 12 121 2, 222 1121

भोले फूल समेटते, प्यारी- प्यारी गंध।
ज्यों ही हवा चली वहाँ, टूटे हैं अनुबंध।।1

यादों की परछाइयाँ, यादों की है धूप।
चाहे रहे स्वरूप जो, भाते हैं हर रूप।।2

अच्छे राजन का सदा, होता है सम्मान।
साथी रही प्रजा जहाँ,होता देश महान।।3

दोनों ही उलझे रहे, लम्बाई को तान।
क्यों एक से लगे हमें, धागे और जुबान।।4

चारों ओर चली हवा, बागों में है शोर।
देखो उन्हें लुभा रही, जो जागे अति भोर।।5


टूटे पात जुड़ें नहीं, ऐसी ही है रीत।
साथी कभी न तोड़ना, रिश्तों वाली प्रीत।।6
--ऋता शेखर मधु

5.मण्डूक दोहा-

18 गुरु 12 लघु=48

112112212,1212221
22112212, 222221

जग में अपना कौन है, हुआ पराया कौन।
काँधे रख दे हाथ जो, या हो जाए मौन।।

मन निश्छल निष्पाप हो, तभी झुकाओ शीश।
जैसी जिसकी सोच हो, वैसा देते ईश।।

गुलमोहर के फूल ने, सदा सिखाई बात।
जो भी सह ले धूप को, संजोता औकात।।

--ऋता शेखर 'मधु'

6.मर्कट दोहा

17 गुरु 14 लघु=48

112211212,222221
112121212,2221121

जल ही जीवन का सदा, होता है आधार।
हर बूँद जो सहेज लें, लौटेगी जलधार।।1

मन को भावन से लगे, बंजारों के गीत।
लगता उन्हें पुकारते, जो खोए घर मीत।।2

जग में सुन्दर नाम हैं, या कृष्णा या राम।
दृग ढूँढते रहे उन्हें, घूमे थे जब धाम।।3

रवि डूबे जब झील में, सोये सारी रात।
मिलती हमें निशा सखी, होती जी भर बात।।4

बगिया में कलियाँ खिलीं, बासंती है राग।
मन बावरा उड़ा फिरे, ढूँढे ढोलक फाग।।5

-ऋता शेखर 'मधु'

7.करभ दोहा-

16 गुरु 16 लघु=48

112211212,21121121
12122212,1212221

पथ आसान मिले किसे, कौन रहे निष्पात।
इसे लिखा है ईश ने, हमें कहाँ है ज्ञात।।

पुरवाई चलने लगी, शीतल है अहसास।
छुईमुई सी पाँखुड़ी, भरे अनोखी आस।।

मत काटो उस पंख को, जो लिखते अरमान।
जहाँ पली हैं बेटियाँ, वहाँ बढ़ी है शान।।

घर आये ऋतुराज हैं, लेकर पुष्प हजार।
रचो सदा माँ शारदे, सुज्ञान का संसार।।

तन पीले परिधान से, आज सजा लो मीत।
उड़े परागी रंग हैं, रिझा रही है प्रीत।।

-ऋता शेखर 'मधु'

गुरुवार, 23 जनवरी 2020

मैं वापस आऊँगा -- कहानी

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मैं वापस आऊँगा

     हवाई जहाज ने टेक ऑफ़ के बाद स्थिर रफ़्तार पकड़ ली थी| जल्द ही श्वेत बादलों को टक्कर देती हुई ऊँची उड़ान भरने लगी|पूरे आठ घंटे का सफर था|
     आज घर से निकलने के कुछ देर पहले पिता जी सीढ़ियों से गिर गये थे| कोई फ्रैक्चर तो नहीं हुआ था पर चोट अच्छी खासी आई थी| एक्स रे करवा लेना जरूरी था इसलिए उन्हें लेकर अस्पताल गया और समुचित इलाज करवाकर वापस आया| घर में पत्नी नेहा ने सब कुछ व्यवस्थित करके रखा हुआ था|

“पिता जी, मेरा मन अब जाने का नहीं हो रहा| जाने से मना कर दूँ क्या,” मैं चिंतित था||

“अरे नहीं बेटा, चोट लगी है तो धीरे धीरे ही ठीक होगी न| तू निश्चिंत हो कर जा| नेहा है न , वह सब संभाल लेगी|

मैंने नेहा की ओर देखा|

“पिता जी ठीक कह रहे रहे हैं, मैं उनकी देखभाल कर लूँगी| आप चिंता न करें|” नेहा ने भी स्वीकृति दे दी| नेहा के सेवा भाव और जिम्मेदार स्वभाव से मैं चार वर्षों में परिचित हो चुका था इसलिए नेहा पर पूरा विश्वास था|
     इसी भागदौड़ में मुझे थोड़ी थकावट हो गयी थी| हवाई ड्डे पर सभी औपचारिकताओं के समय भी मैं थका थका महसूस कर रहा था| हवाई जहाज में बैठकर स्थिरता आते ही मैंने आँखें बन्द कर लीं| मेरा ख्याल था कि मुझे नींद आ जाएगी|पर मन के भीतर का संसार इतना विशाल होता है कि पलक बन्द करते ही मनुष्य वहाँ विचरण करने लगता है| कम्पनी की ओर से वह लंदन जा रहा था| वहाँ मेरे मित्र नें अपने घर आने का न्योता दे रखा था| आँखें बंद करते ही मुझे वह दिन याद आ गया जब उसने आई आई टी कम्पीट करने के बाद काउंसेलिंग के लिए कॉलेज परिसर में कदम रखा था| सबने अपने अपने ब्रांच का चयन किया| उसके बाद बारी थी हॉस्टल में रूममेट चुनने की| लगभग सबने अपनी जोड़ी ढूँढ ली थी| मेरे पिता निर्णय नहीं ले पा रहे थे| कुछ लड़के दिग्गज लग रहे थै, कुछ के माता पिता की अकड़ देखने लायक थी| तभी एक सीधा सा लड़का अपने माता पिता के साथ वहाँ पर आया|

“क्या आप मेरे बेटे ऋषि के साथ अपने बेटे को रखना चाहेंगे| ये बहुत ही सीधा है| आपका बेटा भी मासूम लग रहा|”

मेरे पिता ने झट से हामी भर दी| वहीं से सफर शुरू हुआ हमारे साथ का| हमारी जोड़ी खूब जमने लगी| चार वर्षों तक हमने अपनी सभी बातें शेयर करना सीख लिया| यह भी संयोग ही था कि कैंपस सेलेक्शन में नौकरी भी हमें एक ही कंपनी में लगी|

     हमने मुंबई में साथ ही एक फ्लैट किराये पर लिया और रहने लगे| फ्लैट में अक्सर उसके पिता आकर रहते थे| कानपुर में उनका बिज़नेस था| ऋषि उनका इकलौता पुत्र था|

एक दिन उन्होंने बातों ही बातों में बताया कि वे अब ऋषि की शादी करना चाह रहे|

“अंकल ,आपने लड़की पसंद कर ली क्या?”

“हाँ बेटा, वह मेरे एक मित्र की लड़की है| बहुत ही शालीन , मृदुभाषी और मिलनसार लड़की है| बचपन से ही देखा है उसे| उन्हैं भी ऋषि पसंद है| हमारा फैमिली बिजनेस भी सँभल जाएगा|”

“अरे वाह अंकल, ये तो बहुत अच्छी बात है| अब देर किस बात की| फटाफट बहू लाइए|”

उसके एक महीने बाद ऋषि की शादी हो गयी|

     उसके बाद ऋषि ने अपना स्थानान्तरण कानपुर में ही करवा लिया| मुझे बहुत खुशी थी कि अंकल को सहारा मिल गया था बेटे- बहू का| चूंकि कंपनी एक ही थी तो अचानक एक दिन मेल पर पढ़ा कि ऋषि विदेश जा रहा| मैंने झट से उसे फोन लगाया|

“यार, सुना कि विदेश में बसने की तैयारी हो रही| अपना देश क्या बुरा है यार|”

‘बात अपने देश की नहीं साहिल, जाना है तो जाना है|”

“ऐसा भी क्या हो गया, अंकल के बारे में भी तो सोच|”

“पापा को हमदोनों से बहुत ज्यादा चाहतें है यार, इससे हमारे रिश्तों में दरार आने लगी है|मैं घर का बिजनेस नहीं सँभालना चाहता| बहुत मेहनत से पढाई की है तो नौकरी ही करूँगा| मेरी पत्नी भी नहीं चाहती कि टिपिकल भारतीय बहुओं की तरह घर के काम काज और माँ की सेवा में समय बिताए|”

“तब उसी शहर में अलग रह, भाभी को समझा| देश छोड़ कर भागने से क्या तू खुद को माफ कर पाएगा|”

इसका ऋषि ने कोई जवाब नहीं दिया|

अगले दस दिनों में ही वह पत्नी के साथ विदेश चला गया|

     वह सीधा सादा लड़का क्या सच में अन्दर से उतना ही सीधा था या फिर अंकल ने ही कुछ ज्यादा उम्मीदें पाल ली थीं, इसका उत्तर नहीं दे पाता था मन मेरा|

अब जब मुझे भी लंदन जाने का मौका मिला तो मैंने अंकल को फोन किया|

“अंकल, मैं लंदन जा रहा हूँ| क्या आप कुछ देना चाहेंगे ऋषि के लिए?”

“बेटा, मैं कुछ भी दूँगा तो वह लेगा या नहीं, यह तो नहीं मालूम| हाँ, उसके कुछ छोटे कपड़े हैं, वह ले जाओ उसके बेटे के लिए|”

“अरे वाह! आप दादा बन गये और ऋषि ने बताया भी नहीं| छोटे कपड़े दे दीजिए| और अंकल, आपके लिए क्या लाऊँ?”

“बस, अपने मोबाइल में कुछ फोटो ले आना जिसमें पोते को देखकर संतोष कर लूँगा|”

“जी,”कहते हुए मेरी आँख भर आई|

मैं पुराने दिनों की यादों में खोया हुआ था तभी जहाज लैंड करने की सूचना दी गयी| ओह! पिछले चार वर्षों को याद करते हुए पाँच घंटे बीत चुके थे|

लंदन पहुँचते ही सीधे ऋषि के घर गया| आवभगत की पूरी तैयारी थी| गपशप में समय निकल गया| रात का खाना खाकर ऋषि की पत्नी रसोई समेटने लगी| मैं ऋषि से अकेले में बात करना चाहता था इसलिए उसे लेकर बाहर निकल गया|

“अब बता ऋषि, क्या अंकल आंटी की याद नहीं आती?”

शायद ऋषि को भी इसी सवाल का इन्तेजार था| पर उसने कहा कुछ नहीं| बहाने से आँखों के पास हाथ ले जाकर उसने बूँदों को थाम लिया|

“ऋषि, अंकल ने तेरे लिए कुछ भेजा है| बिना पूछे देने की हिम्मत नहीं हुई| क्या देखना पसंद करेगा?”

“हाँ”, संक्षिप्त उत्तर देकर वह वापस घर की ओर मुड़ गया|

मैंने वह पैकेट ऋषि को थमा दिया| उसे देखते हुए फिर वह स्वयं को रोक नहीं पाया और फूटफूट कर रोने लगा| उसकी पत्नी भी शांत बैठी थी|

“अंकल के लिए कुछ देना चाहोगे ऋषि?”

“क्या दूँगा”

“मैं बताऊँ’, कहते हुए मैंने वीडियो कॉल लगा दिया|

दोनों एकटक एक दूसरे को देखते रहे| मैंने उसके बेटे को भी सामने कर दिया|

उस वक्त शब्द जरूरी न थे|

विडियो बंद करने से पहले मैंने पूछा,’कुछ कहना है?”

“मैं वापस आऊँगा पापा,” अचानक ऋषि ने कहा|

वीडियो कॉल बन्द करके मैं अपने बिस्तर पर चला गया| कभी कभी किसी रिश्ते को सुधारने के लिए किसी तीसरे का प्रवेश भी जरूरी हो जाता है, यह सोचते हुए धीरे धीरे मेरी पलकें मुँदने लगी थी|

मौलिक एवं अप्रकाशित

ऋता शेखर ‘मधु’

३१/०८/२०१९

गुरुवार, 2 जनवरी 2020

वक़्त-- कविता

वक़्त
==============
ये वक़्त भी क्या शय है

कितना कुछ समेटती

कितना कुछ बिखेरती

जाने कितने वादे किए

सपनों की टेकरी में

जाने क्या क्या इरादे दिए

कहीं झंझावात देती

कहीं खुशियों को मात देती

वो मरज़ी रही उसी की

कुछ सुनहरे कुछ रुपहले

मित्रों से मुलाकात देती

इतिहास भी उसी से है

कई राज भी उसी में है

परत दर परत न उधेरो उसे

उसकी अपनी रफ़्तार है

कहीं मीठी कहीं खार है

कहीं किनारा या मझधार है

जरूरत है कि हमसब

उसी रफ़्तार में बढ़े चलें

हर पल बीतना ही है

हर दिन सूरज भी आएगा

इस सच के साथ

हम अंधेरों से न डरें

हम हारकर भी न रुकें

कहीं तो होगी ही

कालीन फूलों की

कदम उधर बढ़ते चलें

ये वक़्त है, वो वक़्त है

हर वक़्त की अपनी कहानी

कहीं लिखी गयी

कहीं है जबानी

वक़्त में सब कुछ समाया

कर्मों की पोटली हो

लगन की हो सजावट

शालीनता हो साथ

न जुबाँ में हो गिरावट

देखो ,सुनो

आने लगी है चौखटों पर

उमंगों की तेज आहट

----- ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 22 दिसंबर 2019

दोहों के प्रकार3- शरभ छंद

दोहों का सामान्य शिल्प 13-11 का होता है।
आंतरिक शिल्प के आधार पर दोहे 23 प्रकार के होते है।
यह है तीसरा प्रकार...छंद विशेषज्ञ नवीन सी चतुर्वेदी जी के दोहे उदाहरणस्वरूप दिए गए हैं।
उसी आधार पर मैंने भी कोशिश की है।
शरभ दोहा
20 गुरु और 8 लघु वर्ण
22 2 11 2 12, 22 2 2 21
2 2 2 221 2, 222 11 21
रम्मा को सुधि आ गयी, अम्मा की वो बात।
जी में हो आनन्द तो, दीवाली दिन-रात।।
-- नवीन सी चतुर्वेदी

पानी भोजन श्वास में, है प्राणों का सार
पौधों पेड़ों ने रचे, ऊर्जा स्रोत अपार।।

माया कंचन कामना, हैं दुःखों के मूल।
माँगी थीं सारंग को, वैदेही छल भूल।।

पैसों को धन मानते, रिश्तों को व्यापार।
ऐसे लोगों में कहाँ, होता प्यार -दुलार।।

खेतों में सरसों खिली, जाड़े की है धूप।
भोली भाली कामना, माँगे रूप अनूप।।

पौधे और नदी मिले, बासंती है गान।
कान्हा ने जो भी दिया, मानो है वरदान।।
--ऋता शेखर 'मधु
सौजन्य: साहित्यम ब्लॉग से साभार

दोहों के प्रकार 2- सुभ्रमर दोहा

दोहों के प्रकार पर कार्यशाला 2 - सुभ्रमर दोहा
दोहों के तेईस प्रकार होते है।
वैसे 13-11के शिल्प से दोहों की रचना हो जाती है जिनमें प्रथम और तृतीय चरण का अंत लघु गुरु(12) से तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण का अंत गुरु लघु(21) से होता है।दोहे में कुल 48 मात्राएँ होती हैं।
आंतरिक शिल्प की बात करें तो दोहे 23 प्रकार के होते हैं । हर शिल्प के लिए दोहों के अलग-अलग नाम हैं। ये सज्जा एवं नाम गुरु वर्णों के अवरोह क्रम में रखे गए हैं।मेरी कोशिश है कि हर प्रकार के कुछ दोहे लिख सकूँ तथा मित्रों को भी बता सकूँ। इसी कोशिश में दूसरा प्रकार आप सभी के अवलोकनार्थ प्रस्तुत है।इन दोहों की समीक्षा प्रार्थित है। पिछली कार्यशाला में प्रकाशित भ्रमर दोहों का थोड़ा रूपांतरण करके सुभ्रमर बनाया है जिससे समझने में आसानी हो।यहाँ प्रथम चरण में चौथे गुरु को दो लघु किया गया है, बाकी सारे यथास्थान हैं।
सुभ्रमर दोहा-
21 गुरु 6 लघु=48
22211212,222221
2222212,222221

पानी भोजन श्वास में, है प्राणी का सार।
पौधों पेड़ों ने रचे, जीवन का आधार।।

काया दौलत के बिना, सूना है संसार।
वाणी योगी साधना, ले जाएँगे पार।।

झूमी गाकर जिंदगी, ले फूलों का साथ।
माथे माथे हों सजे, कान्हा जी के हाथ।।

ऊर्जा से भरपूर हैं, खाते-पीते लोग।
हीरे को हीरा मिले, हो ऐसा संजोग।।

फूलों से खुशबू मिली, खानों से सौगात।
चंदा से है चाँदनी, पेड़ों से हैं पात।।

--ऋता शेखर 'मधु'

शनिवार, 21 दिसंबर 2019

दोहों के प्रकार 1- भ्रमर दोहा

दोहों के प्रकार पर आज की कार्यशाला 1-
भ्रमर दोहा
दोहों के तेईस प्रकार होते है।
वैसे 13-11के शिल्प से दोहों की रचना हो जाती है जिनमें प्रथम और तृतीय चरण का अंत लघु गुरु से तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण का अंत गुरु लघु से होता है।कुल 48 मात्राएँ होती हैं।
किंतु आंतरिक शिल्प की बात करें तो दोहे 23 प्रकार के होते हैं । हर शिल्प के लिए दोहों के अलग-अलग नाम हैं। ये सज्जा एवं नाम गुरु वर्णों के अवरोह क्रम में सजाए गए हैं।मेरी कोशिश है कि हर प्रकार के कुछ दोहे लिख सकूँ तथा मित्रों को भी बता सकूँ। इसी कोशिश में प्रथम प्रकार आप सभी के अवलोकनार्थ प्रस्तुत है। यहाँ 22 गुरु वर्ण तथा 4 लघु वर्णों का प्रयोग किया गया है।
1
भ्रमर दोहा-
22 गुरु 4लघु=48
2222212,222221
2222212,222221
खाना पानी श्वास में, है प्राणी का सार।
पौधों पेड़ों ने रचे, जीने का आधार।।

माया काया के बिना, सूना है संसार।
वाणी योगी साधना, ले जाएँगे पार।।

झूमे गाये जिंदगी, हो फूलों का साथ।
माथे माथे हों सजे, कान्हा जी के हाथ।।

आती जाती जिंदगी, खोते पाते लोग।
हीरे को हीरा मिले, हो ऐसा संजोग।।

चंदा से है चाँदनी, पेड़ों से हैं पात।
फूलों से खुश्बू मिली, खानों में सौगात।।
--ऋता शेखर 'मधु'
सौजन्य- साहित्यम ब्लॉग से साभार

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2019

कैसा मिला है साथ

कैसा मिला है साथ

शीतल उष्ण मिल गए
जैसे तुम और हम
चक्र घूम कर बता रहा
कभी खुशी या गम
जो पिघला वह ठोस हुआ
जीवन अनबुझ राज
पतझर की लीला बड़ी
बजा बसन्त का साज
सूर्य बिना वह कुछ नहीं
चँदा का मन जान रहा
कहाँ तपन घट जाएगी
सूरज को भी भान रहा
एक दूजे बिन हैं अधूरे
पर मिलन की राह नहीं
अवनी अम्बर को देखो
क्षितिज की है थाह नहीं
विभा दिनकर मिलें कहाँ
सन्ध्या ने यह तय किया
आस निराश के मध्य जमी
आस्था ने सब कुछ जय किया
प्रीत मीत की हुई शाश्वत
बिना मिले दो तृप्त हुए
राधा कान्हा दूर दूर
प्रेम रूप संक्षिप्त हुए
कैसा मिला है साथ
मिले, पर हुए न पूरे
बना रहा अहसास
एक दूजे बिन हैं अधूरे
-ऋता शेखर 'मधु'




सभी बहनों सखियों को करवा चौथ की मंगलकामनाएं!! 🌹🌹🌝🌹🌹

बुधवार, 2 अक्टूबर 2019

अस्तित्व

"अस्तित्व"
दिल की धड़कन बन्द होती सी महसूस हो रही थी। मैंने झटपट मशीन निकाली और कलाई पर लगाया। नब्ज रेट वाकई कम था।
"ओह, क्या तुम मुझे कुछ दिनों की मोहलत दे सकती हो प्रिय", मैंने डूबते स्वर में उसका हाथ पकड़ते हुए कहा।
"तुम्हारे पास समय की कमी नहीं थी। पर अब ऐसा क्या है जो तुम करना चाहती हो।" उसने मेरा हाथ छुड़ाते हुए कहा।
"मैं पन्नों को समेट रही हूँ। कुछ बाकी हैं जो अंत में लगाने हैं। बस उतना वक्त दे दो मुझे।मैं अपने भाव संसार को देना चाहती हूँ," निवेदन का भाव आ गया था मेरी आवाज़ में।
"प्रिय सहगामिनी, आज तुम्हारी आयु पूरी हो रही। बस इच्छाशक्ति ही हम दोनों को साथ रख सकती है। वादा करो अब समय गंवाए बिना अपना कार्य पूरा करोगी।"
"वादा करती हूँ, वादा करती हूँ..." चीखते हुए कहा मैंने।
"तब लो, मैं पुनः तुम्हारे शरीर में समाहित हो रही"
मुझे लगा कि धड़कन अब सामान्य हो रही थी।
उफ्फ़...बिना आत्मा के हमारा सांसारिक अस्तित्व कुछ नहीं। अब अपने अस्तित्व को पन्नो पर शीघ्र ही समेटना होगा।
--ऋता

बुधवार, 18 सितंबर 2019

मेरा हिन्दुस्तान, जग में बहुत महान है - सोरठे


सोरठे - हिन्दी पखवारा विशेष छंद

मेरा हिन्दुस्तान, जग में बहुत महान है।
हिन्दी इसकी जान, मिठास ही पहचान है।।

व्यक्त हुए हैं भाव, देवनागरी में मधुर।
होता खास जुड़ाव, कविता जब सज कर मिली।।

कोमलता से पूर्ण, अपनी हिन्दी है भली।
छोटे बड़े अपूर्ण, ऐसे तो न भेद करे।।

होता है व्यायाम, मूर्धा तालू कण्ठ का।
लेती क्ष त्र ज्ञ से काम, द्वि एकल जब साथ हुए।।

जब भी लगे हलन्त, व्यंजन स्वर से हो अलग।
जुटकर वर्णों के अंत, नवल वर्ण की नींव रखे।।

अपनी भाषा छोड़, क्यों इत उत दोलन करे।
जनमानस को जोड़, सद्भावों के पथ रचो।।

आत्मसात हो नित्य, वर्तनी शुद्धता से बढ़े।
हिन्दी का साहित्य, नित नए सोपान गढ़े।।

-- ऋता शेखर 'मधु'

सोमवार, 9 सितंबर 2019

लगता नया नया हर पल है

गीत
जाना जीवन पथ पर चलकर
लगता नया नया हर पल है

धरती पर आँखें जब खोलीं
नया लगा माँ का आलिंगन
नयी हवा में नयी धूप में
नये नये रिश्तों का बंधन

शुभ्र गगन में श्वेत चन्द्रमा
लगता बालक सा निश्छल है

नया लगा फूलों का खिलना
लगा नया उनका झर जाना
मौसम की आवाजाही में
फिर से बगिया का भर जाना

आम्रकुंज की खुशबू पाकर
बढ़ती कोयल में हलचल है
लगा नया लहरों का आना
आकर फिर से वापस जाना

नए नए सीपों को चुनकर
गहराई की थाह लगाना
करे नहीं परवाह पंक की
खिलता नया नया शतदल है

है नवीन लेखन की बातें
नया सफर नयी मुलाकातें
हर दिन का सूरज नया नया
नया स्वप्न ले आतीं रातें

नए इरादे नयी समस्या
नया ढूँढता कोई हल है

ऋता शेखर म
धु

रविवार, 1 सितंबर 2019

तुझको नमन

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सबको राह दिखाने वाले
हे सूर्य! तुझको नमन

नित्य भोर नारंगी धार
आसमान पर छा जाते
खग मृग दृग को सोहे
ऐसा रूप दिखा जाते
आरती मन्त्र ध्वनि गूँजे
तम का हो जाता शमन

हर मौसम की बात अलग
शरद शीतल और जेठ प्रचंड
भिन्न भिन्न हैं ताप तुम्हारे
पर सृष्टि में रहे अखंड
उज्ज्वलता के घेरे में
निराशा का होता दमन

जितना वेग तपन का धरते
उतना ही नीरद भर देते
बूँदों में वापस आकर के
तन मन की ऊष्मा हर लेते
साँझ ढले पर्वत के पीछे
शनै शनै करते गमन
हे सूर्य! तुझको नमन !

ऋता शेखर 'मधु'

शनिवार, 31 अगस्त 2019

सोरठे

सोरठे

स्वप्न हुए साकार, जब कर्म की राह चले।
गंगा आईं द्वार, उनको भागीरथ मिले ।।1

नारी का शृंगार, बिन्दी पायल चूड़ियाँ।
पहन स्वप्न का हार, नभ मुठ्ठी में भर चलीं।।2

नन्हें नन्हें ख़्वाब, नन्हों के मन में खिले।
बोझिल हुए किताब, ज्यों ज्यों वे वजनी हुए।।3

लिए हाथ में हाथ, पथिक चले चुपचाप दो।
मिला बड़ों का साथ, स्वप्न सभी पूरे हुए।।4

धूप छाँव का सार, शनै शनै मिलता गया।
सपनों का संसार, मन बगिया में जा बसा।।5

सपनों में अवरोध, पैदा जब कर दे जगत।
हटा हृदय से क्रोध, चले चलो निज राह पर।6

पाना हो सुख चैन, समय प्रबंधन कीजिये।
शयन काल है रैन, दिन में व्यर्थ न लीजिये।।7

लिख लिख प्रभु के गीत, हर्षित होती लेखनी।
कर कान्हा से प्रीत, अक्षर अक्षर जी उठे।।8

धन दौलत को जोड़, जाने क्या सुख पा रहे।
जाना है तन छोड़, याद इसे रखना पथिक।।9

झुके झुके से नैन, जाने कितना कुछ कहे।
झूठ करे बेचैन, या प्रीत के गीत गहे।।10

परम् सत्य है सत्व, जीवन जीने के लिए।
उन्हें मिले देवत्व, करुण भाव में जो बहे।।11
--ऋता शेखर' मधु'

शुक्रवार, 30 अगस्त 2019

धुँधली आँख-लघुकथा

धुँधली आँख

चारो तरफ ॐ कृष्णाय नमः की भक्तिमय धूम मची हुई थी। देवलोक में बैठे कृष्ण इस कोशिश में लगे थे कि किसी की पुकार अनसुनी न रह जाये। कृष्ण के बगल में बैठे सुदामा मंद मंद मुस्कुरा रहे थे।
" रहस्यमयी मुस्कान तो हमारे अधरों पर विराजमान रहती है मित्र, आज आपने क्यों यह मुस्कान धारण किया है?"
"कुछ नहीं मित्र, आज मेरा मन हो रहा कि मैं भी धरती पर जाऊँ और आपकी महिमा देखूँ।"


" तो देर किस बात की प्रिय सुदामा, चलिये"

धरती पर पहुँचकर कृष्ण , कृष्ण ही बने रहे किन्तु सुदामा ने खुद का अवतरण इस प्रकार किया कि वे जहाँ जायें, उस घर के मालिक के दोस्त के रूप में दिखें।

धरती शंखध्वनि से गुंजायमान थी। दीपकों ने अपनी लौ स्थिर रखा था क्योंकि दीये में घी प्रचूर मात्रा में था।कृष्ण के बालरूप की सज्जा का तो कहना ही क्या था।कृष्ण-राधा का भी अद्भुत श्रृंगार था। कृष्ण के भोग की जितनी गिनती की जाए वह कम ही होनी थी।

कृष्ण सुदामा एक घर के सामने रुक गए। कृष्ण को भी मसखरी सूझी। उन्होंने बालक का रूप धारण कर लिया।

"कोई है, कोई है" सुदामा ने आवाज लगाई।

अन्दर से गृहस्वामी निकले जिनकी रईसी उनकी साजसज्जा बता रही थी।

"क्या है, क्यों आवाज लगा रहे हो। कान्हा की आरती का समय हो गया है भाई, अभी वापस जाओ।"

"मेरा बच्चा कई दिनों से भूखा है, कुछ खाने को दीजिये।" खुले दरवाजे से माखन, दही की हांडी देखते हुए सुदामा ने कहा।

"अभी क्या दूँ, सब कुछ भोग में चढ़ा हुआ है"

"मित्र, मैं राघव हूँ, मैं तो तुम्हें देखते ही पहचान लिया था।मैं चाहता था कि तुम मुझे स्वयं पहचानो। अभी मेरी माली हालत ठीक नहीं, बच्चा भूखा है।" सुदामा ने विनीत भाव से कहा।

गृहस्वामी की आंखों में क्षण भर की पहचान उभरी।
" पर मैं नहीं पहचान पा रहा। क्या मेरे वैभव से आकर्षित होकर आए हो।"

"नहीं,धरती पर शोर मचा है कि कृष्ण भाव के भूखे हैं। हम अपनी वही भूख मिटाने आये थे।" कृष्ण सुदामा ने असली रूप धारण कर गृहस्वामी को अचंभित कर दिया।

"मित्र कृष्ण, जो भी आपके नाम की टेर लगा रहे उनमें कितनों ने आपके सद्गुणों को अपनाया है, बस यही दिखाना था। जो जीते जागते बाल गोपाल को धुँधली आँखों से देख रहे वे आपका अनुकरण कैसे कर पाएँगे।"

रहस्यमयी मुस्कान अब भी सुदामा के अधरों पर थिरक रही थी।

--ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 27 अगस्त 2019

अपनी अपनी नौकरी-लघुकथा



अपनी अपनी नौकरी

सरकार की ओर से जमींदारी प्रथा खत्म हो चुकी थी।फिर भी लोकेश बाबू जमींदार साहब ही कहलाते थे।उनके सात बेटे शहर में रहकर पढ़ाई करते और लोकेश बाबू मीलों तक फैले खेत की देखरेख और व्यवस्था में लगे रहते। धीरे धीरे सातों बेटे ने उच्च शिक्षा प्राप्त की और पदाधिकारी बनते गए। लोकेश बाबू को यह चिंता सताने लगी कि गाँव के जमीन जायदाद की देखभाल कौन करेगा। सब शहर में रहकर नौकरी करना चाहते थे।एक बार उन्होंने यही बात सभी बेटों के सामने रखी।उनमें एक बेटा गाँव में रहकर देखभाल के लिए तैयार हो गया। जब वे जीवित थे तो सभी बेटों को पैदावार का कुछ हिस्सा भेज दिया करते थे। जमींदार साहब को गए पाँच वर्ष बीत चुके थे।अब किसी को कुछ भी नहीं भेजा जाता था।

आज अचानक छोटे भाई उमेश को देख गाँव वाले भाई सोमेश को बहुत खुशी हुई। दोनों भाई देर तक हरियाली भरे खेतों में घूमते रहे। घूमते घूमते उमेश ने दिल की बात बता ही दी।
"भैया, पिताजी के जाने के बाद हमलोगों को खेत का कुछ भी नहीं मिल रहा। लगता ही नहीं कि हम खेतिहर परिवार से हैं।"
"देखो बाबू, जैसे तुमलोग शहर में रहकर नौकरी करते हो तो मैं तो तुम्हारी नौकरी के पैसे से कुछ नहीं माँगता। खेती ही मेरी नौकरी है और पैदावार मेरी तनख्वाह। यदि तुम्हे पैदावार में हिस्सा चाहिए तो अभी इन बैलों को हल में जोतकर दिखा" । यह कहते हुए सोमेश ठठाकर हँस पड़ा।
"पिता जी की इच्छा का मान रखते हुए मैंने गाँव और खेती स्वीकार किया और तुमलोगों ने शहर और नौकरी। खेत की जमीन जब चाहे ले लेना। फिर उस पैदावार पर तुम्हारा हक होगा भाई मेरे"
उमेश मुस्कुरा दिया क्योंकि यही जवाब उसे शहर लौटकर बड़े भाइयों को देना था।
-अप्रकाशित
ऋता शेखर मधु

रविवार, 25 अगस्त 2019

छंद-सोरठा

सोरठा

हर पूजन के बाद, जलता है पावन हवन।
खुशबू से आबाद,खुशी बाँटता है पवन।।1

प्रातःकाल की वायु , ऊर्जा भर देती नई।
बढ़ जाती है आयु, मिट जाती है व्याधियाँ।।2

छाता जब जब मेह, श्यामवर्ण होता गगन।
भरकर अनगिन नेह, पवन उसे लेकर चला।।3

शीतल मंद समीर, तन को लगता है भला।
बढ़ी कौन सी पीर, विरहन के मन ही रही।।4

खत में लिखकर प्रेम,छोड़ गया खिड़की खुली।
सही नहीं है ब्लेम, उसे उड़ा ले जब हवा।।5

झूम उठी है डाल, हवा सहेली थी मिली।
देखो हुआ धमाल, पत्ते कुछ उड़ने लगे।।6

सुप्त हुई जब आग, छुपी हुई थी राख में।
सुना हवा का राग, धधक पड़ी वह जागकर।।7


पढ़े वेद जो चार, ज्ञानी माने यह जगत।
जिनमें भाव अपार, ईश उन्हें जाने भगत।8


जब बोते हैं फूल, खिलने से खुशबू खिले।
रोप रहे जो शूल, कैसे दिल से दिल मिले।।9

कर लालच का कर्म, अंतर्मन क्योंकर छले।
छोड़ नीति का धर्म, कहो मनु किस राह चले।10

पैसा हो या राम,जगत में दो भाव बड़े।
एक करे निष्काम,एक दिखावा में पड़े।।11
@ ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 21 जुलाई 2019

सबकी अपनी राम कहानी - गीत

सबकी अपनी राम कहानी
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जितने जन उतनी ही बानी
सबकी अपनी राम कहानी

ऊपर ऊपर हँसी खिली है
अंदर में मायूस गली है
किसको बोले कैसे बोले
अँखियों में अपनापन तोले
पाकर के बोली प्रेम भरी
आँखों में भर जाता पानी

मन का मौसम बड़ा निराला
पतझर में रहता मतवाला
दिखे चाँदनी कड़ी धूप में
झेले शूलों को पुष्प रूप में
जीत हार से परे हृदय में
भावों की है सतत रवानी

यही कोशिश हो कुछ न टूटे
आस बीज से कोंपल फूटे
भाव सरल हो जब निज मन का
सफ़र सुहाना हो जीवन का
जो सहता है वह पाता है
अनुभव की वह अकथ निशानी

सागर-घट की कथा पुरानी
बाहर पानी भीतर पानी
ज्यों ही टूटा ये घट तन का
मिलन हुआ ईश्वर से मन का
राधा कह लो मीरा कह लो
प्रीत गीत की हुईं दीवानी

जितने जन उतनी ही बानी
सबकी अपनी राम कहानी
--ऋता शेखर 'मधु'
20/06/19
श्रावण कृष्ण पक्ष चतुर्थी
वि0 सं0 २०७४

गुरुवार, 11 जुलाई 2019

पत्र...किसके नाम?


फेसबुक पर एक समूह में पत्र लेखन प्रतियोगिता थी|

62 प्रविष्टियों में...अच्छे पत्रों में हमारे पत्र को भी रखा गया इसके लिए खुश हूँ 😊अब आप सब भी पढ़िए।

पुणे
29/06/2019
प्रिय रौशन,
सदा प्रसन्न रहो।
अपनी रौशनी को रौशन के रूप में स्वीकार करने में थोड़ा समय लगेगा। बड़े नाजों से तुम्हें पाला है रौशनी। जब तुमने जो चाहा, दिया। तुम मेरी बड़ी बेटी हो। हमारे यहाँ दो पीढ़ियों से लड़की का जन्म नहीं हुआ था। तुम्हारे जन्म पर तुम्हारे दादा लक्ष्मी के रूप में तुम्हें पाकर अति प्रसन्न थे और उन्होंने पूरे गाँव में लड्डू बँटवाए थे। दादी तो रोज नए फ्राक सिलकर पहनाती तुम्हें। जब तुम सात वर्ष की थी तो तुम्हें लड़कों वाले खेल पसन्द आते थे। गिल्ली डंडा और कंचे खेलने में तुम्हारी रुचि बढ़ने लगी थी। अब दादी के फ्राक तुम्हें पसन्द नहीं आते थे। तुम हमेशा पैंट शर्ट की ज़िद करने लगी थी। बाल भी छोटे कटवाए थे जिद करके। यह सब बातें सामान्य समझ कर हम निश्चिंत रहे। समय के साथ तुम बड़ी होती गयी और उच्च शिक्षा के लिए दूसरे शहर चली गयी। पढ़ाई में अव्वल आती रही और कभी शिकायत का मौका नहीं दिया। तुम जब भी छुट्टियों में घर आती, अपनी प्रिय सहेली रूबी की ढेर सारी बातें करती। उसकी पसंद नापसन्द तुम्हारे लिए बहुत मायने रखती थी। हम इसे भी सामान्य समझ कर दो सहेलियों का प्रेम समझते रहे। एक बार तुम उसे लेकर घर आई तो तुम दोनों के व्यवहार से कुछ तो खटका था मन में, पर इसे वहम समझकर दिमाग से झटक दिया था। जब विवाह योग्य हुई तो मैंने लड़कों की लिस्ट तुम्हारे सामने रख दी। तुमने विवाह के प्रति अपनी अनिच्छा जताई। बहुत पूछने पर तुमने जो कहा, वह सुनकर मेरे और तुम्हारी मम्मी के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई।
तुमने कहा था " मैं रूबी को जीवनसाथी बनाना चाहती हूँ, अब समलैंगिकों को साथ रहने का कानूनन अधिकार मिल गया है।" हम मूक रहकर सिर्फ तुम्हें देखते रहे। तुम बालिग और आत्मनिर्भर थी। अपना निर्णय लेने का अधिकार था तुम्हें, पर ये...। किसी भी चीज़ को किस्से कहानियों तक पढ़ना अलग बात होती है और खुद पर बीतना अलग।
लोग क्या कहेंगे...यह बात मन पर हावी होने लगी। दो दिनों के मानसिक उथलपुथल के बाद हमने इसे जैविक असमानता स्वीकार करते हुए समाज की परवाह छोड़ दी। तुम्हें डॉक्टर को दिखाया। अब फिर से भगवान ने एक अजूबे तथ्य से अवगत कराया। तुम्हारे शरीर में पुरुषों वाले अंग प्रत्यंग भी थे। कई जटिल प्रक्रियायों से गुजरते हुए आज तुम बेटा के रूप में सामने खड़ी हो। हम दामाद लाते, अब बहू लायेंगे।
रौशन, तुमने लड़की का जीवन भी जिया है।आशा है आगे उनके दर्द को भली भाँति समझ पाओगे।डॉक्टर ने कहा है कि ऐसे केस लाखों में एक होते हैं। समाज की परवाह न करना। हम तुम्हारे साथ हैं और रूबी को बहू के रूप में स्वीकार करते हैं । तुम दोनों की इज्जत पर कोई आँच नहीं आएगी।
हॉर्मोन्स की वजह से असामान्य लक्षण प्रकट होना ईश्वर प्रदत्त है बेटा, उनकी हँसी उड़ाने वालों को नासमझ समझ कर माफ़ कर देना।
बहुत प्यार
तुम्हारा पापा
...............
************
स्वरचित, अप्रकाशित, अप्रसारित
ऋता शेखर 'मधु'
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गुरुवार, 4 जुलाई 2019

जिन काँधों पर चढ़कर झूले-ललित छंद


विधा- ललित छंद (सार छंद)...
16-12 पर यति अंत में वाचिक भार 22,
कुल चार चरण, दो-दो चरण में तुकांत अनिवार्य है.

नेह-सिक्त निर्मल धारा से , मिलती कंचन काया |
अम्बर जैसा प्यार पिता का, शीतल माँ का साया ||
जाने कितने दुख सुख सहकर, तिनका तिनका जोड़े|
ऊँची शिक्षा की खातिर ही, निज सपनों को तोड़े ||

जिन काँधों पर चढ़कर झूले, चौंसठ में झुकते हैं |
एक सहारा पाने को वे, पग पग पर रुकते हैं ||
सन्नाटों के मौन तिमिर में, दो निरीह जगते हैं |
टिक-टिक के संग श्वास-ध्वनि मिल, साथी सा लगते हैं ||2||

तन निःशक्त हुआ है जबसे, झेल रही लाचारी |
दूरभाष भी दूर पड़ा है, ले कैसे बेचारी ||
दवा मिली आहार नदारद, वह कैसे जीएगी |
डॉलर की अनकही कहानी, घूँट घूँट पीएगी ||3||


यूँ  देखो तो यह दुनिया बस, लगता है इक मेला |
पर जिनको तुम छोड़ गए हो, वह तो पड़ा अकेला ||
अनियंत्रित जीवन रेखा का, अनियंत्रण है जारी |
साहब बनकर घूम रहे हो, माँ बिस्तर पर हारी ||4||

आखें मूँद रही थी जब वह, तुम्हें कहाँ पाती थी |
चढ़कर दूजों के कंधों पर, मंजिल को जाती थी ||
मस्त रहो और स्वस्थ रहो तुम, आशिष देकर गाती|
यादों में जाकर जब लौटी, तर्पण अश्रु का लाती ||5||

तुम जग जीत चले थे लेकिन, जीते ना अपनो को |
गाँव द्वार को ठोकर मारे, लेकर निज सपनों को ||
छोड़ तिरंगा बने विदेशी, देश हुआ बेगाना |
अपने अपनो की खातिर तुम, लौट यहाँ फिर आना ||6||

----ऋता शेखर ‘मधु’

ग्रीष्म

ग्रीष्म ऋतु
============
ग्रीष्म की दुपहरिया
कोयल की कूक से
टूट गयी काँच सी

छत पर के पँखे
सर्र सर्र नाच रहे
हाथों में प्रेमचंद
नैंनों से बाँच रहे

निर्मला की हिचकियाँ
दिल में हैं खाँच सी

कोलतार पर खड़े
झुंड हैं मजूरों के
द्वार पर नाच रहे
बानर जमूरों के

लू की बड़ी तपन
खस में है आँच सी

चंदन की खुश्बू सा
खत भी है पास में
आएगा जवाब एक
प्रेम भी है आस में

विचारों की आँधियाँ
परख रहीं जाँच सी

गपशप की इमरती
ठहाकों में छन रही
आम की फाँकों पर
मेथी मगन रही

जीभ की ग्रंथियाँ
चटपटी कुलाँच सी

-ऋता शेखर ‘मधु’

रविवार, 30 जून 2019

जिन्दगी को सार देना-गीतिका

मनोरम छंद
मापनी-2122.2122
***************************
गीतिका
पदांत - देना
समांत- आर
***************************
जिन्दगी को सार देना
नेह को विस्तार देना

फूल की चाहत सभी को
शूल को भी प्यार देना

राह में फिसलन बहुत है
चाल को आधार देना

स्वप्न होते अनगढ़े से
कर्म से आकार देना

बोल मीठे भाव निश्छल
जाँचकर उद्गार देना

पेड़ पौधे हैं धरोहर
प्रेम से उपहार देना

जो करे कर्तव्य अपना
बिनकहे अधिकार देना

स्वरचित, अप्रकाशित
--ऋता शेखर 'मधु'

इस छंद के लिए मुझे फेसबुक समूह 'मुक्तक लोक' से सम्मान पत्र मिला है|

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सोमवार, 24 जून 2019

नलिन की वापसी - कहानी

नलिन की वापसी
   सुपर फ़ास्ट ट्रेन तीव्र गति से अपने गंतव्य की ओर बढ़ती जा रही थी| जनरल डब्बे की निचली बर्थ पर खिड़की के पास बैठी सुमेधा पवन के शीतल झोंकों का आनन्द ले रही थी| मन के भीतर की खुशियाँ चेहरे पर झलक रही थीं, कभी एक उदासी भी झलक जा रही थी| वह अपने प्यारे बेटे के साथ बनारस जा रही थी | बेटे नलिन ने बारहवीं की परीक्षा अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण की थी और साथ साथ आईआईटी भी निकाला था उसने| आगे की शिक्षा के लिए शिव के त्रिशूल पर टिकी नगरी वाराणसी में बीएचयू में दाखिला मिला था| वह उसे हॉस्टल छोड़ने जा रही थी| उसके बगल में बैठा नलिन चेतन भगट का नॉवेल ‘थ्री इडियट्स’ पढ़ने में तल्लीन था| उपन्यास पढ़ते हुए कभी उसके चेहरे पर मुस्कान भी आ जाती| सुमेधा ने यूँ ही पूछ लिया,”इस कहानी में क्या है नलिन?”

“तीन इडियट्स की कहानी जिन्होंने आईआईटी कॉलेज में नामांकन कराया है|”

“हा हा हा, आईआईटी वाले इडियट्स... अच्छा, तब तो तुम्हें मजा आ रहा होगा,”मुस्कुराती हुई सुमेधा पुनः बाहर के नजारे देखने लगी| ट्रेन की रफ़तार धीरे धीरे कम होने लगी थी| अगला स्टेशन शायद मुगलसराय था, जो अब पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन के नाम से जाना जाता है|

ट्रेन के रुकते ही कई यात्री उतर गए, कई चढ़े भी| साथ ही फल वाले, स्नैक्स वाले, पेपर सोप, ताला-चाबी वाले, चिनिया बादाम वाले भी चढ़ गए| शोर से पूरा डब्बा भर गया | चाय कॉफी की बिक्री दनादन होने लगी| सुमेधा और नलिन को इन सब चीज़ों से कोई मतलब नहीं था| नलिन अपने उपन्यास में उलझा रहा और सुमेधा स्टेशन के दृष्य देखने में लगी रही|

“मे आई सिट हियर...May I sit here,” फिरंगी टोन में पूछी गई इस बात से सुमेधा ने सामने देखा| एक गोरा चिट्ठा साधु सामने खड़ा था| एक नजर में ही सुमेधा ने उसके पूरे व्यक्तित्व का जायजा ले लिया| गेड़ुआ वस्त्र धारण किए हुए साधु में कहीं से भी भारतीय रूपरेखा की झलक नहीं थी सिवाय उस झोले के, जिसे उसने कंधे पर लटका रखा था|

“मे आई सिट हियर...क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ?”, इस बार वह सुमेधा की आँखों में आँखें डालकर पूछ रहा था|

“यस, ऑफ़ कोर्स...हाँ हाँ क्यों नहीं”, सुमेधा ने अपने पलथी लगाए पैरों को नीचे रखते हुए कहा|

वह सुमेधा के बगल में बैठ गया| तब तक नलिन ने एक उड़ती निगाह उस साधु पर डाली | उसके बाद वह फिर से अपने उपन्यास में डूब गया| सुमेधा भी बाहर देख रही थी| ट्रेन में अजनबियों से बातें करने का उसे कोई शौक नहीं था|

“इज़ ही योर सन ?”, नलिन को देखते हुए उसने सुमेधा से पूछा|

“यस..हाँ”, कहते हुए सुमेधा की नजर नलिन से मिली|

“व्हाट इज़ योर नेम यंग बॉय”, उसने नलिन से पूछा|

“नलिन, हिज़ नेम इज़ नलिन....कैन यू अंडरस्टैंड हिन्दी?”, नलिन के बजाय सुमेधा ने जवाब देने के साथ ही सवाल भी ठोक दिया| वह नहीं चाहती थी कि वह फिर से नलिन से कोई सवाल करे|

“हाँ, मैं हिन्दी समझता हूँ और बोल भी लेता हूँ|” मुस्कुराते हुए उसने कहा|

“ओके”, कहकर सुमेधा फिर से बाहर देखने लगी|

“नलिन का क्या अर्थ होता है”, वह चाहता कि बातचीत का सिलसिला कायम रहे|

“लोटस...कमल” सुमेधा को बोलना पड़ा क्योंकि यह बताने में कोई हर्ज़ नहीं था|

“वाउ, गुड नेम| लगता है आपलोग भी वाराणसी जा रहे| वहाँ पढ़ते हो क्या नलिन?”

नलिन ने उपन्यास पर से आखें उठाई,”हाँ”, कहकर फिर पढ़ने लगा|

“मैं फिलिपिन्स से आया हूँ,”यह कहकर वह क्षणभर को चुप रहा|

“तो मैं क्या करूँ”, सोचते हुए सुमेधा ने यह दिखाया जैसे उसे उसकी बातों में कोई दिलचस्पी न हो|

“मैंने श्रीमद्भागवद्गीता पढ़ी है| आई लाइक लॉर्ड कृष्णा| उन्होंने स्वयं के बारे में कहा है...ऋतुओं में मैं बसंत हूँ, वृक्षों में मैं बरगद हूँ और....” वह आगे कुछ कहता उसके पहले ही सुमेधा बोल पड़ी,”बरगद नहीं पीपल”

“ओह, सही कहा, भूल गया था मैं”, भूला था या जानबूझकर कर उसने गलत कहा, यह सुमेधा समझ नहीं सकी|

“अंकल, आपका नाम क्या है,” नलिन ने उपन्यास एक ओर रखते हुए पूछा|

“अंकल मत कहो, डैनियल कहो माय सन” कहते हुए उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई|

“हमारे भारत में बड़ों का नाम नहीं लेते अंकल”नलिन ने मुस्कुराते हुए कहा|

“ओ हो हो हो...”उसकी चालाक सी हँसी तैर गई|

“वैसे अंकल, डैनियल का अर्थ क्या होता है|”

“डैनियल मीन्स गॉड इज़ माय जज़, और जिसका न्याय स्वयं ईश्वर करें वह भी तो सच्चा न्यायकर्ता होगा न”, अपनी व्याख्या पर खुद ही मुग्ध होता हुआ वह बोल पड़ा|

सुमेधा ने नलिन की ओर देखकर आँखों ही आँखों मना किया कि वह आगे बात न करे| नलिन चुप बैठ गया|

किन्तु वह भी कहाँ मानने वाला था,”मुझे भारत के युवाओं मे बहुत ऊर्जा दिखती है| पढ़ाई हो या कोई भी क्षेत्र, हर जगह वे अपनी छाप छोड़ते हैं| मैं कई वर्षों से इसी समय भारत आता हूँ| मुझे अक्सर बीएचयू के विद्याथी मिलते हैं ट्रेन में|”

“मैं भी तो...”अचानक नलिन बोल पड़ा और जिस बात से सुमेधा डर रही थी वह हो गया|नलिन ने अनजाने में अपने कॉलेज का खुलासा कर दिया| उसने उस फिलिपियन साधु की ओर देखा| उसके होठों के कोने पर उभरी कुटिल मुस्कान से वह दहल गई|

“किस शहर से आ रहे हो....नलिन?,”नाम लेकर सवाल पूछना जैसे उसके अधिकार क्षेत्र में चला गया था|

“यह बताना मैं जरूरी नहीं समझती”, कहते हुए सुमेधा की रुखाई झलक गई|

“ओके, ओके, कोई बात नहीं”, अपनी ऊँची गोरी नाक को छूता हुआ कह रहा था|

सुमेधा बोल पढ़ी, “आपने गीता पढ़ी है तो यह भी जानते होंगे कि कृष्णा सर्वव्यापी हैं| वह आपको आपके देश में भी मिल जाएँगे| उनके लिए भारत आने की क्या जरूरत है|”

“कृष्णा के लिए अनुयायी बनाने का काम करता हूँ|”

“मतलब? कैसे अनुयायी बनाते हैं आप?”

“छोड़िये, ये मेरे और कृष्णा के बीच की बातें है, आप नहीं समझेंगी,”कहता हुआ वह उठने का उपक्रम करने लगा क्योंकि ट्रेन अब रुकने ही वाली थी|

सुमेधा और नलिन भी सामान ठीक करने लगे| स्टेशन पर वह पहले उतर गया था किन्तु वहीं पर खड़ा रहा| चूँकि हॉस्टल में रहने की बात थी तो सुमेधा ने टिन का एक बक्स लिया था जिसमें रोज के कपड़ो के अलावा गरम कपड़े भी थे| भारी बक्से को दोनों माँ बेटा मिलकर उतारने की कोशिश कर रहे थे कि उसने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया| सुमेधा ने कहना चाहा कि उसे मदद की आवश्यकता नहीं, किन्तु चुप रही और उसे बक्से को उतारने दिया| इस दौरान उस गोरे फिरंगी साधु के चेहरे की एक एक रेखा से कुटिलता टपक रही थी|

“उफ! मैं भी कितनी शक्की हूँ, वह मदद ही तो कर रहा है”, यह सोचकर सुमेधा मुस्कुरा दी|

“मैं दो महीने भारत में रहूँगा, फिर अगले साल आऊँगा” कहता हुआ उसने नलिन से हाथ मिलाया और सुमेधा की ओर मुड़कर नमस्कार की मुद्रा में खड़ा हो गया| सुमेधा ने जल्दी से नमस्कार किया और आगे बढ़ने लगी| पता नहीं क्यों किसी अनहोनी की आशंका से उसका मन बार बार उसे सावधान कर रहा था| आने वाले खतरे को भाँप लेने की उसकी अंतर्दृष्टि को परिवार में भी सभी लोग मानते थे|

बीएचयू पहुँचने पर गेस्टरूम में सुमेधा को जगह मिल गई| नलिन को भी हॉस्टल में जगह मिल गई| नलिन के रूममेट के रूप में सही मित्र को देखकर सुमेधा ने चयन किया| अगले दिन आँखों में नमी लिये वह वापस लौट आई| नलिन भी माँ से बिछड़ते हुए भावुक हो गया| नई जगह , नए दोस्त मिले|”

”कैसे एडजस्ट कर पाएगा” कभी वह घर से बाहर नहीं रहा रहा था तो सुमेधा की चिंता वाज़िब थी|

अपने शहर वापस आकर सुमेधा अपनी नौकरी में लग गयी| जिस दौर में नलिन बीएचयू गया था, उस दौर में हर हाथ में मोबाइल नहीं सजे रहते थे| वह जमाना था कि टेलिफोन बूथ पर जाकर एसटीडी कोड के साथ लैंडलाइन पर नम्बर लगाने होते थे| नलिन से बात करने के लिए ऑफ़िस के नम्बर पर फ़ोन लगाना होता था| फिर वे लोग नलिन को बुलाते तब बात हो पाती| शुरू के सप्ताह में लगातार सुमेधा ने नलिन से बात की| एक बार नलिन ने कहा,”माँ, किसी के घर से हर दिन फ़ोन नहीं आता| आप रोज़ फ़ोन करती हैं तो मेरे दोस्त मज़ाक बनाते हैं|”

“ठीक है नलिन, मैं सप्ताह में एक दिन कर लूँगी, या जब सुविधा हो तब तुम ही कर लेना”|

“ठीक है माँ, हर शनिवार को मेस ऑफ़ रहता है तो हमलोग बाहर लंका जाते हैं खाना खाने| मैं वहीं बूथ से बात कर लूँगा|”

“अपना ख्याल रखना बेटा”, कहकर सुमेधा ने फ़ोन रख दिया|

धीरे धीरे सुमेधा भी अपनी दिनचर्या में रमकर नलिन के बारे में थोड़ा कम सोचने लगी| किन्तु शनिवार को फोन का इन्तेजार अवश्य करती| दो महीने से सब कुछ ठीक ठाक ही चल रहा था| अब नलिन का फर्स्ट सेमेस्टर होने वाला था तो नलिन ने कह दिया था कि वह फ़ोन न कर पाए तो सुमेधा चिन्ता न करे| एक शनिवार सुमेधा का मन नहीं माना तो उसने हॉस्टल के ऑफ़िस में फ़ोन किया| पता चला कि नलिन कमरे में नहीं, कहीं बाहर गया है| अगले रविवार भी वह बाहर था तो उससे बात नहीं हो सकी| परीक्षा के समय कहाँ घूम रहा है, किसी आशंका ने सुमेधा की नींद उड़ा दी| उसने उसी शाम को फिर से फ़ोन लगाया तो नलिन से बात हो गई|

“कहाँ गए थे नलिन?”सुमेधा ने पूछा|

“इस्कॉन टेंपल गया था माँ, कुछ दिन पहले कॉलेज के गेट पर वही ट्रेन वाले डैनियल मिले थे| उन्होंने ही कहा कि लॉर्ड कृष्णा का ध्यान लगाने से जिंदगी की कई बाधाएँ दूर हो जाती हैं|” ऐसा लग रहा था जैसे नलिन किसी ध्यानमग्न अवस्था में बोल रहा था| सुमेधा के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई|

“अभी तुम्हारी परीक्षा है बेटा, कृष्णा भी उसी की मदद करते हैं जो पढ़ता है| उस डैनियल के चक्कर में मत पड़ो नलिन| वह इसी तरह युवा पीढ़ी को बहकाकर कृष्णा का अनुयायी बनाता है, यह अब मेरी समझ में आ रहा| इस बार वह मिले तो वहाँ जाने से मना कर देना|”

“पर माँ, वह शनिवार को गेट पर मिल जाते हैं और कहते हैं कि रविवार को हम सबको कुछ देर इस्कॉन में कृष्णा का ध्यान करना चाहिए|”

इन सब चीज़ों से दूर रहने वाला नलिन आज कैसी बातें कर रहा था| सुमेधा ने नलिन की परवरिश बहुत अच्छे संस्कार देकर की थी| उसकी उम्र के दूसरे बच्चे जहाँ देर रात तक बाहर रहते, नलिन ने कभी ऐसा नहीं किया था उसकी भाषा हमेशा शालीन रहती थी| रैगिंग के दौरान भी गाली न बोल पाने के कारण कई दिनों तक दोस्तों के बीच वह हँसी का पात्र बना रहा था किन्तु अडिग रहा| अभिभावक से दूर हुए बच्चे पर कृष्ण-भक्ति का नशा चढ़ाकर डैनियल आखिर धूर्तता कर ही गया|

“अगली बार मना करना नलिन”|

“शायद न कर पाऊँ”, शायद नलिन विवश था डैनियल के सामने|

“तुम क्या चाहते हो नलिन?”

“मैं नहीं जाना चाहता, पर कोई शक्ति है जो मुझे वहाँ जाने के लिए प्रेरित करती है माँ |”

“ठीक है, अगले रविवार तुम इस्कॉन जाना, मैं तुम्हें वहीं मिलूँगी किन्तु डैनियल को यह पता नहीं चलनी चाहिए”, खतरे को भाँपती हुई सुमेधा ने अगला कदम सोच लिया था|

“ठीक है माँ, आप आना जरूर”, नलिन की आवाज में राहत सी दिखी|

ट्रेन बनारस पहुँच चुकी थी| सुमेधा स्टेशन से सीधे इस्कॉन चली गई| “हरे रामा हरे कृष्णा” पर झूमते हुए कृष्ण के अनुयायियों का झुंड , जाने किस दुनिया में लीन था| अधिकतर विदेशी लग रहे थे| जाने किस शांति की तलाश थी उन्हें| बहुत सारे दुःख दर्द होंगे , तभी मन से वे उस लोक का विचरण कर रहे थे जहाँ उनका अवचेतन मन सब कुछ भूल जाना चाहता था| उन विदेशियों के बीच थे कुछ मासूम भारतीय चेहरे जो स्वेच्छा से तो नहीं ही आए होंगे| अठारह उन्नीस साल के भारतीय बच्चे अशांति के उस स्तर तक नहीं जाते कि उन्हें खुद को भूलना पड़े| उन्हें डैनियल जैसे साधुओं ने यहाँ आकर झूमने को प्रेरित किया होगा|

सुमेधा बेसब्री से नलिन का इन्तेजार कर रही थी|

कुछ देर बाद नलिन डैनियल के साथ आता हुआ दिखा| सुमेधा कृष्ण की प्रतिमा की ओर मुड़कर खड़ी हो गयी और हाथ जोड़कर ”ओम क्लीं कृष्णाय नमः”का जप करने लगी मानो अपने कान्हा को कह रही हो कि मैं हूँ न आपकी भक्ति के लिए|

कुछ देर बाद जब वह मुड़ी तो देखा कि नलिन उस झूमने वाले समूह का हिस्सा बना चुका है| सुमेधा की आँखें नम हो गयीं|

“अरे आप” कहता हुआ डैनियल सामने खड़ा था|

“मेरे बच्चे को बख्श दो डैनियल”, वह हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी|

“मैंने किया ही क्या है| संसार एक मायाजाल है, उस जाल से निकलने में मैं हेल्प करता हूँ और क्या”

“नहीं डैनियल, तुम्हें नहीं मालूम कि कितने घरों के अरमानों को ध्वस्त करते हो तुम| ये मासूम बच्चे जब अपने पेरेन्ट्स की छत्रछाया से दूर होते हैं तो नादान होते हैं| ईश्वर भक्ति में उन्हें कोई बुराई नजर नहीं आती इसलिये बात मान लेते हैं तुम्हारी| जीवन की मुख्य धारा से उन्हें अलग करने का प्रयास न करो|”

“अध्यात्म भी एक धारा है,” वह सुमेधा को आश्वस्त करना चाहता था|

“हर उम्र की धाराएँ अलग अलग होती हैं| अध्यात्म की धारा इन नादान बच्चों के लिए नहीं| क्या इस धारा में बहकर तुम खुश हो डैनियल? क्या तुम्हें अपने माता-पीता, भाई- बहन याद नहीं आते?”

अचानक वह कहीं खो गया| शायद अपने घरवालों को याद कर रहा था| उस वक्त वह भी वैसा ही मासूम दिख रहा था जैसे कि नलिन|

सुमेधा कहती जा रही थी,”मैं इसी धारा में अपने भाई को खो चुकी हूँ| घर और विवाह के प्रति उसकी विरक्ति ने हमारे घर को खोखला कर दिया| मुझसे मेरा बेटा मन छीनो डैनियल,” सुमेधा उस समय एक दयनीय याचक की तरह हाथ जोड़कर खड़ी थी|

अचानक डैनियल हँस पड़ा, “जाओ, तुम्हारा पुत्र तुम्हें वापस करता हूँ|”

“सिर्फ मेरा नहीं, इन सभी पढ़ने वाले बच्चों को छोड़ दो जो यहाँ बेसुध झूम रहे| मैं बाहर इन्तेजार कर रही”, कहकर सुमेधा बाहर निकल गई| कुछ देर बाद करीब दस बच्चों को लेकर वह बाहर आया| सभी बच्चों को सम्बोधित कर वह बोल रहा था,”अभी तुमलोगों की पढ़ने की उम्र है| कृष्ण भक्ति का यह मार्ग हमेशा खुला रहेगा| पहले माता पिता के सपनों को साकार करो बच्चों| जिस देश में ऐसी माँएँ हों वहाँ के बच्चों को मुख्यधारा से अलग नहीं किया सकता|”

सुमेधा सभी बच्चों को लेकर चली| कुछ दूर जाकर वह और नलिन पीछे मुड़े| डैनियल वहीं खड़ा उनलोगों को देख रहा था| दोनो ने वहीं से हाथ हिलाया, डैनियल ने भी हाथ हिलाकर उन्हें विदाई दी और मंदिर की ओर मुड़ गया|

अप्रकाशित और मौलिक

ऋता शेखर ‘मधु’

२९/०३/२०१९



यह कहानी है उन युवाओं की जो जीवन की मुख्य धारा से जाने अनजाने अलग हो जाते हैं|

शनिवार, 22 जून 2019

मल्लिका व अनंग शेखर छंद

मल्लिका छंद

21 21 21 21....(212 121 21)
1
दूब से मिलें गणेश।
प्रेम ने किया प्रवेश।।
दान मान ज्ञान संग।
श्वाँस श्वाँस मे उमंग।।
2
है जिया उदास आज।
वीतराग छेड़ साज।।
मंद मंद है समीर।
क्यों पपीहरा अधीर?।।
3
सिंधु में हजार सीप।
पास एक आस दीप।।
हाथ मे लिए गुलाब।
छंद की नई किताब।।
--ऋता शेखर मधु

अनंग शेखर छंद
12 (लघु गुरु) की सोलह आवृत्तियाँ... दो दो पंक्तियों के अंत तुकांत
🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁
सुनील आसमान में, घिरी घटा सुहावनी,पलाश झूमते रहे, मयूर नाचने लगे।
लता बनी लुभावनी, हवा हुई सुवासिनी,निशीथ प्रीत पात को, चकोर बाँचने लगे।।
गुलाल पीत रंग के ,पराग फूल से झरे ,विनीत बूँद श्रावणी, कली कली सँवारती।
सफ़ेद फेन धारती, हिमाद्रि से बही नदी,जटा हठात छोड़ती, हरी धरा पखारती ।।
🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁
--ऋता शेखर मधु

आप अच्छे हो - लघुकथा







लघुकथा-पितृदिवस पर आप अच्छे हो 

"निभा, कहाँ है हमारी लाडली बिटिया। देखो!हम तुम्हारे लिए क्या लाये हैं।" घर में घुसते ही नीलेश ने बड़े प्यार से तेज आवाज़ में कहा । सामने विभा खड़ी थी। उसने इशारे से बताया कि निभा अपने कमरे में है। आज दोपहर में निभा का बारहवीं के रिजल्ट आया था। उसका प्रतिशत सहपाठियों के मुकाबले काफ़ी कम था। जब से रिजल्ट आया था, वह आंखों में आँसू लिए बैठी थी। दिन का खाना भी नहीं खाया था उसने। उसकी मम्मी विभा ने नीलेश को फ़ोन करके सब बातें बतायी। 
"अरे, मेरी बिटिया कहाँ है" नीलेश ने बिल्कुल उसी अंदाज में कहा जैसे बचपन में वह बेटी के साथ खेला करता था और सामने देखकर भी नहीं देखने का नाटक किया करता था। निभा ने अपना सिर ऊपर नहीं किया। वैसे ही मूर्तिवत बैठी रही। 
"निभा, देखो मैं तुम्हारे लिए क्या लाया हूँ" कहते हुए नीलेश ने नन्हा सा टेड्डी निकाला और सामने रख दिया। निभा ने उदास नजर टेड्डी पर डाली। पहले की बात रहती तो वह नीलेश के गले लग जाती। 
"निभा, देखो मैं पटीज़ लाया हूँ और आइसक्रीम भी वही जो फ्लेवर तुम्हें पसन्द है।" यह कहकर उसने दोनों चीज़ें निभा के सामने रख दीं। 
"पापा, प्लीज, मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैंने आपके उम्मीदों को तोड़ा है। आपने मुझे हर सुविधा दी, और देखिए मैं कितनी नालायक निकली।" "मेरी बेटी और नालायक, कभी नहीं। मुझे सिर्फ तुम चाहिए बेटा। तुमने प्रयास किया वही हमारे लिए बहुत है...अब चलो, हमलोग जश्न मनाते हैं। विभा, इधर आ आओ" कहते हुए नीलेश ने निभा के मुंह में बड़ा सा चम्मच डाल दिया आइसक्रीम वाला। 
एकसाथ इतनी ठंडा आइसक्रीम मुंह में जाते ही वह उठकर पापा के गले लग कर जोर से रो पड़ी। नीलेश ने उसे रो लेने दिया।अब वह नन्हीं बच्ची नहीं थी जो फुसल जाती। नमी नीलेश की आँखों में भी उतरी पर वह खुशी बिटिया को वापस पा लेने की थी। 
अचानक निभा धीरे से बोली,"आप बहुत अच्छे हो पापा" निभा की गम्भीर आवाज ने नीलेश को अंदर से रुला दिया। --ऋता शेखर मधु

रविवार, 12 मई 2019

मातृदिवस

कल माँ पर लिखा...आज एक माँ लिखेगी ।

हम उनके दिलों में रहते हैं
इसको वे कहते नहीं
उनके काम बताते हैं

लेखनी थामी जब हाथों में
वे ब्लॉग बनाकर खड़े रहे
ममा को तुक की कमी न हो
शब्दों के व्यूह में पड़े रहे
shabdvyuh.com

हम उनके दिलों में रहते हैं
इसको वे कहते नहीं
उनके काम बताते हैं

जिसे फ़िजूलखर्च कहते हम
जरूरत उसको बतलाते हैं
थ्री जी से हम खुश थे बन्धु
वे फाइव जी दिलवाते हैं

हम उनके दिलों में रहते हैं
इसको वे कहते नहीं
उनके काम बताते हैं

हम जब देखे चादर अपनी
ट्रेन टिकट कटवा लाए
उनको दिखती सुविधा माँ की
बुकिंग प्लेन में करवाये

हम उनके दिलों में रहते हैं
इसको वे कहते नहीं
उनके काम बताते हैं

देख मायूसी चेहरे पर
घण्टों घण्टों बतियाते हैं
सिर रख करके गोदी में
बच्चे बन हठियाते हैं

हम उनके दिलों में रहते हैं
इसको वे कहते नहीं
उनके काम बताते हैं

तबियत जब जब नासाज़ हुई
रसोई उन्हीं के हाथ हुई
आती बिटिया खाना लेकर
जैसे मेरी माँ साथ हुई

हम उनके दिलों में रहते हैं
इसको वे कहते नहीं
उनके काम बताते हैं

ईश्वर से विनती है इतनी
आशीषों के फूल बिछा देना
आँचल की छाँव रहेगी मेरी
तुम बस धूल हटा देना
उनके सतरंगी सपनों में
सुगन्धित पवन मिला देना
बच्चे माँ के धन दौलत हैं
उनपर रक्षा कवच चढ़ा देना
😍😍😘😘
© ऋता शेखर 'मधु'
#mothersday

मंगलवार, 23 अप्रैल 2019

अभिनंदन राम का


अभिनंदन राम का

भारत की माटी ढूँढ रही
अपना प्यारा रघुनंदन

भारी भरकम बस्तों में
दुधिया किलकारी खोई
होड़ बढ़ी आगे बढ़ने की
लोरी भी थक कर सोई

महक उठे मन का आँगन
बिखरा दो केसर चंदन

वर्जनाओं की झूठी बेड़ी
ललनाएँ अब तोड़ रहीं
अहिल्या होना मंजूर नहीं
रेख नियति की मोड़ रहीं

विकल हुई मधुबन की बेली
राह तके सिया का वंदन

बदल रहे बोली विचार
आक्षेप बढ़े हैं ज्यादा
हे! धनुर्धारी पुरुषोत्तम
लौटा लाओ अब मर्यादा

श्रीराम जन्म के सोहर में
पुलक उठे हर क्रंदन

हर बालक में राम छुपे हों
हर बाला में सीता
चरण पादुका पूजें भाई
बहनें हों मन प्रीता

नवमी में हम करें राम का
धरती पर अभिनंदन
--ऋता शेखर 'मधु'

धरती को ब्याह रचाने दो

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धरती को ब्याह रचाने दो
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धरती ब्याह रचाती है
पीले पीले अमलतास से
हल्दी रस्म निभाती है
धानी चुनरी में टांक सितारे
गुलमोहर बन जाती है
देखो, धरती ब्याह रचाती है।


आसमान के चाँद सितारे
उसके भाई बन्धु हैं
लहराते आँचल पर निर्मल
बहता जाता सिंधु है
ओढ़ चुनरिया इंद्रधनुष की
देखो, धरती ब्याह रचाती है।

बने पुजारी सप्तऋषि
ऋचाएँ वेद सुनाती हैं
नन्दन कानन में वृक्ष लताएं
झूम झूम लहराती हैं
छुईमुई बन कर सिमटी हुई
देखो, धरती ब्याह रचाती है।

इंसानों ने छीन लिया है
उसकी ठंडी छाया को
खेतों में वह ढूँढ रही
स्वर्ण फसल की काया को
वहाँ खड़े भवनों में धरती
कैसे ब्याह रचाएगी ।

मखमली गलीचे दूर्वा के
धूमिल पड़े सड़कों के नीचे
पवन बसन्ती धुआँ धुआँ है
कलियाँ सूखीं अँखियाँ मीचे
वन्दनवार फिर कहाँ बनेंगे
सुमन-हार कहाँ से लाएगी

इंसानों!
लौटा दो सुषमा उसकी
पृथ्वी को स्वर्ग बनाने दो
हम सब नाचेंगे बन बाराती
धरती को ब्याह रचाने दो।
--ऋता

रविवार, 21 अप्रैल 2019

जागो वोटर जागो

जागो वोटर जागो

अपने मत का दान कर, चुनना है सरकार।
इसमें कहीं न चूक हो, याद रहे हर बार।।
याद रहे हर बार, सही सांसद लाना है।
जो करता हो काम, उसे ही जितवाना है।
सर्वोपरि है देश, जहाँ पलते हैं सपने।
'मधु' उन्नत रख सोच, चुनो तुम नेता अपने।।१

जिम्मेदारी आपकी, चुनने की सरकार।
सजग भाव से लीजिये, अपना यह अधिकार।।
अपना यह अधिकार, भला क्योंकर खोना है।
देकर अपना वोट, वहाँ शामिल होना है।
पक्की कर लो 'ऋता', चुनावी हिस्सेदारी।
चुनने की सरकार, हमारी जिम्मेदारी।।२

जागो नेता देश के, खूब बजाओ ढोल।
जी भर-भर के खोल दो, इक दूजे की पोल।।
इक दूजे की पोल, बड़ी लगती है प्यारी।
भाषाओं की लोच, निरीह लगे बेचारी।
त्यागो 'मधु' आलस्य को, वोट देने को भागो।
दो झूठों को सीख, देश की जनता जागो।।३

जनशासन में वोट का, सबको है अधिकार|
योग्य पात्र को तौलकर, बटन दबाओ यार||
बटन दबाओ यार, यही है भागीदारी |
दलबदलू के साथ ,न करना रिश्तेदारी|
स्वयं रहे जो नेक, निभाता वह अनुशासन|
'ऋता' है खुशनसीब, यहाँ पायी जनशासन||४

सारे नेता भ्रष्ट हैं, रखें न ऐसी सोच|
प्रजा कुशल है जौहरी, कहाँ रहे फिर लोच||
कहाँ रहे फिर लोच, परख कर लायें हीरा|
ढूँढ निकालें आप, उष्ट के मुँह से जीरा|
'मधु', तुम जाओ बूथ, वोट दो सुबह सवारे|
रखो न ऐसी सोच, भ्रष्ट हैं नेता सारे ||
--ऋता शेखर 'मधु' 

शनिवार, 20 अप्रैल 2019

आखिर ऐसा क्यों हुआ,समझाओ श्रीमान


गुलमोहर खिलता गया, जितना पाया ताप |
रे मन! नहीं निराश हो, पाकर के संताप |।१

उसने रौंदा था कभी, जिसको चींटी जान।
वही सामने है खड़ी, लेकर अपना मान।।२

रटते रटते कृष्ण को, राधा हुई उदास।
चातक के मन में रही, चन्द्र मिलन की आस।।३

रघुनन्दन के जन्म पर, सब पूजें हनुमान।
आखिर ऐसा क्यों हुआ,समझाओ श्रीमान।।४

आलस को अब त्याग कर, करो कर्म से प्यार।
घिस-घिस कर तलवार भी, पा जाती है धार।।५

जीवन है बहती नदी, जन्म मृत्यु दो कूल।
धारा को कम आँक कर, पाथर करता भूल।।६

ऋता




रविवार, 6 जनवरी 2019

ऐसा है उपहार कहाँ......

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ऐसा है उपहार कहाँ......

नया वर्ष तम सारे हर ले
ऐसा है उपहार कहाँ
चले संग जो सदा हमारे
वह जीवन का सार कहाँ
धरती की ज्वाला ठंडी हो
नदिया में वह धार कहाँ
बिन डगमग जो पार उतारे
वैसी है पतवार कहाँ
उठे हाथ जो सदा क्षमा को
ऐसे रहे विचार कहाँ
एक बात जो सर्वम्मत हो
वह सबको स्वीकार कहाँ
बिन बोले जो समझे सबकुछ
बहता है वह प्यार कहाँ
कोई न भूखा सो पाए
जग में वह भंडार कहाँ
अहसास हृदय को छू जाए
लेखन में व्यापार कहाँ
सिर्फ प्रीत के शब्द मिलें
होता ऐसा हर बार कहाँ
मन बन जाये रमता जोगी
मनु, सुन्दर संसार यहाँ।
-ऋता शेखर मधु

सोमवार, 31 दिसंबर 2018

दो लघुकथाएँ

1.
समझौता
घर में चाहे जितने भी बदलाव किए जाते मगर बैठक के मुख्य द्वार के एक ओर दो सजी कुर्सियाँ वापस रख दी जाती थीं| एक कुर्सी पर करीने से एक तुलसी माली टँगी रहती | दूसरी कुर्सी पर एक छड़ी, एक चश्मा और एक पेन रहते थे| सजावट के ख्याल से छड़ी पर सुनहरी मूठ लगवा दी गई थी और चश्मा को कलम के साथ सुन्दर पारदर्शक डब्बे में बंद किया गया था|

एक बार शरद ने पूछा था,' पापा, इन कुर्सियों पर रखी माला, छड़ी, कलम और चश्मे को हम अन्दर के शो बॉक्स में भी रख सकते हैं न, यहाँ ही क्यों?''
'बेटा, इन कुर्सियों पर मेरी माँ और पिताजी बैठा करते थे| जब भी मैं कुछ गलत करने की सोचता हूँ तो पिता जी की यह छड़ी मुझे धमकाती है| किसी गहरी समस्या पर सोचता हूँ तो चश्मा मुझे दूरदर्शिता रखने को कहता है| यह कलम मुझे कहती है कि कभी गलत काग़ज़ पर हस्ताक्षार न करना| माँ की माला धर्म की राह दिखाती है|'

'वह तो ठीक है पापा, पर अन्दर भी तो शो बॉक्स में रख सकते हैं न', शरद ने दोहराया|

'रख तो सकते हैं बेटा, फिर वह सजावट का सामान बन कर रह जाएगा| मुख्य द्वार पर बुज़ुर्गों के रहने का अहसास भी घर को कई आपदाओं से बचाता है| घर के सदस्य स्नेहाकर्षण से बँधे रहते हैं|'

तभी शरद का मोबाइल बज उठा| वहाँ शालिनी का नाम चमक रहा था|

'शरद, पापा ने यादों के कचरे को मेन डोर से हटाया या नहीं,' मोबाइल पर जोर से कही गई बहू की आवाज़ धीमे से दिनेश बाबू के कानों में पड़ गई| शरद का उत्तर जानने के लिए वे कुछ देर वहीं ठिठक गए|

'नहीं यार, लाख गुण हों हमारे बुज़ुर्गों में पर उन्हें समझौता करना नहीं आता,' अन्दर कमरे की ओर जाता हुआ शरद कह रहा था|

कुछ देर बाद शरद बाहर जाने के लिए दरवाजे पर पहुँचा तो वहाँ कुछ खाली खाली सा लगा| ध्यान देकर देखा तो दोनों कुर्सियाँ गायब थीं| अचकचा कर वह पापा, पापा बोलता हुआ उनके कमरे में गया| सामान सहित कुर्सियाँ वहीं रखी थीं| दिनेश बाबू के पलंग पर चारों ओर पुस्तक के पन्ने बिखरे पड़े थे और पुस्तक का मुखपृष्ठ उनके हाथों में था जिसे वे अपलक देख रहे थे|
अभी एक सप्ताह पहले ही दिनेश बाबू ने बड़े गर्व से 'मेरे बच्चे मेरा संस्कार' नामक अपनी पुस्तक को लोकार्पित किया था|

'पापा, ये क्या किया आपने?' विह्वल स्वर में शरद ने कहा|
'समझौता', दिनेश बाबू की आवाज़ स्थिर थी|

--ऋता शेखर 'मधु'
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2.
दर्द

फेसबुक पर सुमित्रा ने लिखा,
" कल मैंने एक सिनेमा देखा-हाउसफुल-3 जिसमें लँगड़ा, गूँगा और अँधा बनकर सभी पात्रों ने दर्शकों का खूब मनोरंजन किया..."
बस पाँच मिनट ही बीते थे यह लिखे हुए कि इनबॅाक्स की बत्ती जली|
ये तो तुषार का मेसेज है, सोचती हुई सुमित्रा ने मेसेज़ खोला|
'दीदी जी, विकलांग क्या मनोरंजन की वस्तु हैं? ' यह पढ़कर सुमित्रा का दिल धक् से रह गया| तुषार सुमित्रा का फेसबुक मित्र था| दोनों पैरों से लाचार तुषार कलम का धनी था| उसकी लिखी रचनाएँ बहुत लोकप्रिय होती थीं| अभी हाल में ही विकलांग कोटि के द्वारा उसकी नौकरी एक सरकारी विद्यालय में लगी थी|
अभी सुमित्रा सोच ही रही थी कि क्या जवाब दे, तुषार का दूसरा मेसेज़ आ गया|
'दीदी जी, स्वस्थ इंसान विकलांगों के दर्द कभी महसूस नहीं कर सकते तभी तो उनके किरदार निभाकर हास्य पैदा करते हैं|'
सुमित्रा ने कुछ सोचकर कर एक फ़ोटो पोस्ट किया जिसमें वह एक प्यारी सी लड़की के साथ खड़ी थी| उस लड़की की आँखें बहुत सुन्दर थीं|
'बहुत प्यारी बच्ची है दीदी, ये कौन है?'
'मेरी छोटी बहन जो देख नहीं सकती| समय से पूर्व जन्म लेने के कारण बहुत कमजोर थी तो इसे इन्क्युबेटर में रखा गया था| नर्स ने बिना आँखों पर रूई रखे उच्च पावर का बल्ब जलाकर
सेंक दे दिया जिससे इसकी आँखों की रौशनी छिन गई| यह बात तब पता चली जब वह आवाज होने पर अपनी प्रतिक्रिया तो देती थी किन्तु नजरें नहीं मोड़ती| यह पता चलने पर हमारे परिवार पर जो वज्रपात हुआ होगा वह तो तुम समझ सकते हो न तुषार| मैंने फेसबुक पर यह तो नहीं लिखा कि यह सिनेमा देखकर मुझे मजा आया|'
'सॉरी दीदी जी'
'सॉरी की बात नहीं तुषार, दर्द से हास्य पैदा करना ही तो दुनिया की आदत है| अब बताओ तो, विकलांग कौन है? '
तुषार ने खिलखिला कर हँसने वाली बड़ी सी स्माइली भेजी और सुमित्रा ने चैन की साँस ली|
--ऋता शेखर मधु 

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

कलकल नदिया है बही, छमछम चली बयार -कुंडलिया

कलकल नदिया है बही, छमछम चली बयार |
गिरिराज हैं अटल खड़े, लिए गगन विस्तार ||
लिए गगन विस्तार, हरी वसुधा मुस्काई ,
दूर्वा पर की ओस, धूप देख कुम्हलाई ||
तितली मधु को देख, मटक जाती है हरपल ,
छमछम चली बयार, बही है नदिया कलकल ||

गरिमा बढ़ती कार्य से, होता है गुणगान |
जग में सूरज चाँद सम, मिले सदा सम्मान||
मिले सदा सम्मान, नाम जग में होता है,
करते जो आलस्य, स्वप्न उनका खोता है |
ऋता करे स्वीकार, सतत प्रयत्न की महिमा,
होता गुणगान, कार्य से बढ़ती गरिमा ||

मन मन्दिर में शोभते, शिव सम सरल विचार |
सुधा-कलश को बाँटकर, गरल करें स्वीकार ||
गरल करें स्वीकार, जगत रौशन कर जाएँ ,
शीतल विल्व समान, मनः संताप मिटाएँ ||
मधु फूलों के बाग, सोहते ऋतु मगसिर में ,
शिव सम सरल विचार, शोभते मन मन्दिर में||

क्रंदन दिल को चीर कर, ढूँढे दृग की राह |
जाने टूटे स्वप्न हैं, या दरकी है चाह ||
या दरकी है चाह, व्यंग्य की सुन सुन बातें ,
मन को देतीं दंश, विरह की काली रातें ||
रजत किरण की धार, रोम को देतीं स्पंदन,
मनभावन वह चंद्र, सोखता दिल का क्रंदन||

संबोधन के शब्द में, होते गहरे राज|
कर्कश, नम्र, विनीत या, कहीं दिखाते नाज ||
कहीं दिखाते नाज, कुसुम बन कर सजते हैं,
सही बँधे जब तार , सप्तसुर ही बजते हैं |
'मधु' ये रखना ध्यान, कर्णप्रिय हो उद्बोधन,
होगी अच्छी सोच, मधुर होंगे संबोधन||

--ऋता शेखर 'मधु'

मन के भीतर धैर्य हो, अधरों पर मुस्कान-कुंडलिया

जीवन यात्रा अनवरत, चली सांस के साथ |
मध्यम या फिर तीव्र गति, स्वप्न उठाती माथ ||
स्वप्न उठाती माथ, कभी रोती या हँसती |
करती जाती यत्न, राह से कभी न हटती|
पढ़ कर हर पग पाठ,'ऋता'' बनती है छात्रा|
चुक जाएगी सा़ंस, रुकेगी जीवन यात्रा||

जिनके हिय में हरि बसे, वे हैं साधु समान|
परहित को तत्पर रहें, लेकर के संज्ञान|| 
लेकर के संज्ञान, स्वयं आगे आ जाते |
भेदभाव को छोड़, सबको गले लगाते |
' मधु डूबी मझधार, सहारा बनते तिनके|
होते साधु समान, हृदय में हरि हैं जिनके ||'

ममता की जो खान है, घर की है वह जान |
बिन बोले सब कुछ सहे, त्यागे निज अरमान ||
त्यागे निज अरमान, उसे कहते हैं नारी |
बेलन, शिक्षा के साथ, जीतती दुनिया सारी ||
'मधु'को होता गर्व, देखकर उनकी क्षमता |
मन की वह मज़बूत, जोड़ती जाती ममता ||

माना जीवन -पथ नहीं, होता है आसान।
मन के भीतर धैर्य हो, अधरों पर मुस्कान।।
अधरों पर मुस्कान, राह को सरल बनाती,
खग -गुंजन के साथ, ऋचा वेदों की आती।।
भोर-निशा का राज, प्रकृति से हमने जाना।
पतझर संग बसन्त,राह जीवन की माना।

-ऋता शेखर 'मधु'





सोमवार, 12 नवंबर 2018

नैतिकता - लघुकथा


"ममा, आप पटाख़े ले आये, शाम को दो घण्टे का समय रखा गया है जहाँ सब मिलकर पटाख़े फोड़ेंगे"

"हाँ बेटा, सब तरह के पटाख़े लायी हूँ। सुतली बम, रॉकेट बम, धरती बम, आलू बम, मल्टीकलर फुलझड़ियां...सब कुछ।"


"ममा, आप कितने अच्छे हो। लव यू ममा। समय हो रहा पार्क में इकट्ठा होने का। आप तैयार हो जाएं, मैं भी आ रहा हूँ।"

पार्क में जाते हुए ममा ने मोबाइल ऑन किया।

छह सौ लाइक और पाँच सौ कमेंट्स आ चुके थे उनकी दस मिनट पहले डाली गई इस पोस्ट पर,
" पटाखों से वायु प्रदूषण होता है, बुज़ुर्ग, बच्चों और पशुओं का ख्याल रखें। पर्यावरण को शुद्ध रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।"
-ऋता

होते हैं दिखते नहीं, होते कई हजार



होते हैं दिखते नहीं, होते कई हजार।
मन के भीतर के बने, तोरण वाले द्वार।।
तोरण वाले द्वार,सहज होकर खुल जाते।
मन के जो शालीन, मार्गदर्शक बन आते।
कहे ऋता यह बात, व्यंग्य से रिश्ते खोते।
हवा गर्म या सर्द, नहीं दिखते पर होते।।
===========================

नारंगी शुभता रचे, श्वेत दलों के साथ।
धरती पर गिरकर चढ़ें, शंकर जी के माथ।।
शंकर जी के माथ, निखर कर ये इतराते।
लिए समर्पण भाव, गौरवान्वित हो जाते।
मधुर धुनों के बीच, छाप छोड़े सारंगी।
पारिजात के मध्य, रचे शुभता नारंगी।।
=========================

रातें ज्यों सूनी हुईं, पसर गयी है याद।
पल पल युग युग सा लगे, नीरव हैं संवाद।।
नीरव हैं संवाद, हृदय दूर कहीं भटके।
चिंतन की भरमार, लगाते सौ सौ झटके।
ऋता बघारे ज्ञान, मधुर हैं उसकी बातें।
विचरण करते छंद, हुईं सूनी ज्यों रातें।।

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धरती की है सम्पदा, हरे हरे ये पेड़
रे मनुज! निज स्वार्थवश, तू मत इनको छेड़।।
तू मत इनको छेड़, रूठ जाएगी छाया।
सूखेंगे जब खेत, चली जाएगी माया।
छींट ऋता कुछ बीज, जहाँ धरती है परती।
बढ़े मनुज की कीर्ति, हरी हो ज्यों ज्यों धरती।।
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बालक हो या बालिका, दोनों हैं अभिमान।
एकरूप शिक्षा मिले, इतना रखिए ध्यान।।
इतना रखिए ध्यान, पुष्ट हो जाएं तन से।
नज़रों से सम्मान, शिष्टता छलके मन से।
ऋता कहे यह बात, वही है अच्छा पालक।
सदा रखे समभाव, बालिका या हो बालक।।
===========================

बुधवार, 24 अक्टूबर 2018

शरद चाँदनी

गीत का प्रयास

मौसम की आवाजाही में
हवा सर्द या हुई गरम

शरद चाँदनी शीतल बगिया
चमक उठे दुधिया कचनार
पुष्पदलों के हिंडोलों पर
झूल रहे नन्हें तुषार
अन्दर बाहर होती साँसें
अहसासों को करें नरम

शांत चित्त स्थिर मन प्याला
श्वेत क्षीर पर अमृत वर्षा
मेवा केसर पिस्ता मिलकर
दुग्ध अन्न का कण कण हर्षा
मुरली की मीठी धुन पर
दौड़ी राधा छोड़ शरम

जित देखें तित कान्हा दिखते
सभी गोपियाँ हुईं मगन
राधे राधे जपते कान्हा
एकाकार हुई प्रेम लगन
महारास की पावन बेला में
सुख की अनुभूति बनी परम

मन के सारे द्वेष मिटाकर
प्रभु में अपना ध्यान लगा
पूर्ण चन्द्र की सुन्दरता में
तन में आभा का ज्ञान सजा
इहलोक की झूठी माया से
स्वयं ही मिट जाएगा भरम

मौसम की आवाजाही में
हवा सर्द या हुई गरम

-ऋता

रविवार, 30 सितंबर 2018

धातु के बरतन - लघुकथा

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धातु के बरतन

सास और बहू का घर अलग अलग शहरों में था।


"मम्मी जी, आपने मलने के लिए सारे बर्तन बाई को दे दिए। बर्तनों पर खरोंच आएगी तो भद्दे दिखेंगे।" बर्तनों का अंबार देखकर सास के घर आई बहु आश्चर्य से बोल पड़ी।

"नहीं बहु, तेज रगड़ से ये और भी चमक उठेंगे, धातु के हैं न।"

"मम्मी जी, हमारे यहाँ तो आधे से अधिक बर्तन मुझे ही साफ करने होते हैं। काँच के शौफ़ियाना बर्तन, नॉन स्टिक तवा कड़ाही, ये सब बाई को नहीं दे सकती। खरोंच लगा देगी या काँच का एक भी गिलास या कटोरी टूट गयी तो डिनर सेट खराब हो जाएगा।"

"तभी तो आजकल के रिश्ते भी नर्म और नाजुक हो गए हैं। क्रोध या अहम की हल्की खरोंच भी उन्हें बदरंग कर सकती है।"

"क्यों, पहले रिश्ते बदरंग नहीं होते थे क्या मम्मी जी।"

"होते थे, पर उन रिश्तों को संभालने के लिए प्यार के साथ कठोरता से भी काम लिया जाता था और उनमें निखार बढ़ता जाता था। धातु के बर्तनों को अपने गिरने या रगड़े जाने की परवाह नहीं होती । "
-ऋता

शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

राशिफल - लघुकथा

राशिफल

सुबह के पाँच बजे से सुनंदा की दिनचर्या शुरू हो जाती। सबसे पहले बच्चों के मनपसन्द नाश्ते और लंच बनाती। उन्हें पैक करती। उधर बच्चे स्कूल के लिए स्वयं तैयार हो जाते। इतना करते हुए छह बज जाते और पतिदेव सुरेश भी तबतक उठकर चाय की फरमाइश कर देते। सास, ससुर और पति के लिए वह एक साथ ही चाय बनाती। इस दौरान उसके कान बालकनी की तरफ लगे रहते जहां गोल गोल मुड़ा ,नन्ही रस्सी में बंधा अखबार 'टप' से गिरता और वह दौड़ लगाकर बालकनी में पहुँच जाती क्योंकि एक बार अखबार पतिदेव के हाथ लगी तो मिलने से रही।
जल्दी जल्दी तीन चार पन्ने पलटती, कुछ पढ़ती और वापस अखबार मेज पर रखकर रसोई में लौट जाती। ऑफिस जाने के समय पति जब बाहर निकलने लगे तो सुनंदा ने धीरे से कहा,"आज वाणी और क्रोध पर नियंत्रण रखना उचित रहेगा। ऐसा आपकी राशि में लिखा है।"
पति के क्रोधी स्वभाव से वह हमेशा सशंकित रहती थी।सुनंदा की ओर कड़ी नजर से देखकर सुरेश चले गए।
"बहु, राशिफल में आज धनप्राप्ति का भी योग है, ये क्यों नहीं बताया सुरेश को" , सास ने अखबार पढ़ते हुए पूछा।
सुनंदा मुस्कुराकर चुप रह गई।
शाम को सुरेश घर आये तो बहुत खुश थे। आते ही माँ को बताया," आज मुझे एक नई प्रोजेक्ट मिली है"
"बेटा, आज के राशिफल में यह भी लिखा था जिसे सुनंदा ने नहीं बताया।"
"माँ, आज ऑफिस जाते ही बॉस किसी बात पर उलझ गया। मैं भी उससे बड़ी बहस करना चाह रहा था तभी सुनंदा की बात याद आ गई और मैन धैर्य से काम लिया।उसके बाद बॉस ने वह प्रोजेक्ट मुझे ही देने का फैसला किया"
"अरे वाह !" कहती हुई सास ने बहु को हल्की मुस्कान के साथ देखा
"धनप्राप्ति से अधिक महत्वपूर्ण व्यवहार पर नियंत्रण है, मान गए तुम्हारी सोच को बहु।"
"जी" कहकर सुनंदा ने मेज पर गरम गरम चाय और पकौड़े रख दिये।
-ऋता

प्रॉपर्टी - लघुकथा

प्रॉपर्टी

"अभी आ रही हो, इतनी रात गए कहाँ थी तुम?"
"मैं तुम्हारी प्रॉपर्टी नहीं जो तुम मुझपर बन्धन लगाओ"
"प्रॉपर्टी कैसे नहीं, तुम्हारे पिता ने तुम्हे दान दिया है मुझे। तुम्हारे प्रति जिम्मेदारी है मेरी"
"अब भूल जाओ, कोर्ट ने धारा 497 हटाते हुए कहा है कि पत्नी पति की प्रॉपर्टी नहीं"
"हम्म"
"सुनो, कल तुम मेरे साथ चलना। पड़ोस में जो नया आदमी आया है, मुझे अजीब नजरों से घूरता है। तुम्हे मेरा साथ देखेगा तो डरेगा"
"रक्षा तो अपनी प्रॉपर्टी की की जाती है"
-ऋता

गुरुवार, 20 सितंबर 2018

देह का तिलस्म - कहानी


देह का तिलस्म

चारों ओर निशा पसरी हुई थी| निशा के स्याह आँचल पर नन्हें नन्हें सितारे जगमग कर उसकी सुन्दरता बढ़ा रहे थे| एक पूरा चाँद मुस्कुराता हुआ निशा के साँवले मुख को अलौकिक सुन्दरता प्रदान कर रहा था| सृष्टि के निर्माता ब्रम्हा जी धरती पर सागर के किनारे एकांत में बैठे विचारमग्न थे| सिर्फ धरती का कठौर तल, हहराते सागर, चमकता सूर्य, लुभावने सितारे. शातल चाँद के अलावा भी कुछ चाहिए था जो पूरी सृष्टि को मनभावन और चलायमान बना सके| यह सोचते हुए ब्रम्हा जी हाथों में भीगे रेत लेकर सके गोले बनाने लगे| उसे विभिन्न आकार देकर कुछ को धरती पर रहने लायक गढ़ते, कुछ आकार जो समुद्र में रह सकें और कुछ को आसमान में उड़ने लायक बनाया| अब उनकी कल्पना में वे सारे आकार चलने , उड़ने और तैरने लगे| हर गढ़न में अब उन्हें यह ख्याल भी रखना था कि वे शरीर की वृद्धि करें और बाद में खुद जैसे जीवों का निर्माण भी करें ताकि उनकी कृतियों का अस्तित्व बना रहे| अब सवाल यह था कि इन सभी कृतियों में जीवन कैसे भरें| ये तो मात्र देह का निर्माण हुआ था| सोचते सोचते उन्होंने एक प्रकाश पुंज का निर्माण किया| वह पुंज ब्रम्हा जी के सामने आकर पूछने लगा,’प्रभु, मेरे अवतरण का प्रयोजन क्या है’

‘तुम सभी अदृश्य टुकड़ों में विभाजित हो जाओ और अपने पसंद की आकृतियों में समा जाओ| तुम्हारे समाहित होने से ये सभी आकृतियाँ जीवित हो जाएँगी|’’

‘’ लेकिन प्रभु, हम उन आकृतियों में कब तक कैद रहेंगे?’’

‘’सभी आकृतियों का निश्चित जीवन काल होगा| उसके बाद तुम्हें शरीर से मुक्ति मिल जाएगी| ज्योंहि तुम बाहर निकलोगे, वे आकृतियाँ मृत कहलाएँगी| जब तक तुम देह के अन्दर रहोगे, आत्मा या प्राण कहलाओगे|’’

‘’हे प्रभु! इतना बता दीजिए कि हम देह में समाने के बाद क्या व्यवहार करेंगे|’’

‘’पहले तुम सभी आत्माएँ अपनी देह धारण करो| उस देह के अनुरूप जो आचरण उचित होगा वही करना|’’

सभी आत्माओं ने एक एक आकृति ले ली| अब उस निर्जीव निस्तब्ध स्थान पर हलचल मच गयी|तरह तरह की ध्वनियाँ वातावरण में गुँजायमान हो गईं| कुछ वहीं धरती पर उछल कूद करने लगे, कुछ सागर में उतरकर मजे से तैरने लगीं| कुछ ने पंखों का इस्तेमाल किया और आकाश में उड़ गए| ब्रह्मा जी सब देखकर आनंदित होने लगे| तभी एक देह ने दूसरे पर हमला किया और उसकी देह को क्षत विक्षत कर दिया| उस देह के अन्दर की आत्मा आजाद हो गई| किन्तु वह दुखी भी थी क्योंकि आजाद होने के क्रम में देह ने जो यातना झेली वह असहनीय थी| ब्रह्मा जी ने हमलावर प्राणी को बुलाया और पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया|

‘’प्रभु, मुझे जो आकृति मिली उसे पेट भरने के लिए दूसरे पशु की देह चाहिए थी,’ इसलिए मैंने उस अनुरूप आचरण किया|ब्रह्मा जी चुप रह गए क्योंकि इसमें उस शिकारी देह की कोई गल्ती नहीं थी| उसके निर्माता तो वही थे| उधर आसमान में उड़ने वाली एक देह ने अपने से छोटी देह वाली एक आकृति को गिरा दिया था| सृजन के साथ विध्वंस का सिलसिला होते देख ब्रह्मा जी चिंतामग्न हो गए|

अब वे ऐसी आकृति का निर्माण करना चाहते थे जो आपस में प्यार से रह सकें| इसी क्रम में दो नन्हीं आकृतियाँ गढ़ी गयीं जो बिल्कुल एक समान थीं| उन्हें समान बुद्धि और समान ताकत भर दिए| एक खासियत और दी कि वह अपनी जिह्वा का उपयोग करके तरह तरह की आवाजें निकाल सकते थे| अपनी इस कृति पर ब्रह्मा जी निहाल हो गए| उन्हें पूरा विश्वास था कि इन देहों में जाने वाले प्राण प्यार से रहेंगे| अब उन्होंने सृष्टि को आगे बढ़ाने के ख्याल से उनकी काया में थोढ़ा सुधार किया और दोनों मिलकर सृष्टि को आगे बढ़ा सकें, इसके लिए थोड़े से अंग परिवर्तन कर दिए| अब उन्होंने आत्माओं को आज्ञा दी कि अपनी पसंद की किसी देह में प्रविष्ट हो जाओ| आत्माओं ने प्रभु की आज्ञा का पालन किया और देः में प्रविष्ट हो गए| देह और आत्मा का यह साथ अत्यंत आह्लादकारी साबित हुआ| दोनों एक दूसरे की ओर आकर्षित हुए और प्रेमपूर्वक रमणीय स्थल चुनकर रहने लगे|

अब ब्रह्मा जी निश्चिंत हो गए कि उनका काम पूरा हो गया| आखिरकार उन्होंने देह और आत्मा का सुन्दर समायोजन कर लिया था|

दिन बीत चले समय आने पर दोनों काया ने मिलकर नयी काया का निर्माण किया| जिस काया ने नन्ही काया को खुद में समेटकर रखा था वह उसकी देखरेख में व्यस्त हो गई| स्वयं को उपेक्षित होता देख दूसरी काया नाराजगी जाहिर करने लगी| अब उनके बीच उपालम्भों का आदान प्रदान होने लगा| जब बात असह्य होने लगीतो दोनों अपनी शिकायतें लेकर प्रभु के पास पहुँचे| प्रभु ने उनकी बातें सुनी और कहा,’ तुम दोनों ने मेरी उम्मीद को धराशायी कर दिया| आखिर ये शिकायतें कैसी|’

‘प्रभु, आपने एक काया में ममता भरी और वह नम्रता सीख गयी| दूसरे में ताकत थी, वह अहंकारी हो गया,’ममतामयी काया कह उठी|

‘प्रभु, अब यह सवाल जवाब करने लगी है| उसने बुद्धि का उपयोग शुरू कर दिया है| मैं उसे तर्क से नहीं बल्कि ताकत से ही हरा सकता हूँ,’ये अहंकारी देह की आवाज थी|

‘क्या तुम दोनों आत्माएँ प्रेमपूर्वक नहीं रह सकतीं,’ प्रभु अपनी ही बनायी रचना के सामने विनीत भाव से बोले|

‘रह सकते हैं, जब हम इस देहरूपी बंधन से आजाद हो जाएँगे| जब तक हम दोनों के पास काया, वाणी और बुद्धि रहेगी, तर्क वितर्क चलते रहेंगे| इन सबके बावजूद भी हम एक दूसरे का ख्याल रखेंगे| यह देह का तिलस्म है प्रभु जी| अब आप भी इसमें कुछ नहीं कर सकते,’यह कहकर दोनों आत्माएँ ब्रह्मा को उनके ही तिलस्म में हैरान करके

एक दूसरे का हाथ पकड़कर मुस्कुराती हुई ओझल हो गईं|

-ऋता शेखर ‘मधु’

मानव तभी तक जीवित है जब तक उसके शरीर में आत्मा का वास है...वरना मृत है| आत्माओं का व्यवहार देह पाने के बाद बदल क्यों जाता है...चिंतन से उपजी एक कहानी आपको भी अवश्य पसंद आएगी|अपनी राय देंगे तो लेखन में सुधार जारी रहेगा, धन्यवाद मित्रों|

मंगलवार, 18 सितंबर 2018

पसंदगी की रेंज

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‘हलो, मिस्टर वर्मा, मैने शादी डॉट कॉम पर आपके पुत्र के बारे में पढ़ा| आपको मैं अपनी बेटी की आई डी भेजती हूँ| आप देख लें और पसन्द आए तो हमलोग रिश्ते के बारे में सोच सकते हैं,’ ऊधर से मधुर आवाज में एक महिला बोल रही थीं|

‘जी, बताइए, मैं अपनी ओर से देख ही लेता हूँ क्योंकि अभी ऑनलाइन हूँ| आप चाहें तो कुछ देर लाइन पर बनी रह सकती हैं,’ वर्मा जी ने कहा और साथ ही दिए गए आई डी पर क्लिक भी किया| वहाँ एक प्यारी सी लड़की मोहक मुसक्न से सजी दिख रही थी| पूरी प्रोफ़ाइल देखने के बाद वर्मा जी ने कहा’’, मैडम,लड़की मुझे तो पसन्द आ रही| अब आप अपनी बिटिया का मोबाइल नम्बर दीजिए|’’

‘क्या !,’उधर से अचंभित स्वर उभरा|

‘देखिए मैडम, वह जमाना गया जब माता पिता शादियाँ तय करते थे और बाद में बच्चों की राय ली जाती थी| बच्चे भी ज्यादा विरोध नहीं करते थे| अब बच्चे चुनाव करते हैं, बाद में माता पिता की राय ली जाती है| आप बिटिया का नम्बर दें, मैं अपने पुत्र आशु को दे दूँगा| अपनी सुविधा से दोनों बात कर लेंगे| यदि दोनों ने एक दूसरे के विचारों को पसन्द किया तो फिर हमलोग आगे की बात कर लेंगे| दोनों ही बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में उच्च पदों पर हैं| उनकी पसन्द ही सर्वोपरि है,’ थोड़े से आहत स्वर में मिस्टर वर्मा बोल रहे थे|

इसके पहले भी दो जगहों पर बात आगे बढ़ी थी| एक जगह लड़की ने छोड़ा क्योंकि उसे घर में किसी भी बड़े बुज़ुर्ग को रखना स्वीकार्य नहीं था| एक जगह लड़के ने छोड़ा क्योंकि लड़की ने अँग्रेजी स्कूल से शिक्षा प्राप्त नहीं की थी| मिस्टर वर्मा के अनुसार ये दोनों ही बातें कोई मायने नहीं रखती थीं|

“लड़की किसी के साथ नहीं रहना चाहती तो न रहे| समय के साथ और जरूरतों के अनुसार स्वयं सब ठीक हो जाता है| हर बात को गणित की तराजू पर तौलने से क्या डंडी सीथी मिलेगी ? नहीं न, पहले की शादियों में सामंजस्य बिठा ही लिया जाता था|”

“लेकिन पापा, हम सामंजस्य क्यों बिठाएँ| जब विचार ही नहीं मिलेंगे तो साथ कैसे रहेंगे,”वर्मा जी किसी भी दलील से पुत्र को नहीं समझा पाए|

‘आशु, जिस लड़की ने अँग्रेजी स्कूल से शिक्षा नहीं पाकर भी अपनी मेहनत के बल पर इतनी अच्छी नौकरी पाई है उसे तुम कमतर कैसे आँक सकते हो,’ उस दिन भी पिता पुत्र में वैचारिक मतभेद हो गया था| बाद में पिता ने ही चुप्पी का सहारा लिया|

मन में घुमड़ते हुए विचारों के समंदर में डूबे मिस्टर वर्मा यह भूल गए कि वह फ़ोन पर हैं|

“जी, मैं नम्बर दे देती हूँ,” यह सुनकर उनकी तन्द्रा टूटी|

उन्होंने नम्बर नोट किया और व्हाट्स एप पर आशु को भेज दिया| तुरन्त उभरी दो नीली रेखाओं ने संदेश पढ़ लिये जाने की चुगली कर दी| पहले इस तरह के संदेश पर आशु बिना विलम्ब के फ़ोन करता था किन्तु इस बार इन्तेज़ार के बाद भी उसने फ़ोन नहीं किया|

‘ अच्छा ही है, स्वयं बात कर लेगा तो बताएगा’, यह सोचकर वर्मा जी अपने काम में व्यस्त हो गए|

हर दिन बातें होतीं आशु से, पर उस लड़की के बारे में न पिता ने पूछा और न ही पुत्र ने बताया| एक दिन आशु ने कहा,”पापा, मैं एक महीने से लगातार उस लड़की से बात कर रहा हूँ| लगभग सभी विषयों पर हमारे विचार मिलते हैं| मुझे लगता है कि अब हमें आमने-सामने एक दूसरे से मिल लेना चाहिए| आप उसकी माँ को कहिए कि वह भी आ जाएँ और आप भी चलिए|”

सीधे सपाट शब्दों में कही गई बात वर्मा जी को अच्छी लगी| बेकार की संवेदनाओं में बहकर तो हमारी पीढ़ी बात करती थी| घर में ग़लत को कभी ग़लत कहने की हिम्मत नहीं होती थी|

दिन , समय, स्थान निश्चित किया गया| नियत समय पर सभी पहुँच गए| लड़की जैसी फ़ोटो में थी वैसी ही दिख रही थी| कुछ देर तक बातें हुई , उसके बाद आशु और वह लड़की थोड़ा अलग हट कर बातें करने लगे| वर्मा जी और लड़की की माँ ने तबतक विवाह की सारी रूपरेखा तय ली| घर में मण्डप सजेगा, शहनाइयाँ बजेंगी, इसकी प्रसन्नाता दोनों अभिभावकों को आह्लादित कर रही थी|

थोड़ी देर बाद दोनों वापस आ गए| दोनों के चेहरे पर तनाव की रेखाएँ साफ दिख रही थीं| वर्मा जी का दिल धड़क उठा| लक्षण ठीक नहीं लग रहे थे|

“पापा, अभी हम किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सकते| मैं अपना देश नहीं छोड़ सकता| यदि हमारे देश में कुछ कमी है तो हम सभी मिलकर सुधार सकते हैं| देश को हम सभी की जरूरत है| ये क्या बात हुई कि पढ़े लिखे हैं अपने भारत में और सपनों का घर सजाएँ विदेश की धरती पर| यह मुझसे नहीं होगा|”

लड़की सिर झुकाए सुन रही थी| उसने कुछ नहीं कहा| माँ भी कुछ कह पाने में असमर्थ थीं|

इस बार मिस्टर वर्मा ने पुत्र की पीठ को सराहना के भाव से थपथपा दिया| आज पुत्र को वह गर्व भरी दृष्टि से देख रहे थे| पूर्व के मतभेद की दीवार गिर चुकी थी|

औपचारिक अभिवादन के बाद सभी जाने के लिये दरवाजे की ओर बढ़े| आशु जल्दी ही वहाँ से निकल जाना चाहता था| उसका मन अपने आप से ही क्षुब्ध था| बातें करने के दौरान उसने कल्पना भी नहीं की थी कि विदेश में बस जाने का प्रस्ताव भी रखा जा सकता है वरना वह पहले ही नकार देता| उसका गणितीय समीकरण गलत साबित हो गया था पर पिता की थपथपाहट से कुछ शांति अनुभव कर रहा था|

“आशु, मैं तो बस तुम्हारी परीक्षा ले रही थी| मैं भी अपने देश से उतना ही प्यार करती हूँ जितना तुम|”

अचानक आई इस आवाज पर आशु ने पलट कर देखा| लड़की मुस्कुराती हुई खड़ी थी| इधर समधी समधन एक दूसरे को बधाइयाँ दे रहे थे|

-ऋता शेखर “मधु”

गुरुवार, 13 सितंबर 2018

हे अशोक


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हे अशोक !

वापस आकर
हे अशोक! तुम
शोकहरण
कहला जाओ

लूटपाट से सनी नगरिया
लगती मैली सबकी चदरिया
नैतिकता का उच्चार करो
सद्भावों का संचार करो

प्रीत नीर से
हे अशोक! तुम
जन जन को
नहला जाओ

जितने मुँह उतनी ही बातें
सहमा दिन चीखती रातें
मेघ हिचक जाते आने में
सूखी धरती वीराने में

हेमपुष्प से
हे अशोक! तुम
हर मन को
बहला जाओ

नकली मेहँदी नकली भोजन
पल में पाट रहे अब योजन
झूठ के धागे काते तकली
आँसू भी हो जाते नकली

हरित पात से
हे अशोक! तुम
कण कण को
सहला जाओ

भूमिजा को मिली थी छाया
रावण उसके पास न आया
फिर उपवन का निर्माण करो
हर बाला का सम्मान करो

वापस आकर
हे अशोक! तुम
शोकहरण
कहला जाओ
-ऋता शेखर ‘मधु’
यह रचना अनुभूति के अशोक विशेषांक पर प्रकाशित है...
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मंगलवार, 11 सितंबर 2018

पुत्रीरत्न

नवरात्र की पूजा पर बैठी नंदिनी ने मोबाइल बजते ही तत्परता से उठाया और बोल पड़ी,
" हलो, पापा, क्या हुआ है?"
"बेटा,बहुत बहुत बधाई ! तू बुआ बन गयी, काजल की रस्म के लिए यहाँ आने की तैयारी कर।"
" अरे वाह ! आपको भी दादा बनने की बहुत बधाई पापा। भाभी कैसी है और वो दोनों छुटकू किस रूप में अवतरित हुए हैं, ये भी बताइये।"
"एक पुत्ररत्न और एक लक्ष्मी, सोमेश की फ़ैमिली पूरी हो गई। बहुत प्यारा परिवार बन गया नन्दिनी," पापा ने नन्दिनी को जुड़वाँ जन्म लिए बच्चों के बारे में बताया।
" अरे वाह ! पर मैं आपसे नाराज हूँ पापा। आपने नवजात शिशुओं का परिचय ठीक से नहीं दिया|"
"अच्छा, तो यह बता दो क्या ग़लत कहा|"
"पुत्र को गणेश नहीं कहा पर बिटिया को लक्ष्मी कहकर अभी से ही देवी बना दिया आपने। पापा, नवरात्रि के पाठ से यह समझ पा रही हूँ कि स्त्री जीवन स्वयं एक चुनौती है जिसे वह साधारण मानवी के रूप में ही स्वीकार करता है। पढ़ाई, कमाई और सृष्टि निर्माण की शक्ति के समय उसे देवियों के रूप में जाना जा सकता है, पर अभी से क्यो?"
शायद पापा को भी यह बात तर्कसंगत लगी थी तभी  पूछे,"तो क्या कहकर परिचय देता"
"पुत्रीरत्न कहना था," कहकर नन्दिनी खिलखिला उठी।
"समझ गया, तू आरती कर देवियों की और फ़ोन जरा दामाद जी को दे।"
नन्दिनी ने स्पीकर ऑन किया तब पति को फोन दिया।
"सोमेश के जुड़वाँ बच्चों के जन्मोत्सव में आप और नन्दिनी आमन्त्रित हैं, अवश्य आइयेगा" पापा ने कहा।
"जी अवश्य, पर शिशुओं के परिचय तो दीजिये पापा जी।"
"एक पुत्ररत्न और एक पुत्रीरत्न",
यह सुनते ही नन्दिनी का चेहरा खिल गया और वह घंटी बजाकर गाने लगी, "जय अम्बे गौरी.....
-ऋता शेखर 'मधु'

सोमवार, 10 सितंबर 2018

अनकहा हो दर्द तब लावा पिघलता है


रजनी छंद गीतिका

इस जगत में जो सभी से प्रेम करता है
वह तपिश में चाँदनी बनकर उतरता है

ईश से जो भी मिले स्वीकार कर लेना
आसरा के साथ ही विश्वास रहता है

कोंपलें उगती वहीं झरते जहाँ पत्ते
रात के ही गर्भ से सूरज निकलता है

हो समर्पण भाव हरसिंगार के जैसा
देखना कैसे वहाँ पर प्यार पलता है

शांत हो, एकाग्र हो, कहते यहाँ सारे
अनकहा हो दर्द तब लावा पिघलता है

मन बसे हैं भाव दोनों राम या रावण
राम को जो जीतता पल पल निखरता है

-ऋता शेखर मधु

शनिवार, 1 सितंबर 2018

थेथर - लघुकथा

थेथर
सामने नाट्य प्रदर्शन के लिए मंच सजा है| परदा खुलता है|
प्रथम दृश्यः
एक शिक्षक वर्ग में बैठे हैं| उनके सामने कुछ बच्चे बैठे हैं|
‘बच्चों, आज हमलोग कुछ प्रतियोगिताएँ करवाएँगे, आशा है आप सभी अच्छा प्रदर्शन करोगे|’
‘जी सर, हम सभी उस प्रतियोगिता में भाग लेना चाहते हैं,’ दसवीं –ग्यारहवीं के बच्चे उत्साहपूर्वक बोले|
‘ठीक है बच्चों,हम आपको मिट्टी देंगे| आप सभी को एक एक मूर्ति बनानी है| जिसकी मूर्ति सबसे अच्छी होगी उसे इनाम दिया जाएगा|’
सभी बच्चे उत्साहपूर्वक अपने अपने स्थान पर खड़े हो गए| मूर्ति बनाने के लिए सबके पास सूखी मिट्टी से भरी बाल्टियाँ रख दी गईं|
शिक्षक का किरदार निभा रहे बच्चे ने कहा,’ अब आपलोग मूर्तियाँ बनाना शुरू करों|’
सभी बच्चे एक दूसरे को देखने लगे| अपने सामने मिट्टी का ढेर लगाकर उन्होंने पूछा,’ सर मूर्ति कैसे बनाएँ?’
‘क्यों, क्या दिक्कत है’ हल्की मुस्कान के साथ टीचर जी बोले|
‘हमे पानी नहीं दिया गया है, फिर कैसे बनेंगी मूर्तियाँ सूखी मिट्टी से,’ लगभग सभी एक स्वर में बोल पड़े|
तब तक तेज रौशनी वाला बल्ब मंच पर जला| कुछ देर में ही मंच का तापमान काफी बढ़ गया| बच्चे गर्मी से परेशान हो गए|
‘सर, बल्ब ऑफ़ करवाइये, पसीना हो रहा,’ बच्चों की तेज आवाज़ आई|
तभी एक बच्चा, दिनकर चिल्लाया,’ रुकिए सर, बस दो मिनट’
उसने एक रुमाल निकाला| चेहरा और हाथों को पोंछा| रुमाल तरबतर हो गया| फिर उसने पसीने की बूँदों को थोड़ी सी मिट्टी पर निचोड़ दिया| अब उस भीगी मिट्टी से उसने एक डंडी बनाई और उसपर नन्हीं नन्हीं बालियाँ लटका दीं|
मंच का बल्ब बन्द कर दिया गया था किन्तु वातावरण अभी भी गर्म था| मिट्टी की संरचना सूख गई| दिनकर ने पीले रंग से उसे रंग दिया|
पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा| तभी सूत्रधार के रूप में एक कलाकार का पदार्पण हुआ|
‘ मित्रों, हमारी धरती अब सिर्फ सूखी मिट्टी बन चुकी है| बिना बारिश के वह अनाज कैसे पैदा करे यह विचारणीय है| बारिश का पानी रोकने का कोई उपाय नहीं क्योंकि हम सभी धड़ाधड़ जंगल और पेड़ काटते चले जा रहे हैं| जैसे दिनकर ने अपने पसीने से गेहूँ की बालियाँ बनाईं वैसे ही हमारे श्रमिक भी कार्य करते हैं| किंतु सूरज के बढ़ते तापमान ने सब कुछ निगल लिया है| हमारा संदेश आप दर्शकों तक पहुँच पाए, इसी में इस मंचन की सार्थकता है|” दर्शकों ने तालियाँ बजाकर मंचन का स्वागत किया|

द्वितीय दृश्यः
मंच पर दर्शकों की भीड़ नजर आई| उनके बीच से एक आवाज आई,
’ कितने भी मंचन कर लो, इंसानों की प्रजाति थेथर हो चुकी है|’ साथ ही सम्मिलित हँसी की आवाज से नाट्य कलाकारों के चेहरों पर उदासी के भाव तिर गए|
-ऋता शेखर ‘मधु’